बुधवार, 2 मई 2012

चन्द पंक्तियां...


दो..
मेरे सीने में आहें सिसकती रही,
मैं जमाने को नगमें सुनाता रहा।
मेरे घर में भरा था अंधेरा मगर,
मैं दिये रहगुजर के जलाता रहा।

कौन कहता है निभाने के लिए होते हैं,
वायदे तो सिर्फ लुभाने के लिए होते हैं।
ख्वाब देखों मगर ख्वाब की ताबीर न पूछो,
ख्वाब तो सिर्ए रिझाने के लिए होते हैं।

बिखरती रेत पर किस नख्स को आबाद रखेगा,
वो मुझको याद रखे भी तो कितना याद रखेगा।
पलट पर भी नहीं देखी तेरी ये बेरुखी हमने
भुला देंगे तुझे ऐसे, की तू भी याद रखेगा।

अदना सा आदमी होने का फर्ज अदा करता हूँ,
फिर क्या दर्द में रोने पर भी कोई गुनाह करता हूँ।
ऐसे तो न रगड़ों नमक मेरे जख्मी जज्बातों पर,
दिन भर की सांस लिये ही मैं घर से निकलता हूँ।

यकीं हैं मुझे खुद पर कि तेरा दीदार होकर रहेगा,
तेरा दिल भी मेरे दिल पर निसार होकर रहेगा,
कब तलक यूँ ही झुठलाती रहोगी खुद को....
एक दिन तुम्हें भी मुझसे प्यार होकर रहेगा.......

मुद्दत से कोई गम पास नहीं है,
तन्हाई का भी कोई अहसास नहीं है,
अकेले ही जब आये हैं दुनिया में,
फिर क्यों गिला करें...
कि कोई मेरे साथ नहीं है।

बने अजनबी सभी हमसफर और नजर चुरा कर गुजर गये,
मैं रास्तों से रहा बेखबर और उन्हें मंजिलों का सुरुर था।
फकत आदतों के थे तकाजे, जो दिलकशी में बदल गये,
कि उन्हें पसंद थी शोखियां और मुझे सादगी पर गुरुर था।

हम हाथों को देखते हुए ये सोच रहे हैं,
कि अब ये जिन्दगी किसके नाम करें ।
उसके नाम, जो दिल की धड़कनों मे हैं,
या फिर उसके, जो हाथों की लकीरो में हैं ।

"लिपट कर अपनी तन्हाई से जागता रहता हूँ मैं,
तमाम रात किसी की याद मुझे सोने नहीं देती,
उसकी कोई मासूम सी शरारत जब याद है आती,
उदास तो कर जाती है पर रोने नहीं देती...।"

झूठी तारीफ की बातों से हम दूर ही सही,
जब लफ्ज ही उगलना है तो मिलावट कैसी।
जो सोचिये वो कहिए इसमें बुरा क्या है,
केवल वो ही हैं हमारे ये हकीकत तो नहीं।

लम्हों में जो कट जाये वो क्या जिन्दगी,
आंसुओं में जो बह जाये वो क्या जिन्दगी,
जिन्दगी का तो फलसफा ही कुछ और है,
हर किसी की समझ में आये वो क्या जिन्दगी।” 

तुम याद आये बहुत...


आंखों में सपने सजायें बहुत,
तुम हमकों याद आये बहुत,
हर पल रहा तेरी यादों का पहरा,
दिल है बस तेरी ही बात पर ठहरा।

आज भी बस तू ही तू चल रहा,
नहीं कोई और इस जी को जंच रहा,
कब तक आखिर तेरी ही बातें रहेंगी,
ये सोचकर भी मन ना तूझसे खींच रहा।

तेरी यादें भी तुझसी बड़ी ढ़ीठ है,
तू आती नहीं, तेरी याद जाती नहीं,
तुझको बुलाना और यादें मिटाना,
अब तो दोनों ही हमारे बस की नहीं,

तुझको भूलाने के पैतरें आजमाये बहुत,
कुछ ना कर सके तो खुद को तड़पाये बहुत,
पर तेरा ख्याल जो दिल से जाता नहीं,
इस कुफ्त में खुद को गरियायें बहुत,
पर सच है यही कि..
भुलाने की जिद में भी तुम याद आये बहुत।

तो बात बने...


अपना घर-बार हो तो बात बने,
दुनिया में भरा हो प्यार तो बात बने,
अपना पर्व-त्यौहार हो तो बात बने,
हो अपना भी अधिकार तो बात बने,
ना हो सिर्फ संस्कारों का भौंडा प्रदर्शन,
अब सच्चा सम्मान हो तो बात बने,
गुल जो गुलशन में खिलाए हैं देखे,
उन पर भी कोई खार हो तो बात बने,
शौक-ए-आवारगी भर नहीं अपनी,
रोजी-रोजगार हो अपना तो बात बने,
प्रेम-पत्रों को तो कब से पी के बैठे हैं,
अब अपना अखबार हो तो बात बने।

मंगलवार, 1 मई 2012

वो ही सपने....


देखे जो खुले दिल से सपने, वो ही रहे बस अपने,
कि अब भरोसे के दम पर लहरा रहा उम्मीदों का आंचल,
पतंगों की रंगों में होके सराबोर, रौशनी सी जो उमड़ाई रहती है,
अब तो दिखने लगे हैं अंबर से ऊंचे वो ही सपने....

सूरज की किरणें भी हमकों थकाती, हर ख्वाब आंखों से दूर भगाती,
पर नशा आखों में कुछ यूं है समाया, मैं ख्वाब पूरा करने ही आया,
नहीं देखता मैं जहां की मुसिबत, बस चलते रहना है मेरी हकीकत,
अब तो लगने लगे हैं सब रस्तें ही अपने....

खुद को ढूंढ़ा है मैंने भरी भीड़ में, भटकता रहा हूं सदा क्षीण में,
अब जाना है अपने हालात को, पहचाना है जंगी सवालात को,
किस घड़ी, किस दिशा में कदम हैं बढ़ाना, है बस मुझे दूर जाना,
अब तो तपने लगे हैं आंखों के वो ही सपने....

मेरी मंजिल का चेहरा नया हो गया है, नया ही अब सिलसिला हो गया है,
हमसफर बन गया है जो हौंसला मेरा, थोड़ी दूर रह गया है ठिकाना मेरा,
अब तो मंजिल की मुझको महक आ रही, जीत के विश्वास की लहर छा रही,
अब तो बहने लगे हैं हकीकत में वो ही सपने... 

याद...

ये याद ही तो याद है,
कि हर याद में तू याद है।

जिस याद में तू याद नहीं,
वो याद भी क्या कोई याद है।

ये जो याद-याद का है सिलसिला,
इस सिलसिला-ए-याद में...
फकत तू ही तू बस याद है।

परछाई...

परछाईयों की शक्ल भी कोई देख पाया है,
ये तो चिरागों के साथ ही हमसे जुड़ जाता है।

ना चाहता है कुछ भी, ना बोलता कभी,
बस साथ चलता और फिर हममें सिकुड़ जाता है।

कौन कहता है कि इनसे ना नाता हमारा,
देता सहारा जब दुनिया-जहां हमसे बिछुड़ जाता है।

राहों पर तन्हाईयों के जब भी हम चलते,
संग अपने दूर हर सफर तक जाता है।

अपने मन में भी अब ये छंद उभर आया है,
कि मंजिल कहीं हो, हो सफर कैसा भी...
हर राह पर खामोशियों संग तू साथ जाता है।

आईने का सच...


"नजर मुझसे मिलाकर जब वो भाग जाते हैं,
हो जाता यकीं कि वो कुछ तो छुपाते हैं,
जाने कैसे लोग छुपाने औ चुराने की कला को आजमाते हैं,
दिल में रहता चोर और होठों पर मासूमियत दिखाते हैं।

मुझे अब नहीं लगता कि कोई रखना भी चाहेगा,
मैं सच बोल भी दूँ तो कोई सुनना भी चाहेगा,
चाहिए सबको अपने हिसाब-ओ-पसंद की बातें,
और मुझे बस आंखों को ही जुबां में ढ़ालना आयेगा।

लोग देखते मुझको फिर आगे सरकते हैं,
मैं बाजार की शोभा लिये बरसों से खड़ा हूँ,
मैं आईना हूँ, जो कभी महलों में था सजा रहता,
अब जो फेंका गया हूँ तो टुकड़ो में पड़ा हूँ।

हर हुस्न निहारे हमें और खोजे सुन्दरता अपनी,
कैसे कहूँ कि तू खुश हो जाये..
फकत एक आईना हूँ मैं...
जैसा है तू मेरी आंखों में वहीं नजर आये।

चाहे रख ले बंद दीवारों में, या फिर रस्ते पे फेंक दों,
रहा जो घर में तो खुद को संवारोगे...
पड़ा रहा सड़क पर तो...
शायद दुनिया असलियत देख ले ।।"

फरियादी की पुकार...


"नियमते कुदरत जीवन ये मिला है,
कैसे इसकी चाह को पूरा न करुंगा,
चाहूँगा उम्र सारी तेरी आरजू में कटे,
रहूँ जब अर्थी पे लेटा...
तब भी लब पे तेरा ही नाम रहे।

करुँ हर पल इंसानियत की सेवा,
न एक पल भी बैर की मुझमें आग जले,
हो चाहे वो साथी या दुश्मन का सरमाया,
हर एक से मेरी निभे...
और कुछ कदम वो बन मीत चले।

न चाहा न चाहूँगा कि भव सागर में मैं डुबूँ,
चाहत इतनी की ओंकार धुन बन जहां में गूँजू,
एक रोशनी मुझमें जले, मैं प्रकाश का पुंज बनू,
जब अंधेरा हो जाये संसार में तो...
एक ज्योत बन दुनिया में हर पल जलूँ।

चाहतों की लम्बी फेहरिस्त नहीं अपनी,
बस जब कभी आरजू में लब खुले,
एक राम धुन के सिवा न कुछ गनू...।।"

मजदूर का सच




"हमें आदत नहीं किसी का बोझ उठाने की,
ये जरुरत है जो धूप में जले जा रहा हूँ।

न थकना, न हारना सीखा है मैंने,
ये तो जिन्दगी का कर्ज है, जो चुकाये जा रहा हूँ।

इस भूख ने ही दी है ताकत जहां से लड़ने की,
भूख ही है, जिसके लिए खून को पसीने में बहाए जा रहा हूँ।

मैं पथिक हूँ उस मंजिल का, जो मेरे घर में खुशियां ला दे,
जले रोज मेरे घर का चूल्हा, इस उम्मीद में...
हर रोज खुशियों की मंजिल तलाशे जा रहा हूँ ।।"

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

प्यार उत्साह और इंतजार


इतना संभल-संभल के न चलो,
कि न फिसल पाओ यारों....
इतनी तो मार लो कि
किसी से टकरा जाओ यारों,
टकराहट के बिना मुलाकात कैसे होगी,
हर मुलाकात के बाद ही तो बात बनेगी,
बातों के बीच अपनी राग छेड़ देना प्यारे,
मोहब्बत के अरमान उन पर थोप देना सारे,
होगा उनको यकीं तो साथ वो भी देंगे,
नहीं तो फिर संभल के चलना,
कहीं और फिसल लेंगें...।।

कैसे करुं...


तेरे बिना मैं कोई फैसला कैसे करुं,
टूट चुका हूँ अब हौसला कैसे करुं।

सोचा नहीं कभी तेरे बिन भी होगी जिंदगी,
अब खुद को भला तुझसे जुदा कैसे करुं,

दिल से चाहा तुझको तो गुनाह कर दिया,
मुकर्रर खुद को इस गुनाह की सजा कैसे करुं।

हो सके तो तू ही कर दे मेर दिल का फैसला,
मैं फिर तुझको तुझी से पाने की फरियाद कैसे करुं...।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

चल अब गांव का रुख करें...

ये शहरों की जिन्दगी हमें रास नहीं आती...
ताजी हवा भी अब यहाँ पास नहीं आती...
बेचैन है धड़कन, तन्हा ये दिल भी है...
लगता है अब कोई दुआ भी खास नहीं आती...

कल तक रही मेरे गांव में बसती मेरी जन्नत,
रहता हूँ अब शहर में पर वो सुकूं-ए-रात नहीं आती...
कंक्रीट के जंगल हैं, झिलमिलता साये हैं मकानों के...
पर इनमें कहीं भी अपने घर वाली बात नहीं आती...

कि महफिले रोज लगती है, यारों के हुजूम में...
पर जाने क्यों वहां भी अब जिन्दगी बसर नहीं आती...
अब तो बस है याद आता, गांव का वो खरिहान-बगिचा...
कि ख्वाब में भी दौड़ पड़ता हूँ, पर आंखें पहुँच नहीं पाती...

जो मिट्टी है मेरे गाँव की वो जन्नत का नूर है...
इन शहरी धूल से तो अब महक भी नहीं आती...
लगता है अब यही कि बस गांव का रुख करें...
कि इसके आगे तो मंजिल भी कोई नज़र नहीं आती...

रविवार, 22 अप्रैल 2012

कहां आजाद रहते हैं...

"अब सूरज की तपन से भी डर नहीं लगता,
कि उससे ज्यादा आग तो सीने में जलते हैं।

दिन भर जलता रहता मन, पर आंच नहीं कोई,
गुब्बार भरा सीने में, दर्द आंखों से छलकते हैं।

चढ़े जो ताप सिर पर और दवा ले लूँ भी तो क्या,
जलन जो दिल में उठती है उसे यादों से मलते हैं।

कहां ढ़ूंढ़े तेरी याद से बचने का अब आसरा,
जहां देखों तेरी यादों के शोले ही तो गिरते हैं।

ना कोई दोस्त ना साथी रहा, इस दर्द से जुदा,
हर किसी के मन में यादों के अंगार जलते हैं।

भला कब तक दिलों को आग देकर हम रहें जिंदा,
तुम्हें हम भूले ही बैठे हैं, पर कहां आजाद रहते हैं।"

मुहब्बत ऐसी धड़कन है...

"मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती,
जुबां पर दिल की बेचैनी कभी लाई नहीं जाती।

जता देने से दिल हल्का तो हो जाता है पर यारों,
शब्दों की बिसात पर जज्बातें बिछाई नहीं जाती।

समझना हो जो बातों को तो आखों से ही पढ़ने दो,
कि निगाहों की पढ़ाई फिर झुठलाई नहीं जाती।

यकीनन याद आया होगा उनको भी इश्क का ककहरा,
वर्ना, नीची नजरों और दबें होंठों पर मुस्काने नहीं आती।

जुबां ना-ना कहे, सिर भी हिकारत में हिले, ये इंकार होता है,
पर दिल की धड़कनों से राज-ए-इश्क छिपाई नहीं जाती।

मुकरने दो उन्हें तुम भी, छोड़ों उनकी गैरत पर,
वो लौट ही आयेंगे, मोहब्बत कहां दबाई जाती है।

अगर उनका यहीं है फैसला तो सुन ले जहां सारा,
किसी के इश्क में मरने की फितरत हमको नहीं भाती।

चाहा था, चाहता हूँ और उन्हें आगे भी मैं चाहूंगा,
उन्हें पाने न पाने से चाहत मेरी, मर तो नहीं जाती।"

रविवार, 15 अप्रैल 2012

मां से बातें...

"मस्तियां अपनी आज गुमा दी माँ मैंने,
जिंदगी अब अपनी उलझा ली माँ मैंने।

मिले ना सुकून के चंद लम्हें भी तो,
आंसुओं से आंख अपनी भिगा ली माँ मैंने।

तू हमेशा कहती रहती हौसला रख अपने पर,
आज तो देख उम्मीद की लौ भी बुझा दी माँ मैंने।

बनाता था कभी बचपन में कागज से कश्तियाँ,
वक्त के थपेड़ों में सारी कश्तियाँ डूबा दी माँ मैंने।

आज मैं भी मजबूर हूँ, तू भी अपने दुलारे से दूर है,
बुझदिली-आवारगी में दूरियाँ और बढ़ा दी माँ मैंने।

इतना टूटा कि अपने चेहरे पे मल ही अकेलेपन की ख़ाक,
अंधेरों में गुम अपनी होली आप तन्हा मना ली माँ मैंने।"

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

हम भी मोहब्बत किया करते थे..

"जब तेरी धुन में रहा करते थे,
हम भी चुपचाप जीया करते थे।

आंखों में प्यास हुआ करती थी,
दिल में हर पल तूफां उठा करते थे।

लोग पूछते थे दुनिया-जहान की बातें,
और हम बस तेरा जिक्र किया करते थे।

सच समझकर तेरे हर झूठे वायदे को,
निगाहें अपनी रस्तों पर टिका रखते थे।

जब भी आहट हो जाये तेरे आने की,
दिल में हजारों फूल खिला करते थे।

दिल के दरों-दीवार को सजाने की खातिर,
हर सांस को तेरे नाम की सजा देते थे।

कल फिर आई तेरी याद ने, सब ताजा कर दिया,
कि हम भी कभी मोहब्बत किया करते थे।"

नसरत फतह अली जी की शानदार गजल...

ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है...

"ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है..
किसी की चाहत को तोड़ दिया,
तो किसी टूटे की चाहत बनी है।
कभी लाखों उम्मीदों को कतरा बना दिया,
कभी लाखों की उम्मीद का कतरा तू रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

जिसने सजाये ख्वाब आंखों की मानिंद,
उनके लिए नींद का कोटा नहीं दिया।
और जो ऊंचाईयों को पाने की ख्वाहीश लिये जन्में,
उन्हें ऐश-ओ-आराम की आगोश में सुला दिया।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

हम तेरी बेहतरी के वास्ते लड़ते रहे जहां में,
और तू बेहतरीन बन अमीर की कोठी सजा रही है।
इंसा को उम्मीदों-हौंसलों की कहानी बताने वाली,
तू भी उसकी हार पर कहकहे-ठहाके लगा रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

पहले तो सिखाती है हार से लड़ने औ जीतने के नुस्खे,
फिर अंधी-दौड़ में लोगों को अपनों से लड़ा रही है।
जब देती है जीत के शिखर का वरदान किसी को,
जाने फिर क्यों तन्हाई की सौगात उसे भेज रही है।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।

जन्म से मरण तक तू खेल बनी रही,
लोग बस हारते रहे, तू हीं जीतती रही।
अन्तिम सफर में भी तुझे ही मीर कहें लोग,
कि मरना बवाल है, जिन्दगी कमाल रही।
ऐ जिन्दगी! तू भी क्या खूब रही है।"

मंगलवार, 27 मार्च 2012

दिल से निकली पंक्तियां..

"आजकल नहीं देख पा रहा, सूरज की प्रभात लालिमा।
मैं अक्सर देर से उठता हूँ, वो सुबह जल्दी निकलता है।"

"मैनें खुद के लिए खुदा से मांगना ही छोड़ दिया है,
जब से उसने किसी और से चाहत की बात कही है।"

"वो मुझसे पूछता है, ख्वाब किस किस के देखते हो,
बेखबर जानता ही नही, यादें उसकी सोने कहाँ देती हैं!"

"मुस्कुराने से भी होता है बयां गम-ए-दिल,
मुझे रोने की आदत हो ये जरुरी तो नहीं..।"

"तुझसे बुरा दुनिया मे कोई नहीं है इश्क,
हर भले को बिगाड़ने का काम किया तूने।"

"हमें अच्छा नहीं लगता, कोई हम-नाम तेरा,
कोई हो तुझसा, तो फिर नाम तुम्हारा रखे।"

"जब भी सोचता हूँ तेरे बिना क्या है मेरी जिन्दगी,
एक उजड़े हुए गुलिस्तां का मंजर याद आता है।"

"ख्वाहिशों का काफीला भी अजीब ही होता है,
अक्सर वहीं से गुजरता है जहां रास्ते नहीं होते।"

"तुम जो इजाजत दो तो चंद लफ्जों में कह डालें,
कि तुम बिन मर तो सकते हैं, पर जी नहीं सकते।"

"ये लफ्जों की शरारत है, जरा संभल कर लिखना तुम,
मोहब्बत लफ्ज भर है लेकिन, ये अक्सर हो भी जाती है।"

"जिन्दगी तो मेरे जन्म के पहले से ही खूबसूरत है,
मेरी कोशिश तो इसे और बेहतर बनाने की है...।"

"मंजिलों का गम करने से मंजिलें नहीं मिला करती,
हौसले भी टूट जाते हैं, अक्सर उदास रहने से...।"

"जो तुम्हें देख के फिर और किसी के देखे,
वो एक तमाशाई है तलब-ए-दीदार नहीं...।"

"ये मैं ही था, बचा के खुद को ले आया कनारे तक,
वर्ना, समंदर ने बहुत मौका दिया था डूब जाने का।"

"बहुत मुश्किल है कोई लगाये मेरी चाहतों का अंदाजा,
कि मेरी चाहतों का समंदर उनकी सोच से भी गहरा है..।"

"मैं काबिल-ए-नफरत हूँ तो छोड़ दे मुझको,
तू मुझसे यूं दिखावे की मोहब्बत न किया कर..।"

"तुझसे रुठने के बहाने तो बहुत हैं मगर,
डरता हूँ गर मनाने न आया तो क्या करेंगे।"

"उसकी मोहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब सिलसिला था,
अपना भी नहीं बनाया और किसी का होने भी नहीं दिया...।"

"अल्फाज इन्सान के गुलाम होते हैं, मगर बोलने से पहले ।
बोलने के बाद इन्सान लफ्जों का गुलाम बन जाता है ।।"

"सफर तो है मेरा, रफ्तार मगर तुम हो।
न होते तुम तो शायद तेज दौड़ता,
या किसी ठौर पर रुक ही जाता...।"

"उनकी शिकायत है की मैं तारीफ नहीं करता,
कैसे कहूं की अब मैं सच बोलने लगा हूँ...।"

"वाह रे दुनिया की साफगोई,
दीवारो को रंगों में बांटा, और
इंसानो को मजहबों के फेर में..."

"मत छोड़ मेरा साथ तू जिंदगी में इस तरह, दोस्त
शायद हम जिंदा हैं तुम्हारे ही साथ रहने से..."

"यह विसंगति जिंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई....
चाह में है और कोई...बांह में है और कोई...."

"मरना तो इस जहान में कोई हादसा नहीं,
इस दौर-ए-नागवारी में जीना कमाल है...।”"

"जिन राहों पे एक उमर तेरे साथ रहा हूँ,
कुछ रोज से वो रास्ते सुनसान बहुत हैं..."

"अबकी वो बिछड़ेगा तो ये इल्तजा करुंगे उससे,
बिन अपने जीने का कोई अंदाज तो सिखाता जा..."

"वो कहती रहीं हर बार, मेरी मुस्कुराट कमाल है..
सच ही कह रही थीं शायद, तभी तो
आज जाते हुए, साथ सिर्फ मेरी मुस्कुराहट ले गयी।"

"काश ! वो सुबह नींद से जागे तो मुझसे लड़ने आये,
कि तुम कौन होते है मेरे ख्वाबों में आने वाले।"

"गैरों को कब फुरसत है गम देने की,
जब होता है कोई हमदम होता है।"

"बर्बाद बस्तियों में किसे ढ़ूढ़ते हो तुम,
उजड़े हुए लोगों के ठिकाने नहीं होते।"
"
"कफन पड़ा तन पे तो ये मालूम हुआ,
कि लोग परदा नशीनों को इतना चाहते क्यों हैं।"

"कैसी खामोशी है इन लम्हों में,
जैसे सारे रंग उड़ चले हैं जिन्दगी के हमारे।"

"मैं इस लिए भी अक्सर अपनी ख्वाहिशों को मार देता हूँ,
कि मुझे वो नहीं मिला करता जो ख्वाहिश बन जाता है।"

"आसां नहीं आबाद करना घर मोहब्बत का,
ये उनका काम है जो जिन्दगी बरबाद करते हैं।"

"आजकल सूरज से बहुत कम मेरी आंख मिलती है।
रात जागते बीत जाती है, दिन आंखों खोलने में गुजरती है।"

"जगी है प्यास ऐसी की, समन्दर भी कम लग रहा।
पर मुकद्दर ऐसा है, कि जहर भी नहीं मिल रहा।।"

कुछ कहीं-अनकही..

"रात सुनती रही मैं सुनाता रहा,
दर्द की दास्तां मैं बनाता रहा।

लोग लोगों से चाहत निभाते रहे,
एक वो था मेरा दिल जलाता रहा।

धूप छांव सी उसकी तबीयत रही,
वो निगाहें मिलाता चुराता रहा।

दिल के मेहमान खाने में रौनक रही,
कोई आता रहा, कोई जाता रहा।

साथियों ने भी सारा माजरा समझ लिया,
मैं जो नाम तेरा लिखता मिटाता रहा।

एक मैं ही प्यासा रहा दोस्तों,
लोग पीते रहे मैं पिलाता रहा।"

मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं...

"अपनी खुशियां लुटाकर उसपे कुर्बान हो जाऊं,
काश कुछ दिन उसके शहर में मेहमान हो जाऊं।

वो अपना नायाब दिल मुझको देदे और फिर मांगे,
मैं मुकर जाऊं और बे-इमान हो जाऊं।

वो मुझपे सितम करे हर किसी की तरह,
मैं उसकी इस अदा पर भी मेहरबान हो जाऊं।

वो मेरे पांव के नीचे से जमीन भी खींच ले,
और फिर मैं उसका आसमान हो जाऊं।

अब तो मुझे इतनी मोहब्बत हो गयी उससे,
कि ऊपर वाला ही दिखाये कोई करामात...
और मैं उसका दिल-ओ-जान हो जाऊं।"

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