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सोमवार, 13 जून 2016

बनारस ! तू मेरा प्यार है..

आज जो लौटा अपने बनारस तो लगा की जान में जान आई है... खुद से खुद का तार्रूफ कराने का सा अहसास हुआ। लगा कि मैं फिर से जी गया.. अपने शरीर में ही मूर्छित सा मैं था अब तक.. जो बनारस की मिट्टी को छुआ तो लगा जैसे संजीवनी मिली..।

कैंट से विद्यापीठ, सिगरा, रथयात्रा और भेलूपुर का रास्ता... इस कदर लोगों से खचाखच भरा था.. मानो मेरे आने की भनक से ही सब इकट्ठे हुए हों... मेरे ही स्वागत को जुटे हैं लोग... बेशूमार भीड़, गांड़ियों की पों-पों, कहीं मधुर शब्दों में भो....ड़ी का जोरदार उच्चारण... ये सब स्वाद सिर्फ बनारस ही दे सकता है... भले ही विकास के खांचे में कोई शहर कितना भी आगे निकल जाए मगर वो एक बनारसी को नहीं लुभा सका, तो उसका विकास बे-स्वाद सा लगता है...

आगे जब भेलूपुर चौराहे से विजया सिनेमा (जो अब आईपी विजया है) की ओर मुड़ा तो बाहें फैलाये शहर की सड़कें.. मेरा आलिंगन करने को बेताब दिखी... बनारस लौटकर आने से बड़ा सुख कोई नहीं..

लौंटा जो शहर में, तो यूं ही सारी पुरानी यादें अचानक मेरे जहन में कौंध गईं.. यहीं तो थीं वो सड़कें जहां बचपना खेल में बीता। इन्हीं गलियों में यारों-दोस्तों के बीच सारे त्यौहार मने..। आज सब कुछ वैसा है पर बस इन सब में मैं ही दूर हूँ.. एक यात्री की तरह बस शहर में घूमने आता हूँ.. या यूँ कहो कि शहर से दूर जितने पाप कमाता हूँ उन्हें ही काटने आता हूँ। बनारस मीलों में जरूर दूर हैं मगर जज्बातों और खयालों में ये मेरे साथ-साथ है..

सोनारपुरा, केदारनाथ गली, दशाश्वमेध, शिवाला और अस्सी ये वो स्थान हैं जिनका बखान किए बिना बनारस को मेरे नजरिए से नहीं जाना जा सकता। इन जगहों का ये आलम है कि यहां की हवाओं में महबूब की सी खुशबू आती है.. पता है, ना अब वो दिन हैं, ना ही उन दिनों की सी कोई बात.. मगर मेरी कल्पना ही सही.. यहां की गलियों में, घाटों पर आज भी यादों का वो जमघट मिल जाएगा। सोच तो ये भी है कि घाटों की सीढियां, गंगा की लहरें और मन्दिर की घण्टियाँ ये उन यादों से ही तो अलंकृत हैं... ये शोर आध्यात्म का, मेरे लिए शहर का प्रेम ही तो है.. शहर बदल गया है और लगातार बदल भी रहा है.. मगर शहर का हर कोना पुरानी यादों से लिपटा है, जो बता रहा है कि मैं आज भी यहां की फिजाओं में कहीं बसा हुआ हूँ।

बनारस.. जिसकी सोच ही व्यक्ति को पावन कर दे.. उस शहर को दिल-ओ-दिमाग में संजोए रखने वाला मैं किसी तीर्थ यात्री से कम थोड़े ही हूँ। बाबा भोलेनाथ, काल भैरव महाराज, संकटमोचन हनुमान जी और मां दुर्गा का मंदिर.. ये वो स्थान हैं जहां से मेरी हर यात्रा का प्रारम्भ हुआ और मेरे हर सफर का पड़ाव भी यहीं इनके चरणों में निमित्त रहा... इतनी अनुकम्पाओं के बाद भी बनारस तेरी कमी उस दिन खूब अखरती है जब मेरे माथे पर तिलक करने वाला कोई नहीं होता.. मैं शहर से दूर विकास की घटनाओं में घुटा सा जी रहा होता हूँ.. मेरे सूने से माथे पर ना मां के हाथ थाप देते.. और ना ही महादेव के नाम पर चंदन तिलक लगाने का सुख मिलता.. हां, सरे राह पंडित जी मिलते हैं माथे पर तिलक लगाने का कोरम भी पूरा करते हैं... बस इसी अहसास को पावन मानकर खुश हो लेता हूँ कि तू नहीं तेरा नाम सही.. माथे पर चंदन लगने के इस एक सोच से ही मेरी थकान को भी आराम मिलता है.. फिर तेरी ही याद का सुरूर लिए तेरा ये घुमक्कड़ सा आवारा बाशिंदा अपनी निगाहों को आराम देता है, कि कल फिर जब ये जगेगा तो सुबह-ए-बनारस से शहर को छानता हुआ शाम के पहर मां गंगा की आरती से तृप्त होगा।

शुक्रवार, 11 मई 2012

माँ तू कितनी अच्छी है...


माँ सृष्टी की सबसे खूबसूरत कृति है, जिसके पास अपने से ज्यादा अपने बच्चों की बेहतरी के लिए चिंतित होने का सारा अधिकार निहित होता है। माना जाता है कि ईश्वर ने स्वयं अपनी देखभाल करने के लिए माँ की रचना की और आज वहीं माँ पूरी दुनिया बन गयी है। एक छोटे से प्यारे शब्द माँ को स्वयं भी यह नहीं पता कि वह अपने बच्चों को कितना चाहती है। माँ की निश्छल, असीमित प्यार, स्नेह और नि:स्वार्थ ममता अतुलनीय है।

इन्सान को जो प्यार अपनी माँ से मिलता है वह किसी और से नहीं मिलता। दुख-दर्द और मुसीबत में माँ एक ऐसी ढ़ाल बन कर अपने बच्चों का सहारा बनती है कि दुनिया की सभी बुराईयां भी उसे पार कर बच्चें तक नहीं पहुँच पाती। एक बच्चें की सबसे सुन्दर ध्वनि वह है जो उसके हृदय की अतल गहराईयों से आती है- वह है माँ’। प्रेम, स्नेह और आशाओं से भरा यह शब्द ‘माँ’ सर्वत्र, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है। जो दुख के क्षणों में दिलासा देता है तो कठिन वक्त में आशा और कमजोरी भरे पल में हमारी ताकत है। दुनिया की हर चीज माँ का ही विस्तार है। सूरज के मन में पृथ्वी के लिए ममता है, उसकी गोद में पृथ्वी स्नेह की गर्मी लेती है। शाम होने तक धूप का छाता ताने रहता है सूरज, जब तक पृथ्वी समुद्र के संगीत और चिड़ियों के गान के साथ सो नहीं जाती।

यह पृथ्वी भी माँ है- वृक्षों और फूलों की, नदियों और झरनाओं की, समतल मार्गों से लेकर उबड़-खाबड़ पठारों की। असल में दुनिया में जितनी भी प्राकृतिक वस्तुए उपलब्ध हैं, उनका संरक्षण कर अपने बच्चों के उपभोग के काबिल बनाने वाली पृथ्वी ही है। इतना ही नहीं यह पेड़-पौधे भी अपने महान बीजों और फूलों के जन्मदाता है। आदिरुपा, अनादि-अनन्त रुप की देवी है माँ, जो अपने अन्दर सौन्दर्य और प्रेम का भंडार समाये हुए है। शिशु की एक मुस्कान पर अपनी खुशियां लुटा देने वाली माँ ही तो है, जो बच्चें की नींद के लिए अपनी रातें कुर्बान करती है। उसका भविष्य संवारने के लिए अपने सपनों और इच्छाओं को भी भूल जाती है।

शब्दों-अभिव्यक्तियों से परे और दुनिया के हर संबंध से ऊंची होती है माँ। थोड़ा बचपन की ओर लौटे तो... वो माँ ही तो थी, छोटी सी बीमारी में भी दिन-रात सिरहाने बैठी जागा करती थी। परियों की, जानवरों की अनगिनत कहानियां होती उसकी जुबान पर और वह अपनी मधुर लोरियों से हमारी नींद को ख्वाबों से सजा देती थी। माँ ही तो है जो नैतिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों के बीज हमारे अन्तर्मन में बचपन से ही डाल देती है, ताकि हम वास्तविक अर्थों में पूर्ण इंसान बन सके।

समय के साथ-साथ माँ की भूमिकाओं में भी परिवर्तन आया है। अब वह परम्परागत अर्थ वाली माँ से इतर भी समाज में अलग पहचान  और खुद का वजूद रखने लगी है। आज एक माँ न सिर्फ परिवार बल्कि समाज, राज्य और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर उसकी नीतियों में भी सक्रिय तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। किन्तु यह वह बिन्दू है, जहां स्त्री की दोनों भूमिकाओं के बीच परस्पर टकराव भी उत्पन्न होता है। आज कई व्यापारिक, खेल और फिल्म जगत की माये हैं जो आधुनिक और परम्परागत माँ की भूमिकाओं को निभाने का सफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी समाज अक्सर कहता है कि सैलिब्रिटी माँ एक औसत भारतीय माँ का व्यक्तित्व नहीं निर्धारित करती, बल्कि सिर्फ एक छवि बनाती है। वास्तव में आज की आधुनिक माँ अपने परम्परागत और कामकाजी व्यक्तित्व के बीच लगातार सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही है। दोनों छवियों में टकराहट होती है, तभी परम्परागत माँ जीत जाती है।  

माँ ऐसा शब्द है जो बच्चा पैदा होने के बाद सबसे पहले बोलता है, इसलिए कहा जाता है कि ईश्वर का दूसरा रुप है माँ। सच ही है माँ जैसा दूसरा कोई हो भी नहीं सकता। कितने रुप समाये होती है माँ अपने आप में। नौ माह तक बच्चे का पेट में रखना और फिर उसके जन्म के बाद उसकी देखभाल में लग जाना, उसका पल-पल ख्याल रखना। रोने पर चुप कराना और भूख लगने पर दूध पिलाना, बस हर पल अपने बच्चों की खुशियों में ही डूबे रहती है माँ। आज सामाजिक परिदृश्य बदल गया है, दुनिया तेजी से बदल रही है. हर चीज में परिवर्तन आया है पर बदला नहीं है तो माँ का रुप। वही ममता, वही प्यार, वही स्नेह और वही गुस्सा, सब कुछ वैसा ही कुछ भी तो नहीं बदला। पहले की समय में महिलाएं घर पर ही रहती थी तो बच्चों और परिवार की देखभाल में ही जुटी रहती, पर अब समय के साथ यहां भी बदलाव हुआ है। अब माँ आफिस से लेकर घर तक हर काम बखूबी निभा रही है। घर की चिन्ता से लेकर आफिस के बोझ को सहते हुए भी माँ के चेहरे पर कोई शिकन नहीं होता, बल्कि घर पर बच्चों की एक मुस्कान और प्यार भरे शब्द से वह सारे कष्टों को भूल आह्लादित हो जाती है।  

आज जीवन शैली निरन्तर प्रगतिशील और उपभोक्तावादी हुई है, लेकिन माँ हमेशा दिल से माँ रही है। चाहे वह बर्बर युग की माँ रही हो, मध्यकाल की माँ हो, औद्योगिक क्रांति के दौर की माँ रही हो या फिर आज की सुपर मॉम। माँ की भावनाओं में रत्ती भर का कोई परिवर्तन नहीं आया है। आज के समय में विशेषकर महानगरों में 27 फीसदी महिलाएं अपने घर-परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को उठाती हैं। पिछले पांच दशक में महिलाओं के हिस्से में आने वाली काम की जिम्मेदारियों में 35 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। सुपर मॉम बन जाने का मतलब यह नहीं हुआ कि वह घर की तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सिर्फ और सिर्फ आर्थिक उपार्जन करती हैं। पिछले दिनों एक सरकारी सर्वेक्षण में ये बात उभर कर आयी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर प्राइवेट फर्म तक में काम करने वाली 99.5 प्रतिशत महिलाएं दफ्तर से छुट्टी के बाद सीधे घर आती हैं। जबकि पुरुषों के विषय में आंकड़े कुछ और ही बातें बताते हैं। दफ्तर का काम निबटा सीधे घर पहुँचने वाले पुरुषों का प्रतिशत महज 75 से 80 फीसदी है। शेष 20-25 फीसदी पुरुष दिनभर की थकान मिटाने के लिए पार्टियों और दोस्तों का सहारा लेते हैं, पर महिलाएं आफिस की जिम्मेदारियों के निर्वाह कर घर के लिए तत्पर रहती हैं।

मुम्बई जो देश का सबसे ज्यादा आधुनिक और कैरियर के लिहाज से तेज रफ्तार वाला शहर माना जाता है वहां पर भी महिलाएं माँ बनने की खुशी को कैरियर से ज्यादा तवज्जों देने की बात करती हैं। देश की राजधानी दिल्ली सहित अन्य बड़े शहरों में भी बीते सालों में कुछ ऐसा ही ट्रेंड देखने को मिला है। इन महानगरों की 90 से 95 फीसदी महिलाओं का औसत बयान यही है कि वह समय पर माँ बनने के लिए नौकरी छोड़नी पड़े तो वो ऐसा करेंगी। माँ को समाज में श्रेष्ठ होने का दर्जा आज से नहीं बल्कि पुराणों के समय से ही है। उस युग में भी माताएं सदाचार, चरित्र, संस्कार और कर्तव्यपालन को अपने व्यक्तित्व से परिभाषित करती थी। ऐसी ही एक गरिमामयी माँ थीं सती अनुसुइया, जिन्होंने भगवान को भी अपनी ममता के आगे नतमस्तक कर दिया था। सती अनुसुइया ने त्रिदेवों ब्रम्हा, विष्णु और महेश को शिशु बना दुग्धपान कराया था। वे जब पुन: यथार्थ रुप में आये तो माँ की शक्ति से अभिभूत हुए थे, तब त्रिदेव भी कहे बिना ना रह सके कि माँ तुम महान हो। इसी तरह भगवान राम की माँ कोशल्या, कन्हैया की माँ यशोदा और गणेश की माँ पार्वती पौराणिक काल की वो माताएं हैं, जिन्होंने माँ के उच्च आदर्श को समाज के सामने रखा।

माँ और बच्चे का बड़ा ही आश्चर्यजनक रिश्ता है। माँ अपने बच्चों के सभी भावों का बिना उसके कोई शब्द उगले भी पहचान लेती है। चाहे बच्चा संकट में हो या फिर उसे माँ की जरुरत हो माँ की धड़कने अपने-आप बढ़ जाती है और उसका विश्वास की बच्चा सकुशल होगा अंतत: जीत ही जाता है। अगर एक मां को बालिवुडिया चश्में से देखें तो आमिर खान की फिल्म तारे जमीन पर’ का वह गाना खुद ही सारी कहानी बयां करता है कि ‘...तुझे सब है पता मेरा माँ, मैं कभी घबराता नहीं, पर अंधेरों से डरता हूँ मैं माँ, तुझे सब है पता मेरी माँ।’ वास्तव में एक माँ को सब पता होता है कि किसे किस चीज की जरुरत है। एक अन्य फिल्म ‘राजा और रंक’ का गाना ‘माँ तू कितनी अच्छी है... भोली-भाली है, प्यारी है.. है माँ।’ फिल्मी गीतों में माँ को इतनी उपमाये दी गयी है कि शायद ही किसी को मिल सकें। इस तरह की बहुत सी फिल्में हैं, जिसमें माँ को इतना विशाल रुप दिया गया है कि जो अधिकारपूर्वक अपने फैसले लेती है और पूरे परिवार का ध्यान रखती है।

माँ एक ऐसा शब्द है दुनिया में जिसके साथ चाहे जितनी भी उपमाये और विशेषण जोड़ दो, वो कभी भी अतिश्योक्ति की श्रेणी में नहीं आयेगा। माँ की महत्ता को दर्शाती हुई एक यहूदी कहावत है कि... ‘खुदा ने पूरा संसार रचा, वह खुद पूरी दुनिया की देखभाल नहीं कर सकता था, इसलिए उसने माँ की रचना की। इसी तरह एक चीनी कहावत के अनुसार, ‘पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही बच्चा खूबसूरत है और वह हर माँ के पास है।’ माँ को शब्दों में बता पाना तो संभव नहीं है पर कुछ महान आत्माओं ने अपनी वाणी से माँ की प्रमुखता को जरुर शब्द दिये हैं। जैसे की हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा कि ‘पुरुष का काम दिन से शाम तक खत्म हो जाता है पर माँ का काम कभी खत्म नहीं होता।’ वहीं प्रथम अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के शब्दों में, ‘आज मैं जो भी हूँ और भविष्य में जो भी बनूंगा, उसके लिए मैं अपनी माँ के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।’ जबकि माँ के रुप में नारी शक्ती को पहचानते हुए लाला लाजपतराय ने कहा कि ‘तुम मुझे कुछ अच्छी माँ लाकर दो, मैं तुम्हें बेहतर देश दूंगा।’ महान विभूतियों के इन शब्दों और माँ के प्रति के बच्चों की प्रगाढ़ भावों से एक ही बात सत्य है कि अगर दुनिया में जीवन हैं   और उसे बेहतर बनाने का कार्य कोई कर रहा है तो वह सिर्फ माँ है। बच्चों की प्राथमिक शिक्षिका की भाँति वह अपने बच्चों को समाज में अच्छाई और बुराई में भेद कर बेहतर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है। 

"मातृ दिवस के अवसर पर प्यारी-प्यारी ‘मां’ की याद में..." --आकाश कुमार राय

बुधवार, 2 मई 2012

गधे का मानव अवतार..


गधों स करों दोस्ती इसके कार्य से संसार है,
हर कर्म को करने को ये रहता तैयार है,
हर रोज उठकर जीवन को बोठ उठाता है,
शाम पहर होते, थक कर सो जाता है,
फिर कल के बोझ के लिए करता विचार है,
इसीलिए कहता हूँ...
इन्सान अपने कर्म से गधे का अवतार है।।

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

आंकड़ों की गवाही में भी बड़े खिलाड़ी हैं राहुल द्रविड़

नई दिल्ली, 09 मार्च (हि.स.)। कहते हैं कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। आंकड़े किसी खिलाड़ी की सफलता और असफलता का पहला सबूत पेश करते हैं और इस लिहाज से अगर राहुल द्रविड़ के आंकड़ों पर गौर करें तो वह नि:संदेह बड़े खिलाड़ी प्रतीत होते हैं।

क्रिकेट के खेल में आंकड़ों की महत्ता का अंदाजी इसी से लगाया जाता है कि वह सीधे तौर पर खिलाड़ी की अपनी मेहनत को दर्शाता है। आंकड़ों की तरह द्रविड़ का व्यक्तित्व और उनका पेशेवर करियर इस बात का इशारा करता है कि वह भारतीय ही नहीं विश्व क्रिकेट के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं। ऐसे में द्रविड़ का संन्यास एक ऐसा खालीपन लेकर आया है, जिसमें परंपरागत क्रिकेट को चाहने वाले सबसे अधिक निराश होंगे।

विशुद्ध किताबी शॉट खेलने वाले द्रविड़ ने भारत के लिए 344 एकदिवसीय और 164 टेस्ट मैच खेले हैं। क्रिकेट के दोनों स्वरूपों में द्रविड़ के नाम 10 हजार से अधिक रन हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ ने जहां सचिन तेंदुलकर के बाद सबसे अधिक 13288 रन बनाए हैं वहीं एकदिवसीय मैचों में उनके नाम 10889 रन हैं। भले ही रन तेजी से बनाने के लिए द्रविड़ को न जाना जाता हो पर यह भी सत्य है कि एकदिवसीय/टी-20 मैचों में भारतीय बल्लेबाजों में वह सबसे तेज पचासा लगाने वालों में तीसरा स्थान रखते हैं। उनसे आगे केवल युवराज सिंह (12 गेंद), अजीत आगरकर (20 गेंद) हैं, जबिक द्रविड़ ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 22 गेंदों में अपना पचासा जड़ा था।

फटाफट खेल से इतर पारम्परिक खेल टेस्ट मैच में द्रविड़ ने 36 शतक और 63 अर्धशतक लगाए हैं। शतकों की दौड़ में वह दूसरे सबसे सफल भारतीय बल्लेबाज हैं। सचिन तेंदुलकर ने उनसे अधिक 51 शतक लगाए हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ के नाम सबसे अधिक 210 कैच लपकने का रिकार्ड है। एकदिवसीय मैचों में द्रविड़ के नाम 12 शतक और 83 अर्धशतक हैं। उन्होंने 196 कैच लपके हैं। विकेटकीपर के तौर पर द्रविड़ ने एकदिवसीय मैचों में 14 स्टम्प भी किए हैं। सचिन की तरह द्रविड़ ने भी एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय ट्वेंटी-20 मैच खेला है, जिसमें उनके नाम 31 रन दर्ज हैं।

वर्ष 1996 में लॉर्ड्स में 95 रनों की पारी के साथ अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले द्रविड़ ने अपना अंतिम टेस्ट 24 जनवरी को एडिलेड में आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था। क्रिकेट जगत में 'द वॉल' और 'मिस्टर भरोसेमंद' जैसे विशेषणों से नवाजे गए द्रविड़ भारत के अलावा स्कॉटलैंड, एशिया एकादश, आईसीसी विश्व एकादश, एमसीसी और इंडियन प्रीमियर लीग में रॉयल बैंगलोर चैलेंजर्स और राजस्थान रॉयल्स के लिए खेले हैं।

उल्लेखनीय है कि बेंगलुरू के सेंट जोसफ हाई स्कूल से निकलकर पहले कर्नाटक और फिर भारत के लिए खेलने वाले द्रविड़ ने अपने 20 साल के क्रिकेट करियर में सबका प्यार पाया और उस प्यार के तोहफे के तौर पर देश के लिए कई नायाब पारियां खेलीं। एक वक्त ऐसा था जब भारत के क्रिकेट प्रेमी यह मानते थे कि कोई विकेट पर टिके या न टिके द्रविड़ जरूर टिकेंगे और द्रविड़ ने इस विश्वास को कायम रखते हुए अपने लिए सबके दिलों में एक खास जगह बनाई।

हिन्दुस्थान समाचार/09.03.2012/आकाश।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

क्रिकेट खेल है जंग नहीं

-सर डॉन ब्रैडमैन व्याख्यान में छा गये द्रविड़।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर सर डान ब्रैडमैन से बड़ा दूसरा खिलाड़ी नहीं हुआ, वर्ष 2000 से ऑस्ट्रेलिया में उनकी स्मृति में ब्रैडमैन व्याख्यान का आयोजन किया जाता रहा है। इस आयोजन में क्रिकेट व अन्य क्षेत्रों की विभूतियां सर डान ब्रैडमैन व क्रिकेट के विषय पर अपने विचार व्यक्त करती हैं।

इस वर्ष के ब्रैडमैन व्याख्यान में पहली बार किसी विदेशी क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में भारत के राहुल द्रविड़ को इस संबोधन का सम्मान दिया गया।14 दिसंबर 2011 को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आयोजित इस व्याख्यान में राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट के अलावा विश्व इतिहास, समाज, संस्कृति व मानव शास्त्र में अपनी बारीक समझ का प्रमाण भी दिया। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक प्रांगण जैसे आयोजन स्थल की गरिमा के अनुरूप युद्ध की गंभीरता को समझने वाले राहुल द्रविड़ ने किसी क्रिकेट मैच के वर्णन के लिए युद्ध, जंग या महासंग्राम जैसे वजनी शब्दों के उपयोग को निर्थक बताया।

इतिहास के अच्छे जानकार की तरह द्रविड़ ने भारत-ऑस्ट्रेलिया के सैन्य सहयोग का भी उल्लेख किया, जो 20वीं सदी के दोनों विश्व युद्धों के दौरान भारत व ऑस्ट्रेलिया ने बनाये थे। द्रविड़ ने स्वाधीनता पूर्व भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सर डान ब्रैडमैन के क्रिकेटीय करिश्मे से भारतीयों के भावनात्मक जुड़ाव का जिक्र किया और यह भी कहा कि उस समय सारे भारतीय सर डान ब्रैडमैन को एक प्रकार से अपना प्रतिनिधि ही समझते थे। भारतीय क्रिकेट के एक बेहतरीन ब्रांड अंबेसडर राहुल द्रविड़ ने पिछले 25 सालों में भारत में क्रिकेट प्रतिभा के व्यापक फ़ैलाव और छोटे-छोटे कस्बो-शहरों से नये खिलाड़ियों के टीम में आने के अनेक उदाहरण दिये। द्रविड़ ने भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों के सिर चढ़े व अति धनाढ्य होने को भी अतिशयोक्ति बताया।

द्रविड़ ने सबसे ज्यादा तारीफ़ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को दी, द्रविड़ के अनुसार भारत के क्रिकेट प्रशंसक अपनी टीम व क्रिकेट खेल को बेहद प्यार देते हैं। हर भारतीय क्रिकेटर अपने कैरियर के दौरान यह समझ जाता है कि भले ही क्षणिक आवेश में कुछ लोग अप्रिय स्थिति पैदा कर दें, किंतु अधिकतर भारतीय प्रशंसकों की भावनाएं टीम के साथ जुड़ी हुई हैं। भारतीय क्रिकेटर के लिए यह खेल रोजगार का साधन मात्र नहीं है बल्कि यह अपने जीवन का सदुपयोग करने का अवसर है, ऐसा अवसर कितने लोगों को मिल ही पाता है? राहुल द्रविड़ ने भारतीय खिलाड़ियों के मानवीय पक्ष को जिस रूप में जिया है ठीक उसी रूप में उसे प्रस्तुत भी किया। अखिल विश्व में अपने पंगु नेतृत्व व भ्रष्ट संचालन के लिए बदनाम बीसीसीआइ को भी कूटनीतिज्ञ द्रविड़ ने सराहा और भारत में क्रिकेट के प्रसार में इस बोर्ड के प्रयासों का जिक्र किया। इस संबोधन के दौरान राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद कुशल रणनीतिकार की भांति ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सुरक्षित भविष्य के लिए एक नयी कार्यनीति का प्रतिपादन भी किया।

राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट अधिकारियों व खिलाड़ियों को क्रिकेट प्रशंसकों के प्रति अपनी जवाबदेही की ओर सजग होने को कहा और हर अंतरराष्ट्रीय दौरे में जबरन ठूंसे हए अनेक एक दिवसीय व 20- ट्वेंटी मैचों की संख्या घटाने को कहा। टेस्ट मैच को क्रिकेट की सर्वोच्च प्रतिस्पर्धा बताने वाले द्रविड़ ने खुले तौर पर कहा कि गैर जरूरी एक दिवसीय या 20- ट्वेंटी मैचों के चलते ही मैदान में दर्शकों की संख्या बेहद कम हो गयी है। टेस्ट में और दर्शकों को लाने के लिए द्रविड़ ने रात-दिन के टेस्ट खेलने की भी वकालत की। राहुल ने क्रिकेट की स्थिति बनाये रखने के लिए टेस्ट पर सबसे ज्यादा ध्यान देने को कहा, एक दिवसीय मैचों को वर्ल्ड कप या चैंपियन ट्राफ़ी जैसी प्रतियोगिताओं के लिए उपयुक्त बताया जबकि 20-ट्वेंटी को राष्ट्रीय स्तर पर सीमित रखने को कहा। राहुल के अनुसार क्रिकेट के तीनों प्रारूप साथ-साथ रह सकते है किन्तु जैसे अभी चल रहे है वैसे नहीं।

राहुल द्रविड़ के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खेल में बेईमानी और मैच फ़िक्सिं ग को रोकने के बारे में था। द्रविड़ ने खिलाड़ियों से और कड़े परीक्षणों व नियमों को स्वीकार करने को कहा। राहुल द्रविड़ ने इस खेल की शुचिता के लिए क्रिकेट खिलाड़ियों से कुछ असुविधाओं व अपनी निजी जानकारी प्रदान करने को तैयार रहे को भी कहा। द्रविड़ ने क्रिकेट की आय बढ़ाने के के नये तरीकों की आवश्यकता स्वीकार की किन्तु साथ ही क्रिकेट की गौरवशाली परंपरा को बनाये रखने की अपील भी की। राहुल द्रविड़ का व्याख्यान ठीक उनकी बल्लेबाजी की तरह शास्त्रीय शैली में दिया गया स्पष्ट भाषण था। ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय समाचार माध्यमों में राहुल द्रविड़ के इस संबोधन को ब्रेडमैन व्याख्यान में अब तक दिये गये सभी भाषणों में से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। क्रिकेट मैदान के ‘श्रीमान भरोसेमंद’ द्रविड़ ने अपने संबोधन से यह साबित किया कि इस ‘भारतीय दीवार’ की बौद्धिक योग्यता और सैद्धांतिक मान्यताओं की नींव कितनी गहरी और कितनी मजबूत है।

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तीसरे मोर्चे के लिए दिल्ली अभी दूर!

राजनीति में मतदाताओं को लुभाना तथा विकास व सुविधाओं के आश्वासन पर लोगों को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया में अब तीसरा मोर्चा भी अपना स्थान तलाशने में जुट गया है । इस बाबत कुछ पार्टियां फिर से एक साथ आने को तैयार दिख रही है। वैसे तो इससे पहले भी वह एक बार हाथ मिला चुकी हैं लेकिन कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी।

वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर तीसरा मोर्चा गठजोड़ बनाने में जुटता नजर आ रहा है। इस बाबत समाजवादी पार्टी और वामपंथी आपस में हाथ मिलाकर सत्तारूढ़ सरकार और प्रमुख विपक्षी पार्टी को पछाड़ने तथा सत्ता में आने की जुगत भिड़ाने में लग गये हैं। हलांकि इस तीसरे मोर्चे की सोच काफी हल्की लगती है क्योंकि न तो इनके पास कोई ठोस मुद्दा है और न ही सरकार को घेरकर सत्ता हथियाने वाला कोई चेहरा। यहां यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर बिना चेहरे और मुद्दे के कोई भी गठबंधन सत्ताशीन कैसे हो सकता है?

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो अन्य मोर्चा के लिए अभी भी परिस्थितियां प्रतिकूल नहीं है कि वह लोकसभा स्तर पर कांग्रेस या भाजपा के हाथों से सत्ता का मांझा खींच सके। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा ही सत्ता के लिए प्रमुख उम्मीदवार हैं, जिनके मांझे पर जनता के विश्वास का शीशा पूरी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसे में वह किसी भी तीसरे मोर्चे के सूती धागे को आसानी से कांट देंगे। जबकि तीसरे मोर्चे को मजबूती से सामने लाने की कवायद के बीच भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा का कहना है कि दोनों प्रमुख पार्टियां (कांग्रेस व भाजपा) जब जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व को ठीक से नहीं निभा रही हैं तो एक विकल्प के तौर पर तीसरे मोर्चे को लाना आवश्यक हो जाता है। इस लिए भाकपा अपने विचारों और देश के प्रति समर्पित विचारों वाली पार्टियों को एकत्रित करने में जुट गयी है।

तीसरे मोर्चे के लिए लामबंद हो रहे लोगों के बारे समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिवेश में तीसरा मोर्चा ही समस्याओं से हलकान जनता के लिए राहत लायेगी। वहीं तेलगुदेशम पार्टी के नेता नामा नागेश्वर राव ने कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी पार्टी भी अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों की भांति ही सोचती है। इसके लिए भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की वकालत भी करती हैं। ओ़डिशा में शासन कर रही बिजद वैसे तो वैचारिक तौर पर भाजपा और कांग्रेस से काफी अलग है पर तीसरे मोर्चे के लिए उसने अभी कोई मन नहीं बनाया है। वहीं तमिलनाडु में पूर्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) का कांग्रेस के साथ गठबंधन रहा है, अब सत्ता में आई अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम(एआईआईडीएमके) राज्य में लेफ्ट के साथ जुड़ी हुई है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर एआईआईडीएमके का भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना ज्यादा हैं।

भाजपा और कांग्रेस से इतर बाकी सारी छो़टी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के विचारों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को देखते हुए राजनीतिक विशेषज्ञों का यही कहना है कि अभी तीसरा मोर्चा किसी प्रकार की शक्ति प्रदर्शन के लायक नहीं है। जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त के प्रोफेसर निसार उल हक का कहना है कि तीसरे मोर्चे का प्रदर्शन इस लिए दमदार नहीं होगा क्योंकि वर्तमान में वामपंथी खुद चोटिल हैं तो वह औरों को कैसे मजबूत करेंगे। इसी प्रकार, राजनीतिक विश्लेषक जी.वी.एल. नरसिम्हा राव का कहना है कि बीते हालातों को देखते हुए अब जनता भी सावधान हो गयी है। इस लिए वह भी तीसरे मोर्चे पर दाव लगाने की नहीं सोच रहें कि कुछ दिनों बाद ही यह मोर्चा फिर अस्थायी स्थिति बना देगा। विदित हो कि 1996 में देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी तीसरे मोर्चे की सरकार अपना कार्यकाल दो साल भी पूरा कर सकी।

तीसरे मोर्चे की प्रमुख पार्टियों की स्थितियां भी पहले से तो बेहतर है पर ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। समाजवादी पार्टी जहां केवल उत्तर प्रदेश में मजबूत हैं,जहां कुछ 545 लोकसभा सीट में 80 सीटे हैं। इसी प्रकार वामपंथ का केरल (20) और पश्चिम बंगाल (42) को छोड़कर कहीं भी आधार नहीं है। ऐसे में बिहार में अस्तित्व तलाश रही राष्ट्रीय जनता दल व लोकजनशक्ति पार्टी से तीसरे मोर्चे को बहुत अधिक उम्मीद नहीं है। सत्ता में बने रहने की लालसा लिये इन क्षेत्रीय पार्टियों का तीसरे मोर्चे से जुड़ने की संभावना कम ही है। ऐसा ही कुछ हाल जनता दल-सेकुलर और जनता दल यूनाइटेड का भी है। ऐसे में आपसी खींचतान के बीच कुछ एक पार्टियां मिलकर तीसरे मोर्चे को मजबूती नहीं दे पायेगी।

एक अन्य राजनीतिक जानकार भास्कर राव का कहना है कि दिल्ली की सत्ता से विरोध के भाव क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ तो ला सकते हैं लेकिन यह पार्टियां विकल्प के तौर पर नहीं उभर सकती। मुद्दों और साफ छवि के कद्दावर चेहरे की कमी के कारण ही तीसरे मोर्चे की भारतीय जनमानस के बीच अपनी पैठ बनाने की संभावना न के बराबर है।


शनिवार, 13 अगस्त 2011

‘‘कुत्तों को नहीं हजम होता घी....’’

कहते हैं न कि अगर किसी को उसकी औकात से ज्यादा खुशी मिल जाती है तो वह उसे संभाल नहीं पाता, कुछ ऐसा ही हाल इंग्लैंड क्रिकेट टीम का है। टेस्ट क्रिकेट की नंबर एक टीम भारत को लगातार दो टेस्ट मैच में पटखनी देने के बाद नंबर एक बनने की कगार पर खडी इंग्लिश टीम इस बात को नहीं पचा पा रही है और भारतीय खिलाडियों के बारे अनाब-शनाब बयानबाजी कर ठेठ हिंदी की एक कहावत ‘कुत्तों को नहीं हजम होता घी...’ को चरितार्थ कर रही है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि इंग्लैंड टीम अपने पूरे रौ में है और उसके खिलाडी अपने जीवन के सबसे शबाब वाले फार्म के स्तर से गुजर रहे हैं। ऐसे में जीत और शानदार प्रदर्शन के लिए उनकी प्रशंसा लाजमी है लेकिन अपनी जीत को दूसरों की हार से जोडना तथा सामने वाली टीम पर छींटाकशी करना सही नहीं। वैसे भी क्रिकेट को जैन्टलमैंस गेम कहा जाता है और बीते सालों तक यह परिपाटी कायम भी रही। जब कपिल देव, सुनील गावस्कर, एलेन बार्डर, माइकल होल्डिंग और स्टीव वॉ जैसे कई खिलाडी अपने समय में खेल के प्रति मैदान पर काफी उग्र रहे लेकिन उनका खेल और व्यक्तिगत पहलू कभी एक-दूसरे के आडे नहीं आये। जितनी उग्रता खेल में दिखी, उतनी ही सरलता उनके संवादों में थी। वह देश के लिए खेलते हुए भी खेल को ज्यादा तवज्जों देते थे जबकि आज क्रिकेट का स्वरूप बदल गया है और जैन्टलमैंस गेम अब अपशब्दों के शब्दावली के नये आयाम गढते हुए छींटाकशी के मैसलेनियस स्तर तक आ गया है। जहां किसी भी टीम और खिलाडी पर कोई भी किसी भी प्रकार के नजरिये के साथ बयानबाजी कर देता है, और यदि किसी प्रकार से उसके खिलाफ कार्रवाई का डर बनाया जाता है तो वह झट से शर्मिंदगी की हदों को पार का माफी मांग लेता हैŸ। जिसे आज कल सोशल मैनर कह कर संबोधित किया जाने का चलन है।

इंग्लिश टीम जो अपनी ही जमीन पर भारतीय शेरों को लगातार खेल के उम्दा प्रदर्शन से धमकाये हुए है कि वह उसके नंबर एक की बादशाहत पर कब्जा कर लेगी, जो अब शायद साकार होने की ओर है। बर्मिंघम में खेले जा रहे तीसरे टेस्ट मैच में भी इंग्लैंड की पकड मजबूत है और अब शायद इस बात का इंतजार है कि भारत अपनी हार को कितना लम्बा खींच सकता है। इस सबके बीच भले ही इंग्लैंड प्रदर्शन से आंकडों को आधार बना नंबर एक बन जाये लेकिन इंग्लिश क्रिकेट टीम का व्यवहार और वहां की मीडिया का रवैया बादशाहत के लायक नहीं है। नंबर एक भारत भी रहा है या कहिए अभी है और पिछले दस माह से अपने बादशाहत को कायम भी रखे हुए हैŸ लेकिन कभी भारत को अपने नंबर एक होने पर दंभ नहीं रहा। जबकि बादशाहत की ओर अग्रसर इंग्लिश टीम पर पहले से ही अव्वल होने का सुरूर इंग्लिश खिलािडयों और वहां की मीडिया पर छाने पर लगा है तभी तो वह भारतीय टीम की हार और खिलाडियों के लचर प्रदर्शन को लतीफों और अट्ठहास के रूप में भूना रहे हैं। एक ओर जहां इंग्लिश मीडिया ने भारतीय टीम को बूढे बार्डर काली’ प्रजाती के कुत्ते से तुलना की, वहीं द्रविड पर कटाक्ष करते हुए कहा है कि अब समझ में आया कि उन्हें वाल (दीवार) क्यों कहा जाता है क्योंकि गेंद उनसे टकराकर वापस आ जाती है। इसके अलावा सहवाग पर बॉल टेंपरिंग का आरोप भी लगाया है।

भारतीय टीम और खिलाडियों पर किये गये कटाक्ष से यह तो स्पष्ट है कि इंग्लिश टीम जीत और नंबर एक के दर्जे से करीबी को पचा नहीं पा रही है। इसी लिए क्रिकेट जनक देश अब तक की अपनी नाकामियों और हार को खुन्नस के तौर पर बाहर निकाल रही है। आखिर इंग्लिश खिलाडी और वहां की मीडिया भी बेचारी क्या करे, पहली बार तो ऐसा मौका आया है कि इंग्लैंड विशेष तौर पर जाना जायेगाŸ। क्रिकेट का जन्मदाता होने के बावजूद वह न तो विश्वविजेता बन सका है और न ही आज से पहले कभी खेल में उसका वर्चस्व रहा है। बीते साल दो साल में ही वह निखरा है। ऐसे में छोटे बच्चें की तरह जो लगातार परीक्षा में फेल होने के बाद जब पास होता है तो सोचता है उससे बेहतर कोई नहीं और गर्व में फूल जाता हैŸ। कुछ ऐसा ही हाल इंग्लिश मैन का भी है जीत मिल रही है, नंबर एक बनने जा रहे है तो हार और मात के कढवे घूंट को पीने के बाद मिल रही देशी घी में लिपटी सौधी जीत की खुशी को वह पचा पाने नहीं पा रहे हैं। अपने इस व्यवहार से उन्होंने दर्शा दिया है कि वह तालाब के मेंढक की तरह हैं तो थोडी सी जीत की बारिश को ही सारा समंदर मान लेते हैं और खुशी में टर्राने लग पडते हैं।

इन सबके बावजूद इंग्लिश टीम और मीडिया को ध्यान रखना चाहिए उनकी ये तल्ख टिप्पणियां किस टीम और किन खिलाडियों पर आ रही है, जो अपने खेल और खेल भावना के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैंŸ। वैसे भी राहुल द्रविड और विरेंद्र सहवाग को गोरी चमडी के इन सूअरों के उटपटांग बयानबाजी से कोई फर्क नहीं पडेगा। जो खिलाडी क्रिकेट के दो प्रमुख फार्मेट में साढे दस हजार से ज्यादा रनों के पहाड पर खडा हो वह भला जमीनी खोह स्तर वाली सोच रखने वाले इंग्लिश मैन की परवाह क्यों करेगा। राहुल द्रविड को पता है कि टीम में उनकी क्या उपयोगिता है और किस लिए उन्हें ‘द वाल’ और ‘श्रीमान भरोसेमंद’ कहा जाता है। वैसे भी द्रविड ने अपने करियर में कभी कुत्तों के भौकने की परवाह नहीं की क्योंकि उन्हें पता है उनके हर काम के साथ जहां कुछ लोग आपकों पसंद करते हैं तो उसी क्रम में कुछ आलोचक भी जन्म लेते हैंŸ, जिनका उद्देश्य मात्र लोगों की आलोचना करना ही होता है।

रविवार, 24 जुलाई 2011

वक्त और लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं। एक न एक दिन हम सबको आखिरी नतीजों का सामना करना ही पड़ता है। मुस्कुराते हुए इसका सामना करने की तैयारी करना बेहतरी है।
‎"हमारा दिमाग, इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखेबाज़ है! यह अपने रास्ते चलने के लिए अलग-अलग तरह के हज़ारों बहाने करता है!"
"मैं रोजमर्रा के अनुभवों में, होशमंद हालत में, यूं ही भटकता हूं ... महसूस करता हूं कि जैसे कोई जहाज हूं जो परिस्थितियों के समंदर में है ..."
राहें सदा असंतोष से निकलती हैं, संतोष के गढ़ से कोई भी राह बाहर की ओर नहीं जाती। मैं भी असंतोष के दौर में हूँ और अपने मंजिल को उन्मुख मेरा सफ़र लगातार जारी है।
‎"कभी सुना था की ज़िन्दगी हौसलों से कटती है, आज पता चला 'मरने की आरज़ू' और 'सिसकती साँसों' को भी लोग जीना कहते हैं...!"
‎"लगातार प्रयास और अपनी गलतियों से सीख कर हर किसी को सही कदम उठाना ही पड़ेगा क्योंकि किसी की भी जिंदगी इतनी लंबी नहीं होती वह 'चाणक्य' बनने तक की अवधि का इंतज़ार कर सके!"

मंगलवार, 21 जून 2011

द्रविड के टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे


'श्रीमान भरोसेमंद' और 'दी वाल' जैसे उप-नामो से विख्यात पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने वेस्टइंडीज के खिलाफ़ २० जून २०११ को शुरू हुए पहले क्रिकेट टेस्ट के साथ टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे किये! इस इस्टाईलिश बैट्समैन से आगे भी इसी तरह बेहतरीन खेल का मुजाहरा करते रहने की सभी क्रिकेट प्रशंशक की कामना है!

अपने क्रिकेटिंग कैरियर में द्रविड़ ने काफी उचाईयों और विरोधाभास को देखा है! इस बिच द्रविड़ धीमा खेलने के लिए टीम से निकाले भी गए और फिर वापसी करते हुए भारतीय बलेबाज़ी क्रम की रीढ़ की हड्डी भी बन गए, जिसने बिना टीम से निकले लगातार मैच खेलने का रिकॉर्ड भी बनाया!

इंग्लैंड के खिलाफ़ लार्डस में 20 जून 1996 को पदार्पण करने वाला यह कलात्मक बल्लेबाज टीम के लिए भरोसे की पहचान बन गया! आज भी जीवन के ३८ बसंत देख चुके राहुल द्रविड़ के रिप्लेसमेंट के टक्कर का कोई खिलाडी भारतीय टीम के पास नहीं है! भले ही युवाओ का खेल हो चुके एकदिनी और टी२० मैच में द्रविड़ न दिखे पर ये बात अब भी सही है की युवा खिलाडी तेज़ तो है पर उन के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है! जिसके बिना खेल के किसी भी फॉरमेट में अपना स्थान पक्का नहीं किया जा सकता ! जबकि द्रविड़ को जाना ही उनकी इसी खूबी के लिए जाता है की वो अच्छा न खलते हुए भी औसतन ३५-४० रन तो बनायेंगे ही! आज भी क्रिकेट के असली परिचायक फॉरमेट 'टेस्ट' में राहुल द्रविड़ के बिना खेलना टीम के लिए सपनो के जैसा है, जिसकी कल्पना भी वह नहिकारना चाहेगी कि जब द्रविड़, सचिन और लक्ष्मण सन्यास के बाद टीम का क्या होगा.......

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

लब खोलोगे , तो दिल तोड़ोगे ….

हम अक्सर कुछ ऐसी बाते कहते और सुनते हैं जो हमे तो अच्छी लगती हैं पर सामने वाला इसे पसंद नहीं करता । ये तो पता था की किसी एक बात से सबको खुश नहीं रखा जा सकता , पर ये नहीं जानता था की आपकी कही एक बात किसी को दुःख भी पंहुचा सकती है । आज मैंने इस बात को भी समझ लिया की आप कुछ कहने से पहले सौ बार सोचिये की कहीं इससे कोई दुखी तो नहीं होगा । यहाँ बात कहने से तात्पर्य ये नहीं की आप किसी की बुराई या खामिया छाट रहे हैं बल्कि किससे ये बात करे इसका भी ध्यान देना जरुरी होता है ।

आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ , एक महोदय से अपने कॉमन फ्रेंड के बारे में बात की जो किसी प्रकार से उसे पता चली … खैर इसमें कोई गलत बात नहीं थी क्योंकि मै खुद उससे इस बारे में बात करने को था । मै उसे बताना चाहता था की अमुक व्यक्ति से मेरी बात हुई , पर अमुक व्यक्ति मुझसे तेज़ निकला और एक प्रकार से मेरी कही हर अच्छी-बुरी बात को उसके सामने ऐसे रखा की मै ही दोषी हो गया । अब उस मित्र को ऐसा लगता है की मैंने उसकी बुराई उसके पीठ पीछे किसी और से की है । पर ये तो मै ही जनता हूँ मैंने क्या और क्यों कहा । इन बातो के पीछे मेरी क्या मनसा थी । पर मै गलत साबित हुआ और अब मै खुद अपनी नजरो में दोषी लग रहा हूँ की चाहे जो हुआ पर मुझे किसी की बात उसकी अनुपस्थिति में किसी अन्य के सामने नहीं करनी चाहिए थी ।

अपनी गलती की माफ़ी तो मैंने आज उस दोस्त से मांग ली , साथ ही एक वायदा भी कर आया की अब उससे जुडी किसी बात को उसे छोड़ किसी से नहीं करूँगा । पर दिल को जाने क्यों ऐसा लग रहा है की अब किसी से बात नहीं करनी चाहिए, कम से कम अगले कुछ दिनों तक तो नहीं ही। शायद पहली बार इस तरह से अपना ही मजाक उड़ते मैंने पाया है कि अब हर किसी से रूठ जाने को दिल करता है । बस मै और मेरी तन्हाई ना कोई बात ना किसी की रुसवाई ….....॥

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

सवाल यही : कौन गलत, कौन सही

अपराध और राजनीती एक दुसरे के पर्याय बनते जा रहे हैंहर बार चुनाव से पहले एक सवाल उठता है की दागी छवि वाले नेताओ को टिकेट ना दिया जाये, लेकिन अगर बेदाग छवि वाले नेताओ को ढूँढना ही टेढ़ी खीर हो जाये तो? भारतीय राजनीती में हर स्तरपर ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके रसूख का जायजा उनके हथियारों के की तादाद से लिया जाता है। 'ओंकारा' तथा 'सत्या' जैसी फिल्मो के नायक ही बाहुबली थे और इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की नेताओ की बाहुबली वाली छवि को भारतीय जनमानस ने पुरो तरह अपना लिया है

कैसी विडम्बना है की गुंडों, लोफरो और बदमाशो को अब 'बाहुबली' जैसे सशक्त शब्द की पारी सीमा में गढ़ दिया गया हैजो लोगो को उनके प्रति घृणा की जगह सम्मान और उनके बढ़ते रसूख को बढ़ावा देता हैऐसे में एक सवाल उठता है की क्या वाकई भारतीय राजनीती में ये बाहुबली अपनी लिए खास मुकाम बना चुके हैं? क्या आज बाहुबली होना शर्म की नहीं गर्व की बात बन गयी है? क्या नैतिकता के लिए अब कोई जगह नहीं बची?

हमारे सामने सवाल मुश्किल हैअगर उद्योगपति अपनी अकूत दौलत की बदौलत, कोई अपराधी अपने बहुबल की तर्ज पर और कोई पत्रकार-लेखक अपनी कलम बेचकर संसद या विधानसभाओ में 'जनप्रतिनिधि' का दर्जा पाने की कोशिश करता है तो इनमे से किसे अलग और एक आदर्श के तौर पर देखा जाये???

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

संवादों ने जीता दिल …. शायद आत्मा भी जगाई


गलती का मौत दंड है , रण है …..

यह फिल्म रण के एक गीत की वह पंक्ति है जो कहानी के अनुसार मीडिया की महत्ता को दर्शाती है की अगर मीडिया ने गलती की तो मतलब सब ख़तम। वैसे तो फिल्म में कई ऐसी खासियते हैं जिन्हें अगर हम आत्मसात करे तो हमारा नैतिक विकास ही होगा । उनमे से कुछ खास संवाद निम्न हैं -


1- कुछ चुनिन्दा अवसरवादी लोगो की कट्टरपंथी सोच का नाम ही कौमी नफरत है

इस संवाद ने शायद सभी को एक बार तो यह सोचने को मजबूर कर ही दिया होगा की ये वाकई सच है । और उस पल हमारे मन की साड़ी कद्वाहते ख़तम हो गयी होंगी ।


2- कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं होता बस लोग होते हैं अपने-अपने तरीके से जीवन जीना ही धर्मं है

यह संवाद विचारों की मंथन चासनी में काफी पाक कर ही कागज़ पर आया है । लेखक भी अक्सर सोचता रहता होगा की आखिर ये धर्मं है क्या ? क्या दो लोगो के बीच विषमता की परिभाषा ही धर्मं है ?


अगर किसी भी धर्मं या जाती के दो लोगो को आपस में बदल कर एक-दुसरे के स्थान पर रखा जाएऔर सारे काम उन्हें दुसरो की तरह करने हो तो भला कौन कह पायेगा की अब वह हिन्दू-मुस्लिम याकिस अन्य जाती का है बल्कि वह सिर्फ एक इंसान है, हाड-मांस का बना जो हमारी-आपकी तरहकेवल खुद का पेट पालने के लिए काम करता है उसे ना तो दुनियादारी की चिंता है ना किसीधर्मं-जाती की , वह बस काम करता है और अपने मालिक से चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लमान अपनीमजदूरी ले घर को आता है

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

हम और आप सिर्फ कहते हैं...

हम और आप सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते ही है कि हमारी सरकार नाकाम है, निकम्मी है, कामचोर है, कुछ नहीं करती है, यहां कानून कोई मायने नहीं रखता है। कानून रसूखदारों और सत्तासीनों की रखैल से ज्यादा कुछ नहीं है। जल बोर्ड का पानी घर की बजाय नालियों में जाता है। नगर निगम सफाई नहीं करता है। फोन महिनों ठप्प पड़े रहते है। सड़के टूटी पड़ी रहती है लेकिन कागजों में सेंकड़ों बार बन जाती है। ट्रेनों के आने जाने का समय हमें सदी का सबसे बड़ा मजाक लगता है। हम सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते है।


लेकिन जब हम और आप विदेश जाते है तो सिगरेट के ठूंठों को लंदन की सड़कों पर नहीं फेंकते है। न्यूयोर्क की सड़कों पर गलत साइड चलाने पर ट्रेफिक के हवलदार को जानता नहीं मैं फलां का साला हू की धमकी नहीं देते। रोम की दीवारों पर भी खैनी खाकर नहीं थूकते। जबकि अपने देश में हम इंतजार कर रहे है किसी मिस्टर, मिस एंड मिसेज सुपर क्लीन का। क्या यह संभव नहीं है कि हम खुद ही कुछ छोटा-छोटा सा, थोड़ा- थोड़ा सा योगदान दे दें? यदि आपका जवाब हां है तो पहल कीजिए अपने आप से। ताकि बना सकें एसा समाज जैसा हम चाहते है। संस्कार अपने बच्चों को देना चाहते है, क्योंकि जैसा आज आप बोएगें, कल वैसा ही अपने बच्चे काटेगें।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

आज क़ी सरस्वती वंदना



आज माँ सरस्वती की आराधना और धरती माँ की गोद में उभरी फसलों के श्रृंगार का दिन है आज बसंत पंचमी का पावन दिवस है जिस दिन सभी लोग विद्या की देवी से अपने सुनहरे भविष्य की कामना करते हैं आज चाहे वो बुद्धिमान हो या फिर मेरे जैसा मुर्ख हर कोई माँ वीणा वादिनी से प्रार्थना करने में लगा रहेगा, की वह उसे वो सब कुछ दे जो उसे समाज के अन्य लोगो से ऊपर कर सके इस बीच हमारी मांगे भी अपनी हदों को पार कर जाती हैं विद्या की देवी से बुद्धि और ज्ञान के भंडार का वरदान मांगने के साथ-साथ हम उनसे भौतिक सुख सम्पदा और धन की भी चाह करने लगते हैं

यह कोई दोष नहीं है बल्कि हमारा भावावेश है कि हम चाहे जिस वास्तु कि खोज कर रहे हो पर जब हम भावनात्मक रूप से लबरेज होते हैं तो हमारी मुख्य मांग अपने आप हमारी जुबान पे जाती है या यूँ कहिये कि हमारी जरुरत या वो कमी जिसकी हमे ज्यादा आवश्यकता है स्वतः ही लबों पे स्फुतिक हो जाती है अगर आज के समय में लोगो कि धारणा के हिसाब से माँ सरस्वती कि आराधना मंत्र का उच्चारण होगा तो वह शायद ऐसा ही होगा....
''वीणा वादिनी वर दे , बुद्धि का भंडार दे
घर में मिले ऐश हमको, ऐसा कोई उपहार दे
करे कोई उपेक्षा , हर लब हमको जय दे
धन-धान्य कभी हमसे रूठे ,
लक्ष्मी से मेरे घर को भर दे,
माँ वीणा वादिनी वर दे......''

क्या ये दर्द भी दिखावटी है?



क्यों आत्मा जब शरीर को छोड़ कर चली जाती है तब ही सबको ज्ञात होता है की वह भला मानस था । उसके द्वारा किये गए काम सराहनीय हैं । ये सब बांटे तो उसके जीवित रहते भी तो की सकती थी । आखिर ये कैसी राजनीति हमारे समाज में फैली है की इंसान के मरणोपरांत ही उसके अनूठे कार्य की प्रशंशा होती है । क्या केवल यादों में ही किसी को अच्छा या बुरा कह देने से काम ख़त्म हो गया । यदि किसी की वास्तविक प्रशंशा करनी हो तो उसके रहते, उसके समक्ष करनी चाहिए ताकि एक स्पष्टवादिता के भाव से समाज को ओत प्रोत किया जा सके ।

आज भले ही सभी अखबारों में लेखों , सम्पादकीय और स्तंभों में ज्योति बासु जी को राजनीति का आदम पुरुष की संज्ञा दी जा रही है पर इन्ही बासु जी को कांग्रेस ने हाल ही में बने सरकार से ये कह कर किनारा कर लिया था की वाम दल की कोई निश्चित सोच नहीं की कैसे देश को विकास के पथ पर ले जाया जाए । जब कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता पायी तो पत्रकारों के पूछे सवाल पे स्पष्ट उत्तर मिला था की लेफ्ट द्वारा बार बार सर्कार को भ्रमित करने का काम किया जाता रहा है । इसलिए इस बार कांग्रेस ने अकेले , बिना लेफ्ट की मदद के सरकार बनाने तथा चलाने का काम करेगी । वहीँ विपक्षी पार्टियाँ भारतीय जनता पार्टी , समाजवादी पार्टी तो पहले से ही लेफ्ट की नीतियों पर प्रश्न उत्थाये हुए हैं । यहाँ तक की बंगाल में वामदल की चीर प्रत्ज्द्वंदी ममता बेनर्जी ने भी बासु और उनकी पार्टी को गलत नीतियों का पोषक बता कर सत्ता पर काबिज हुई । और आज ये ही सारे दुनिया से रूठे हुए महान जीवन को याद की लोरी में गुनगुना रहे हैं ।।।

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