गुरुवार, 9 जून 2011

फलसफा अपनी मोहब्बत का...


ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे ,
किसे क्या खबर है कहाँ टूट जाएँ ,
मोहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के ,
न जाने ये किस मोड़ पर डूब जाएँ !

अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी ,
हर एक मोड़ मौसम नयी ख्वाहिशों का ,
लगाये हैं हमने भी सपनो के पौधे ,
मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का !

मुरादों की मंजिल के सपनो में खोये ,
मोहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे ,
ज़रा दूर चल के जो आँखें खुली तो ,
कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे !

जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा ,
नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से ,
रवायत है शायद ये सदियों पुराणी ,
शिकायत नहीं है कोई ज़िंदगी से !

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