"माना की बहुत खास हूँ में अपने चाहने वालो के लिए लेकिन ...
चंद लम्हों से ज्यादा कोई न रोयेगा मेरे चले जाने के बाद ..."
लेबल
- कविता.. (103)
- शायरी.. (42)
- लेख.. (31)
- अपनी बेबाकी... (21)
- Special Occassion (8)
- समाचार (7)
- तथ्य.. (2)
रविवार, 24 जुलाई 2011
खलीश मन की...
"बेनाम सा ये दर्द, ठहर क्यों नहीं जाता,
जो बीत गया है, वो गुज़र क्यों नहीं जता,
वो एक ही चेहरा तो नहीं, सारे जहां में,
जो दूर है, वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता,
मैं अपनी ही उलझी हुई, राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मै उधर क्यों नहीं जाता,
वो नाम जो बरसो से, ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है, तो बिखर क्यों नहीं जाता...."
जो बीत गया है, वो गुज़र क्यों नहीं जता,
वो एक ही चेहरा तो नहीं, सारे जहां में,
जो दूर है, वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता,
मैं अपनी ही उलझी हुई, राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मै उधर क्यों नहीं जाता,
वो नाम जो बरसो से, ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है, तो बिखर क्यों नहीं जाता...."
इक बात कहूं गर सुनते हो ..
इक बात कहूं गर सुनते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
कुछ चुप - चुप से , कुछ चंचल से ,
कुछ पागल - पागल लगते हो .
हैं चाहने वाले और बहुत ,
...पर तुम में है इक बात अजब ,
तुम मेरे सपने से लगते हो.
इन ख्वाबों से आगे बढ़कर .
तुम अपने अपने से लगते हो .
इक बात कहूं गर सुनते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
कुछ चुप - चुप से , कुछ चंचल से ,
कुछ पागल - पागल लगते हो .
हैं चाहने वाले और बहुत ,
...पर तुम में है इक बात अजब ,
तुम मेरे सपने से लगते हो.
इन ख्वाबों से आगे बढ़कर .
तुम अपने अपने से लगते हो .
इक बात कहूं गर सुनते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
सदस्यता लें
संदेश (Atom)