लेबल
- कविता.. (103)
- शायरी.. (42)
- लेख.. (31)
- अपनी बेबाकी... (21)
- Special Occassion (8)
- समाचार (7)
- तथ्य.. (2)
शुक्रवार, 9 मार्च 2012
आंकड़ों की गवाही में भी बड़े खिलाड़ी हैं राहुल द्रविड़
क्रिकेट के खेल में आंकड़ों की महत्ता का अंदाजी इसी से लगाया जाता है कि वह सीधे तौर पर खिलाड़ी की अपनी मेहनत को दर्शाता है। आंकड़ों की तरह द्रविड़ का व्यक्तित्व और उनका पेशेवर करियर इस बात का इशारा करता है कि वह भारतीय ही नहीं विश्व क्रिकेट के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं। ऐसे में द्रविड़ का संन्यास एक ऐसा खालीपन लेकर आया है, जिसमें परंपरागत क्रिकेट को चाहने वाले सबसे अधिक निराश होंगे।
विशुद्ध किताबी शॉट खेलने वाले द्रविड़ ने भारत के लिए 344 एकदिवसीय और 164 टेस्ट मैच खेले हैं। क्रिकेट के दोनों स्वरूपों में द्रविड़ के नाम 10 हजार से अधिक रन हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ ने जहां सचिन तेंदुलकर के बाद सबसे अधिक 13288 रन बनाए हैं वहीं एकदिवसीय मैचों में उनके नाम 10889 रन हैं। भले ही रन तेजी से बनाने के लिए द्रविड़ को न जाना जाता हो पर यह भी सत्य है कि एकदिवसीय/टी-20 मैचों में भारतीय बल्लेबाजों में वह सबसे तेज पचासा लगाने वालों में तीसरा स्थान रखते हैं। उनसे आगे केवल युवराज सिंह (12 गेंद), अजीत आगरकर (20 गेंद) हैं, जबिक द्रविड़ ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 22 गेंदों में अपना पचासा जड़ा था।
फटाफट खेल से इतर पारम्परिक खेल टेस्ट मैच में द्रविड़ ने 36 शतक और 63 अर्धशतक लगाए हैं। शतकों की दौड़ में वह दूसरे सबसे सफल भारतीय बल्लेबाज हैं। सचिन तेंदुलकर ने उनसे अधिक 51 शतक लगाए हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ के नाम सबसे अधिक 210 कैच लपकने का रिकार्ड है। एकदिवसीय मैचों में द्रविड़ के नाम 12 शतक और 83 अर्धशतक हैं। उन्होंने 196 कैच लपके हैं। विकेटकीपर के तौर पर द्रविड़ ने एकदिवसीय मैचों में 14 स्टम्प भी किए हैं। सचिन की तरह द्रविड़ ने भी एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय ट्वेंटी-20 मैच खेला है, जिसमें उनके नाम 31 रन दर्ज हैं।
वर्ष 1996 में लॉर्ड्स में 95 रनों की पारी के साथ अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले द्रविड़ ने अपना अंतिम टेस्ट 24 जनवरी को एडिलेड में आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था। क्रिकेट जगत में 'द वॉल' और 'मिस्टर भरोसेमंद' जैसे विशेषणों से नवाजे गए द्रविड़ भारत के अलावा स्कॉटलैंड, एशिया एकादश, आईसीसी विश्व एकादश, एमसीसी और इंडियन प्रीमियर लीग में रॉयल बैंगलोर चैलेंजर्स और राजस्थान रॉयल्स के लिए खेले हैं।
उल्लेखनीय है कि बेंगलुरू के सेंट जोसफ हाई स्कूल से निकलकर पहले कर्नाटक और फिर भारत के लिए खेलने वाले द्रविड़ ने अपने 20 साल के क्रिकेट करियर में सबका प्यार पाया और उस प्यार के तोहफे के तौर पर देश के लिए कई नायाब पारियां खेलीं। एक वक्त ऐसा था जब भारत के क्रिकेट प्रेमी यह मानते थे कि कोई विकेट पर टिके या न टिके द्रविड़ जरूर टिकेंगे और द्रविड़ ने इस विश्वास को कायम रखते हुए अपने लिए सबके दिलों में एक खास जगह बनाई।
हिन्दुस्थान समाचार/09.03.2012/आकाश।
शुक्रवार, 2 मार्च 2012
सरोगेसी मातृत्व की विश्व राजधानी को तौर पर बदनाम भारत
शुक्रवार को सीएसआर ने ’सरोगेसी मातृत्व: नैतिक या व्यावसायिक’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी की जो गुजरात में किए गए अध्ययन पर आधारित है। सीएसआर की निदेशक और जानी मानी महिला कार्यकर्ता डॉ. रंजना कुमारी ने सरकार से आग्रह किया कि एआरटी 2010 बिल को अविलम्ब पास किया जाए। इससे अपनी कोख को समर्पित करने वाली महिलाओं को सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी, क्योंकि अपनी आजीविका को स्थिर रखने के लिए उन्हें गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है।
रिपोर्ट के माध्यम से डा. रंजना ने स्पष्ट तौर पर परिभाषित कानून की आवश्यकता पर बल दिया, जो सरोगेसी के बारे में भारतीय सरकार के विचार को विस्तार में प्रकट करे, ताकि सरोगेट माताओं के होने वाले शोषण को रोका जा सके। रिपोर्ट का यह भी कहना है कि सरोगेसी शिशु का नागरिक अधिकार भी अति महत्व का विषय है और इसमें पूछा गया है कि, भारतीय सरकार को सरोगेट शिशु को भारतीय नागरिकता देने के मामले में कदम उठाना होगा क्योंकि वह भारतीय (सरोगेट माता) कोख से भारत में जन्म लेता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरोगेट माता और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य बीमा होना चाहिए ताकि वे एक सेहतमंद जीवन जी सकें।
रिपोर्ट मे यह भी खुलासा हुआ है कि पिछले कुछ सालों में किस प्रकार सरोगेसी बढ़ी है और क्यों भारत अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल बनता जा रहा है। सीएसआर में अनुसंधान की प्रमुख एवं इस रिपोर्ट की मुख्य लेखिका सुश्री मानसी मिश्रा ने कहा, ‘सस्ती चिकित्सा सुविधाएं, उन्नत प्रजनन तकनीकी जानकारी के साथ निर्धन सामाजिक-आर्थिक स्थितियां तथा भारत में नियामक कानूनों की कमी; ये सब मिलकर भारत को एक आकर्षक विकल्प बना देते हैं।’ यह रिपोर्ट सरोगेट माताओं के अधिकारों और देश भर में गैरकानूनी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलॉजी (एआरटी) क्लीनिकों के मुद्दे उठाती है। इसमें सवाल उठाए गए हैं कि क्या सरोगेट मातृत्व को नियमित करना चाहिए और यदि हां, तो किस तरीके से। यदि नियमन के संबंध में किसी अनुबंध पर पहुंचा जा सके, तो भी प्रश्न बना रहता है कि क्या उन मापदंडों को कायम रखा जा सकेगा।
सरोगेसी के इंतजाम के विषय पर सीधे तौर पर कानून होना चाहिए जिसमें तीनों पार्टियां शामिल हों, यानीः सरोगेट मदर, माता-पिता और बच्चा। सरोगेट माताओं के लिए अधिकार-आधारित कानूनी ढांचे की जरूरत है क्योंकि आईसीएमआर के दिशानिर्देश काफी नहीं हैं। डॉ. कुमारी ने कहा। उनका कहना था कि असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल को तुरंत पास करने की जरूरत है जिसका लक्ष्य सरोगेट माता और बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना है। सरोगेसी व्यवस्था से जो कारोबार हो रहा है उसका अनुमानित आंकड़ा 500 मीलियन डॉलर है और सरोगेसी के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इस संबंध में सटीक भारतीय आंकड़ें ज्ञात नहीं हैं लेकिन जांच से पता लगा है कि पिछले कुछ सालों में यह काम दोगुना हो चुका है।
गोरी, शिक्षित और युवा औरतों की मांग लगातार बढ़ रही है जो विदेशी दंपतियों के लिए सरोगेट माता का काम कर सकें। अक्सर दंपतियों को अपनी बारी के लिए आठ महीनों से लेकर एक साल तक प्रतीक्षा करनी होती है। आम तौर पर छोटे शहरों की महिलाओं को इस आउटसोर्सिंग प्रेग्नेंसी के लिए चुना जाता है। आणंद, सूरत, जामनगर, भोपाल व इंदौर ऐसे शहर हैं जहां भारतीय तथा विदेशी दंपति बच्चे की चाहत में यात्राएं करते हैं।
सरोगेसी की औसत लागत 10,000 से 30,000 डॉलर के बीच है जिसमें शामिल होते हैं : सरोगेट माता का पारिश्रमिक, आईवीएफ का खर्च, भोजन व उपभोज्य वस्तुएं, कानूनी व डॉक्टर की फीस, प्रसव व्यय एवं प्रसव पूर्व देखभाल का खर्चा। अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल पर्यटकों के लिए यह लागत बहुत ही किफायती है जिस वजह से वे अधिक से अधिक संख्या में भारत आ रहे हैं। किंतु जो महिला वास्तव में अपनी कोख समर्पित करती है वह न्यायपूर्ण मुआवजे़ से वंचित रह जाती है। बिचौलिए, मैडिकल क्लीनिक और वकील अधिकांश पैसा ले जाते हैं- इस रिपोर्ट के मुताबिक सरोगेसी के लिए जो 12 से 15 लाख रुपए दिए जाते हैं उसमें से सरोगेट माता को मात्र 1-2 प्रतिशत ही मिलता है।
गौरतलब है कि यह रिपोर्ट कई परेशान कर देने वाले तथ्यों को भी उद्घाटित करती है। उदाहरण के लिए, कई बार पति इस बात पर ऐतराज नहीं करता की उसकी पत्नी सरोगेसी के लिए जाए लेकिन जब बच्चे के जन्म के बाद औरत घर लौटती है तो उसका पति व बच्चे उससे दूरी बना लेते हैं। इन मामलों में क्लीनिकों की भूमिका भी संदेहास्पद है। सरोगेसी अनुबंध सरोगेट माता (उसके पति सहित) कमीशनिंग माता-पिता और फर्टिलिटी चिकित्सक के बीच होता है, लेकिन क्लीनिक इस विषय से अपने को दूर रखते हैं ताकि उन्हें किसी कानूनी झंझट में न पड़ना पड़े। इस बारे में कोई तयशुदा नियम नहीं है कि सरोगेट माता को कितना मुआवज़ा दिया जाएगा, यह रकम क्लीनिक मनमाने ढंग से तय करते हैं। आम चलन यह है कि सरोगेट शिशु के कमीशनिंग माता-पिता कुल जितना धन देते हैं उसका 1-2 प्रतिशत ही सरोगेट माता को दिया जाता है। इस रिपोर्ट ने खुलासा किया।
हिन्दुस्थान समाचार/02.03.2012/आकाश।
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
क्रिकेट खेल है जंग नहीं
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर सर डान ब्रैडमैन से बड़ा दूसरा खिलाड़ी नहीं हुआ, वर्ष 2000 से ऑस्ट्रेलिया में उनकी स्मृति में ब्रैडमैन व्याख्यान का आयोजन किया जाता रहा है। इस आयोजन में क्रिकेट व अन्य क्षेत्रों की विभूतियां सर डान ब्रैडमैन व क्रिकेट के विषय पर अपने विचार व्यक्त करती हैं।
इस वर्ष के ब्रैडमैन व्याख्यान में पहली बार किसी विदेशी क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में भारत के राहुल द्रविड़ को इस संबोधन का सम्मान दिया गया।14 दिसंबर 2011 को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आयोजित इस व्याख्यान में राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट के अलावा विश्व इतिहास, समाज, संस्कृति व मानव शास्त्र में अपनी बारीक समझ का प्रमाण भी दिया। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक प्रांगण जैसे आयोजन स्थल की गरिमा के अनुरूप युद्ध की गंभीरता को समझने वाले राहुल द्रविड़ ने किसी क्रिकेट मैच के वर्णन के लिए युद्ध, जंग या महासंग्राम जैसे वजनी शब्दों के उपयोग को निर्थक बताया।
इतिहास के अच्छे जानकार की तरह द्रविड़ ने भारत-ऑस्ट्रेलिया के सैन्य सहयोग का भी उल्लेख किया, जो 20वीं सदी के दोनों विश्व युद्धों के दौरान भारत व ऑस्ट्रेलिया ने बनाये थे। द्रविड़ ने स्वाधीनता पूर्व भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सर डान ब्रैडमैन के क्रिकेटीय करिश्मे से भारतीयों के भावनात्मक जुड़ाव का जिक्र किया और यह भी कहा कि उस समय सारे भारतीय सर डान ब्रैडमैन को एक प्रकार से अपना प्रतिनिधि ही समझते थे। भारतीय क्रिकेट के एक बेहतरीन ब्रांड अंबेसडर राहुल द्रविड़ ने पिछले 25 सालों में भारत में क्रिकेट प्रतिभा के व्यापक फ़ैलाव और छोटे-छोटे कस्बो-शहरों से नये खिलाड़ियों के टीम में आने के अनेक उदाहरण दिये। द्रविड़ ने भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों के सिर चढ़े व अति धनाढ्य होने को भी अतिशयोक्ति बताया।
द्रविड़ ने सबसे ज्यादा तारीफ़ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को दी, द्रविड़ के अनुसार भारत के क्रिकेट प्रशंसक अपनी टीम व क्रिकेट खेल को बेहद प्यार देते हैं। हर भारतीय क्रिकेटर अपने कैरियर के दौरान यह समझ जाता है कि भले ही क्षणिक आवेश में कुछ लोग अप्रिय स्थिति पैदा कर दें, किंतु अधिकतर भारतीय प्रशंसकों की भावनाएं टीम के साथ जुड़ी हुई हैं। भारतीय क्रिकेटर के लिए यह खेल रोजगार का साधन मात्र नहीं है बल्कि यह अपने जीवन का सदुपयोग करने का अवसर है, ऐसा अवसर कितने लोगों को मिल ही पाता है? राहुल द्रविड़ ने भारतीय खिलाड़ियों के मानवीय पक्ष को जिस रूप में जिया है ठीक उसी रूप में उसे प्रस्तुत भी किया। अखिल विश्व में अपने पंगु नेतृत्व व भ्रष्ट संचालन के लिए बदनाम बीसीसीआइ को भी कूटनीतिज्ञ द्रविड़ ने सराहा और भारत में क्रिकेट के प्रसार में इस बोर्ड के प्रयासों का जिक्र किया। इस संबोधन के दौरान राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद कुशल रणनीतिकार की भांति ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सुरक्षित भविष्य के लिए एक नयी कार्यनीति का प्रतिपादन भी किया।
राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट अधिकारियों व खिलाड़ियों को क्रिकेट प्रशंसकों के प्रति अपनी जवाबदेही की ओर सजग होने को कहा और हर अंतरराष्ट्रीय दौरे में जबरन ठूंसे हए अनेक एक दिवसीय व 20- ट्वेंटी मैचों की संख्या घटाने को कहा। टेस्ट मैच को क्रिकेट की सर्वोच्च प्रतिस्पर्धा बताने वाले द्रविड़ ने खुले तौर पर कहा कि गैर जरूरी एक दिवसीय या 20- ट्वेंटी मैचों के चलते ही मैदान में दर्शकों की संख्या बेहद कम हो गयी है। टेस्ट में और दर्शकों को लाने के लिए द्रविड़ ने रात-दिन के टेस्ट खेलने की भी वकालत की। राहुल ने क्रिकेट की स्थिति बनाये रखने के लिए टेस्ट पर सबसे ज्यादा ध्यान देने को कहा, एक दिवसीय मैचों को वर्ल्ड कप या चैंपियन ट्राफ़ी जैसी प्रतियोगिताओं के लिए उपयुक्त बताया जबकि 20-ट्वेंटी को राष्ट्रीय स्तर पर सीमित रखने को कहा। राहुल के अनुसार क्रिकेट के तीनों प्रारूप साथ-साथ रह सकते है किन्तु जैसे अभी चल रहे है वैसे नहीं।
राहुल द्रविड़ के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खेल में बेईमानी और मैच फ़िक्सिं ग को रोकने के बारे में था। द्रविड़ ने खिलाड़ियों से और कड़े परीक्षणों व नियमों को स्वीकार करने को कहा। राहुल द्रविड़ ने इस खेल की शुचिता के लिए क्रिकेट खिलाड़ियों से कुछ असुविधाओं व अपनी निजी जानकारी प्रदान करने को तैयार रहे को भी कहा। द्रविड़ ने क्रिकेट की आय बढ़ाने के के नये तरीकों की आवश्यकता स्वीकार की किन्तु साथ ही क्रिकेट की गौरवशाली परंपरा को बनाये रखने की अपील भी की। राहुल द्रविड़ का व्याख्यान ठीक उनकी बल्लेबाजी की तरह शास्त्रीय शैली में दिया गया स्पष्ट भाषण था। ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय समाचार माध्यमों में राहुल द्रविड़ के इस संबोधन को ब्रेडमैन व्याख्यान में अब तक दिये गये सभी भाषणों में से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। क्रिकेट मैदान के ‘श्रीमान भरोसेमंद’ द्रविड़ ने अपने संबोधन से यह साबित किया कि इस ‘भारतीय दीवार’ की बौद्धिक योग्यता और सैद्धांतिक मान्यताओं की नींव कितनी गहरी और कितनी मजबूत है।
सोमवार, 26 सितंबर 2011
तीसरे मोर्चे के लिए दिल्ली अभी दूर!
राजनीति में मतदाताओं को लुभाना तथा विकास व सुविधाओं के आश्वासन पर लोगों को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया में अब तीसरा मोर्चा भी अपना स्थान तलाशने में जुट गया है । इस बाबत कुछ पार्टियां फिर से एक साथ आने को तैयार दिख रही है। वैसे तो इससे पहले भी वह एक बार हाथ मिला चुकी हैं लेकिन कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी।
वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर तीसरा मोर्चा गठजोड़ बनाने में जुटता नजर आ रहा है। इस बाबत समाजवादी पार्टी और वामपंथी आपस में हाथ मिलाकर सत्तारूढ़ सरकार और प्रमुख विपक्षी पार्टी को पछाड़ने तथा सत्ता में आने की जुगत भिड़ाने में लग गये हैं। हलांकि इस तीसरे मोर्चे की सोच काफी हल्की लगती है क्योंकि न तो इनके पास कोई ठोस मुद्दा है और न ही सरकार को घेरकर सत्ता हथियाने वाला कोई चेहरा। यहां यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर बिना चेहरे और मुद्दे के कोई भी गठबंधन सत्ताशीन कैसे हो सकता है?
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो अन्य मोर्चा के लिए अभी भी परिस्थितियां प्रतिकूल नहीं है कि वह लोकसभा स्तर पर कांग्रेस या भाजपा के हाथों से सत्ता का मांझा खींच सके। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा ही सत्ता के लिए प्रमुख उम्मीदवार हैं, जिनके मांझे पर जनता के विश्वास का शीशा पूरी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसे में वह किसी भी तीसरे मोर्चे के सूती धागे को आसानी से कांट देंगे। जबकि तीसरे मोर्चे को मजबूती से सामने लाने की कवायद के बीच भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा का कहना है कि दोनों प्रमुख पार्टियां (कांग्रेस व भाजपा) जब जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व को ठीक से नहीं निभा रही हैं तो एक विकल्प के तौर पर तीसरे मोर्चे को लाना आवश्यक हो जाता है। इस लिए भाकपा अपने विचारों और देश के प्रति समर्पित विचारों वाली पार्टियों को एकत्रित करने में जुट गयी है।
तीसरे मोर्चे के लिए लामबंद हो रहे लोगों के बारे समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिवेश में तीसरा मोर्चा ही समस्याओं से हलकान जनता के लिए राहत लायेगी। वहीं तेलगुदेशम पार्टी के नेता नामा नागेश्वर राव ने कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी पार्टी भी अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों की भांति ही सोचती है। इसके लिए भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की वकालत भी करती हैं। ओ़डिशा में शासन कर रही बिजद वैसे तो वैचारिक तौर पर भाजपा और कांग्रेस से काफी अलग है पर तीसरे मोर्चे के लिए उसने अभी कोई मन नहीं बनाया है। वहीं तमिलनाडु में पूर्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) का कांग्रेस के साथ गठबंधन रहा है, अब सत्ता में आई अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम(एआईआईडीएमके) राज्य में लेफ्ट के साथ जुड़ी हुई है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर एआईआईडीएमके का भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना ज्यादा हैं।
भाजपा और कांग्रेस से इतर बाकी सारी छो़टी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के विचारों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को देखते हुए राजनीतिक विशेषज्ञों का यही कहना है कि अभी तीसरा मोर्चा किसी प्रकार की शक्ति प्रदर्शन के लायक नहीं है। जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त के प्रोफेसर निसार उल हक का कहना है कि तीसरे मोर्चे का प्रदर्शन इस लिए दमदार नहीं होगा क्योंकि वर्तमान में वामपंथी खुद चोटिल हैं तो वह औरों को कैसे मजबूत करेंगे। इसी प्रकार, राजनीतिक विश्लेषक जी.वी.एल. नरसिम्हा राव का कहना है कि बीते हालातों को देखते हुए अब जनता भी सावधान हो गयी है। इस लिए वह भी तीसरे मोर्चे पर दाव लगाने की नहीं सोच रहें कि कुछ दिनों बाद ही यह मोर्चा फिर अस्थायी स्थिति बना देगा। विदित हो कि 1996 में देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी तीसरे मोर्चे की सरकार अपना कार्यकाल दो साल भी पूरा कर सकी।
तीसरे मोर्चे की प्रमुख पार्टियों की स्थितियां भी पहले से तो बेहतर है पर ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। समाजवादी पार्टी जहां केवल उत्तर प्रदेश में मजबूत हैं,जहां कुछ 545 लोकसभा सीट में 80 सीटे हैं। इसी प्रकार वामपंथ का केरल (20) और पश्चिम बंगाल (42) को छोड़कर कहीं भी आधार नहीं है। ऐसे में बिहार में अस्तित्व तलाश रही राष्ट्रीय जनता दल व लोकजनशक्ति पार्टी से तीसरे मोर्चे को बहुत अधिक उम्मीद नहीं है। सत्ता में बने रहने की लालसा लिये इन क्षेत्रीय पार्टियों का तीसरे मोर्चे से जुड़ने की संभावना कम ही है। ऐसा ही कुछ हाल जनता दल-सेकुलर और जनता दल यूनाइटेड का भी है। ऐसे में आपसी खींचतान के बीच कुछ एक पार्टियां मिलकर तीसरे मोर्चे को मजबूती नहीं दे पायेगी।
एक अन्य राजनीतिक जानकार भास्कर राव का कहना है कि दिल्ली की सत्ता से विरोध के भाव क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ तो ला सकते हैं लेकिन यह पार्टियां विकल्प के तौर पर नहीं उभर सकती। मुद्दों और साफ छवि के कद्दावर चेहरे की कमी के कारण ही तीसरे मोर्चे की भारतीय जनमानस के बीच अपनी पैठ बनाने की संभावना न के बराबर है।
मंगलवार, 20 सितंबर 2011
श्रीमान भरोसेमंद राहुल 'द वाँल' द्रविड...



शनिवार, 17 सितंबर 2011
श्रीमान भरोसेमंद का रंगीन लबादे को अलविदा



बुधवार, 14 सितंबर 2011
आखिरी मैच खेलने की हैट्रीक लगायेंगे द्रविड़
नई दिल्ली, 14 सितंबर (हि.स.)। भारतीय क्रिकेट टीम के बल्लेबाजी की रीढ़ रहे राहुल द्रविड़ के नाम तो वैसे कई विश्व रिकार्ड हैं लेकिन आगामी शुक्रवार 16 सितंबर 2011 एक और रिकार्ड बनाने जा रहे हैं। द्रविड़ इस दिन अपने करियर का आखिरी मैच खेलने की हैट्रीक लगायेंगे, क्योंकि इससे पहले वह दो बार और वनडे से बाहर होने के बाद उनके करियर खत्म होने की आशंका उठ चुकी है। इस बार यह आशंका नहीं बल्कि हकीकत है कि वह इंग्लैंड सीरीज के बाद वनडे से संयास ले लेंगे।
करीब चार साल पहले अक्तूबर 2007 में नौ मैच में 8.88 की औसत से 80 रन बनाने के कारण राहुल द्रविड़ को भारतीय एकदिवसीय टीम से बाहर कर दिया गया था। तब माना गया कि द्रविड़ का वनडे कैरियर समाप्त हो गया लेकिन दो साल बाद पुनः वापसी हुई और फिर टीम ने उन्हें बिसार दिया। अब इंग्लैंड में फिर से जरूरत के आधार पर चयनीत द्रविड़ ने संयास की घोषणा कर दी। बार-बार दो-दो साल के अंतराल पर टीम में जगह पाने वाले श्रीमान भरोसेमंद अब अंततः शुक्रवार को कार्डिफ में इंग्लैंड के खिलाफ वास्तव में अपना आखिरी वनडे मैच खेलेंगे।
राहुल द्रविड़ को इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट श्रंखला में शानदार प्रदर्शन के कारण वनडे टीम में चुना गया। उन्होंने तभी घोषणा कर दी थी कि वह इस सीरीज के बाद क्रिकेट के इस प्रारूप को अलविदा कह देंगे। इससे पहले भी दो अवसरों पर यह मान लिया गया था कि द्रविड़ अपना आखिरी वनडे खेल चुके हैं लेकिन वह टीम में वापसी करने में सफल रहे थे लेकिन अब फैसला स्वयं द्रविड़ ने किया है। अक्तूबर 2007 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ द्रविड़ का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था और इसके बाद जब पाकिस्तान की टीम भारत आई थी तो उन्हें टीम में नहीं चुना गया था। तब भी यह माना गया कि द्रविड़ ने 14अक्तूबर 2007 को अपना आखिरी वनडे खेल लिया है, लेकिन इसके लगभग दो साल बाद उन्हें शार्ट पिच गेंद खेलने और विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में खेले गए आईपीएल में अच्छे प्रदर्शन के दम पर श्रीलंका में त्रिकोणीय सीरीज और चैंपियन्स ट्राफी के लिए टीम में लिया गया।
द्रविड़ के वापसी पर तब चयनकर्ताओं के फैसले की कड़ी आलोचना हुई थी। जिसमें दिलीप वेंगसरकर भी शामिल थे जिनके चयनसमिति का अध्यक्ष रहते हुए द्रविड़ बाहर किए गए थे। वेंगसरकर ने कृष्णामाचारी श्रीकांत की अगुवाई वाली चयनसमिति के इस फैसले पर कहा था कि राहुल की इसलिए वापसी हुई है कि वह शार्ट गेंद को अच्छी तरह से खेलते हैं तो फिर यह भारतीय क्रिकेट के लिए चिंता का विषय है टीम फिर से पीछे देखने में लगी है। द्रविड़ को हालांकि दक्षिण अफ्रीका में खेली गयी चैंपियन्स ट्राफी के बाद फिर से बाहर कर दिया गया। उन्होंने इस बीच छह मैच में 180 रन बनाए जिनमें पाकिस्तान के खिलाफ सेंचुरियन में खेली गई 76 रन की पारी भी शामिल है। जब यह लगने लगा था कि द्रविड़ 30 सितंबर, 2009 को जोहानिसबर्ग में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना अंतिम वनडे खेल चुके हैं तब इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज में तीन शतक जड़ने के कारण द्रविड़ की वनडे सीरीज में फिर से वापसी हो गयी।
इंग्लैंड के खिलाफ वनडे श्रृंखला में द्रविड़ के चुने जाने पर चयनसमिति के पूर्व अध्यक्ष किरण मोरे और वेंगसरकर ने इस बार भी चयनकर्ताओं के फैसले पर नाखुशी जाहिर की थी। उन्होंने कहा कि था कि भले ही राहुल टेस्ट में अच्छा खेले हो पर वनडे में किसी युवा को ही तरजीह दी जानी चाहिए थी। हालांकि द्रविड़ ने अब तक खेले गए चार मैचों में टेस्ट सीरीज जैसी फार्म नहीं दिखाया है। उनसे उम्मीद की जा रही थी वह अच्छा प्रदर्शन करके अपना औसत 40 के ऊपर ले जाएंगे लेकिन चार मैच में 2, 32, 2, और 19 रन बनाने से अब उनका औसत 39 से भी नीचे गिरने का खतरा मंडराने लगा है। अब तक 39.06 की औसत से रन बनाने वाले द्रविड़ को 39 का औसत बनाए रखने के लिए कार्डिफ में अपने अंतिम वनडे में कम से कम 22 रन जरूर बनाने होंगे।