बुधवार, 10 अगस्त 2011

ये कैसी लाचारी है...

सब के सब चुपचाप खड़े हैं, ये कैसी लाचारी हैं,
तानाशाही लगता हैं की लोकतंत्र पर भारी हैं !

झूट कपट वालों ने देखो सच्चाई को मारा हैं,
काले अंगरेजों से फिर दिल्ली में गाँधी हारा हैं !

योग गुरु बाबा को नेताओं ने कैसा रूप दिया,
राजनीती ने मानो सत्याग्रह के मूह पर थूक दिया !

बड़े इशारे पाकर के वर्दी ने ऐसा है काम किया,
दिल्ली की मिटटी को मासूमों के खूं से लाल किया !

रामलीला मैदान में जलियाँ वाली हुई कहानी हैं,
ये सरकार तो भारत में डायर की आज निशानी हैं !

कभी बाबाओ, कभी छात्रो पर लाठियां बरसी हैं,
लेकिन हर कराह पर देश के युवा रणभेरी गरजी हैं!

है इतिहास गवाह कि युवाओं कि हुंकार बुरी,
जब-जब रगों में जोश दौड़ा, है सरकार गिरी!

राजभवन में देशद्रोहियों को जैसे इनाम मिला,
संसद हमले के आरोपी को भी सम्मान मिला !

राजभवन में बैठे नेता सारे अब तुम संभल जाओ,
इससे पहले हम बदलें तुम अपने आप बदल जाओ !

ऐसा ना हो भगत सिंह कही फिर बंदूकें बो जाये,
बदला लेने की खातिर जिंदा उधम सिंह हो जाये !

दरबारों के परपंचो से धीरज मेरा भी डोल गया,
सच की खातिर आज मै भी मरने की भाषा बोल गया..!!

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