बुधवार, 9 मई 2012

चंद पंक्तियां...

तीन...

ये रास्ते ले ही जायेंगे मंजिल तक हमें,
कभी सुना है... अंधेरों ने सवेरा होने न दिया हो।

मेरी खामोशी को मेरा गुमान न समझ,
दिल की बातों को अल्फाज बयां नहीं करते।

नया दिन, नयी सुबह, नयी ताजगी,
वहीं हौसला, वहीं उम्मीदें, वहीं सादगी।

किसी ने प्यार में फिर आजमाया है किसी को,
तभी मेरे शहर में आज एक और जनाजा उठा है।

ये माना लौट कर आते नहीं गुजरे हुए लम्हे,
मगर वो अपनी कुछ परछाईयां तो छोड़ जाते हैं।

कैद थे अब तक तेरे दिन-ओ-जान में हम,
तुम जो रुठे हो तो लगता है आजाद हुए हैं।

सुना था इश्क हुस्न की मोहताज नहीं होता,
फिर जाने क्या देखती है दुनिया सूरत-ए-यार में।

वो जीत जाता है अक्सर मुझसे, हर छोटी-बड़ी लड़ाई में।
और मैं खुश हूँ ये सोचकर, अपनों से लड़ाई में घाटा ही होगा।।

फैली सियाही से बिखरे पन्नों पर लिखी,
एक अधूरी सी कहानी है जिन्दगी मेरी...।

दीवार के उस पार मेरा ठिकाना रहा है,
एक हसीन चेहरे का आना-जाना रहा है।

मतलब से मोहब्बत का दिखावा करने वाले,
जिन्दगी में देह को इश्क का पैमाना बना देते हैं।

आसमान छूने के मेरे इरादे बुलंद हैं,
छलांग जरुर लगाउंगा ये फायदेमंद है।

विचित्र हाल है, कुदरत की करिश्माई है।
इश्क में बार-बार टूटकर बिखरजाना हौसला अफजाई है।।

जाने कैसे जालिम है वो, जो इम्तहां लेते हैं इश्क का,
मोहब्बत के ढ़ोल पीटते हैं, पर सबूतों की बिसात पर।

चुभते हुए ख्वाबों से कह दो, कि अब आया न करें।
हम तन्हा तसल्ली से रहते हैं, बेकार उलझाया न करें।

चैन और जुनूं की बातें वो भी एक साथ,
लगता है इश्क का एक और मरीज बढ़ गया।

रविवार, 6 मई 2012

अहसान है उनका...


"दिल की उदासियों के नाम कोई पैगाम नहीं उनका,
वो याद तो हैं बहुत पर कोई अहतराम नहीं उनका।
मेरी कोशिशों ने चाहतों को शब्दों में ढाल तो दिया,
पर परचों के सिलसिलों में कहीं नाम नहीं उनका।
हैं ये मेरी परेशानी, मैंने बनाये सब झमेले,
ना कहना कोई आ के कि सब अफसाना है उनका।  
उनकी यादें भी बहुत अहतीयात से पास है रखी,
कि वो मांग ले कभी कहकर ये सामान है उनका।
हम यादों को भी लौटांयेंगे उनके हसीं जतन मानकर,
चलो आखिरी बार मुखातिब हुए अहसान है उनका।"

शनिवार, 5 मई 2012

इश्क...

"होश में बेहोश हूँ, पर
बेहोशी में भी कुछ होश है।
औरों की हालत जो देखी,
तो हर कोई मदहोश है।

ये नशा किसका है, और
क्यों इस कदर चढ़ गया।
जिसको देखा वो ही इसमें,
हद से आगे बढ़ गया।

इस नशे में डूबना ही,
इस नशे की है दवा।
हर कोई अंजान है,
आखिर सबको क्या हुआ।

अब सोचता हूँ जब डूबना तय है तो,
क्यों न लुफ्त उठाऊं मैं भी इसका।
पर आता खयाल जिंदगी बड़ी प्यारी है,
और सिर्फ एक अहसास के वास्ते...
इस नियामत को गंवाना नादानी है..।"

बुधवार, 2 मई 2012

ये यादें...


पल-पल किसी के खयाल से रुलाती हैं ये यादें,
जिन्दगी को और भी तन्हा कर जाती हैं ये यादें।
बेशक वीरान लगती है जिन्दगी किसी के जाने के बाद,
पर किसी के पास होने का एहसास दिलाती है ये यादें।
माना कि आंखों से बरसता है इन्तजार किसी का,
होंठों पर फिर भी मुस्कान दे जाती हैं ये यादें...।।

तड़प...


आज फिर नींद इन आंखों से ओझल रही है,
कि थकान भी बहुत है पर करार नहीं कोई।

जाने किस घड़ी का अब इंतजार है इन्हें,
कि लोरिया सुनाने भी आयेगा क्या कोई।

जब जागते रहे तो कोई साथ न दे सका,
अब सोने की ख्वाहिश है तो नींद है खोई।

कैसे जहान-ए-इश्क में लोग डूब जाते हैं,
हम जबसे निकले हैं नहीं कतरा नसीब कोई।

ये किस्मत की बात है या फिर साजिशों का दौर है,
रखते हैं हम भी दिले नाजुक सीने में, नहीं बुतमईन कोई।

अब सोचते हैं फाड़कर जहान को दिखला ही दें सीना,
कि दिल यही लोथड़ा है या और चीज हुई कोई।

गधे का मानव अवतार..


गधों स करों दोस्ती इसके कार्य से संसार है,
हर कर्म को करने को ये रहता तैयार है,
हर रोज उठकर जीवन को बोठ उठाता है,
शाम पहर होते, थक कर सो जाता है,
फिर कल के बोझ के लिए करता विचार है,
इसीलिए कहता हूँ...
इन्सान अपने कर्म से गधे का अवतार है।।

करतबों पर ध्यान दो..


आज फिर यादों के मंजर ने करवटें ली,
तो ध्यान में आ गई बात एक मित्र की,
कि कहता रहता मुझसे वो हर पल यही...
कि अपनी काबिलियत का इम्तिहान लो,
पालते हो कुछ पाने की ख्वाहिशें जो दिल में,
तो किस्मतों को त्याग कर करतबों पर ध्यान दो।

चन्द पंक्तियां...


एक...
थी खुशियों सी हरी-भरी जिन्दगी, तुम जब साथ थे मेरे,
अब डाल से टूटी हुई पत्तियों का सा हाल है अपना।
हो के तुमसे अलग सूखे खरपतवार के ढ़रे हुए हैं,
कि लोग बटोरतें भी हैं हमें तो बस जलाने के लिए।

दर्द जब दर्द की हद के पार जाता है,
तब दर्द भी दर्द को बेजार पाता है।
एक दर्द ही है जो सदा दिल को लुभाता है,
वर्ना यादों के दर्द के सिवा तू कहां सताता है।

रातों को ख्वाब में आने की शिकायत है,
दिन का सुकून चुराने की शिकायत है,
दूर हो कर भी इतने पास हो दिल के,
तुझको भूल न पाने की शिकायत है।

मुकम्मल हो गया वो जो इश्क में तो,
हर बंदे में उसे रब नजर आने लगा,
नहीं फर्क रहा अब उसके लिए,
दर्द और इश्क के दरमियां..
अब तो दर्द में ही उसे इश्क नजर आने लगा।

बहुत रोशन सी रहती है ये बस्ती फिर क्यों,
हर चेहरा यहां अजनबी सा लगता है।
ना इश्क में ठोकर खायी है मैंने,
ना ही ना-उम्मीद हुआ हूँ जिन्दगी से,
फिर क्यों इस शहर की महफिल में भी,
हर पल दिल तन्हा-तन्हा रहता है।

गमों की आंच पर आंसु उबालकर देखो,
बनेगें रंग चटकीले, किसी पर डालकर देखो,
तुम्हारे दिल की चुभन भी जरुर कम होगी,
किसी के पांव का कांटा निकाल कर देखो।

सुबह की सूरत भी देख ही लेंगे,
अंधेरे के साये अब ढ़लने जो लगे हैं।
इतना गुरुर खुद पर करते नहीं मगर,
दीये की तरह हम अब जलने तो लगे हैं।

दर्द बनकर पिघल रहा हूँ मैं,
गीत ग़जलों में ढ़ल रहा हूँ मैं,
उनकी फितरत बदल नहीं सकती,
अपनी आदत को बदल रहा हूँ मैं।

सारा ज्ञान मिला मोहे जग से,
तुहिं एक पास न होय।
नाम तेरा जब दिल ने जाना,
अब ज्ञान बचा ना कोय।।

लाख उठा करे हर मौज के सीने में भंवर,
पर किनारा है कि बढ़ता ही चला जाता है।
आंधियां आये या मंजिल पर छा जाये अंधेरा,
कांरवा है कि गुजरता ही चला जाता है।

खामोशियां ही महफिल की सोजो-साज होती हैं,
कि मेरी बेजुबानी ही मेरी आवाज होती है।
यहां पे प्यासा रहकर ही मैं जश्ने-जाम बनाता हूँ,
इस महफिल में आकर बिन पिये ही झूम जाता हूँ।

चन्द पंक्तियां...


दो..
मेरे सीने में आहें सिसकती रही,
मैं जमाने को नगमें सुनाता रहा।
मेरे घर में भरा था अंधेरा मगर,
मैं दिये रहगुजर के जलाता रहा।

कौन कहता है निभाने के लिए होते हैं,
वायदे तो सिर्फ लुभाने के लिए होते हैं।
ख्वाब देखों मगर ख्वाब की ताबीर न पूछो,
ख्वाब तो सिर्ए रिझाने के लिए होते हैं।

बिखरती रेत पर किस नख्स को आबाद रखेगा,
वो मुझको याद रखे भी तो कितना याद रखेगा।
पलट पर भी नहीं देखी तेरी ये बेरुखी हमने
भुला देंगे तुझे ऐसे, की तू भी याद रखेगा।

अदना सा आदमी होने का फर्ज अदा करता हूँ,
फिर क्या दर्द में रोने पर भी कोई गुनाह करता हूँ।
ऐसे तो न रगड़ों नमक मेरे जख्मी जज्बातों पर,
दिन भर की सांस लिये ही मैं घर से निकलता हूँ।

यकीं हैं मुझे खुद पर कि तेरा दीदार होकर रहेगा,
तेरा दिल भी मेरे दिल पर निसार होकर रहेगा,
कब तलक यूँ ही झुठलाती रहोगी खुद को....
एक दिन तुम्हें भी मुझसे प्यार होकर रहेगा.......

मुद्दत से कोई गम पास नहीं है,
तन्हाई का भी कोई अहसास नहीं है,
अकेले ही जब आये हैं दुनिया में,
फिर क्यों गिला करें...
कि कोई मेरे साथ नहीं है।

बने अजनबी सभी हमसफर और नजर चुरा कर गुजर गये,
मैं रास्तों से रहा बेखबर और उन्हें मंजिलों का सुरुर था।
फकत आदतों के थे तकाजे, जो दिलकशी में बदल गये,
कि उन्हें पसंद थी शोखियां और मुझे सादगी पर गुरुर था।

हम हाथों को देखते हुए ये सोच रहे हैं,
कि अब ये जिन्दगी किसके नाम करें ।
उसके नाम, जो दिल की धड़कनों मे हैं,
या फिर उसके, जो हाथों की लकीरो में हैं ।

"लिपट कर अपनी तन्हाई से जागता रहता हूँ मैं,
तमाम रात किसी की याद मुझे सोने नहीं देती,
उसकी कोई मासूम सी शरारत जब याद है आती,
उदास तो कर जाती है पर रोने नहीं देती...।"

झूठी तारीफ की बातों से हम दूर ही सही,
जब लफ्ज ही उगलना है तो मिलावट कैसी।
जो सोचिये वो कहिए इसमें बुरा क्या है,
केवल वो ही हैं हमारे ये हकीकत तो नहीं।

लम्हों में जो कट जाये वो क्या जिन्दगी,
आंसुओं में जो बह जाये वो क्या जिन्दगी,
जिन्दगी का तो फलसफा ही कुछ और है,
हर किसी की समझ में आये वो क्या जिन्दगी।” 

तुम याद आये बहुत...


आंखों में सपने सजायें बहुत,
तुम हमकों याद आये बहुत,
हर पल रहा तेरी यादों का पहरा,
दिल है बस तेरी ही बात पर ठहरा।

आज भी बस तू ही तू चल रहा,
नहीं कोई और इस जी को जंच रहा,
कब तक आखिर तेरी ही बातें रहेंगी,
ये सोचकर भी मन ना तूझसे खींच रहा।

तेरी यादें भी तुझसी बड़ी ढ़ीठ है,
तू आती नहीं, तेरी याद जाती नहीं,
तुझको बुलाना और यादें मिटाना,
अब तो दोनों ही हमारे बस की नहीं,

तुझको भूलाने के पैतरें आजमाये बहुत,
कुछ ना कर सके तो खुद को तड़पाये बहुत,
पर तेरा ख्याल जो दिल से जाता नहीं,
इस कुफ्त में खुद को गरियायें बहुत,
पर सच है यही कि..
भुलाने की जिद में भी तुम याद आये बहुत।

तो बात बने...


अपना घर-बार हो तो बात बने,
दुनिया में भरा हो प्यार तो बात बने,
अपना पर्व-त्यौहार हो तो बात बने,
हो अपना भी अधिकार तो बात बने,
ना हो सिर्फ संस्कारों का भौंडा प्रदर्शन,
अब सच्चा सम्मान हो तो बात बने,
गुल जो गुलशन में खिलाए हैं देखे,
उन पर भी कोई खार हो तो बात बने,
शौक-ए-आवारगी भर नहीं अपनी,
रोजी-रोजगार हो अपना तो बात बने,
प्रेम-पत्रों को तो कब से पी के बैठे हैं,
अब अपना अखबार हो तो बात बने।

मंगलवार, 1 मई 2012

वो ही सपने....


देखे जो खुले दिल से सपने, वो ही रहे बस अपने,
कि अब भरोसे के दम पर लहरा रहा उम्मीदों का आंचल,
पतंगों की रंगों में होके सराबोर, रौशनी सी जो उमड़ाई रहती है,
अब तो दिखने लगे हैं अंबर से ऊंचे वो ही सपने....

सूरज की किरणें भी हमकों थकाती, हर ख्वाब आंखों से दूर भगाती,
पर नशा आखों में कुछ यूं है समाया, मैं ख्वाब पूरा करने ही आया,
नहीं देखता मैं जहां की मुसिबत, बस चलते रहना है मेरी हकीकत,
अब तो लगने लगे हैं सब रस्तें ही अपने....

खुद को ढूंढ़ा है मैंने भरी भीड़ में, भटकता रहा हूं सदा क्षीण में,
अब जाना है अपने हालात को, पहचाना है जंगी सवालात को,
किस घड़ी, किस दिशा में कदम हैं बढ़ाना, है बस मुझे दूर जाना,
अब तो तपने लगे हैं आंखों के वो ही सपने....

मेरी मंजिल का चेहरा नया हो गया है, नया ही अब सिलसिला हो गया है,
हमसफर बन गया है जो हौंसला मेरा, थोड़ी दूर रह गया है ठिकाना मेरा,
अब तो मंजिल की मुझको महक आ रही, जीत के विश्वास की लहर छा रही,
अब तो बहने लगे हैं हकीकत में वो ही सपने... 

याद...

ये याद ही तो याद है,
कि हर याद में तू याद है।

जिस याद में तू याद नहीं,
वो याद भी क्या कोई याद है।

ये जो याद-याद का है सिलसिला,
इस सिलसिला-ए-याद में...
फकत तू ही तू बस याद है।

परछाई...

परछाईयों की शक्ल भी कोई देख पाया है,
ये तो चिरागों के साथ ही हमसे जुड़ जाता है।

ना चाहता है कुछ भी, ना बोलता कभी,
बस साथ चलता और फिर हममें सिकुड़ जाता है।

कौन कहता है कि इनसे ना नाता हमारा,
देता सहारा जब दुनिया-जहां हमसे बिछुड़ जाता है।

राहों पर तन्हाईयों के जब भी हम चलते,
संग अपने दूर हर सफर तक जाता है।

अपने मन में भी अब ये छंद उभर आया है,
कि मंजिल कहीं हो, हो सफर कैसा भी...
हर राह पर खामोशियों संग तू साथ जाता है।

आईने का सच...


"नजर मुझसे मिलाकर जब वो भाग जाते हैं,
हो जाता यकीं कि वो कुछ तो छुपाते हैं,
जाने कैसे लोग छुपाने औ चुराने की कला को आजमाते हैं,
दिल में रहता चोर और होठों पर मासूमियत दिखाते हैं।

मुझे अब नहीं लगता कि कोई रखना भी चाहेगा,
मैं सच बोल भी दूँ तो कोई सुनना भी चाहेगा,
चाहिए सबको अपने हिसाब-ओ-पसंद की बातें,
और मुझे बस आंखों को ही जुबां में ढ़ालना आयेगा।

लोग देखते मुझको फिर आगे सरकते हैं,
मैं बाजार की शोभा लिये बरसों से खड़ा हूँ,
मैं आईना हूँ, जो कभी महलों में था सजा रहता,
अब जो फेंका गया हूँ तो टुकड़ो में पड़ा हूँ।

हर हुस्न निहारे हमें और खोजे सुन्दरता अपनी,
कैसे कहूँ कि तू खुश हो जाये..
फकत एक आईना हूँ मैं...
जैसा है तू मेरी आंखों में वहीं नजर आये।

चाहे रख ले बंद दीवारों में, या फिर रस्ते पे फेंक दों,
रहा जो घर में तो खुद को संवारोगे...
पड़ा रहा सड़क पर तो...
शायद दुनिया असलियत देख ले ।।"

फरियादी की पुकार...


"नियमते कुदरत जीवन ये मिला है,
कैसे इसकी चाह को पूरा न करुंगा,
चाहूँगा उम्र सारी तेरी आरजू में कटे,
रहूँ जब अर्थी पे लेटा...
तब भी लब पे तेरा ही नाम रहे।

करुँ हर पल इंसानियत की सेवा,
न एक पल भी बैर की मुझमें आग जले,
हो चाहे वो साथी या दुश्मन का सरमाया,
हर एक से मेरी निभे...
और कुछ कदम वो बन मीत चले।

न चाहा न चाहूँगा कि भव सागर में मैं डुबूँ,
चाहत इतनी की ओंकार धुन बन जहां में गूँजू,
एक रोशनी मुझमें जले, मैं प्रकाश का पुंज बनू,
जब अंधेरा हो जाये संसार में तो...
एक ज्योत बन दुनिया में हर पल जलूँ।

चाहतों की लम्बी फेहरिस्त नहीं अपनी,
बस जब कभी आरजू में लब खुले,
एक राम धुन के सिवा न कुछ गनू...।।"

मजदूर का सच




"हमें आदत नहीं किसी का बोझ उठाने की,
ये जरुरत है जो धूप में जले जा रहा हूँ।

न थकना, न हारना सीखा है मैंने,
ये तो जिन्दगी का कर्ज है, जो चुकाये जा रहा हूँ।

इस भूख ने ही दी है ताकत जहां से लड़ने की,
भूख ही है, जिसके लिए खून को पसीने में बहाए जा रहा हूँ।

मैं पथिक हूँ उस मंजिल का, जो मेरे घर में खुशियां ला दे,
जले रोज मेरे घर का चूल्हा, इस उम्मीद में...
हर रोज खुशियों की मंजिल तलाशे जा रहा हूँ ।।"

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