मंगलवार, 1 मई 2012

याद...

ये याद ही तो याद है,
कि हर याद में तू याद है।

जिस याद में तू याद नहीं,
वो याद भी क्या कोई याद है।

ये जो याद-याद का है सिलसिला,
इस सिलसिला-ए-याद में...
फकत तू ही तू बस याद है।

परछाई...

परछाईयों की शक्ल भी कोई देख पाया है,
ये तो चिरागों के साथ ही हमसे जुड़ जाता है।

ना चाहता है कुछ भी, ना बोलता कभी,
बस साथ चलता और फिर हममें सिकुड़ जाता है।

कौन कहता है कि इनसे ना नाता हमारा,
देता सहारा जब दुनिया-जहां हमसे बिछुड़ जाता है।

राहों पर तन्हाईयों के जब भी हम चलते,
संग अपने दूर हर सफर तक जाता है।

अपने मन में भी अब ये छंद उभर आया है,
कि मंजिल कहीं हो, हो सफर कैसा भी...
हर राह पर खामोशियों संग तू साथ जाता है।

आईने का सच...


"नजर मुझसे मिलाकर जब वो भाग जाते हैं,
हो जाता यकीं कि वो कुछ तो छुपाते हैं,
जाने कैसे लोग छुपाने औ चुराने की कला को आजमाते हैं,
दिल में रहता चोर और होठों पर मासूमियत दिखाते हैं।

मुझे अब नहीं लगता कि कोई रखना भी चाहेगा,
मैं सच बोल भी दूँ तो कोई सुनना भी चाहेगा,
चाहिए सबको अपने हिसाब-ओ-पसंद की बातें,
और मुझे बस आंखों को ही जुबां में ढ़ालना आयेगा।

लोग देखते मुझको फिर आगे सरकते हैं,
मैं बाजार की शोभा लिये बरसों से खड़ा हूँ,
मैं आईना हूँ, जो कभी महलों में था सजा रहता,
अब जो फेंका गया हूँ तो टुकड़ो में पड़ा हूँ।

हर हुस्न निहारे हमें और खोजे सुन्दरता अपनी,
कैसे कहूँ कि तू खुश हो जाये..
फकत एक आईना हूँ मैं...
जैसा है तू मेरी आंखों में वहीं नजर आये।

चाहे रख ले बंद दीवारों में, या फिर रस्ते पे फेंक दों,
रहा जो घर में तो खुद को संवारोगे...
पड़ा रहा सड़क पर तो...
शायद दुनिया असलियत देख ले ।।"

फरियादी की पुकार...


"नियमते कुदरत जीवन ये मिला है,
कैसे इसकी चाह को पूरा न करुंगा,
चाहूँगा उम्र सारी तेरी आरजू में कटे,
रहूँ जब अर्थी पे लेटा...
तब भी लब पे तेरा ही नाम रहे।

करुँ हर पल इंसानियत की सेवा,
न एक पल भी बैर की मुझमें आग जले,
हो चाहे वो साथी या दुश्मन का सरमाया,
हर एक से मेरी निभे...
और कुछ कदम वो बन मीत चले।

न चाहा न चाहूँगा कि भव सागर में मैं डुबूँ,
चाहत इतनी की ओंकार धुन बन जहां में गूँजू,
एक रोशनी मुझमें जले, मैं प्रकाश का पुंज बनू,
जब अंधेरा हो जाये संसार में तो...
एक ज्योत बन दुनिया में हर पल जलूँ।

चाहतों की लम्बी फेहरिस्त नहीं अपनी,
बस जब कभी आरजू में लब खुले,
एक राम धुन के सिवा न कुछ गनू...।।"

मजदूर का सच




"हमें आदत नहीं किसी का बोझ उठाने की,
ये जरुरत है जो धूप में जले जा रहा हूँ।

न थकना, न हारना सीखा है मैंने,
ये तो जिन्दगी का कर्ज है, जो चुकाये जा रहा हूँ।

इस भूख ने ही दी है ताकत जहां से लड़ने की,
भूख ही है, जिसके लिए खून को पसीने में बहाए जा रहा हूँ।

मैं पथिक हूँ उस मंजिल का, जो मेरे घर में खुशियां ला दे,
जले रोज मेरे घर का चूल्हा, इस उम्मीद में...
हर रोज खुशियों की मंजिल तलाशे जा रहा हूँ ।।"

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

प्यार उत्साह और इंतजार


इतना संभल-संभल के न चलो,
कि न फिसल पाओ यारों....
इतनी तो मार लो कि
किसी से टकरा जाओ यारों,
टकराहट के बिना मुलाकात कैसे होगी,
हर मुलाकात के बाद ही तो बात बनेगी,
बातों के बीच अपनी राग छेड़ देना प्यारे,
मोहब्बत के अरमान उन पर थोप देना सारे,
होगा उनको यकीं तो साथ वो भी देंगे,
नहीं तो फिर संभल के चलना,
कहीं और फिसल लेंगें...।।

कैसे करुं...


तेरे बिना मैं कोई फैसला कैसे करुं,
टूट चुका हूँ अब हौसला कैसे करुं।

सोचा नहीं कभी तेरे बिन भी होगी जिंदगी,
अब खुद को भला तुझसे जुदा कैसे करुं,

दिल से चाहा तुझको तो गुनाह कर दिया,
मुकर्रर खुद को इस गुनाह की सजा कैसे करुं।

हो सके तो तू ही कर दे मेर दिल का फैसला,
मैं फिर तुझको तुझी से पाने की फरियाद कैसे करुं...।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

चल अब गांव का रुख करें...

ये शहरों की जिन्दगी हमें रास नहीं आती...
ताजी हवा भी अब यहाँ पास नहीं आती...
बेचैन है धड़कन, तन्हा ये दिल भी है...
लगता है अब कोई दुआ भी खास नहीं आती...

कल तक रही मेरे गांव में बसती मेरी जन्नत,
रहता हूँ अब शहर में पर वो सुकूं-ए-रात नहीं आती...
कंक्रीट के जंगल हैं, झिलमिलता साये हैं मकानों के...
पर इनमें कहीं भी अपने घर वाली बात नहीं आती...

कि महफिले रोज लगती है, यारों के हुजूम में...
पर जाने क्यों वहां भी अब जिन्दगी बसर नहीं आती...
अब तो बस है याद आता, गांव का वो खरिहान-बगिचा...
कि ख्वाब में भी दौड़ पड़ता हूँ, पर आंखें पहुँच नहीं पाती...

जो मिट्टी है मेरे गाँव की वो जन्नत का नूर है...
इन शहरी धूल से तो अब महक भी नहीं आती...
लगता है अब यही कि बस गांव का रुख करें...
कि इसके आगे तो मंजिल भी कोई नज़र नहीं आती...

रविवार, 22 अप्रैल 2012

कहां आजाद रहते हैं...

"अब सूरज की तपन से भी डर नहीं लगता,
कि उससे ज्यादा आग तो सीने में जलते हैं।

दिन भर जलता रहता मन, पर आंच नहीं कोई,
गुब्बार भरा सीने में, दर्द आंखों से छलकते हैं।

चढ़े जो ताप सिर पर और दवा ले लूँ भी तो क्या,
जलन जो दिल में उठती है उसे यादों से मलते हैं।

कहां ढ़ूंढ़े तेरी याद से बचने का अब आसरा,
जहां देखों तेरी यादों के शोले ही तो गिरते हैं।

ना कोई दोस्त ना साथी रहा, इस दर्द से जुदा,
हर किसी के मन में यादों के अंगार जलते हैं।

भला कब तक दिलों को आग देकर हम रहें जिंदा,
तुम्हें हम भूले ही बैठे हैं, पर कहां आजाद रहते हैं।"

मुहब्बत ऐसी धड़कन है...

"मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती,
जुबां पर दिल की बेचैनी कभी लाई नहीं जाती।

जता देने से दिल हल्का तो हो जाता है पर यारों,
शब्दों की बिसात पर जज्बातें बिछाई नहीं जाती।

समझना हो जो बातों को तो आखों से ही पढ़ने दो,
कि निगाहों की पढ़ाई फिर झुठलाई नहीं जाती।

यकीनन याद आया होगा उनको भी इश्क का ककहरा,
वर्ना, नीची नजरों और दबें होंठों पर मुस्काने नहीं आती।

जुबां ना-ना कहे, सिर भी हिकारत में हिले, ये इंकार होता है,
पर दिल की धड़कनों से राज-ए-इश्क छिपाई नहीं जाती।

मुकरने दो उन्हें तुम भी, छोड़ों उनकी गैरत पर,
वो लौट ही आयेंगे, मोहब्बत कहां दबाई जाती है।

अगर उनका यहीं है फैसला तो सुन ले जहां सारा,
किसी के इश्क में मरने की फितरत हमको नहीं भाती।

चाहा था, चाहता हूँ और उन्हें आगे भी मैं चाहूंगा,
उन्हें पाने न पाने से चाहत मेरी, मर तो नहीं जाती।"

रविवार, 15 अप्रैल 2012

मां से बातें...

"मस्तियां अपनी आज गुमा दी माँ मैंने,
जिंदगी अब अपनी उलझा ली माँ मैंने।

मिले ना सुकून के चंद लम्हें भी तो,
आंसुओं से आंख अपनी भिगा ली माँ मैंने।

तू हमेशा कहती रहती हौसला रख अपने पर,
आज तो देख उम्मीद की लौ भी बुझा दी माँ मैंने।

बनाता था कभी बचपन में कागज से कश्तियाँ,
वक्त के थपेड़ों में सारी कश्तियाँ डूबा दी माँ मैंने।

आज मैं भी मजबूर हूँ, तू भी अपने दुलारे से दूर है,
बुझदिली-आवारगी में दूरियाँ और बढ़ा दी माँ मैंने।

इतना टूटा कि अपने चेहरे पे मल ही अकेलेपन की ख़ाक,
अंधेरों में गुम अपनी होली आप तन्हा मना ली माँ मैंने।"

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

हम भी मोहब्बत किया करते थे..

"जब तेरी धुन में रहा करते थे,
हम भी चुपचाप जीया करते थे।

आंखों में प्यास हुआ करती थी,
दिल में हर पल तूफां उठा करते थे।

लोग पूछते थे दुनिया-जहान की बातें,
और हम बस तेरा जिक्र किया करते थे।

सच समझकर तेरे हर झूठे वायदे को,
निगाहें अपनी रस्तों पर टिका रखते थे।

जब भी आहट हो जाये तेरे आने की,
दिल में हजारों फूल खिला करते थे।

दिल के दरों-दीवार को सजाने की खातिर,
हर सांस को तेरे नाम की सजा देते थे।

कल फिर आई तेरी याद ने, सब ताजा कर दिया,
कि हम भी कभी मोहब्बत किया करते थे।"

नसरत फतह अली जी की शानदार गजल...

ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है...

"ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है..
किसी की चाहत को तोड़ दिया,
तो किसी टूटे की चाहत बनी है।
कभी लाखों उम्मीदों को कतरा बना दिया,
कभी लाखों की उम्मीद का कतरा तू रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

जिसने सजाये ख्वाब आंखों की मानिंद,
उनके लिए नींद का कोटा नहीं दिया।
और जो ऊंचाईयों को पाने की ख्वाहीश लिये जन्में,
उन्हें ऐश-ओ-आराम की आगोश में सुला दिया।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

हम तेरी बेहतरी के वास्ते लड़ते रहे जहां में,
और तू बेहतरीन बन अमीर की कोठी सजा रही है।
इंसा को उम्मीदों-हौंसलों की कहानी बताने वाली,
तू भी उसकी हार पर कहकहे-ठहाके लगा रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

पहले तो सिखाती है हार से लड़ने औ जीतने के नुस्खे,
फिर अंधी-दौड़ में लोगों को अपनों से लड़ा रही है।
जब देती है जीत के शिखर का वरदान किसी को,
जाने फिर क्यों तन्हाई की सौगात उसे भेज रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

जन्म से मरण तक तू खेल बनी रही,
लोग बस हारते रहे, तू हीं जीतती रही।
अन्तिम सफर में भी तुझे ही मीर कहें लोग,
कि मरना बवाल है, जिन्दगी कमाल रही।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।"

मंगलवार, 27 मार्च 2012

दिल से निकली पंक्तियां..

"आजकल नहीं देख पा रहा, सूरज की प्रभात लालिमा।
मैं अक्सर देर से उठता हूँ, वो सुबह जल्दी निकलता है।"

"मैनें खुद के लिए खुदा से मांगना ही छोड़ दिया है,
जब से उसने किसी और से चाहत की बात कही है।"

"वो मुझसे पूछता है, ख्वाब किस किस के देखते हो,
बेखबर जानता ही नही, यादें उसकी सोने कहाँ देती हैं!"

"मुस्कुराने से भी होता है बयां गम-ए-दिल,
मुझे रोने की आदत हो ये जरुरी तो नहीं..।"

"तुझसे बुरा दुनिया मे कोई नहीं है इश्क,
हर भले को बिगाड़ने का काम किया तूने।"

"हमें अच्छा नहीं लगता, कोई हम-नाम तेरा,
कोई हो तुझसा, तो फिर नाम तुम्हारा रखे।"

"जब भी सोचता हूँ तेरे बिना क्या है मेरी जिन्दगी,
एक उजड़े हुए गुलिस्तां का मंजर याद आता है।"

"ख्वाहिशों का काफीला भी अजीब ही होता है,
अक्सर वहीं से गुजरता है जहां रास्ते नहीं होते।"

"तुम जो इजाजत दो तो चंद लफ्जों में कह डालें,
कि तुम बिन मर तो सकते हैं, पर जी नहीं सकते।"

"ये लफ्जों की शरारत है, जरा संभल कर लिखना तुम,
मोहब्बत लफ्ज भर है लेकिन, ये अक्सर हो भी जाती है।"

"जिन्दगी तो मेरे जन्म के पहले से ही खूबसूरत है,
मेरी कोशिश तो इसे और बेहतर बनाने की है...।"

"मंजिलों का गम करने से मंजिलें नहीं मिला करती,
हौसले भी टूट जाते हैं, अक्सर उदास रहने से...।"

"जो तुम्हें देख के फिर और किसी के देखे,
वो एक तमाशाई है तलब-ए-दीदार नहीं...।"

"ये मैं ही था, बचा के खुद को ले आया कनारे तक,
वर्ना, समंदर ने बहुत मौका दिया था डूब जाने का।"

"बहुत मुश्किल है कोई लगाये मेरी चाहतों का अंदाजा,
कि मेरी चाहतों का समंदर उनकी सोच से भी गहरा है..।"

"मैं काबिल-ए-नफरत हूँ तो छोड़ दे मुझको,
तू मुझसे यूं दिखावे की मोहब्बत न किया कर..।"

"तुझसे रुठने के बहाने तो बहुत हैं मगर,
डरता हूँ गर मनाने न आया तो क्या करेंगे।"

"उसकी मोहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब सिलसिला था,
अपना भी नहीं बनाया और किसी का होने भी नहीं दिया...।"

"अल्फाज इन्सान के गुलाम होते हैं, मगर बोलने से पहले ।
बोलने के बाद इन्सान लफ्जों का गुलाम बन जाता है ।।"

"सफर तो है मेरा, रफ्तार मगर तुम हो।
न होते तुम तो शायद तेज दौड़ता,
या किसी ठौर पर रुक ही जाता...।"

"उनकी शिकायत है की मैं तारीफ नहीं करता,
कैसे कहूं की अब मैं सच बोलने लगा हूँ...।"

"वाह रे दुनिया की साफगोई,
दीवारो को रंगों में बांटा, और
इंसानो को मजहबों के फेर में..."

"मत छोड़ मेरा साथ तू जिंदगी में इस तरह, दोस्त
शायद हम जिंदा हैं तुम्हारे ही साथ रहने से..."

"यह विसंगति जिंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई....
चाह में है और कोई...बांह में है और कोई...."

"मरना तो इस जहान में कोई हादसा नहीं,
इस दौर-ए-नागवारी में जीना कमाल है...।”"

"जिन राहों पे एक उमर तेरे साथ रहा हूँ,
कुछ रोज से वो रास्ते सुनसान बहुत हैं..."

"अबकी वो बिछड़ेगा तो ये इल्तजा करुंगे उससे,
बिन अपने जीने का कोई अंदाज तो सिखाता जा..."

"वो कहती रहीं हर बार, मेरी मुस्कुराट कमाल है..
सच ही कह रही थीं शायद, तभी तो
आज जाते हुए, साथ सिर्फ मेरी मुस्कुराहट ले गयी।"

"काश ! वो सुबह नींद से जागे तो मुझसे लड़ने आये,
कि तुम कौन होते है मेरे ख्वाबों में आने वाले।"

"गैरों को कब फुरसत है गम देने की,
जब होता है कोई हमदम होता है।"

"बर्बाद बस्तियों में किसे ढ़ूढ़ते हो तुम,
उजड़े हुए लोगों के ठिकाने नहीं होते।"
"
"कफन पड़ा तन पे तो ये मालूम हुआ,
कि लोग परदा नशीनों को इतना चाहते क्यों हैं।"

"कैसी खामोशी है इन लम्हों में,
जैसे सारे रंग उड़ चले हैं जिन्दगी के हमारे।"

"मैं इस लिए भी अक्सर अपनी ख्वाहिशों को मार देता हूँ,
कि मुझे वो नहीं मिला करता जो ख्वाहिश बन जाता है।"

"आसां नहीं आबाद करना घर मोहब्बत का,
ये उनका काम है जो जिन्दगी बरबाद करते हैं।"

"आजकल सूरज से बहुत कम मेरी आंख मिलती है।
रात जागते बीत जाती है, दिन आंखों खोलने में गुजरती है।"

"जगी है प्यास ऐसी की, समन्दर भी कम लग रहा।
पर मुकद्दर ऐसा है, कि जहर भी नहीं मिल रहा।।"

कुछ कहीं-अनकही..

"रात सुनती रही मैं सुनाता रहा,
दर्द की दास्तां मैं बनाता रहा।

लोग लोगों से चाहत निभाते रहे,
एक वो था मेरा दिल जलाता रहा।

धूप छांव सी उसकी तबीयत रही,
वो निगाहें मिलाता चुराता रहा।

दिल के मेहमान खाने में रौनक रही,
कोई आता रहा, कोई जाता रहा।

साथियों ने भी सारा माजरा समझ लिया,
मैं जो नाम तेरा लिखता मिटाता रहा।

एक मैं ही प्यासा रहा दोस्तों,
लोग पीते रहे मैं पिलाता रहा।"

मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं...

"अपनी खुशियां लुटाकर उसपे कुर्बान हो जाऊं,
काश कुछ दिन उसके शहर में मेहमान हो जाऊं।

वो अपना नायाब दिल मुझको देदे और फिर मांगे,
मैं मुकर जाऊं और बे-इमान हो जाऊं।

वो मुझपे सितम करे हर किसी की तरह,
मैं उसकी इस अदा पर भी मेहरबान हो जाऊं।

वो मेरे पांव के नीचे से जमीन भी खींच ले,
और फिर मैं उसका आसमान हो जाऊं।

अब तो मुझे इतनी मोहब्बत हो गयी उससे,
कि ऊपर वाला ही दिखाये कोई करामात...
और मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं।"

सोमवार, 19 मार्च 2012

सच्चाई की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है...

पत्रकारों को सच सामने लाने के लिए जोखिम उठाने पड़ते हैं और इस सच की कीमत भी चुकानी पड़ती है। यह सच और झूंठ की मुठभेड़ है जो अनादिकाल से चली आ रही है तथा अपने-अपने मोर्चे पर बोलकर अथवा लिखकर हर दौर में नारद से लेकर गांधी तक महान लोगों ने समाज में बदलाव की लहर लाने का काम किया। इस काम में साहित्कारों की भूमिका भी सराहनीय रही है, जिन्होंने कलम के सिपाही के तौर पर निरन्तर अपनी लेखनी की कीमत चुकाते हुए नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्तिकरण का काम करते रहे।

आज के समय में भी कलम के इन सिपाहियों यानि की देश के चौथे स्थम्भधारी मीडिया वालों पर देश और समाज की दशा और दिशा के बारे में विचार कर उसके लिए बेहतर विकल्प तलाशने का काम है। ऐसे में पत्रकार अपनी ईमानदारी और कलम के जोर पर ही समाज के प्रति अपनी संवेदनाओं को अक्षरों के रुप में उकेरने का काम करता है। एक पत्रकार सबके सुख-दु:ख लिखता है लेकिन अपनी कहानी कभी नहीं कहता। वह राष्ट्र की संस्कृति और समाज बनाता है और इतिहास व समय के पैमाने को बदलता जाता हैं। ऐसे में ज्ञान की वंश परम्परा में साहित्यकार और पत्रकार को दो जुड़वां भाईयों की संज्ञा देना गलत ना होगा। जहां साहित्यकार शाश्वत की खोज करता है वहीं पत्रकार वर्तमान का अन्वेषण करता है। सूचना और प्रोद्योगिकी के युग से पहले भी वह स्वतंत्रता सेनानियों की जय बोलता था और आज भी वह पिछड़े और वंचितों से साथ ही जीता है। यही कारण है कि शब्द कभी मरता नहीं है, वह स्वयं ही अपना रास्ता बनाता है। साहित्यकार और पत्रकार की जुगलबंदी अनन्तकाल से आततायी और शोषण की व्यवस्था से लड़ती-मरती आई है तथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक असहमतियों के चक्रव्यूह में अभिमन्यु की भूमिका अदा करती है।

स्मरणीय हो कि मानव समाज और समय के कुरूक्षेत्र में जिस शब्द और वाणी का आधार सत्य और अहिंसा रही है, वही कलम सामाजिक क्रांति के लिए परिवर्तन की जननी मानी गयी है। यानि कि उपनिवेशवाद से लेकर आज पूंजीवाद तक तानाशाही और लोकतंत्र में सच्ची कलम विपक्ष की आवाज बनकर ही चली है। दुनिया भर में दूसरे विश्वयुध्द के बाद जो क्रांतिकारी बदलाव आये हैं, उसमें आम जनता की आवाज को आगे बढ़ाने का काम साहित्यकारों तथा पत्रकारों ने ही किया है। वैसे मूल तौर पर पत्रकारिता का विकास तो उस युग से माना जायेगा जब यूरोप में ओद्योगिक क्रांति के बाद जब से छापाखने की परिकल्पना सामने आई। भारत के संदर्भ में देखें तो पत्रकारिता का उदय अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व मुगलकाल में ही हो गया था। पहले प्रचार-प्रसार सीमित था लेकिन जैसे-जैसे तकनीक का और कागज का आविष्कार हुआ हमारे लोक जीवन में शब्द और वाणी के प्रभाव सभी दिशाओं में फैलने लगे। साहित्य की इन्हीं सीमाओं को तोड़ने का काम आज पत्रकारिता कर रही है तथा सूचना और प्रोद्योगिकी की इस २१वीं सदी में पत्रकारिता ने पारदर्शिता के नए रास्ते भी खोल दिए हैं।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रुप में प्रचलित वर्ष १८५७ की क्रांति में इस सूचना और समाचार की ताकत ने जबर्दस्त काम किया है। आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडीया ने देश और समाज में जो अग्रणी हस्तक्षेप और सवाल खड़े किये हैं, उसी का परिणाम है कि मीडिया अब विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बाद चौथे स्तम्भ अर्थात् खबरपालिका के रूप में स्थापित हो गया है। स्थितियों में बदलाव इस तरह से आया है कि पहले जहां सूचना का खुलासा करने वालों को भेदिया कहकर मार दिया जाता था, जहर का प्याला पिला दिया जाता था, हाथी के पांवो से कुचल दिया जाता था या फिर तोप के मुँह पर बांधकर उड़ा दिया जाता था। वही काम आज लोकतंत्र में राजनैतिक और आर्थिक गिरोहों तथा माफियाओं के द्वारा किया जाता है यानि कि उनके हितों के लिए बोलने और लिखने वाले को रास्ते का काँटा समझकर साफ किया जाता है।

समझने की बात यह है कि आज जब राजनीती का अपराधीकरण हो गया है, जातिवाद और सम्प्रदायवाद जिस तरह सत्ता-व्यवस्था में घुस गया है तथा आर्थिक शक्तियां जिस तरह समानान्तर सरकार जैसी संगठित बन गई है तब से सच की खोज करने वाला पत्रकार इन समाज विरोधी ताकतो के निशाने पर आ गया है। आजादी के बाद और लोकतंत्र के विकास में जब पत्रकारिता और मीडिया एक सूचना उद्योग का रूप ले चुके है तब से शब्द और सूचना की सत्यता ही सबसे अधिक हिंसा और अपराध का शिकार हो रही है। आज भारत में ही विभिन्न भाषाओं की कोई ८० हजार पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं और करीब ७०० से अधिक टीवी चैनल रात-दिन चल रहे है। ऐसे में राजनैतिक और आर्थिक ताकतों की सारी कवायद मीडिया को अपने नियंत्रण में रखने की हो रही है। यह शक्तियां साम, दाम, दण्ड व भेद से मीडिया पर अपना आधिपत्य जमाने में लगी हैं। इस रास्ते में बाधा बन रहे पत्रकारों और लेखकों को अपनी राह का रोड़ा समझकर मारती-डराती रहती है।

शब्द और सत्य पर आक्रमण की यह कहानी १९९० के भूमंडलीकरण और खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक सक्रिय हो गई है। तानाशाही और अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाओं में यह हमले अधिक है लेकिन भारत जैसे उदार लोकतंत्र में पत्रकार और मीडिया पर सबसे अधिक कातिलाना हमले राजनीती और आर्थिक जगत से जुड़े घराने ही करा रहे हैं। जहां-जहां मीडीया का प्रभाव समाज में बढ़ रहा है, वहां-वहां भेद खोलने वाले और खोजी पत्रकारिता के नायकों पर हमले अधिक हो रहे है। संक्षिप्त में एक मीडियाकर्मी और पत्रकार की हत्या समय और समाज के सत्य को दबाने के लिए ही है। पंजाब केसरी के लाला जगत नारायण तथा रमेशचंद्र की हत्या आंतक में की गई तो लेखिका तसलीमा नसरीन को सच लिखने के लिए बांग्लादेश से निर्वासित होना पड़ा। इसी तरह १९७५ के आपातकाल में मीडिया को भारी प्रतिबंध झेलने पड़े ताकि वह सरकार की गलत नीतियों पर जनता की बातों को आगे और प्रचारित-प्रसारित न करें।

यह सब प्रतिरोध और असहमति ही कलम के सिपाही को हिंसा का शिकार बनाती है और हरिशंकर परसाई को भी साम्प्रदायिकता के गुंडो से पिटवाती है। अभी आर्थिक राजधानी मुम्बई में समाचार पत्र मीड डे के पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या और पिछले दिनो पाकिस्तान के एक पत्रकार सलीम शहजात की मौत, इसी क्रम का एक उदाहरण है। इसी प्रकार आए दिन हत्या और हमलों की खबरें इस बात की याद दिलाती है कि हर लेखक और पत्रकार को सच लिखने की कीमत चुकानी ही पड़ती है, जो भूत से लेकर भविष्य में भी पूर्णत: सत्य है। ऐसे में कलम के सिपाहियों को जोखिम तो उठाने ही होंगे, तभी तो वह तथ्यों की परख और सच के अन्वेष्ण को सही दिशा दे सकेगा। ऐसे में वह समय दूर नहीं जब कमल के सिपाही सही मायनों में लोकतंत्र के सच्चे रक्षक कहलायेंगे। यह सत्य है कि शायर, सिहं और सपूत सदैव लीक से हटकर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हैं। कलम का इतिहास भी वही लिखते हैं जो शहीद हो जाते हैं पर बिकते नहीं।

मां...


"अभी तक वो बचपने की यादें हैं बाकि,
और वो बचपने की बातें हैं बाकि।

कि जब मैंने बोला था मां पहली बार,
मां की आंखों में भरा था कितना प्यार।

पैदा हुआ था तो कुछ भी नहीं था मैं,
मां की वजह से ही हूं आज मैं।

लालच तो कुछ नहीं मेरी मां को मगर,
अच्छा हो दे दूं दिल तोहफे में अगर।

मां को छोड़ते हैं ऐसे कुछ लोग होते हैं,
फिर औरों के लिए वो हमेशा बोझ होते हैं।

कुछ लोगों के लिए मां को कभी छोड़ते नहीं,
चाहे कुछ भी हो जाये मुंह मोड़ते नहीं।

मां से हमेशा हमें सुख मिलता है,
फिर भी उसको हमसे दुख मिलता है।

काश मैं कुर्बान करुं सब उसकी सदा पर,
और वो मुझे प्यार करे मेरी इसी अदा पर।

मेरी मां से मुझे कोई जुदा न करे।
करुं प्यार किसी और से खुदा न करें।"

शनिवार, 17 मार्च 2012

मेरा जिक्र ना करना...

“दुख दर्द के मारों से मेरा जिक्र ना करना,
घर जाओ तो यारों से मेरा जिक्र ना करना।

वो रोक ना पायेंगे आंखों का समन्दर,
तुम राह-गुजारों से मेरा जिक्र ना करना।

फूलों सी यारी पर रहे हैं हम अक्सर हर्षिले,
देखों कभी कंटों से भी मेरा जिक्र ना करना।

शायद ये अंधेरे ही मुझे राह दिखायें,
अब चांद-सितारों से मेरा जिक्र ना करना।

वो मेरा कहानी को गलत रंग ना दे दें,
अफसाना निगाहों से मेरा जिक्र ना करना।

शायद वो मेरे हाल पर बेशाख्ता रो दे,
इस बार बहारों से मेरा जिक्र ना करना।

ले जायेंगे गहराईयों में तुमको भी बहा कर,
दरिया के किनारे से मेरा जिक्र ना करना।

वो शख्स मिले तो उसे हर बात बताना,
तुम सिर्फ इशारों से मेरा जिक्र ना करना।”

रविवार, 11 मार्च 2012

चलो आज खुद को सजा देते हैं...

“चलों आज खुद को सज़ा देते हैं,
हर ख्वाहिश दिल में दबा देते हैं।

खाये हैं बड़े धोखे राह-ए-उलफत में,
तोड़ कर दिल किसी का अब मजा लेते हैं।

मजबूर है दिल उनसे प्रीत निभाने को,
वो हैं हर मोड़ पर दगा देते हैं।

तो क्या हुआ जो मिली हमें सिर्फ तन्हाई,
उन्हें फिर भी खुश रहने की दुआ देते हैं।

गवांरा नहीं उन्हें कि देखें नजर भर,
आज अपनी रुह तक हम जला देते हैं।”

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