मंगलवार, 23 अगस्त 2011

शहर के लोग

पहले दिलो-दिमाग पर छाये शहर के लोग,

लगने लगे हैं अब तो पराये शहर के लोग।


मैं तो पढ़ा गया हूँ अखबार की तरह,

मेरी ही बात मुझसे छुपाये शहर के लोग।


बन गये हैं अब वहीं आखों की ही किरकिरी,

पहले थे जो आखों में समाये शहर के लोग।


सड़कों पे घूमता हूँ महज एक लाश बन,

हक दोस्ती का खूब निभाये शहर के लोग।


इस छोर से उस छोर तक बारूद बन गयी,

छोटी सी बात सर पे उठाये शहर के लोग।


ऊँची इमारतों की तरफ देख रहा हूँ
,

लगते हैं बनावटीपन से सजाये शहर के लोग।।


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