मंगलवार, 27 मार्च 2012

दिल से निकली पंक्तियां..

"आजकल नहीं देख पा रहा, सूरज की प्रभात लालिमा।
मैं अक्सर देर से उठता हूँ, वो सुबह जल्दी निकलता है।"

"मैनें खुद के लिए खुदा से मांगना ही छोड़ दिया है,
जब से उसने किसी और से चाहत की बात कही है।"

"वो मुझसे पूछता है, ख्वाब किस किस के देखते हो,
बेखबर जानता ही नही, यादें उसकी सोने कहाँ देती हैं!"

"मुस्कुराने से भी होता है बयां गम-ए-दिल,
मुझे रोने की आदत हो ये जरुरी तो नहीं..।"

"तुझसे बुरा दुनिया मे कोई नहीं है इश्क,
हर भले को बिगाड़ने का काम किया तूने।"

"हमें अच्छा नहीं लगता, कोई हम-नाम तेरा,
कोई हो तुझसा, तो फिर नाम तुम्हारा रखे।"

"जब भी सोचता हूँ तेरे बिना क्या है मेरी जिन्दगी,
एक उजड़े हुए गुलिस्तां का मंजर याद आता है।"

"ख्वाहिशों का काफीला भी अजीब ही होता है,
अक्सर वहीं से गुजरता है जहां रास्ते नहीं होते।"

"तुम जो इजाजत दो तो चंद लफ्जों में कह डालें,
कि तुम बिन मर तो सकते हैं, पर जी नहीं सकते।"

"ये लफ्जों की शरारत है, जरा संभल कर लिखना तुम,
मोहब्बत लफ्ज भर है लेकिन, ये अक्सर हो भी जाती है।"

"जिन्दगी तो मेरे जन्म के पहले से ही खूबसूरत है,
मेरी कोशिश तो इसे और बेहतर बनाने की है...।"

"मंजिलों का गम करने से मंजिलें नहीं मिला करती,
हौसले भी टूट जाते हैं, अक्सर उदास रहने से...।"

"जो तुम्हें देख के फिर और किसी के देखे,
वो एक तमाशाई है तलब-ए-दीदार नहीं...।"

"ये मैं ही था, बचा के खुद को ले आया कनारे तक,
वर्ना, समंदर ने बहुत मौका दिया था डूब जाने का।"

"बहुत मुश्किल है कोई लगाये मेरी चाहतों का अंदाजा,
कि मेरी चाहतों का समंदर उनकी सोच से भी गहरा है..।"

"मैं काबिल-ए-नफरत हूँ तो छोड़ दे मुझको,
तू मुझसे यूं दिखावे की मोहब्बत न किया कर..।"

"तुझसे रुठने के बहाने तो बहुत हैं मगर,
डरता हूँ गर मनाने न आया तो क्या करेंगे।"

"उसकी मोहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब सिलसिला था,
अपना भी नहीं बनाया और किसी का होने भी नहीं दिया...।"

"अल्फाज इन्सान के गुलाम होते हैं, मगर बोलने से पहले ।
बोलने के बाद इन्सान लफ्जों का गुलाम बन जाता है ।।"

"सफर तो है मेरा, रफ्तार मगर तुम हो।
न होते तुम तो शायद तेज दौड़ता,
या किसी ठौर पर रुक ही जाता...।"

"उनकी शिकायत है की मैं तारीफ नहीं करता,
कैसे कहूं की अब मैं सच बोलने लगा हूँ...।"

"वाह रे दुनिया की साफगोई,
दीवारो को रंगों में बांटा, और
इंसानो को मजहबों के फेर में..."

"मत छोड़ मेरा साथ तू जिंदगी में इस तरह, दोस्त
शायद हम जिंदा हैं तुम्हारे ही साथ रहने से..."

"यह विसंगति जिंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई....
चाह में है और कोई...बांह में है और कोई...."

"मरना तो इस जहान में कोई हादसा नहीं,
इस दौर-ए-नागवारी में जीना कमाल है...।”"

"जिन राहों पे एक उमर तेरे साथ रहा हूँ,
कुछ रोज से वो रास्ते सुनसान बहुत हैं..."

"अबकी वो बिछड़ेगा तो ये इल्तजा करुंगे उससे,
बिन अपने जीने का कोई अंदाज तो सिखाता जा..."

"वो कहती रहीं हर बार, मेरी मुस्कुराट कमाल है..
सच ही कह रही थीं शायद, तभी तो
आज जाते हुए, साथ सिर्फ मेरी मुस्कुराहट ले गयी।"

"काश ! वो सुबह नींद से जागे तो मुझसे लड़ने आये,
कि तुम कौन होते है मेरे ख्वाबों में आने वाले।"

"गैरों को कब फुरसत है गम देने की,
जब होता है कोई हमदम होता है।"

"बर्बाद बस्तियों में किसे ढ़ूढ़ते हो तुम,
उजड़े हुए लोगों के ठिकाने नहीं होते।"
"
"कफन पड़ा तन पे तो ये मालूम हुआ,
कि लोग परदा नशीनों को इतना चाहते क्यों हैं।"

"कैसी खामोशी है इन लम्हों में,
जैसे सारे रंग उड़ चले हैं जिन्दगी के हमारे।"

"मैं इस लिए भी अक्सर अपनी ख्वाहिशों को मार देता हूँ,
कि मुझे वो नहीं मिला करता जो ख्वाहिश बन जाता है।"

"आसां नहीं आबाद करना घर मोहब्बत का,
ये उनका काम है जो जिन्दगी बरबाद करते हैं।"

"आजकल सूरज से बहुत कम मेरी आंख मिलती है।
रात जागते बीत जाती है, दिन आंखों खोलने में गुजरती है।"

"जगी है प्यास ऐसी की, समन्दर भी कम लग रहा।
पर मुकद्दर ऐसा है, कि जहर भी नहीं मिल रहा।।"

कुछ कहीं-अनकही..

"रात सुनती रही मैं सुनाता रहा,
दर्द की दास्तां मैं बनाता रहा।

लोग लोगों से चाहत निभाते रहे,
एक वो था मेरा दिल जलाता रहा।

धूप छांव सी उसकी तबीयत रही,
वो निगाहें मिलाता चुराता रहा।

दिल के मेहमान खाने में रौनक रही,
कोई आता रहा, कोई जाता रहा।

साथियों ने भी सारा माजरा समझ लिया,
मैं जो नाम तेरा लिखता मिटाता रहा।

एक मैं ही प्यासा रहा दोस्तों,
लोग पीते रहे मैं पिलाता रहा।"

मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं...

"अपनी खुशियां लुटाकर उसपे कुर्बान हो जाऊं,
काश कुछ दिन उसके शहर में मेहमान हो जाऊं।

वो अपना नायाब दिल मुझको देदे और फिर मांगे,
मैं मुकर जाऊं और बे-इमान हो जाऊं।

वो मुझपे सितम करे हर किसी की तरह,
मैं उसकी इस अदा पर भी मेहरबान हो जाऊं।

वो मेरे पांव के नीचे से जमीन भी खींच ले,
और फिर मैं उसका आसमान हो जाऊं।

अब तो मुझे इतनी मोहब्बत हो गयी उससे,
कि ऊपर वाला ही दिखाये कोई करामात...
और मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं।"

सोमवार, 19 मार्च 2012

सच्चाई की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है...

पत्रकारों को सच सामने लाने के लिए जोखिम उठाने पड़ते हैं और इस सच की कीमत भी चुकानी पड़ती है। यह सच और झूंठ की मुठभेड़ है जो अनादिकाल से चली आ रही है तथा अपने-अपने मोर्चे पर बोलकर अथवा लिखकर हर दौर में नारद से लेकर गांधी तक महान लोगों ने समाज में बदलाव की लहर लाने का काम किया। इस काम में साहित्कारों की भूमिका भी सराहनीय रही है, जिन्होंने कलम के सिपाही के तौर पर निरन्तर अपनी लेखनी की कीमत चुकाते हुए नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्तिकरण का काम करते रहे।

आज के समय में भी कलम के इन सिपाहियों यानि की देश के चौथे स्थम्भधारी मीडिया वालों पर देश और समाज की दशा और दिशा के बारे में विचार कर उसके लिए बेहतर विकल्प तलाशने का काम है। ऐसे में पत्रकार अपनी ईमानदारी और कलम के जोर पर ही समाज के प्रति अपनी संवेदनाओं को अक्षरों के रुप में उकेरने का काम करता है। एक पत्रकार सबके सुख-दु:ख लिखता है लेकिन अपनी कहानी कभी नहीं कहता। वह राष्ट्र की संस्कृति और समाज बनाता है और इतिहास व समय के पैमाने को बदलता जाता हैं। ऐसे में ज्ञान की वंश परम्परा में साहित्यकार और पत्रकार को दो जुड़वां भाईयों की संज्ञा देना गलत ना होगा। जहां साहित्यकार शाश्वत की खोज करता है वहीं पत्रकार वर्तमान का अन्वेषण करता है। सूचना और प्रोद्योगिकी के युग से पहले भी वह स्वतंत्रता सेनानियों की जय बोलता था और आज भी वह पिछड़े और वंचितों से साथ ही जीता है। यही कारण है कि शब्द कभी मरता नहीं है, वह स्वयं ही अपना रास्ता बनाता है। साहित्यकार और पत्रकार की जुगलबंदी अनन्तकाल से आततायी और शोषण की व्यवस्था से लड़ती-मरती आई है तथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक असहमतियों के चक्रव्यूह में अभिमन्यु की भूमिका अदा करती है।

स्मरणीय हो कि मानव समाज और समय के कुरूक्षेत्र में जिस शब्द और वाणी का आधार सत्य और अहिंसा रही है, वही कलम सामाजिक क्रांति के लिए परिवर्तन की जननी मानी गयी है। यानि कि उपनिवेशवाद से लेकर आज पूंजीवाद तक तानाशाही और लोकतंत्र में सच्ची कलम विपक्ष की आवाज बनकर ही चली है। दुनिया भर में दूसरे विश्वयुध्द के बाद जो क्रांतिकारी बदलाव आये हैं, उसमें आम जनता की आवाज को आगे बढ़ाने का काम साहित्यकारों तथा पत्रकारों ने ही किया है। वैसे मूल तौर पर पत्रकारिता का विकास तो उस युग से माना जायेगा जब यूरोप में ओद्योगिक क्रांति के बाद जब से छापाखने की परिकल्पना सामने आई। भारत के संदर्भ में देखें तो पत्रकारिता का उदय अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व मुगलकाल में ही हो गया था। पहले प्रचार-प्रसार सीमित था लेकिन जैसे-जैसे तकनीक का और कागज का आविष्कार हुआ हमारे लोक जीवन में शब्द और वाणी के प्रभाव सभी दिशाओं में फैलने लगे। साहित्य की इन्हीं सीमाओं को तोड़ने का काम आज पत्रकारिता कर रही है तथा सूचना और प्रोद्योगिकी की इस २१वीं सदी में पत्रकारिता ने पारदर्शिता के नए रास्ते भी खोल दिए हैं।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रुप में प्रचलित वर्ष १८५७ की क्रांति में इस सूचना और समाचार की ताकत ने जबर्दस्त काम किया है। आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडीया ने देश और समाज में जो अग्रणी हस्तक्षेप और सवाल खड़े किये हैं, उसी का परिणाम है कि मीडिया अब विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बाद चौथे स्तम्भ अर्थात् खबरपालिका के रूप में स्थापित हो गया है। स्थितियों में बदलाव इस तरह से आया है कि पहले जहां सूचना का खुलासा करने वालों को भेदिया कहकर मार दिया जाता था, जहर का प्याला पिला दिया जाता था, हाथी के पांवो से कुचल दिया जाता था या फिर तोप के मुँह पर बांधकर उड़ा दिया जाता था। वही काम आज लोकतंत्र में राजनैतिक और आर्थिक गिरोहों तथा माफियाओं के द्वारा किया जाता है यानि कि उनके हितों के लिए बोलने और लिखने वाले को रास्ते का काँटा समझकर साफ किया जाता है।

समझने की बात यह है कि आज जब राजनीती का अपराधीकरण हो गया है, जातिवाद और सम्प्रदायवाद जिस तरह सत्ता-व्यवस्था में घुस गया है तथा आर्थिक शक्तियां जिस तरह समानान्तर सरकार जैसी संगठित बन गई है तब से सच की खोज करने वाला पत्रकार इन समाज विरोधी ताकतो के निशाने पर आ गया है। आजादी के बाद और लोकतंत्र के विकास में जब पत्रकारिता और मीडिया एक सूचना उद्योग का रूप ले चुके है तब से शब्द और सूचना की सत्यता ही सबसे अधिक हिंसा और अपराध का शिकार हो रही है। आज भारत में ही विभिन्न भाषाओं की कोई ८० हजार पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं और करीब ७०० से अधिक टीवी चैनल रात-दिन चल रहे है। ऐसे में राजनैतिक और आर्थिक ताकतों की सारी कवायद मीडिया को अपने नियंत्रण में रखने की हो रही है। यह शक्तियां साम, दाम, दण्ड व भेद से मीडिया पर अपना आधिपत्य जमाने में लगी हैं। इस रास्ते में बाधा बन रहे पत्रकारों और लेखकों को अपनी राह का रोड़ा समझकर मारती-डराती रहती है।

शब्द और सत्य पर आक्रमण की यह कहानी १९९० के भूमंडलीकरण और खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक सक्रिय हो गई है। तानाशाही और अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाओं में यह हमले अधिक है लेकिन भारत जैसे उदार लोकतंत्र में पत्रकार और मीडिया पर सबसे अधिक कातिलाना हमले राजनीती और आर्थिक जगत से जुड़े घराने ही करा रहे हैं। जहां-जहां मीडीया का प्रभाव समाज में बढ़ रहा है, वहां-वहां भेद खोलने वाले और खोजी पत्रकारिता के नायकों पर हमले अधिक हो रहे है। संक्षिप्त में एक मीडियाकर्मी और पत्रकार की हत्या समय और समाज के सत्य को दबाने के लिए ही है। पंजाब केसरी के लाला जगत नारायण तथा रमेशचंद्र की हत्या आंतक में की गई तो लेखिका तसलीमा नसरीन को सच लिखने के लिए बांग्लादेश से निर्वासित होना पड़ा। इसी तरह १९७५ के आपातकाल में मीडिया को भारी प्रतिबंध झेलने पड़े ताकि वह सरकार की गलत नीतियों पर जनता की बातों को आगे और प्रचारित-प्रसारित न करें।

यह सब प्रतिरोध और असहमति ही कलम के सिपाही को हिंसा का शिकार बनाती है और हरिशंकर परसाई को भी साम्प्रदायिकता के गुंडो से पिटवाती है। अभी आर्थिक राजधानी मुम्बई में समाचार पत्र मीड डे के पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या और पिछले दिनो पाकिस्तान के एक पत्रकार सलीम शहजात की मौत, इसी क्रम का एक उदाहरण है। इसी प्रकार आए दिन हत्या और हमलों की खबरें इस बात की याद दिलाती है कि हर लेखक और पत्रकार को सच लिखने की कीमत चुकानी ही पड़ती है, जो भूत से लेकर भविष्य में भी पूर्णत: सत्य है। ऐसे में कलम के सिपाहियों को जोखिम तो उठाने ही होंगे, तभी तो वह तथ्यों की परख और सच के अन्वेष्ण को सही दिशा दे सकेगा। ऐसे में वह समय दूर नहीं जब कमल के सिपाही सही मायनों में लोकतंत्र के सच्चे रक्षक कहलायेंगे। यह सत्य है कि शायर, सिहं और सपूत सदैव लीक से हटकर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हैं। कलम का इतिहास भी वही लिखते हैं जो शहीद हो जाते हैं पर बिकते नहीं।

मां...


"अभी तक वो बचपने की यादें हैं बाकि,
और वो बचपने की बातें हैं बाकि।

कि जब मैंने बोला था मां पहली बार,
मां की आंखों में भरा था कितना प्यार।

पैदा हुआ था तो कुछ भी नहीं था मैं,
मां की वजह से ही हूं आज मैं।

लालच तो कुछ नहीं मेरी मां को मगर,
अच्छा हो दे दूं दिल तोहफे में अगर।

मां को छोड़ते हैं ऐसे कुछ लोग होते हैं,
फिर औरों के लिए वो हमेशा बोझ होते हैं।

कुछ लोगों के लिए मां को कभी छोड़ते नहीं,
चाहे कुछ भी हो जाये मुंह मोड़ते नहीं।

मां से हमेशा हमें सुख मिलता है,
फिर भी उसको हमसे दुख मिलता है।

काश मैं कुर्बान करुं सब उसकी सदा पर,
और वो मुझे प्यार करे मेरी इसी अदा पर।

मेरी मां से मुझे कोई जुदा न करे।
करुं प्यार किसी और से खुदा न करें।"

शनिवार, 17 मार्च 2012

मेरा जिक्र ना करना...

“दुख दर्द के मारों से मेरा जिक्र ना करना,
घर जाओ तो यारों से मेरा जिक्र ना करना।

वो रोक ना पायेंगे आंखों का समन्दर,
तुम राह-गुजारों से मेरा जिक्र ना करना।

फूलों सी यारी पर रहे हैं हम अक्सर हर्षिले,
देखों कभी कंटों से भी मेरा जिक्र ना करना।

शायद ये अंधेरे ही मुझे राह दिखायें,
अब चांद-सितारों से मेरा जिक्र ना करना।

वो मेरा कहानी को गलत रंग ना दे दें,
अफसाना निगाहों से मेरा जिक्र ना करना।

शायद वो मेरे हाल पर बेशाख्ता रो दे,
इस बार बहारों से मेरा जिक्र ना करना।

ले जायेंगे गहराईयों में तुमको भी बहा कर,
दरिया के किनारे से मेरा जिक्र ना करना।

वो शख्स मिले तो उसे हर बात बताना,
तुम सिर्फ इशारों से मेरा जिक्र ना करना।”

रविवार, 11 मार्च 2012

चलो आज खुद को सजा देते हैं...

“चलों आज खुद को सज़ा देते हैं,
हर ख्वाहिश दिल में दबा देते हैं।

खाये हैं बड़े धोखे राह-ए-उलफत में,
तोड़ कर दिल किसी का अब मजा लेते हैं।

मजबूर है दिल उनसे प्रीत निभाने को,
वो हैं हर मोड़ पर दगा देते हैं।

तो क्या हुआ जो मिली हमें सिर्फ तन्हाई,
उन्हें फिर भी खुश रहने की दुआ देते हैं।

गवांरा नहीं उन्हें कि देखें नजर भर,
आज अपनी रुह तक हम जला देते हैं।”

बहन...


"बहुत चंचल बड़ी खुशनुमा सी होती है बहन,
नाजुक सा दिल है रखती, मासूम सी होती है बहन,
बात-बात पर रोती हैं, लड़ती हैं, झगड़ती हैं,
पर झट से मान जाने वाली नादान परी होती है बहन...

है रहमतों से भरपूर, खुदा की ईनायत है बहन,
भाईयों की सूनी कलाईयों पर प्यार बनकर छाई है बहन,
घर भी महक उठता है जब मुस्कुराती है बहन,
जब डांट पर बड़ों की गुस्सा जाते हैं भाई,
तो दादी अम्मा की तरह समझाती और हंसाती है बहन....

होती है अजीब हालत जब छोड़ वो घर को जाती है,
खुशी उसकी विदाई की, पर आंख तो भर ही आती है,
लाख मनाये दिल के अपने, धर्म है उसका एक दिन जाना,
फिर भी उससे बिछड़ने का गम़, मन में घर कर जाती है।

दीवारों पर भले चढ़ा हो रंग और सजी हो रंगीन लतरियां,
पर सूना-सूना रहता घर-आंगन, जब विदा वो हो जाती है।
हंसी-ठिठोली करने वाली, जग से प्यारी अपनी बहन,
अन्त समय जाते-जाते कितना रुला जाती है बहन...।"

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

आंकड़ों की गवाही में भी बड़े खिलाड़ी हैं राहुल द्रविड़

नई दिल्ली, 09 मार्च (हि.स.)। कहते हैं कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। आंकड़े किसी खिलाड़ी की सफलता और असफलता का पहला सबूत पेश करते हैं और इस लिहाज से अगर राहुल द्रविड़ के आंकड़ों पर गौर करें तो वह नि:संदेह बड़े खिलाड़ी प्रतीत होते हैं।

क्रिकेट के खेल में आंकड़ों की महत्ता का अंदाजी इसी से लगाया जाता है कि वह सीधे तौर पर खिलाड़ी की अपनी मेहनत को दर्शाता है। आंकड़ों की तरह द्रविड़ का व्यक्तित्व और उनका पेशेवर करियर इस बात का इशारा करता है कि वह भारतीय ही नहीं विश्व क्रिकेट के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं। ऐसे में द्रविड़ का संन्यास एक ऐसा खालीपन लेकर आया है, जिसमें परंपरागत क्रिकेट को चाहने वाले सबसे अधिक निराश होंगे।

विशुद्ध किताबी शॉट खेलने वाले द्रविड़ ने भारत के लिए 344 एकदिवसीय और 164 टेस्ट मैच खेले हैं। क्रिकेट के दोनों स्वरूपों में द्रविड़ के नाम 10 हजार से अधिक रन हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ ने जहां सचिन तेंदुलकर के बाद सबसे अधिक 13288 रन बनाए हैं वहीं एकदिवसीय मैचों में उनके नाम 10889 रन हैं। भले ही रन तेजी से बनाने के लिए द्रविड़ को न जाना जाता हो पर यह भी सत्य है कि एकदिवसीय/टी-20 मैचों में भारतीय बल्लेबाजों में वह सबसे तेज पचासा लगाने वालों में तीसरा स्थान रखते हैं। उनसे आगे केवल युवराज सिंह (12 गेंद), अजीत आगरकर (20 गेंद) हैं, जबिक द्रविड़ ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 22 गेंदों में अपना पचासा जड़ा था।

फटाफट खेल से इतर पारम्परिक खेल टेस्ट मैच में द्रविड़ ने 36 शतक और 63 अर्धशतक लगाए हैं। शतकों की दौड़ में वह दूसरे सबसे सफल भारतीय बल्लेबाज हैं। सचिन तेंदुलकर ने उनसे अधिक 51 शतक लगाए हैं। टेस्ट मैचों में द्रविड़ के नाम सबसे अधिक 210 कैच लपकने का रिकार्ड है। एकदिवसीय मैचों में द्रविड़ के नाम 12 शतक और 83 अर्धशतक हैं। उन्होंने 196 कैच लपके हैं। विकेटकीपर के तौर पर द्रविड़ ने एकदिवसीय मैचों में 14 स्टम्प भी किए हैं। सचिन की तरह द्रविड़ ने भी एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय ट्वेंटी-20 मैच खेला है, जिसमें उनके नाम 31 रन दर्ज हैं।

वर्ष 1996 में लॉर्ड्स में 95 रनों की पारी के साथ अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले द्रविड़ ने अपना अंतिम टेस्ट 24 जनवरी को एडिलेड में आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था। क्रिकेट जगत में 'द वॉल' और 'मिस्टर भरोसेमंद' जैसे विशेषणों से नवाजे गए द्रविड़ भारत के अलावा स्कॉटलैंड, एशिया एकादश, आईसीसी विश्व एकादश, एमसीसी और इंडियन प्रीमियर लीग में रॉयल बैंगलोर चैलेंजर्स और राजस्थान रॉयल्स के लिए खेले हैं।

उल्लेखनीय है कि बेंगलुरू के सेंट जोसफ हाई स्कूल से निकलकर पहले कर्नाटक और फिर भारत के लिए खेलने वाले द्रविड़ ने अपने 20 साल के क्रिकेट करियर में सबका प्यार पाया और उस प्यार के तोहफे के तौर पर देश के लिए कई नायाब पारियां खेलीं। एक वक्त ऐसा था जब भारत के क्रिकेट प्रेमी यह मानते थे कि कोई विकेट पर टिके या न टिके द्रविड़ जरूर टिकेंगे और द्रविड़ ने इस विश्वास को कायम रखते हुए अपने लिए सबके दिलों में एक खास जगह बनाई।

हिन्दुस्थान समाचार/09.03.2012/आकाश।

बुधवार, 7 मार्च 2012

जिन्दगी...

आ जाये ऐसे में कोई, जहर ही दे दे मुझको,
कोई चाहत है ना कोई जरुरत है...

अब तो ख्वाहिशों ने भी साथ छोड़ दिया
कि जैसे उम्मीदों की ना कोई एहमियत है...

मौत की गोद मिल रही है अगर,
तो जागे रहने की क्या जरुरत है...

जिन्दगी को बहुत करीब से देखा है हमने,
जिन्दगी... बस एक मिट्टी की मूरत है...।

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

सरोगेसी मातृत्व की विश्व राजधानी को तौर पर बदनाम भारत

नई दिल्ली, 02 मार्च (हि.स.)। भारत सरोगेसी मातृत्व की विश्व राजधानी के तौर पर दुनिया भर में बदनाम हो रहा है। तेजी से प्रजनन पर्यटन का प्रमुख केन्द्र बनने के चलते इस बात की बहुत सख्त जरूरत है कि सरोगेट माताओं के अधिकारों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किया जाये। साथ ही इस संबंध में कानून बना कर देश भर में तेजी से पनपते ’असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलॉजी’ क्लीनिकों को नियम-कायदों के दायरे में लाया जाए। यह कहना है जैंडर विषय पर काम करने वाले अग्रणी स्वैच्छिक समूह सेंटर फॉर सोशल रिसर्च का।

शुक्रवार को सीएसआर ने ’सरोगेसी मातृत्व: नैतिक या व्यावसायिक’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी की जो गुजरात में किए गए अध्ययन पर आधारित है। सीएसआर की निदेशक और जानी मानी महिला कार्यकर्ता डॉ. रंजना कुमारी ने सरकार से आग्रह किया कि एआरटी 2010 बिल को अविलम्ब पास किया जाए। इससे अपनी कोख को समर्पित करने वाली महिलाओं को सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी, क्योंकि अपनी आजीविका को स्थिर रखने के लिए उन्हें गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है।

रिपोर्ट के माध्यम से डा. रंजना ने स्पष्ट तौर पर परिभाषित कानून की आवश्यकता पर बल दिया, जो सरोगेसी के बारे में भारतीय सरकार के विचार को विस्तार में प्रकट करे, ताकि सरोगेट माताओं के होने वाले शोषण को रोका जा सके। रिपोर्ट का यह भी कहना है कि सरोगेसी शिशु का नागरिक अधिकार भी अति महत्व का विषय है और इसमें पूछा गया है कि, भारतीय सरकार को सरोगेट शिशु को भारतीय नागरिकता देने के मामले में कदम उठाना होगा क्योंकि वह भारतीय (सरोगेट माता) कोख से भारत में जन्म लेता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरोगेट माता और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य बीमा होना चाहिए ताकि वे एक सेहतमंद जीवन जी सकें।

रिपोर्ट मे यह भी खुलासा हुआ है कि पिछले कुछ सालों में किस प्रकार सरोगेसी बढ़ी है और क्यों भारत अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल बनता जा रहा है। सीएसआर में अनुसंधान की प्रमुख एवं इस रिपोर्ट की मुख्य लेखिका सुश्री मानसी मिश्रा ने कहा, ‘सस्ती चिकित्सा सुविधाएं, उन्नत प्रजनन तकनीकी जानकारी के साथ निर्धन सामाजिक-आर्थिक स्थितियां तथा भारत में नियामक कानूनों की कमी; ये सब मिलकर भारत को एक आकर्षक विकल्प बना देते हैं।’ यह रिपोर्ट सरोगेट माताओं के अधिकारों और देश भर में गैरकानूनी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलॉजी (एआरटी) क्लीनिकों के मुद्दे उठाती है। इसमें सवाल उठाए गए हैं कि क्या सरोगेट मातृत्व को नियमित करना चाहिए और यदि हां, तो किस तरीके से। यदि नियमन के संबंध में किसी अनुबंध पर पहुंचा जा सके, तो भी प्रश्न बना रहता है कि क्या उन मापदंडों को कायम रखा जा सकेगा।

सरोगेसी के इंतजाम के विषय पर सीधे तौर पर कानून होना चाहिए जिसमें तीनों पार्टियां शामिल हों, यानीः सरोगेट मदर, माता-पिता और बच्चा। सरोगेट माताओं के लिए अधिकार-आधारित कानूनी ढांचे की जरूरत है क्योंकि आईसीएमआर के दिशानिर्देश काफी नहीं हैं। डॉ. कुमारी ने कहा। उनका कहना था कि असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल को तुरंत पास करने की जरूरत है जिसका लक्ष्य सरोगेट माता और बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना है। सरोगेसी व्यवस्था से जो कारोबार हो रहा है उसका अनुमानित आंकड़ा 500 मीलियन डॉलर है और सरोगेसी के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इस संबंध में सटीक भारतीय आंकड़ें ज्ञात नहीं हैं लेकिन जांच से पता लगा है कि पिछले कुछ सालों में यह काम दोगुना हो चुका है।

गोरी, शिक्षित और युवा औरतों की मांग लगातार बढ़ रही है जो विदेशी दंपतियों के लिए सरोगेट माता का काम कर सकें। अक्सर दंपतियों को अपनी बारी के लिए आठ महीनों से लेकर एक साल तक प्रतीक्षा करनी होती है। आम तौर पर छोटे शहरों की महिलाओं को इस आउटसोर्सिंग प्रेग्नेंसी के लिए चुना जाता है। आणंद, सूरत, जामनगर, भोपाल व इंदौर ऐसे शहर हैं जहां भारतीय तथा विदेशी दंपति बच्चे की चाहत में यात्राएं करते हैं।

सरोगेसी की औसत लागत 10,000 से 30,000 डॉलर के बीच है जिसमें शामिल होते हैं : सरोगेट माता का पारिश्रमिक, आईवीएफ का खर्च, भोजन व उपभोज्य वस्तुएं, कानूनी व डॉक्टर की फीस, प्रसव व्यय एवं प्रसव पूर्व देखभाल का खर्चा। अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल पर्यटकों के लिए यह लागत बहुत ही किफायती है जिस वजह से वे अधिक से अधिक संख्या में भारत आ रहे हैं। किंतु जो महिला वास्तव में अपनी कोख समर्पित करती है वह न्यायपूर्ण मुआवजे़ से वंचित रह जाती है। बिचौलिए, मैडिकल क्लीनिक और वकील अधिकांश पैसा ले जाते हैं- इस रिपोर्ट के मुताबिक सरोगेसी के लिए जो 12 से 15 लाख रुपए दिए जाते हैं उसमें से सरोगेट माता को मात्र 1-2 प्रतिशत ही मिलता है।

गौरतलब है कि यह रिपोर्ट कई परेशान कर देने वाले तथ्यों को भी उद्घाटित करती है। उदाहरण के लिए, कई बार पति इस बात पर ऐतराज नहीं करता की उसकी पत्नी सरोगेसी के लिए जाए लेकिन जब बच्चे के जन्म के बाद औरत घर लौटती है तो उसका पति व बच्चे उससे दूरी बना लेते हैं। इन मामलों में क्लीनिकों की भूमिका भी संदेहास्पद है। सरोगेसी अनुबंध सरोगेट माता (उसके पति सहित) कमीशनिंग माता-पिता और फर्टिलिटी चिकित्सक के बीच होता है, लेकिन क्लीनिक इस विषय से अपने को दूर रखते हैं ताकि उन्हें किसी कानूनी झंझट में न पड़ना पड़े। इस बारे में कोई तयशुदा नियम नहीं है कि सरोगेट माता को कितना मुआवज़ा दिया जाएगा, यह रकम क्लीनिक मनमाने ढंग से तय करते हैं। आम चलन यह है कि सरोगेट शिशु के कमीशनिंग माता-पिता कुल जितना धन देते हैं उसका 1-2 प्रतिशत ही सरोगेट माता को दिया जाता है। इस रिपोर्ट ने खुलासा किया।

हिन्दुस्थान समाचार/02.03.2012/आकाश।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

.... ढूँढ लेते हैं।

“कि जिनके दिल में है हरदम जुनूं हाँ जीतने का बस
वो हर तूफान में अपना किनारा ढूँढ लेते हैं।

पता हमने कभी ना आँसुओं को भी दिया अपना
न जाने फिर वो कैसे घर हमारा ढूँढ लेते हैं

ये उनकी बादशाहत है या समझूँ मैं हकीकत ही
कि खुद में ही खुदा का वो नज़ारा ढूँढ लेते हैं

मेरी जो मुस्कुराहट गुम हुई तो मिल नहीं पाई
चलो आओ जरा उसको दुबारा ढूँढ लेते हैं

हमें अब पड़ गई आदत है अद्भुत फाकामस्ती की
हमारा क्या, कहीं भी हम, गुजारा ढूँढ लेते हैं।”

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

ऐसे विदा हुआ एक शख्स...

“विदा हुआ तो बात मेरी मान कर गया,
जो उसके पास था सब मुझे दान कर गया।

बिछड़े कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई,
एक व्यक्ति सारे शहर को वीरान कर गया।

दिलचस्प बात है उसके जाने के पीछे,
अपने हितों पर मुझे कुर्बान कर गया।

अब शहर में कोई भी मुझे पहचानता नहीं,
वह अपने साथ मुझे भी अनजान कर गया।”

शनिवार, 14 जनवरी 2012

तेरी ममता पावन दाई, ओ माई...

अंबर की ये ऊंचाई, धरती की ये गहराई,
तेरे नाम में है समाई, ओ माई...
तेरा मन अमृत का प्याला, यही काबा यही शिवाला
तेरी ममता पावन दाई, ओ माई...

तेरे साथ रहूं मैं बन के तेरा,
तेरे हाथ न आऊ, छुप-छुप जाऊं
यूं खेलूं आंख मिचौली
परियों का कहानी सुना के,
कोई मीठी लोरी गा के,
कर दे सुखदाई, ओ माई...

संसार के ताने-बाने से घबराता है मन मेरा,
इन झुठे रिश्ते नातो में बस प्यार है सच्चा तेरा,
सब दुख सुख में ढ़ल जाये,
तेरी बाहें जो मिल जायें,
मिल जाये मुझे खुदाई, ओ माई...

फिर कोई शरारत हो मुझसे,
नाराज करूं फिर तुझको,
फिर गाल पे थप्पड़ मार के तू,
सीने से लगा ले मुझको,
बचपन की प्यास बुझा दे,
अपने हाथों से खिला दे,
पल्लू से बंधी मीठाई, ओ माई...

मुझमें नहीं...

चेहरे बदलने का हुनर मुझमें नहीं ,
दर्द दिल में हो तो हसँने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं तो आईना हूँ तुझसे तुझ जैसी ही बात करूं,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमें नहीं।

चलते-चलते थम जाने का हुनर मुझमें नहीं,
एक बार मिल के बिछड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं तो दरिया हूँ, बहता ही रहा सदा,
तूफानों से डर जाने का हुनर मुझमें नहीं।।

रविवार, 1 जनवरी 2012

फिर याद आये तुम...

मैं लफ्जों में कुछ भी इजहार नहीं करता,
इसका मतलब ये नहीं कि मैं प्यार नहीं करता।

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
तेरी सोच में वक्त अपना बरबाद नहीं करता।

तमाशा ना बन जाये कहीं ये मेरी मोहब्बत,
इस लिए अपने दर्द को नामोदार नहीं करता।

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता।

पर कोई तो बात है तेरी फितरत में जालिम,
वरना मैं तुझे चाहने की गलती बार-बार नहीं करता।।

उदासी

चुप चुप रहना कुछ न कहना,
ये भी एक उदासी है।

हंस के सारे सदमे सहना,
ये भी एक उदासी है।

बैठे-बैठे खो जाना यूं ही,
दूर खयालों में।

चलते-चलते हँसते रहना,
ये भी एक उदासी है।

दिल की बातें सुन कर हँसना,
ये तो सब की आदत है।

ग़म की बात पे हँसते रहना,
ये भी एक उदासी है।

यूं चले दौर यारी के...

ये यारो की महेफिल.... सितारों की संगत ।
पता क्या था मिलेगी हमको रौनक-ए-रंगत ।।

यूं चले दौर यारी के.. हुई सब की सोहबत ।
कुछ अनजाने.. अन-सुलझे चेहरों की उल्फत ।।

यहां किसको समझे... यहां किसको जाने ।
जहां देखता हूँ... सभी में अपनी ही सूरत ।।

न कोई पराया.. रहा हमसे बेगाना अब तो ।
सभी में मिल गये सब अपने ही सब तो ।।

धड़कते हुए दिल से आवाज़ देना ।
तड़पे जो कभी तब सहारा तुम देना ।।

न इल्जाम, न तोहमत, न शिकवा किसी से ।
करेंगे महोब्बत अब हम तो सभी से...।।

आदत ही बना ली है...

"आदत ही बना ली है, इस शहर के लोगों ने,
अंदाज बदल लेना, आवाज बदल लेना,
दुनिया की मोहब्बत में, अतवार बदल लेना,
मौसम जो नया आये, रफ्तार बदल लेना,
अल्फाज वहीं रखना, इस्तहार बदल लेना,
आदत ही बना ली है, इस शहर के लोगों ने।

रास्ते में अगर मिलना, नजर को झुका लेना,
आवाज अगर दो तो, कतरा कर निकल जाना,
हर एक से जुदा रहना, हर एक से खफा रहना,
हर एक ने गिला करना...
जाते हुए राही को, मंजिल का पता देकर,
रस्ते में रुला देना...।
आदत ही बना ली है, इस शहर के लोगों ने।"

नये वर्ष में नई प्रेरणा

"नव जीवन का नव प्रभात नव वर्ष लेकर आया है ।
नयी उमंग, नयी आशा से, हममें जोश नया अब आया है ।।

बीता हुआ वर्ष कुछ अच्छा भी था, कुछ ने हमें रुलाया है ।
मिला परिणाम हमें जो गत् वर्ष, हमारे परिश्रम की परिछाया है ।।

हर गलती हमें सिखाती है, हर जीत जोश भर जाती है ।
हर पल आगे बढ़ते रहना, प्रकृति यह पाठ पढ़ाती है ।।

जो कल था उसका चिंता न कर, हमें आज को संवारना है ।
भूलकर अब हर बातें, अपना हर संकल्प निभाना है ।।

खुशियां बांटना और खुशियां पाना, जीवन का सही स्पनदन है ।
सही दिशा में सार्थक सोच से, करना नव वर्ष का अभिनंदन है ।।"

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

कमी-सी है...

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है।

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है।

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है।

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है।

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है।

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है।

रविवार, 25 दिसंबर 2011

पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के 88वें जन्मदिवस पर विशेष


ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े तथा धूल और धुएँ की बस्ती में खेले एक साधारण अध्यापक पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी के पुत्र श्री अटलबिहारी वाजपेयी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बने। अटल जी का जन्म 25 दिसंबर 1925 को हुआ। अपनी प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और लोकप्रियता के कारण वह चार दशकों से भी अधिक समय से भारतीय संसद के सांसद रहे। उनमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की संकल्पशक्ति, भगवान श्रीकृष्ण की राजनीतिक कुशलता और आचार्य चाणक्य की निश्चयात्मिका बुद्धि के आधार पर ही उन्होंने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने का काम किया। जिसे लेकर आगे बढते हुए ही उनकी पार्टी सत्ता के सिंहासन पर काबिज हो सकी।

अपने जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण राष्ट्रसेवा के यज्ञ में अर्पित करने वाले अटल बिहारी देश और समाज के लिए ही तत्पर रहे। इनका उद्घोऔष, ‘हम जिएँगे तो देश के लिए, मरेंगे तो देश के‍लिए। इस पावन धरती का कंकर-कंकर शंकर है, बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है। भारत के लिए हँसते-हँसते प्राण न्योछावर करने में गौरव और गर्व का अनुभव करूँगा।' भारत को लेकर उनकी दृष्टि यह हे कि ‘ऐसा भारत जो भूख और डर से, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो’। अटल जी एक ऐसे नेता है जिन्होने जो देश-हित में था वही किया। देश के प्रति संजीदगी के आलम ऐसा रहा कि वह आजीवन अविवाहित रहे। अटल जी एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता (ओरेटर) एवं सिद्ध हिन्दी कवि भी हैं।

अटल सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। वह पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गठबंधन सरकार को न केवल स्थायित्व दिया अपितु सफलता पूर्वक से संचालित भी किया। अटल ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। इन सबसे अलग उनके व्यक्तित्व का सबसे बडा गुण है कि वे सीधे सच्चे व सरल इन्सान हैं। उनके जीवन में किसी भी मोड पर कभी कोई व्यक्तिगत विरोधाभास नहीं दिखा। परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने अग्नि-दो और परमाणु परीक्षण कर देश की सुरक्षा के लिये साहसी कदम भी उठाये। सन् १९९८ में राजस्थान के पोखरण में भारत का द्वितीय परमाणु परीक्षण किया जिसे अमेरिका की सी०आई०ए० को भनक तक नहीं लगने दी। प्रधानमंत्री अटलजी ने पोखरण में अणु-परीक्षण करके संसार को भारत की शक्ति का एहसास करा दिया।

कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाले तथा उसे पराजित करने वाले भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए अटल जी अग्रिम चौकी तक गए थे। वहां उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था, 'वीर जवानो! हमें आपकी वीरता पर गर्व है। आप भारत माता के सच्चे सपूत हैं। पूरा देश आपके साथ है। हर भारतीय आपका आभारी है।' अटल जी के भाषणों का ऐसा जादू है कि लोग उन्हें सुनते ही रहना चाहते हैं। उनके व्याख्यानों की प्रशंसा संसद में उनके विरोधी भी करते रहे हैं तथा उनके अकाट्यउ तर्कों का सभी ओर लोहा भी माना है। उनकी सबसे बड़ा खासियत यह है कि उनका अपनी वाणी पर कसा नियंत्रण रहा और सदैव विवेक व संयम का ध्यान रखते हुए अपनी बात रखी।

राजनीतिक जीवन
वह भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक हैं और सन् १९६८ से १९७३ तक वह उसके अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सन् १९५५ में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, परन्तु सफलता नहीं मिली लेकिन हिम्मत नहीं हारी और सन् १९५७ में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँच कर ही दम लिया। सन् १९५७ से १९७७ जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। सन् १९६८ से ७३ तक वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। मोरारजी देसाई की सरकार में वह सन् १९७७ से १९७९ तक विदेश मंत्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनाई।

१९८० में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की। ६ अप्रैल, १९८० में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी जी को सौंपा गया। दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए। लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् १९९७ में प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। १९ अप्रैल, १९९८ को पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में १३ दलों की गठबंधन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।

सन् २००४ में कार्यकाल पूरा होने से पहले भयंकर गर्मी में सम्पन्न कराये गये लोकसभा चुनावों में भा०ज०पा० के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन (एन०डी०ए०) ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय (अंग्रेजी में इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपंथी दलों के समर्थन से कांग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम होने में सफलता प्राप्त की और भा०ज०पा० विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई। सम्प्रति वे राजनीति से सन्यास ले चुके हैं।

जन संघ और भाजपा
1951 में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे। अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया। वैसे लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वो हार गए थे। 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे। अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी।

1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे। विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं। 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे। 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे।

सांसद से प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं। दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही। ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे। इस बीच, 1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने। लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए।

1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली।

कैदी कविराय के रूप में अटल
अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वह ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें ऋंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर ‘यक शहन्शाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम हसीनों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक’ की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया।

वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेकों आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी। उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ मृत्यु या हत्या, अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी वक्तव्यों का संग्रह), कैदी कविराय की कुण्डलियाँ, संसद में तीन दशक, अमर आग है, कुछ लेख: कुछ भाषण, सेक्युलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि हैं।

“मां तू होती तो…”

नींद बहुत आती है पढ़ते-पढ़ते है,
मां होती तो कह देता, एक प्याली चाय बना दो ।

थक गया जली रोटी खा-खा कर,
मां होती तो कह देता पराठे वना दो ।

भींग गई आंसुओं से आंखे मेरी,
मां होती तो कह देता आंचल दे दो ।

रोज वही कोशिश खुश होने की,
मां होती तो मुस्कुरा लेता ।

देर रात हो जाती है घर पहुँचते-पहुँचते,
मां होती तो वक्त से घर लौट जाता ।

सुना है कई दिनों से वो भी नहीं मुस्कुराई,
ये मजबूरियां न होती तो घर चला जाता ।

बहुत दूर निकल आया हुँ घर से अपने,
जो तेरे सपनों की परवाह न होती...
... बस चला आता ।।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

आरक्षण की बैसाखी नहीं अवसर की समानता का अधिकार दो

देश में जब-जब चुनाव करीब आते हैं, चुनावी वायदों और घोषणओं की बयार बहने लगती हैं। अगले साल पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। प्रत्येक राज्य में सियासी पार्टियां अपने-अपने प्रदेशों के हिसाब से जीत पक्की करने के लिए जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रिय विकास का सहारा लेकर जनता के पास जाती हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है यानि यों कहें कि यूपी कई देशों से भी बड़ा है। यूपी की आबादी करीब 20 करोड़ है। देश की आबादी के 16.49 फीसदी लोग इसी राज्य में रहते हैं। देश में सर्वाधिक अनुसूचित जाति के लोग भी इसी राज्य में हैं और मुस्लिमों की संख्या भी बहुतायत में है।

प्रदेश की मुखिया मायावती ने राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधान सभा में पारित करा कर अपने इस फैसले को विकास का कारगर फॉर्मूला बताया है। ऐसे में कांग्रेस भी कहां पीछे रहने वाली थी। कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने एटा में मुस्लिमों आरक्षण का मुद्दा उठा कर सियासी चाल चल दी। हालांकि मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात बहुत पहले भी उठाती रही है, फिर बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी मुस्लिम आरक्षण की वकालत की है। चुनाव पास आते ही सभी राजनीतिक पार्टियां वोटरों को आकर्षित करने के लिए कई हथकंडे अपनाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही नेता सारे वादे भूल जाते हैं।

अब सवाल ये उठता है कि क्या आरक्षण से पिछड़ों का विकास संभव है। देश को आजाद हुए 64 साल बीत गए। पिछड़ी जातियां और दलितों के उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है। इन आरक्षण से गरीबों और पिछड़ी जातियों का कितना विकास हुआ। उसके जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ। परिणाम में कोई खास फर्क नहीं दिखता है। आज भी दलितों और पिछड़ी जातियों के लोगों की आर्थिक हालत बहुत खराब है। खासकर गांवों में जहां रोजगार के साधन नहीं के बराबर हैं। आरक्षण सिर्फ सरकारी नौकरियों में है, जिनकी संख्या बहुत कम है। 120 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में केंद्रीय नौकरियां और राज्य की नौकरियों को मिला दिया जाए तो अधिक से अधिक ढ़ाई करोड़ लोग सरकारी नौकरियां कर रहे होंगे। जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति तथा पिछड़ी जातियों का कुल हिस्सा करीब 54 फीसदी है। क्या 5-6 करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी दे देने मात्र से पिछड़ी जातियों का पिछड़ापन दूर हो जाएगा, कभी नहीं।

1990 में उदारीकरण के बाद देश में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां आईं, जिससे रोजगार के नए अवसर भी खुले। कौशल में निपुण युवाओं को इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरियां मिली। इस दौरान देसी प्राइवेट कंपनियों में भी योग्यता के हिसाब से युवाओं को नौकरियां मिलीं। देश में प्राइवेट नौकरियों की बहार आ गईं। सैलरी (वेतन) भी अच्छी खासी दी जाने लगी। सरकारी नौकरियों से कई गुना ज्यादा निजी क्षेत्र में नौकरियां पैदा हुईं। इन निजी कंपनियों में आरक्षण की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार एक ओर जहां निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। वहीं, आरक्षण का दायरा भी बढ़ा रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने 50 से ज्यादा नई जातियों को पिछड़ी जातियों की श्रेणी में शामिल किया है। अब अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की श्रेणी में मुस्लिमों को शामिल करने की बात चल रही है ताकि मुस्लिमों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके। अगर धीर-धीरे सभी जातियों का आरक्षण दे दिया जाय तो आरक्षण का औचित्य की खत्म हो जाएगा।

आम जनता को सरकार की इस चाल को समझना पड़ेगा। एक ओर सरकारी नौकरियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं। वहीं, आरक्षण का झुनझुना लोगों को बांटने की बात दिन-रात हो रही है। यह बहुत बड़ा छलावा है, इसे गंभीरता से समझना होगा। अगर सरकार सही मायने में दलितों, पिछड़ी जातियों और पिछड़े मुसलमानों की तरक्की चाहती है तो उसे अवसर की समानता देनी होगी। देश में हर व्यक्ति के लिए समान अवसर मुहैया करना होगा। गरीबों और अमीरों के बच्चों को समान शिक्षा व्यवस्था देनी होगी। जैसा स्कूल नई दिल्ली में संभ्रांत परिवार के बच्चों के लिए होता है वैसी स्कूली सुविधाएं गरीबों के बच्चों के लिए जैसलमेर, लद्दाख, किशनगंज, जंगलमहल, गंजाम में भी होनी चाहिए। मतलब कश्मीर से कन्या कुमारी और अरुणाचल प्रदेश से राजस्थान तक प्रत्येक स्कूल और कॉलेज में पढ़ने लिखने की समान व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि देश के किसी भी कोने में सभी जाति और धर्म के बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।

इतना ही नहीं इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट के निजी कॉलेजों को बंद कर दिया जाना चाहिए। अगर सरकार देश के पिछड़े लोगों के बारे में सही मायने में सोचती है तो उसे निजी शिक्षण संस्थानों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि प्राइवेट शिक्षण संस्थानों में काफी मोटी फीस वसूलकर एडमिशन लिया जाता है। जिससे दलित और पिछड़ी जातियों के बच्चे पैसे के अभाव में सही शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं। सरकार आरक्षण नहीं देकर देश के तमाम आर्थिक रुप से पिछड़ों के लिए अगड़ों से समान अवसर उपलब्ध करा कर उसमें आज के जमाने के अनुसार कौशल विकसित करें तो भारत निश्चित तौर पर चीन का आर्थिक रुप से मुकाबला कर सकता है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

क्रिकेट खेल है जंग नहीं

-सर डॉन ब्रैडमैन व्याख्यान में छा गये द्रविड़।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर सर डान ब्रैडमैन से बड़ा दूसरा खिलाड़ी नहीं हुआ, वर्ष 2000 से ऑस्ट्रेलिया में उनकी स्मृति में ब्रैडमैन व्याख्यान का आयोजन किया जाता रहा है। इस आयोजन में क्रिकेट व अन्य क्षेत्रों की विभूतियां सर डान ब्रैडमैन व क्रिकेट के विषय पर अपने विचार व्यक्त करती हैं।

इस वर्ष के ब्रैडमैन व्याख्यान में पहली बार किसी विदेशी क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में भारत के राहुल द्रविड़ को इस संबोधन का सम्मान दिया गया।14 दिसंबर 2011 को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आयोजित इस व्याख्यान में राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट के अलावा विश्व इतिहास, समाज, संस्कृति व मानव शास्त्र में अपनी बारीक समझ का प्रमाण भी दिया। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक प्रांगण जैसे आयोजन स्थल की गरिमा के अनुरूप युद्ध की गंभीरता को समझने वाले राहुल द्रविड़ ने किसी क्रिकेट मैच के वर्णन के लिए युद्ध, जंग या महासंग्राम जैसे वजनी शब्दों के उपयोग को निर्थक बताया।

इतिहास के अच्छे जानकार की तरह द्रविड़ ने भारत-ऑस्ट्रेलिया के सैन्य सहयोग का भी उल्लेख किया, जो 20वीं सदी के दोनों विश्व युद्धों के दौरान भारत व ऑस्ट्रेलिया ने बनाये थे। द्रविड़ ने स्वाधीनता पूर्व भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सर डान ब्रैडमैन के क्रिकेटीय करिश्मे से भारतीयों के भावनात्मक जुड़ाव का जिक्र किया और यह भी कहा कि उस समय सारे भारतीय सर डान ब्रैडमैन को एक प्रकार से अपना प्रतिनिधि ही समझते थे। भारतीय क्रिकेट के एक बेहतरीन ब्रांड अंबेसडर राहुल द्रविड़ ने पिछले 25 सालों में भारत में क्रिकेट प्रतिभा के व्यापक फ़ैलाव और छोटे-छोटे कस्बो-शहरों से नये खिलाड़ियों के टीम में आने के अनेक उदाहरण दिये। द्रविड़ ने भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों के सिर चढ़े व अति धनाढ्य होने को भी अतिशयोक्ति बताया।

द्रविड़ ने सबसे ज्यादा तारीफ़ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को दी, द्रविड़ के अनुसार भारत के क्रिकेट प्रशंसक अपनी टीम व क्रिकेट खेल को बेहद प्यार देते हैं। हर भारतीय क्रिकेटर अपने कैरियर के दौरान यह समझ जाता है कि भले ही क्षणिक आवेश में कुछ लोग अप्रिय स्थिति पैदा कर दें, किंतु अधिकतर भारतीय प्रशंसकों की भावनाएं टीम के साथ जुड़ी हुई हैं। भारतीय क्रिकेटर के लिए यह खेल रोजगार का साधन मात्र नहीं है बल्कि यह अपने जीवन का सदुपयोग करने का अवसर है, ऐसा अवसर कितने लोगों को मिल ही पाता है? राहुल द्रविड़ ने भारतीय खिलाड़ियों के मानवीय पक्ष को जिस रूप में जिया है ठीक उसी रूप में उसे प्रस्तुत भी किया। अखिल विश्व में अपने पंगु नेतृत्व व भ्रष्ट संचालन के लिए बदनाम बीसीसीआइ को भी कूटनीतिज्ञ द्रविड़ ने सराहा और भारत में क्रिकेट के प्रसार में इस बोर्ड के प्रयासों का जिक्र किया। इस संबोधन के दौरान राहुल द्रविड़ ने किसी बेहद कुशल रणनीतिकार की भांति ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सुरक्षित भविष्य के लिए एक नयी कार्यनीति का प्रतिपादन भी किया।

राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट अधिकारियों व खिलाड़ियों को क्रिकेट प्रशंसकों के प्रति अपनी जवाबदेही की ओर सजग होने को कहा और हर अंतरराष्ट्रीय दौरे में जबरन ठूंसे हए अनेक एक दिवसीय व 20- ट्वेंटी मैचों की संख्या घटाने को कहा। टेस्ट मैच को क्रिकेट की सर्वोच्च प्रतिस्पर्धा बताने वाले द्रविड़ ने खुले तौर पर कहा कि गैर जरूरी एक दिवसीय या 20- ट्वेंटी मैचों के चलते ही मैदान में दर्शकों की संख्या बेहद कम हो गयी है। टेस्ट में और दर्शकों को लाने के लिए द्रविड़ ने रात-दिन के टेस्ट खेलने की भी वकालत की। राहुल ने क्रिकेट की स्थिति बनाये रखने के लिए टेस्ट पर सबसे ज्यादा ध्यान देने को कहा, एक दिवसीय मैचों को वर्ल्ड कप या चैंपियन ट्राफ़ी जैसी प्रतियोगिताओं के लिए उपयुक्त बताया जबकि 20-ट्वेंटी को राष्ट्रीय स्तर पर सीमित रखने को कहा। राहुल के अनुसार क्रिकेट के तीनों प्रारूप साथ-साथ रह सकते है किन्तु जैसे अभी चल रहे है वैसे नहीं।

राहुल द्रविड़ के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खेल में बेईमानी और मैच फ़िक्सिं ग को रोकने के बारे में था। द्रविड़ ने खिलाड़ियों से और कड़े परीक्षणों व नियमों को स्वीकार करने को कहा। राहुल द्रविड़ ने इस खेल की शुचिता के लिए क्रिकेट खिलाड़ियों से कुछ असुविधाओं व अपनी निजी जानकारी प्रदान करने को तैयार रहे को भी कहा। द्रविड़ ने क्रिकेट की आय बढ़ाने के के नये तरीकों की आवश्यकता स्वीकार की किन्तु साथ ही क्रिकेट की गौरवशाली परंपरा को बनाये रखने की अपील भी की। राहुल द्रविड़ का व्याख्यान ठीक उनकी बल्लेबाजी की तरह शास्त्रीय शैली में दिया गया स्पष्ट भाषण था। ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय समाचार माध्यमों में राहुल द्रविड़ के इस संबोधन को ब्रेडमैन व्याख्यान में अब तक दिये गये सभी भाषणों में से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। क्रिकेट मैदान के ‘श्रीमान भरोसेमंद’ द्रविड़ ने अपने संबोधन से यह साबित किया कि इस ‘भारतीय दीवार’ की बौद्धिक योग्यता और सैद्धांतिक मान्यताओं की नींव कितनी गहरी और कितनी मजबूत है।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

शायरी......

हम उन्हें वो हमें, एक दूजे की गलतियों पर इल्जाम देते हैं मगर,

अपने अंदर झांकने का हौसला वो भी नहीं रखते, हम भी नहीं...।


मेरी मज़ार पर ख्वाहिशों का इतना सार लिख देना,

कि एक शख्स जिन्दगी की हसरत में मर गया...।‌


किसी से क्या गिला करना इस जहान में,

शायद हम ही याद के काबिल नहीं रहे।


शहर वाले सजाते हैं, हर झूठ पर रिश्तों के आशियानें,

और हमें पछताना पड़ा है अपने पहले ही झूठे बयान पर।


"नींद से मेरा ताल्लुक ही नहीं बरसों से, फिर

ख्वाब आ-आ कर मेरे छत पर टहलते क्यों हैं..."


आज आईने में अपनी भी सूरत ना पहचानी गयी,

आंसुओं ने आंख का हर अक्श धुंधला कर दिया।


मैं एक खिलौना हॅू, और वो उस बच्चे की तरह है,

जिसे प्यार है मुझसे, पर सिर्फ खेलने की हद तक।


तुम्हें मालूम है जाना कि तुम भी एक कातिल हो,

मेरे अंदर का हंसता हुआ इंसान तुमने मार डाला है।


सूरज को जागने में जरा देर क्या हुई,

चिड़ियों ने आसमान ही सर पर उठा लिया।


आज कल मिलती है हमें बहुत कम फुरसत,

रात सोने में गुजरती है, दिन उठने में है जाता।


"नींद आये तो ख्वाबों का मुकद्दर भी हो रोशन,

जब नींद ही नहीं है, तो फिर ख्वाब कहां के...।"


हवा परेशान है कि आज उसने जुल्फों को क्यों नहीं समेटा

शायद उसकी ज़िन्दगी आज जुल्फों से ज्यादा उलझ गयी है....


खुबसूरत क्या कह दिया उनको, हमको छोड़ कर वे शीशे के हो गए,

तराशा नही था तो पत्थर थे, तराश दिया तो खुदा हो गए ....”\


हम गलत कुछ नहीं करते हैं,

हम तो ज़माने के साथ चलते हैं।


मोहलत तो दे मुझे कुछ... ऐ-वक़्त के मुसाफिर,

तेरी ही यादों से हैं मेरी तकदीर की तस्वीर,

यूँ तो सारा जहाँ हैं खजाने में मेरे,

बस तू ही नहीं मेरे हम-दम ...... मेरे रकीब.....


एक ना तमाम ख्वाब मुकम्मल न हो सके,

आने को जिंदगी में बहुत इंकलाब आये...।


मंदिर में फूल चडाने गया तो अहसास हुआ की....

पत्थरो की ख़ुशी के लिये फुलोंका कत्ल कर आये हम ...

मिटाने गये थे पाप जंहा... वहीं एक और पाप कर आये हम.....


चेहरे अजनबी हो भी जायें तो कोई बात नहीं लेकिन,

रवैये अजनबी हो जाये तो बड़ी तकलीफ देते हैं...।


"मैं जो चाहू तो अभी तोड़ लू नाता तुमसे,

पर मैं बुजदिल हूँ, मुझे मौत से डर लगता है।"


है मिजाज अपना परिंदा, आवारगी-ए-आलम अपना शौक,

पर एक उनकी ख्वाहिश ने, मेरी उड़ान को पाबंद कर दिया...


बेताब दिल का हाल खुद-ब-खुद जाहिर हो जाता है,

जब भी जरा सा जिक्र उस नाम का हो उठता है...।


"बदला हुआ है आज मेरे आंसुओं का रंग,

फिर दिल के जख्म़ का कोई टांका उधड़ गया..."


"किसी का ना समझना भी हमे बहुत दर्द देता है,

बस जो सामने दिखाई न दे उसे लोग माना नहीं करते..."


तेरी सूरत पर मुझे कभी नाज ना था,

कमबकत तेरी सीरत ने दगा दे दिया....


अफवाह कभी दिल-ए-हालात बता नहीं सकते,

जो जाननी हो तबियत तो हमसे मिलते रहा करो...


बीज तब ही बोना जब ज़मीन को परख लेना,

हर एक मिट्टी की फितरत में वफादारी नहीं होती।


इश्क का टुटा वो इमां बेच आया ...

खुदा के डर वो बचपन बेच आया ...


पुराना मंजर...

"आज फिर कुछ पुराना मंजर याद आने लगा है,

उन हसीन लम्हों को सोच मन हर्षाने लगा है।

कभी हर पल की जिद्द पर कोई ख्वाहिश पूरी होती,

आज ख्वाहिशे हैं हल पल बस जिद्द अधूरी सोती!


हमारी शरारतों पर उन दिनों मिलती हमें लोरियों की थाप थी,

आज दिल खोजता उस डांट को, जिसमें कभी दुलार की छाप थी!


जाने क्यों वक़्त दूरियों की इतनी पाबन्द होती है,

कि समय के साथ बदलाव की बाते बुलंद होती हैं,

क्यों नहीं सब रिश्तें हर समय एक समान होते हैं,

क्यो बचपन बीतने पर हम नींद-ओ-चैन खो देते हैं।


जब कभी इन बातो पर आता विचार, होते हम शर्मिंदगी से चूर,

आखिर क्यों अपनों से हैं हम दूर, कि क्यों हम हैं इतने मजबूर...!"

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

बदलते परिवेश में बदलती पत्रकारिता

कल देश गुलाम था पत्रकार आजाद, लेकिन आजदेश आजाद है और पत्रकार गुलाम। देश में गुलामी जब कानून था तो पत्रकारिता की शुरुआत करलोगों के अंदर क्रांति को पैदा करने का काम हुआ। आज जब हमारा देश आजाद है तो हमारे शब्द गुलाम हो गए हैं। कल जब एक पत्रकार लिखने बैठता था तो कलम रुकती ही नहीं थी, लेकिन आज पत्रकार लिखते-लिखते स्वयं रुक जाता है, क्योंकि जितना डर पत्रकारों को बीते समय में परायों से नहीं था, उससे ज्यादा भय आज अपनों से है।

गुलाम देश में अंग्रेजों का शासन था; तब कागज-कलम के जरिए कलम के सिपाही लोगों को यहबताने को आजाद थे कि गुलामी क्या है और लोग इससे किस प्रकार छुटकारा पा सकेंगे। पर आजअगर सरकार या व्यवस्था से कोई परेशानी है तो उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा पाता और कोशिश करने पर निजी जरूरतों का आगे कर कलम की ताकत को खरीदने की कोशिश की जा रही है। बीते समय पत्रकारिता के प्रति लोग शौक से जुड़ते थे लेकिन आज यह शौक जरूरत का रूपले चुकी है और व्यवसाय की परिपाटी का फलीभूत कर रही है। आज एक जुनूनी पत्रकार जब किसीखबर को उकेरता है तो वह खबर उच्च अधिकारियों व अन्य के पास से गुजरते हुए समय के बीततेक्रम में मरती जाती है या फिर लाभ प्राप्ति की मंशा के नीचे दब जाती है। ऐसे में जुनून के साथअपने कार्य को निभाने वाला पत्रकार भी मेहनत पर पानी फिरता देख, केवल खबर बनाने काकोरम पूरा कर पैसा कमाने में जुट जाता है।

पत्रकारिता के इस बदलते स्वरूप का जिम्मेदार केवल पत्रकार का स्वभाव और उसकी जरूरतें हीनहीं है वरन्‌ इसका असली जिम्मेदार हमारा आज का पाठक वर्ग भी है। जो इस बदलते परिवेशके साथ इतना बदल गया है की उसने समाचार पत्र और पत्रकारों के शब्दों को एक कलमकार कीभावनाओं से अलग कर दिया है। इसी का नतीजा है कि आज पत्रकार अपनी मर्जी से कुछ भी नहींलिख सकता है क्योंकि वह अपने पाठक का गुलाम होता है और उसे वही लिखना पड़ता है जोउसका पाठक चाहता है। इससे अलग अगर कोई पत्रकार अपनी जीवटता दिखाते हुए खबर सेतथ्यों को उजागर करने का मन बनाता भी है तो वह खबर समाचार पत्र समूह के उसूलों औरविज्ञापनों की बोली की भेंट चढ़कर डस्टबीन की शोभा बढ़ाती है। अगर इन बातों की छननी से वहखबर छन कर मूल बातों समेत बच जाती है तब कहीं जाकर वह खबर पेज पर अंकित हो पाती है।ऐसे में उक्त पत्रकार भगवान को धन्यवाद देता है कि चलों खबर छप गयी, पर इस खबर के प्रतिपत्रकार की ईमानदारी और मेहनत पीछे छूट जाती है और उसकी जगह संपादक व उच्च अधिकारी की प्रतिबद्धता ले लेती है।

आज की पत्रकारिता पर बाजार और व्यवसाय कादबाव बढ़ गया है। जिस कारण लोगों को जागरूककरने की अपनी आधारशिला से ही मीडिया भटकचुकी है और पेड न्यूज का रूप लेती जा रही है।मीडिया में 'पेड न्यूज' का बढ़ता चलन देश एवंसमाज के लिए ही नहीं अपितु पत्रकारिता के लिए भी घातक है। 'पेड न्यूज' कोई बीमारी नहीं बल्कि बीमारी का लक्षण है। इसका मूल कहीं और है। इस दिशा में सकारात्मक रुप से सोचने कीआवश्यकता है। मीडिया समाज का एक प्रभावशाली अंग बन गया है लेकिन आज इस आधारस्तंभ पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जो देश एवं समाज के लिए घातक है।

आज की मीडिया समाज को इस कदर प्रभावित कर चुकी है कि वह चाहे किसी को भी राजा औररंक की श्रेणी में खड़ी कर सकती है। लेकिन विडम्बना यह है कि इतनी शक्ति होने बाद भी मीडियाको हर ओर से आलोचना ही सुननी पड़ती है क्योंकि उसकी दिशा भ्रमित है या फिर ये कहा जाये किवह नकारात्मकता को ही आत्मसात कर चुकी है। हाल फिलहाल की घटनाओं पर नजर दौड़ाये तोगांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे सबसे मजबूत पक्ष के रूप में उभरते हैं पर वास्तविकता कुछऔर ही है। भ्रष्टाचार के मुददे को लेकर अनशन करने वाले अन्ना मीडिया की विशेष कृपा केआधार पर "भ्रष्टाचार' जैसे प्रमुख मुद्‌दे से काफी बड़े हो गये। उनके अनशन के एक दिन पहलेदिल्ली स्थिति जंतर मंतर के पास इलेक्ट्रानिक मीडिया के 74 ओ.वी. वैन के रेले इकट्‌ठा हो गये,जैसे उस दिन प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने वाले हों। मीडिया के इस विशिष्ट मेहमाननवाजीके कारण ही आज गली-गली में अन्ना की धूम मची हुई है। आखिर कौन है यह अन्ना हजारे, क्याकोई महात्मा है?देवदूत है? या फिर सरकार के सामानांतर शक्ति रखने वाले बंदा है? जो देश केलोगों को उसके पीछे चलने की बातें करता है और देश आंख मूदे उसके साथ हो लेती हैं। देश कीआम जनता तो चलों सरकार के निकम्मेपन से त्रस्त थी और बदलाव की बयार के साथ बह चलीपर बुद्धिजीवियों का गढ़ कही जाने वाली मीडिया भी अन्नामय हो चली थी कि जैसे इसमेंमीडियाकर्मियों का अपना स्वार्थ निहीत हो।

कहने को तो पत्रकारिता देश का चौथा स्तम्भ है। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिकाजैसे देश के महत्वपूर्ण स्तंभों पर नजर रखने का कार्य करने वाली खबरपालिका आज अपने मूलकार्य से विमुख हो चुकी है। अपने प्रारम्भ में मिशन के तहत लोगों के बीच अपनी भूमिका कानिर्वाह करने वाली पत्रकारिता समय के साथ बदलते हुए प्रोफेशन के रूप में भी परिवर्तित हुई। परिवर्तन का यह दौर यहीं नहीं थमा, वर्तमान समय में पत्रकारिता का स्वरूप कमीशन के तौर परउभरा है। ऐसे में आज की पत्रकारिता को किसी भी तरह से पूर्व के मिशन और एम्बीशन के साथजोड़ कर देखना सही नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और मीडिया भी उसी का पालन कररही है। स्पेक्ट्रम घोटाले बाद तो पत्रकारिता और पत्रकार होने का मतलब भी बदल गया था।अक्सर मजाक के बीच गंभीर मुद्रा में यह कहा जाता कि नीरा राडिया जैसे कारपोरेट लाबिस्टों सेसंबंध रखने वाले ही बड़े पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं। कल का यह मजाक अब लोगों केदिलो-दिमाग पर हावी हो गया है, खबरों के अन्वेषण की जगह उसे खरीदने-बेचने का काम चलनिकला है।

वर्तमान की पत्रकारिता को परिभाषित किया जाना हो तो उसे मानवीय संवेदनाओं को बेचने केअनवरत क्रम को शिद्‌दत से फैलाने का उपक्रम की संज्ञा दी जा सकती है। समाचार पत्र हो या फिरखबरिया चैनल सबमें आपस में टीआरपी की जंग छिड़ी हुई है, जिसके चलते सामाजिक सरोकारोंसे अलग केवल सामाजिक विषमता को फलने-फूलने का मौका मिल रहा है। शक्ति का दंभ और स्वयंभू होने के भाव ने आज मीडिया को सामाजिक प्रहरी के स्थान पर निर्णायक की भूमिका मेंदिखती प्रतीत होती हैं। मीडिया के इस चलन ने खबरों के प्रति पाठकों के नजरिये को बदल दियाहै। अब पाठकों के बीच मीडिया सूचना देने के बजाय अपना विचार परोसने में लगी हुई है।

मूलतः पत्रकारिता की प्रक्रिया ऐसी होती है जिसमें तथ्यों को समेटने, उनका विश्लेषण करने फिरउसके बाद उसकी अनुभूति कर दूसरों के लिए अभिव्यक्त करने का काम किया जाता है। ऐसे में इसका परिणाम दुख, दर्द, ईष्या,प्रतिद्वंद्धिता, द्वेष व असत्य को बांटना हो सकता है अथवा सुख,शांति, प्रेम, सहनशीलता व मैत्री का प्रसाद हो सकता है। कौन सा विकल्प चुनना है यह समाज कोतय करना होता हैं। वर्तमान में इन विषयों का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है, जिसकेआधार पर एक वैकल्पिक पत्रकारिता के दर्शन की प्रस्तुति पूरी मानवता को दी जाए। यह इसलिएक्योंकि वर्तमान मीडिया ऐसे समाज की रचना करने में सहायक नहीं है। पत्रकारिता की यहकल्पना बेशक श्रेष्ठ पुरुषों की रही हो परन्तु इसमें हर साधारण मानव की सुखमय और शांतिपूर्णजीवन की आकांक्षा के दर्शन होते हैं। वर्तमान में पत्रकारिता एक संक्रमण के दौर से गुजर रही है।इस क्षेत्र में सुधार के लिए स्तरीय प्रशिक्षण और व्यापक अनुसंधान की जरुरत है। समाज औरराष्ट्रहित में मीडिया को विरोध की सीमा और समर्थन की मर्यादा निर्धारित करनी चाहिए।उदारीकरण के कारण बाजारवाद का प्रभाव बढ़ा है। पत्रकारिता भी इससे मुक्त नहीं है, लेकिनस्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। यह संक्रमणकाल है। अच्छाई और बुराई के इस संक्रमणमें अन्ततः अच्छाई की विजय होगी, इसके लिए अच्छाई के पक्षधरों को मुखर होना पड़ेगा।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

भौतिकता से ज्यादा मन के रावण को मारने की जरूरत-आकाश राय

दशहरा के पर्व को हम अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में मनाते है। इसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है क्योकि राम और रावण की लड़ाई दसवे दिन रावण के खात्में के साथ समाप्त हुई थी। यह पर्व मनाने के पीछे भी यही सोच निहीत है कि आज के दिन समाज और व्यक्ति के मन से रावण रूपी बुराई का अंत का हो और राम स्वरूप सदविचारो की ही जीत हो। लेकिन फिर भी आज हम सार्थक बातों को नकारात्मक दिशा में मना कर खुश होते हैं।

हमारे विजय दशमी के पर्व को मनाने के पीछे यह सोच कही खो कर रह गयी है कि अच्छाई ही सर्वोपरि है। बल्कि हम यह सोचकर अपनी खुशी को अमलीजामा पहनाते हैं कि बुराई को खत्म करना है। यह सोच भी गलत नहीं है पर बात सार्थकता की है कि क्या यह विचारधारा एक स्वस्थ्य मानसिकता और समाज को पनपने का मौका देगी। अगर हमें कुछ अच्छा करना है तो क्यों किसी के संहार या खात्में की बात हो। क्यो नहीं एक स्वस्थ सोच के साथ अपनी खुशियों को जीया जाये। क्या किसी त्यौहार को मनाने के पीछे यह बौद्धिक स्तर काफी नहीं कि उसमें क्या सकारात्मकता, सार्थकता और समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा आदि जैसी अच्छी बातें निहीत हैं। क्या किसी त्यौहार या पर्व को खुद की प्रगति के बजाय दूसरों की हार से मापा जाना ठीक है। वैसे तो सालो साल से हम दशहरा पर्व मना रहे है तथा रामलीलाओं आदि के माध्यम से इसका प्रचार भी करते है। पर क्या वाकई हम मर्यादापुरुषोतम श्री रामचंद्र के सतकार्य को समझ पाये हैं। क्या हम यह जान पाये हैं कि रामायण पूर्वतः राम के चरित्र और व्यवहार का ही दृश्टिकोण फैलाता है। हमने तो बस अपने मन-मौजीपन में दशहरा में राम का रूप धरे किसी कलाकार को रावण का बध किया जाना ही देखा है। पर वास्तव में आज भी रावण मर कर भी अमर है।

भले ही भौतिकता में हम उसके पुतले को जलाते हैं पर बात के हर लहजें में जिंदा रखे हुए हैं। वह हमारी नफरतों में जिंदा है तथा किसी भी गलत कार्य को परिणित होते देखते है तो उसे रावण की संज्ञा दे देते हैं। पर कभी दैनिक दिनचर्या में किसी के अच्छे कर्म के लिए उसे राम या उनके पदचालक की संज्ञा या उपाधि क्यो नहीं देतें। क्यो ऐसा करने से क्या राम नाम पर दाग लग जायेगा या फिर वह व्यक्ति उस प्रकार की प्रशंसा के काबिल नहीं हेाता। नहीं... बल्कि हमारे दिलो-दिमाग में आज राम से ज्यादा रावण की छवि रम-बस गयी है। जिसे हम बुरा कहकर, उससे घृणा करके भी अपने मन से नही निकाल पा रहे हैं। आज हममें किसी से द्वेश या घृणा के भाव इतने बलवती है कि हम आपसी प्रेम और सौहादर्‌र को भी भूल गये हैं और जब तक हम अपनी सोच में रावण को नहीं मार देते हमारे राम का अस्तित्व केवल शब्दो व नामों में ही बंध कर रह जायेगा।

आज वैसे भी दुनिया में ऐसे राम की संख्या काफी कम है जो कर्तव्य, व्यवहार और संस्कृति से राम शब्द का पालन करता हो। अतः हमे कोशिश कर राम जैसे चरित्र का ही त्यौहारों आदि के माध्यम से प्रचार-प्रसार करना चाहिए। ताकि हमारी नई पीढी एक अच्छे आइडियल पुरूष की कल्पना अपने मन में बसायें और एक सकारात्मक विचार दिशा की ओर अग्रसर हो सके।

(नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार)

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