शनिवार, 24 सितंबर 2011

छायी फिर से बहार हो जैसे...

"छायी फिर से बहार हो जैसे
हल्का हल्का खुमार हो जैसे

रात भर थे तुम ही ख्यालों मे
दिल को तुमसे ही प्यार हो जैसे

बात ऐसी वो कह गया सब से
बस मेरा ऐतबार हो जैसे

हर घडी देखता हैं वो मुझको
रखता मेरा ख्याल हो जैसे

कितने खामोश है लब उसके
दिल मे कोई गुबार हो जैसे

जुस्तजू में तेरी रहा हर दिन
वो कोई ख़ाक सार हो जैसे

रहती है बस नमी सी आँखों मे
अब भी कोई इन्तजार हो जैसे

मर के भी नाम था तेरा लब पे
जाँ ये तुझ पे निसार हो जैसे....!"

1 टिप्पणी:

  1. मूर्ख आदमी औरों की लिखी हुई ग़ज़लें अपने नाम से पोस्ट कर रहे हो
    क्या दुसरे का थूका हुआ चाटने से कभी प्यास बुझती है
    यहाँ कोई भी ग़ज़ल तुम्हारी लिखी नहीं है बनते शायर हो

    उत्तर देंहटाएं

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