हे राष्ट्रोन्यायक, हे परम तपस्वी,
जन-जन के वाणी के संबल।
हे अन्त्योदय के प्रखर पुंज,
करते हैं तेरी हम जय जय।।
तुम स्थिरता, उद्वेग तुम्हीं हो,
इस जीवन का तेज तुम्हीं हो।
यह अटल भाग्य हम सबका है,
हमको जो मिला संस्कार अटल।।
जीवन की थाती देने को,.
आये तुम पृथ्वी पर हो विह्वल।
देश गढ़ा है जीत दिलों को,
यह सकल विश्व अनुगामी है।
हे वाक प्रखर, हे कालजयी,
तुम सा न कोई बलिदानी है।।
अजर रहे तूं.. अमर रहे,
युगों-युगों तक प्रवर रहे,
शब्द तुम्हारे कण-कण गूंजे,
तूं पर्वत सा सदा अटल रहे।।

आपकी कविता में श्रद्धा, सम्मान और राष्ट्रभाव का सुंदर संगम दिखाई देता है। हर पंक्ति आदर और प्रेरणा का भाव लेकर आगे बढ़ती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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