शनिवार, 16 जून 2012

पिता...


"होती है मां घर की आत्मा जरुर,
पर ओढ़ दृढ़ता का आवरण रक्षक बनता है पिता।

अश्रुओं का सागर बच्चों के लिए रखती है मां,
तो संयम का नया पाठ पढ़ाता है पिता।

बच्चों की एक आह पर दौड़ती है जहां मां,
वहीं फर्स्ट-एड का डिब्बा पकड़ता है पिता।

माना बच्चों की भूख पर रोटी खिलाती मां,
उसे लाने की खातिर तो परिश्रम करता है पिता।

नहीं कहता मां से बेहतर पिता होता हैं,
कि दोनों की छांव में बच्चा पल-बढ़ कर है जीता।

मां सह देकर कहती ना करना गलती तू,
पर ठेठ अंदाज में बच्चों को सुधारता है पिता।

थोड़ा गुस्सा थोड़ा प्यार अंदाज यही पिता का,
पर जाने क्यों फिर मन ही मन रोता है पिता।


ना रोकता ना टोकता, बच्चों की ख्वाहिश पे जीता,
बच्चे ना पकड़े गलत रस्ता, ये ध्यान रखता है पिता।

कभी उभरते जज्बात कभी डांट का भरम बनाये रखते हैं,
अपने ही अलग-अनूठे अंदाज में अनबूझ पहेली हैं पिता।

चाहे जैसा भी कह लो उनको, गुस्सैल-नरम या जज्बाती,
पर बच्चों की खातिर नाजुक दिल संग सख्त धड़ हैं पिता।"

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