रविवार, 26 जून 2011

ग़ज़ल...


वो जब मिलता है दुनिया बदल जाती है,
उस के पहलु में ज़िन्दगी बहल जाती है....

अपने दिल में बला की सादगी रखता है,
चालाकियां बहुत दूर से निकल जाती है...

तुझे पाने के लिए क्या हमें खोना होगा,
इसी हिसाब में ज़िन्दगी फिसल जाती है...

जरा उसकी यादों की जादूगरी तो देखो,
बना कर खंडहर को ताज महल जाती है.....

न आह, न वाह, न दाद मिली किसी की,
देख रुसवा सी 'आकाश' तेरी ग़ज़ल जाती है...!!

1 टिप्पणी:

  1. भावो के स्तर पर इतना गहरा और बिम्बों में इतना खूबसूरत आकाश ही लिख सकते हैं...आप को पढ़कर मन में कोई विवेचना नहीं उभरी ..एक खूबसूरत अहसास पंक्ति दर पंक्ति उभर कर दिलो दिमाग पर छा गया...कोई एक शेर नहीं अपितु पूरी गजल कोट करने लायक है..

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