गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

मैं घर का मर्द था..


हर अधूरे ख्वाब की उम्मीद था मैं,
हर खुशी, हर चाह का पाबंद था मैं,
मैं ख्वाहिशों की हिट लिस्ट में दर्ज,
सभी की विश पूरी करने को जर्द था..
क्योंकि मैं घर का मर्द था...

रोती आखों को हंसाना था,
हर रुठे दिल को मनाना था,
खुशियां बांटकर अपनों में,
मुझे हरपल चलते जाना था,
क्यों... क्योंकि मैं घर का मर्द था...

मेरे गम मेरी आंखों से बहे ही नहीं,
कदम लड़खड़ाए जरूर पर थमे ही नहीं,
मजबूरियां-कमजोरियां मेरे किरदार के लिए नहीं,
हक की बातें पढ़ी अक्सर, पर कभी कही ही नहीं,
क्योंकि मैं ही तो घर का मर्द था...

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

यह अटल भाग्य हमारा...



हे राष्ट्रोन्यायक, हे परम तपस्वी,
जन-जन के वाणी के संबल।
हे अन्त्योदय के प्रखर पुंज,
करते हैं तेरी हम जय जय।।

तुम स्थिरता, उद्वेग तुम्हीं हो,
इस जीवन का तेज तुम्हीं हो।
यह अटल भाग्य हम सबका है,
हमको जो मिला संस्कार अटल।।

जीवन की थाती देने को,.
आये तुम पृथ्वी पर हो विह्वल।
देश गढ़ा है जीत दिलों को, 
यह सकल विश्व अनुगामी है।
हे वाक प्रखर, हे कालजयी,
तुम सा न कोई बलिदानी है।।

अजर रहे तूं.. अमर रहे,
युगों-युगों तक प्रवर रहे,
शब्द तुम्हारे कण-कण गूंजे,
तूं पर्वत सा सदा अटल रहे।।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

कुछ ऐसे दोस्त जरूरी हैं...

कुछ ऐसे दोस्त जरूरी हैं...
अल्हड़ बातों पर व्यस्त रहे, दिन-रात चराचर मस्त रहे.
जो दौड़ पहाड़ों पर चढ़ जाए, समतल पर जो ढंगला जाए.. 
कुछ ऐसे दोस्त जरूरी हैं...

आंखों में जिनके पानी हो, खुशियां मन में धानी हों..
जो गौरव का आभास धरें, जीवन में हर्षोल्लास भरे..
कुछ ऐसे दोस्त जरूरी हैं...

जिनका आना-जाना संकट सा हो, ना आना और विकट सा हो..
मिलकर जिससे मन रम जाए, 
झगड़ें रोज भले जिससे, फिर पल में सब सुलझ जाए..
कुछ ऐसे दोस्त जरूरी हैं...

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हिंदी...


हिंदी उमंग है, भाव में मलंग है..
एकता का सार है, विशुद्धता प्रमाण है..
हिंदी सत्संग है...

सपना हो, कहानी हो, या यादें पुरानी हो,
दुख की कोई बेला हो, या व्यक्ति अकेला हो
हर पल ये संग है.. 

जीवन के हास में और परिहास में..
घात-प्रतिघात में, आस-विश्वास में..
हिंदी सर्वांग है..

शब्द हो, बकार हो, मौन श्रृंगार हो..
अभिव्यक्ति का चाहे जो भी प्रकार हो...
हिंदी उतंग है...

गद्य है.. पद्य है.. भावों में व्यंग्य है...
देखता हूँ अब जहां, इसका अपना ही ढ़ंग है..
हिंदी नवरंग है...
#आkash

सिर्फ तुम...


कुछ ख्वाब सरीखे आंखों में, 
फिर समझौता रात से कैसे हो।
कुछ बातें तेरी मिश्री सी, 
फिर लब पर कटुता कैसे हो।

दिनभर मन में तुम रहते हो,
हर पल ख्याल तुम्हारे आते।
फिर तुम बिन मेरे जीवन में,
धड़कन का संभलना कैसे हो। 

जब बाहर-बाहर खुश रहता हूँ,
फिर अंदर उथल-पुथल कैसे हो।
मान लिया तुम्हें प्रीत की मूरत,
तुम अंतरमन में मंदिर जैसे हो।
#आkash

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

डोप का डंक...

किसी भी खेल के लिए सबसे जरूरी बात होती है उसके प्रति खिलाड़ियों का समर्पण। खिलाड़ी जब अपने पूरे समर्पण और निष्ठा के साथ खेल को आत्मसात करता है तभी वह खेल के हर पहलू का लुत्फ उठाता है और सफलता की इबारत भी गढ़ता है। खेलों के महाकुंभ 'ओलंपिक' को लेकर तो खिलाड़ी इतना उत्साहित होता है कि उसके लिए पदक से ज्यादा बस उसमें सहभागिता की बात ही उसे रोमांचित कर देती है। ऐसे में अगर किसी खिलाड़ी को किसी भी वजह से ओलंपिक से दूर किया जाए तो उसकी मनोदशा को समझना ज्यादा कठिन ना होगा।
ओलंपिक खेलों के लिए देश का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम में स्थान मिलने के बाद भी ओलंपिक जाने को लेकर संशय की स्थिति खिलाड़ी के आत्मविश्वास को पूरी तरह झंकझोर देती है। ऐसा ही कुछ मामला रियो ओलंपिक 2016 के शुरू होने से ठीक पहले घट रहा है। भारत की ओर से ओलंपिक में पदक की उम्मीद बने पहलवान नरसिंह यादव डोप टेस्ट में फेल पाये गये हैं। उन पर प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का आरोप लगा है। ऐसे में नरसिंह के रियो ओलंपिक जाने को लेकर फैसला अब भी लंबित है। इसी प्रकार शॉट पुटर इंदरजीत सिंह का '' सैंपल भी डोप टेस्ट में पॉजीटिव पाया गया है।
डोप के इस डंक से जहां खिलाड़ियों का मनोबल प्रभावित होता है, वहीं देश की गरिमा पर भी कलंक लगता है। ऐसे में रियो ओलंपिक में भारत की मेडल जीतने की उम्मीदों को सबसे बड़ा झटका लगा है।
डोपिंग को लेकर खेल और खिलाड़ी पर अक्सर संदेह के बादल छाये रहते हैं। आम तौर पर एक खिलाड़ी का करियर छोटा होता है। अपने सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में होने के समय ही खिलाड़ी अमीर और मशहूर होना चाहता है। इसी जल्दबाजी और शॉर्टकट तरीके से पदक (मेडल) पाने की भूख में कुछ खिलाड़ी अक्सर डोपिंग के जाल में फंस जाते हैं। मगर भारतीय खिलाड़ियों के साथ ऐसा कुछ है या नहीं, इसका जवाब तो मामले की जाँच के बाद ही सामने आ सकेगा।
जहां तक बात इंदरजीत सिंह की है... रियो के लिए क्वालीफाई करने वाले सबसे पहले एथलीट्स में से थे। वो एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड, एशियन ग्रां प्री और वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में जीत हासिल कर चुके हैं। इंचियोन में इंदरजीत सिंह ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था। कंधे की चोट के बावजूद इंदरजीत सिंह ने इंडियन ग्रां प्री में दूसरा स्थान हासिल किया था। यह विडंबना ही होगी कि इतने मौकों पर भारत का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ी की वजह से ही आज खेल के वैश्विक स्तर पर भारत की फजीहत हो रही है। ऐसा ही कुछ पहलवान नरसिंह यादव के साथ भी है। ओलंपिक में भारत के लिए कुश्ती का स्वर्ण पदक जीतने का सपना संजोने वाले नरसिंह को डोप का ऐसा डंक लगा कि अब वो पदक तो दूर सहभागिता मिलने की आस लगा रहे हैं।
डोप मामले में फंसे खिलाड़ियों को लेकर केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने स्पष्ट किया है कि दोनों खिलाड़ियों को अस्थायी तौर पर निलंबित किया गया है। अगर नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी का पैनल उन्हें दोषमुक्त करार देता है तो वे रियो ओलंपिक में हिस्सा ले सकते हैं। फिलहाल अस्थायी निलंबन के कारण ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व अब 118 खिलाड़ी करेंगे। बता दें कि पहले रियो ओलंपिक के लिए भारत ने 120 खिलाड़ियों का दल तैयार किया था।
डोपिंग की यह बीमारी केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में फैली हुई है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय खेल पंचाट ने डोपिंग को लेकर रूस की अपील खारिज कर दी, जिससे रूस की ट्रैक और फील्ड टीम रियो ओलंपिक में भाग नहीं ले सकेगी। यहां तक कि बीजिंग ओलंपिक 2008 के 23 पदक विजेताओं समेत 45 खिलाड़ी पॉजीटिव पाए गए। जाँच का परिणाम ये है कि बीजिंग और लंदन ओलंपिक के नमूनों की दोबारा जांच में नाकाम रहे खिलाड़ियों की संख्या अब बढ़कर 98 हो गई है।
वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक खेलों में भी डोप के 26 मामले सामने आए। इससे पहले इतने खिलाड़ियों पर कभी भी डोपिंग का आरोप नहीं लगा। इन 26 खिलाड़ियों में से छह को पदक मिले थे। दो तो स्वर्ण पदक विजेता थे। बहरीन के राशिज रमजी के खून में तो ईपीओ तक पाया गया। ईपीओ से लाल रक्त कणिकाएं बढ़ जाती है और शरीर क्षमता से तेज काम करता है। इसके बाद रमजी से उनका स्वर्ण पदक छीन लिया गया।
डोपिंग के हालिया मामले और भारतीय खिलाड़ियों पर लगे आरोपों के बीच भारतीय प्रशंसकों की उम्मीद अब भी यहीं है कि दोनों खिलाड़ी नरसिंह यादव और इंदरजीत सिंह रियो जाएंगे। आखिर ऐसी उम्मीद हो भी क्यों ना.. जिस खिलाड़ी पर देश के लिए पदक जीतने का भार हो वो भला खेल दूर रहे तो किसे नहीं अखरेगा। खैर, खेल संघों की जाँच के जवाब पर ही यह तय होगा कि नरसिंह और इंदरजीत रियो में भारत का मान बढ़ाते हैं या डोप का डंक देश की गरीमा को लांछित करेगा।
    -आकाश कुमार राय

सोमवार, 13 जून 2016

बनारस ! तू मेरा प्यार है..

आज जो लौटा अपने बनारस तो लगा की जान में जान आई है... खुद से खुद का तार्रूफ कराने का सा अहसास हुआ। लगा कि मैं फिर से जी गया.. अपने शरीर में ही मूर्छित सा मैं था अब तक.. जो बनारस की मिट्टी को छुआ तो लगा जैसे संजीवनी मिली..।

कैंट से विद्यापीठ, सिगरा, रथयात्रा और भेलूपुर का रास्ता... इस कदर लोगों से खचाखच भरा था.. मानो मेरे आने की भनक से ही सब इकट्ठे हुए हों... मेरे ही स्वागत को जुटे हैं लोग... बेशूमार भीड़, गांड़ियों की पों-पों, कहीं मधुर शब्दों में भो....ड़ी का जोरदार उच्चारण... ये सब स्वाद सिर्फ बनारस ही दे सकता है... भले ही विकास के खांचे में कोई शहर कितना भी आगे निकल जाए मगर वो एक बनारसी को नहीं लुभा सका, तो उसका विकास बे-स्वाद सा लगता है...

आगे जब भेलूपुर चौराहे से विजया सिनेमा (जो अब आईपी विजया है) की ओर मुड़ा तो बाहें फैलाये शहर की सड़कें.. मेरा आलिंगन करने को बेताब दिखी... बनारस लौटकर आने से बड़ा सुख कोई नहीं..

लौंटा जो शहर में, तो यूं ही सारी पुरानी यादें अचानक मेरे जहन में कौंध गईं.. यहीं तो थीं वो सड़कें जहां बचपना खेल में बीता। इन्हीं गलियों में यारों-दोस्तों के बीच सारे त्यौहार मने..। आज सब कुछ वैसा है पर बस इन सब में मैं ही दूर हूँ.. एक यात्री की तरह बस शहर में घूमने आता हूँ.. या यूँ कहो कि शहर से दूर जितने पाप कमाता हूँ उन्हें ही काटने आता हूँ। बनारस मीलों में जरूर दूर हैं मगर जज्बातों और खयालों में ये मेरे साथ-साथ है..

सोनारपुरा, केदारनाथ गली, दशाश्वमेध, शिवाला और अस्सी ये वो स्थान हैं जिनका बखान किए बिना बनारस को मेरे नजरिए से नहीं जाना जा सकता। इन जगहों का ये आलम है कि यहां की हवाओं में महबूब की सी खुशबू आती है.. पता है, ना अब वो दिन हैं, ना ही उन दिनों की सी कोई बात.. मगर मेरी कल्पना ही सही.. यहां की गलियों में, घाटों पर आज भी यादों का वो जमघट मिल जाएगा। सोच तो ये भी है कि घाटों की सीढियां, गंगा की लहरें और मन्दिर की घण्टियाँ ये उन यादों से ही तो अलंकृत हैं... ये शोर आध्यात्म का, मेरे लिए शहर का प्रेम ही तो है.. शहर बदल गया है और लगातार बदल भी रहा है.. मगर शहर का हर कोना पुरानी यादों से लिपटा है, जो बता रहा है कि मैं आज भी यहां की फिजाओं में कहीं बसा हुआ हूँ।

बनारस.. जिसकी सोच ही व्यक्ति को पावन कर दे.. उस शहर को दिल-ओ-दिमाग में संजोए रखने वाला मैं किसी तीर्थ यात्री से कम थोड़े ही हूँ। बाबा भोलेनाथ, काल भैरव महाराज, संकटमोचन हनुमान जी और मां दुर्गा का मंदिर.. ये वो स्थान हैं जहां से मेरी हर यात्रा का प्रारम्भ हुआ और मेरे हर सफर का पड़ाव भी यहीं इनके चरणों में निमित्त रहा... इतनी अनुकम्पाओं के बाद भी बनारस तेरी कमी उस दिन खूब अखरती है जब मेरे माथे पर तिलक करने वाला कोई नहीं होता.. मैं शहर से दूर विकास की घटनाओं में घुटा सा जी रहा होता हूँ.. मेरे सूने से माथे पर ना मां के हाथ थाप देते.. और ना ही महादेव के नाम पर चंदन तिलक लगाने का सुख मिलता.. हां, सरे राह पंडित जी मिलते हैं माथे पर तिलक लगाने का कोरम भी पूरा करते हैं... बस इसी अहसास को पावन मानकर खुश हो लेता हूँ कि तू नहीं तेरा नाम सही.. माथे पर चंदन लगने के इस एक सोच से ही मेरी थकान को भी आराम मिलता है.. फिर तेरी ही याद का सुरूर लिए तेरा ये घुमक्कड़ सा आवारा बाशिंदा अपनी निगाहों को आराम देता है, कि कल फिर जब ये जगेगा तो सुबह-ए-बनारस से शहर को छानता हुआ शाम के पहर मां गंगा की आरती से तृप्त होगा।

बनारस शहर में....

"आया हूँ बनकर सन्देश मैं पावन से शहर में,
फिरता हूँ आजकल यहां गलियों के भंवर में।

फूलों सी गमकाई खुशबू भी अब साथ है अपने,
कि बड़ी सादगी के जीया हूँ इस सनातन शहर में।

यहां लोग सभी अपने ना है कोई पराया,
सुख-दुख का है साया रहा हरदम ही सफर में।

हो ना यकीन तुमकों तो कभी आ जाओं घर मेरे,
अल्हड़ सी मस्ती लिये फिरते, सब बनारसशहर में।"

शनिवार, 7 मई 2016

भयावह ख्वाब...

आज फिर डर गया विभत्स्य ख्वाब देख कर,
कि मेरी कलम थी टंगी..
साहूकार के यहां चंद सिक्कों के दाम पर।
फिर क्या,
हांथ भींचे, आंख मीचे, झट से मैं तो उठ गया।
इस ख्वाब की ताबीर पर भी, आंसू भर-भर रो गया।

है क्या इसमें हकीकत ये तो केवल ख्वाब था,
पर इस कल्पना ने ही खयाल सारे धो दिये।
ख्वाब थे पाले मैंने भी क्या, खूब नाम कमाउंगा,
इस शब्दलोक की भूमि पर, धन-धान्य जुटाउंगा।

ख्वाब टूटे, हांथ छूटे, जग सारा बैरी हो गया,
होकर निराश मन, मैं शून्य व्योम में खो गया।
चाह थी जो बसी उच्च शिखर पर जाने की,
उसमें थोड़ी फांस गड़ी और कलम चिरंतन सो गया।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे...

भारतएक शब्द नहीं बल्कि वह भाव है जो देशवासियों के दिलों में देशप्रेम और राष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा और समर्पण का संचार करता है। यह राष्ट्रप्रेम की भावना ही है कि हम आधुनिकता के इस दौर में भी कहीं न कहीं अपनी संस्कृति, नैतिक मूल्यों, परंपराओं व परिवारों को जोड़ कर रखे हुए हैं। यही कारण है कि हमारे संस्कार आज भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की परिकल्पना को संजोये हुए हैं उसमें राष्ट्र प्रथम सर्वोपरि है। प्राचीन काल हो या आज का दौर जब भी कभी राष्ट्र के ऊपर किसी भी तरह का संकट उभरा है तो सभी देशवासियों ने एक स्वर में एकजुटता का परिचय देते हुए उसका सामना किया है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियशिइस बात की परिचायक रही है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं.. पुराणों में निहीत यह सत्य आज भी युवाओं तक पहुंच रहा है तभी तो देश के सम्मान की बात आते ही 'तन समर्पित.. मन समर्पित.. और यह जीवन समर्पित...' की भावना लिए आज का युवा अपना सर्वस्व न्यौछावर करने तैयार हैं।
वैसे भी भारत युवाओं का देश है और यहां विश्व की सबसे अधिक उर्जा होने के कारण सबकी नजरे भारत पर टिकी हैं। ऐसे में यह अतिआवश्यक हो जाता है कि भारत का युवा अपनी जिम्मेदारियों को भलीभांति समझे और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन करे। विकास के इस पायदान पर युवा कितना भी आगे निकल गया हो लेकिन कहीं न कहीं उसके दिल में अपनी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान परम्पराओं को लेकर आज भी जुड़ाव है। राष्ट्र के प्रति उसके मन में एक उमंग है, समाज के प्रति उसके दिल में एक संवेदना है। तभी तो हम गर्व से कहते हैं कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.... लेकिन यह भाव स्थाई रूप से सदैव बना रहे और देश की तरक्की में खुद का योगदान सुनिश्चित हो सके इसके लिए कर्तव्यों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना पड़ेगा। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखे..
वैसे देखा जाए तो राष्ट्र प्रेम की भावना के साथ पले-बढ़े देशवासियों खासकर युवाओं में राष्ट्र प्रथम का भाव हमेशा रहता है। जो उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में राष्ट्र सर्वोपरि की भावना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। ऐसे में अगर शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो उच्च शिक्षा के नाम पर विदेशों में पढ़ने वाले छात्र अपनी शिक्षा पूरी कर स्वदेश में ही रोजगार पायें अथवा अपनी मातृभूमि पर कोई नया उद्योग-धंधा चलाये तो यह कदम देश के विकास में मददगार ही होगा। साथ ही देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और कुछ अन्य युवाओँ में बेरोजगारी का ग्राफ भी नीचे गिरेगा।
ठीक इसी प्रकार, सामाजिक, राजनीति और सांस्कृति परिक्षेत्र में भी युवाओं की भूमिका को राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ परिलक्षित किया जाये तो वह देश के मान-सम्मान में चार-चांद ही लगाएंगे। जिस प्रकार भारतीय संस्कृति का प्रचार विदेशों में हो रहा है उससे कितने ही देश हैं जो हमारी पारंपरिक रीति-रिवाजों को जानने और समझने का प्रयास कर रहे हैं। कितने ही देश हैं जो हमारी सभ्यता पर शोध कर रहे हैं, काफी लोग हमारी संस्कृति को एक अलग और रुचिकर तौर पर देखते हैं और इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं। यह सब दर्शाता है कि राष्ट्र प्रथम का भाव किस प्रकार देशवासियों में समाहित है जो अपनी संस्कृति और सभ्यता का चाहे-अनचाहे, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। जिसके बल पर हमारा देश विश्वपटल पर अपनी खूबियों के साथ उभर रहा है।
देश में हुए कई बड़े आंदोलनों में युवाओं ने रचनात्मक भूमिका निभाई है, जिसका सकारात्मक प्रभाव देश के सामाजिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य पर भी पड़ा। मगर वर्तमान में कुछ युवा आंदोलन उद्देश्यहीनता और दिशाहीनता से ग्रस्त होकर भ्रमित हो गये। जिसका परिणाम यह हुआ कि देश के आधार स्तंभ कहलाने वाले युवा देश के खिलाफ खड़े होते दिखे। ऐसे में कोई शक नहीं कि यदि समय रहते युवा वर्ग को उचित दिशा नहीं मिली तो राष्ट्र का अहित होने एवम् अव्यवस्था फैलने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में देश कुछ ऐसी स्थितियों से जूझ रहा है जिसमें देश के कुछ युवाओं को मोहरा बनाकर चंद सेकुलर व वामपंथी दल अपने स्वार्थ को साधने का काम कर रहे हैं। देश की अखंडता और एकता को प्रभावित करने के मंसूबे को लेकर काम करने वाले कुछ संगठनों के खिलाफ 'राष्ट्र प्रथम' के भाव के साथ पूरा देश एकजुट हैं.. लगातार इन देशद्रोहियों का प्रतिकार किया जा रहा है। ऐसे में जरूरत है कि युवाओं को स्वऔर परका बोध कराते हुए यह निश्चित किया जाए कि उनके मन-मस्तिष् में 'राष्ट्र प्रथम' का भाव प्रतिपल समाहित हो। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाये कि उनके विचार किसी बाह्य शक्तियों द्वारा प्रभावित ना किया जा सके। ऐसे में जिस दिन प्रगतिशील भारत के प्रगतिशील युवा इस बात को अच्छी तरह समझ लेंगे उस दिन भारत को विश्व गुरुबनने से कोई रोक नहीं पायेगा। लेकिन भारत को 'विश्व गुरु' बनाने दिशा में जरूरी होगा कि 'राष्ट्र प्रथम' की भावना के ओत-प्रोत युवाओं का सही मार्गदर्शन किया जाये।
     - आकाश कुमार राय
   [लेखक राष्ट्रीय छात्रशक्ति पत्रिका के संपादन मंडल सदस्य हैं।]

कैसे करूं...

तेरे बिना मैं कोई फैसला कैसे करूं,
टूट चुका हूँ अब हौसला कैसे करूं।

सोचा नहीं कभी तेरे बिन भी होगी जिंदगी,
अब खुद को भला तुझसे जुदा कैसे करूं।

दिल से चाहा तुझे तो गुनाह कर दिया,
मुकर्रर खुद को इस गुनाह की सजा कैसे करूं।

हो सके तो तू ही कर दे मेरे दिल का फैसला,
मैं फिर तुझी से तुझ को पाने की दुआ कैसे करूं।

सोमवार, 14 मार्च 2016

तुम मेरी हर बात में रहो...


"सुबह रहो, शाम रहो और रात को रहो,
तुम हर वक्त मेरी हर एक बात में रहो।
मुझको डराती हैं ये वक्त-बेवक्त की आंधियां,
तुम हर घड़ी, हर पल बस मेरे साथ में रहो।
गर कभी बिखरू, तो भी कोई गम नहीं मुझे,
संभलू जो गर कभी तो तुम्हीं याद में रहो,
ये तन्हाइयां-रुसवाइयां मुझे कब तक सताएंगी,
मैं सब सहूंगा, जो तुम सिलसिला-ए-मुलाकात में रहो।"

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

कौन...


चुप-चाप खड़े हैं हम दोनों, सवाल यही कि बोले कौन ?
बीच हमारे घोर खामोशी, चुप्पी के कान मरोड़े कौन ?

सर-सर बह रही हवाएं, कानों से मफलर खोले कौन ?
शब्द फंसे सब मुख के अंदर, सन्नाटे को तोड़े कौन ?

कटुता इतनी भरी है हममें, मिसरी सी बातें घोले कौन ?
लाख मानू सब अवगुण मेरे, तुम गुणवान ये बोले कौन ?

माना ओस की बूंदे शीतल, उससे प्यास बुझाये कौन ?
रेत भी गीली पानी से पर, रेत के कपड़े निचोड़े कौन ?

तन की पीड़ा ढ़ुलक के कटती, मन के मर्म को जाने कौन ?
जो ख्वाब सलोने भ्रम हैं फिर भी, नींद से नाता तोड़े कौन ?

रंग भी ले-लू फूलों से पर, धनुष इन्द्र के सजाये कौन ?
लक्ष्य रखे 'आकाश' से ऊंचे, मन को धैर्य जताये कौन ?

मुख तेज, ओज माथे पर है... फिर चंदन तिलक लगाये कौन ?

जब मां मेरी है घर पर बैठी, बिन आशीष जग जिताये कौन ?

मैं बस कागजों पर अहसास लिखता हूँ..


ना कवि, ना लेखक, ना ही इतिहासकार हूँ...
जीवन है अबूझ पहेली, उसके कुछ पल लिखता हूँ..
ना लिखता हूँ शायरी.. ना दोहों की करता बातें..
गुजरे उम्र का.. कागजों पर अहसास लिखता हूँ।

यादों के मर्म की बस.. कुछ बात लिखता हूँ..
कुछ उलझे हुए से अपने हालात लिखता हूँ..
जीवन उलझा जिनमें वो बेतरतीब सवाल लिखता हूँ..
और फिर कुछ उनके बेवजह से जवाब लिखता हूँ..
.... मैं बस कागजों पर अहसास लिखता हूँ..

जो बिगड़ गयी कुछ बात, उसकी याद लिखता हूँ..
कभी-कभी तुम संग बिते पलों का हिसाब लिखता हूँ..
तो कभी तुम बिन जागती रातों का खयाल लिखता हूँ..
फिर बिन तुम्हारें खाली पलों का मलाल लिखता हूँ..
.... मैं बस कागजों पर अहसास लिखता हूँ..

कुछ हारे कल का पल लिखता हूँ..
कुछ जीत का आने वाला कल लिखता हूँ..
कुछ जीने की आस लिखता हूँ..
कुछ मरे हुए जज्बात लिखता हूँ..

.... मैं बस कागजों पर अहसास लिखता हूँ..

रविवार, 1 नवंबर 2015

सूर्य की उपासना का महापर्व ‘छठ पूजा’


भारतीय संस्‍कृति में त्‍यौहार सिर्फ औपचारिक अनुष्‍ठान मात्र नहीं हैं, बल्‍कि जीवन का एक अभिन्‍न अंग हैं। त्‍यौहार जहाँ मानवीय जीवन में उमंग लाते हैं वहीं पर्यावरण संबंधी तमाम मुद्‌दों के प्रति भी किसी न किसी रूप में जागरूक करते हैं। सूर्य देवता के प्रकाश से सारा विश्‍व ऊर्जावान है और इनकी पूजा जनमानस को भी क्रियाशील, उर्जावान और जीवंत बनाती है। भारतीय संस्‍कृति में दीपावली के बाद कार्तिक माह के दूसरे पखवाड़े में पड़ने वाला छठ पर्व मूलतः भगवान सूर्य को समर्पित है। यह त्‍यौहार इस अवसर पर प्रत्‍यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है। आदित्‍य हृदय स्‍तोत्र से स्‍तुति करते हैं, जिसमें बताया गया है कि ये ही भगवान सूर्य, ब्रह्‍मा, विष्‍णु, शिव, स्‍कन्‍द, प्रजापति, इन्‍द्र, कुबेर, काल, यम, चन्‍द्रमा, वरूण हैं तथा पितर आदि भी ये ही हैं।

छठ पर्व सूर्य की उपासना का पर्व है। वैसे भारत में सूर्य पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही रही है। सूर्य अर्थात सविता की संचित शक्ति का रूप षष्ठी देवी हैं जिन्हें छठी मइया से संबोधित किया जाता है। सविता की शक्तियाँ ही सावित्री और गायत्री माँ हैंजिनसे जीवन की सृष्टि और पालन होता है। सावित्री के पश्चात जीवों के पालन हेतु षष्ठी के दिन ही माँ गायत्री प्रक़ट हुईं। विश्वामित्र ऋषि के मुख से गायत्री मंत्र षष्ठी के दिन ही प्रष्फूटित हुआ था।

पर्व के प्रारम्‍भिक चरण में प्रथम दिन व्रती स्‍नान कर के सात्‍विक भोजन ग्रहण करते हैं, जिसे नहाय खायकहा जाता है। वस्‍तुतः यह व्रत की तैयारी के लिए शरीर और मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया होती है। सुबह सूर्य को जल देने के बाद ही कुछ खाया जाता है। लौकी की सब्‍जी और चने की दाल पारम्‍परिक भोजन के रूप में प्रसिद्ध है। दूसरे दिन सरना या लोहण्‍डा व्रत होता है, जिसमें दिन भर निर्जला व्रत रखकर शाम को खीर रोटी और फल लिया जाता है। इस दिन नमक का प्रयोग तक वर्जित होता है। तीसरा दिन छठ पर्व में सबसे महत्‍वपूर्ण होता है। संध्‍या अर्घ्‍य में भोर का शुक्र तारा दिखने के पहले ही निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। दिन भर महिलाएँ घरों में ठेकुआ, पूड़ी और खजूर से पकवान बनाती हैं। इस दौरान पुरूष घाटों की सजावट आदि में जुटते हैं और सूर्यास्‍त से दो घंटे पूर्व लोग सपरिवार घाट पर जमा हो जाते हैं।

सूर्यदेव जब अस्‍ताचल की ओर जाते हैं तो महिलायें पानी में खड़े होकर अर्घ्‍य देती हैं। अर्घ्‍य देने के लिए सिरकी के सूप या बाँस की डलिया में पकवान, मिठाइयाँ, मौसमी फल, कच्‍ची हल्‍दी, सिंघाड़ा, सूथनी, गन्‍ना, नारियल इत्‍यादि रखकर सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है- ऊँ ह्रीं षष्‍ठी देव्‍यै स्‍वाहा। इसके बाद महिलाएँ घर आकर 5 अथवा 7 गन्‍ना खड़ा करके उसके पास 13 दीपक जलाती हैं। इसे कोसी भरना कहते हैं। निर्जला व्रत जारी रहता है और रात भर घाट पर भजन-कीर्तन चलता है। छठ पर्व के अन्‍तिम एवं चौथे दिन सूर्योदय अर्घ्‍य एवं पारण में सूर्योदय के दो घंटे पहले से ही घाटों पर पूजन आरम्‍भ हो जाता है। सूर्य की प्रथम लालिमा दिखते ही सूर्यदेव को गाय के कच्‍चे दूध से अर्घ्‍य दिया जाता है एवं इसके बाद सभी लोग एक दूसरे को बधाई देते हैं। प्रसाद लेने के व्रती लोग व्रत का पारण करते हैं।

सूर्य की कठिन साधना और तप के इस पर्व में दुख और संकट के विनाश के लिए सूर्य का आह्वान किया जाता है। इस पर्व के संबंध में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कथा यह है कि लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई। जब राम का राज्याभिषेक हुआ, तो राम और सीता ने सूर्य षष्ठी के दिन तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना की। एक प्रसंग यह भी है कि पाण्डवों का वनवास सफलपूर्वक कट जाय इसके लिए भगवान श्री कृष्ण ने कुंती को षष्ठी देवी के अनुष्ठान करने का परामर्श दिया था। शकुनि के प्रपंच से जब पाण्डवों ने अपना सब कुछ खो दिया था, तो धौम्य ऋषि ने द्रोपदी से षष्ठी देवी की पूजा करवायी थी।

मूलतः बिहार और पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के भोजपुरी समाज का पर्व माना जाने वाला छठ अपनी लोक रंजकता के चलते न सिर्फ भारत के तमाम प्रान्‍तों में अपनी उपस्‍थिति दर्ज करा रहा है बल्‍कि मारीशस, नेपाल, त्रिनिडाड, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, हालैण्‍ड, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भी भारतीय मूल के लोगों द्वारा अपनी छाप छोड़ रहा है। कहते हैं कि यह पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा लोक पर्व है जिसमें उगते सूर्य के साथ डूबते सूर्य की भी विधिवत आराधना की जाती है। यही नहीं इस पर्व में न तो कोई पुरोहिती होती है और न कोई आडम्‍बर युक्‍त कर्मकाण्‍ड। छठ पर्व मूलतः महिलाओं का माना जाता है, जिन्‍हें पारम्‍परिक शब्‍दावली में परबैतिनकहा जाता है। पर छठ व्रत स्‍त्री-पुरूष दोनों ही रख सकते हैं।

कष्टों से उबरने की लिए, संतान प्राप्ति के लिए, परिवार के कल्याण के लिए काफी विधि-विधान के साथ छठ मइया की पूजा की जाती है। कठिन उपवास के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को और उगते  सूर्य को गंगा में या जैसी सुविधा हो , तालाब, पोखर ,कुंआ ,या घर के आँगन में जल या दूध का अर्घ्य देकर और सूप में विभिन्न प्रकार के फलों एवं ठेकुआ का प्रसाद अर्पण कर छठ मइया की पूजा की जाती है । वर्ती का चरण-स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। महिला वर्ती के हाथों से सुहागिन अपने माँगों में सिंदूर भरवातीं हैं और अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

भारतीय संस्‍कृति में समाहित पर्व अन्‍ततः प्रकृति और मानव के बीच तादात्म्‍य स्‍थापित करते हैं। इस दौरान लोक सहकार और मेल का जो अद्‌भुत नजारा देखने को मिलता है, वह पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्‌दों को भी कल्‍याणकारी भावना के तहत आगे बढ़ाता है। यह अनायास ही नहीं है कि छठ के दौरान बनने वाले प्रसाद हेतु मशीनों का प्रयोग वर्जित है और प्रसाद बनाने हेतु आम की सूखी लकड़ियों को जलावन रूप में प्रयोग किया जाता है, न कि कोयला या गैस का चूल्‍हा। वस्‍तुतः छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्‍ता के साथ-साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्‍ते को भी संजोता है।

छठ पर्व की परंपरा में वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व भी छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है, जिस समय धरती के दक्षिणी गोलार्ध में सूर्य रहता है और दक्षिणायन के सूर्य की पराबैंगनी किरणें धरती पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं क्योंकि इस दौरान सूर्य अपनी नीच राशि तुला में होता है। इन दूषित किरणों का सीधा प्रभाव जनसाधारण की आंखों, पेट, स्किन आदि पर पड़ता है। इस पर्व के पालन से सूर्य प्रकाश की इन पराबैंगनी किरणों से जनसाधारण को हानि ना पहुंचे, इस अभिप्राय से सूर्य पूजा का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। इसके साथ ही घर-परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता से भी छठ पूजा का व्रत जुड़ा हुआ है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति, पत्नी, पुत्र, पौत्र सहित सभी परिजनों के लिए मंगल कामना से भी जुड़ा हुआ है। सुहागिन स्त्रियां अपने लोक गीतों में छठ मैया से अपने ललना और लल्ला की खैरियत की ख्वाहिश जाहिर करती हैं।


एक ओंकार सतनाम...

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, इस बात की पुष्टि सभी धर्मों और उनके पवित्र पुस्तकों में भी होती है और जो इसे मानने वाला ही वास्तव में इंसान कहलाता है। भारत एक धार्मिक देश है और यहां समय-समय पर कई धर्म गुरुओं ने अपनी शिक्षा से मानवता की सेवा करने का संदेश दिया है। ऐसे ही एक धर्म गुरु हैं गुरु नानक देव जी जो सिखों के प्रथम गुरू थे।

लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित तलवंडी नामक स्थान पर संवत् 1526 (ईस्वी सन 1469) की कार्तिक पूर्णिमा के दिन उदित हुए एक सूर्य ने अपनी ऐसी किरणें बिखेरीं कि वह भारत ही नहीं विश्व भर में धर्म अध्यात्ममानवता और स्वाभिमान का अग्रदूत बन गया। तलवंडी नगर (वर्तमान में इसे ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है) के प्रधान पटवारी कल्याण दास मेहता (कालू खत्री) के यहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा बडी बहिन का नाम नानकी था। अत: नानकी के छोटे भाई होने के कारण नवजात बालक का नाम नानक रखा गया। बचपन में जब गुरु नानक देव जी स्थानीय पंडित के पास पढ़ाई करने नहीं गएतो उनके पिता ने उन्हें गाय-भैंसें चराने के लिए जंगल में भेज दिया। जंगल में जाकर गाय-भैंसें चरते-चरते स्थानीय जमीदार राय बुलार के खेतों में घुस गए और थोड़ी ही देर में सारे खेत चट कर गए। राय बुलार को गुस्सा आया और उन्होंने आदमी भेजकर कालू मेहता को बुलवाया। कालू मेहता और नानकी देवीजो कि उनकी बड़ी बहन थींअपने नानक की इस करतूत से बहुत खफा हुए और उन्हें ढूंढने के लिए जंगल में निकल पड़े। जंगल में जाकर देखा कि नानक जी एक मेड के सहारे लेटे हुए ध्यान मग्न हैं और एक काला कोबरा उनके पीछे से आकर फन फैलाए हुए चेहरे पर छाया किए सामने है। जैसे ही कालू मेहता और नानकी वहां पहुंचे सांप अन्तरध्यान हो गया। घर वालों को उस दिन पता लगा कि नानक दैवी शक्ति से युक्त कोई अवतारी सन्त हैं।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जब भी संसार में अनाचार फैलता हैअवांछित तत्वों से साधारण जन परेशान हो जाते हैंतब समाज को दिशा देने के लिए किसी न किसी महापुरुष का पदार्पण होता है। उन्हीं महान आत्माओं में से एक थे गुरु नानक देव। समाज में समानता का नारा देने के लिए उन्होंने कहा कि ईश्वर हमारा पिता है और हम सब ही उसके बच्चे हैं। पिता की निगाह में छोटा-बड़ा कोई नहीं होता। वही हमें पैदा करता है और वही हमारा पेट भरने के लिए अन्न भेजता है। इसी प्रकार गुरु नानक भी जात-पात के विरोधी थे। उन्होंने समस्त हिन्दू समाज को बताया कि मानव जाति तो एक ही हैफिर जाति के कारण यह ऊंच-नीच क्यों?  गुरु नानक देव जी ने कहा कि तुम मनुष्य की जाति पूछते होलेकिन जब व्यक्ति ईश्वर के दरबार में जाएगा तो वहां जाति नहीं पूछी जाएगी। सिर्फ उसके कर्म देखे जाएंगे। इसलिए आप सभी जाति की तरफ ध्यान न देकर अपने कर्मों को दूसरों की भलाई में लगाओ।
बचपन से ही बालक नानक साधु संतोंगरीब व असहायों की सेवा व सहायता के लिए तत्पर रहते थे। गुरु नानक देव जी का सम्पूर्ण जीवन और उनकी शिक्षाएं विश्व के लिए एक अमूल्य निधि और जीवन जीने का मूल मंत्र बना। नानक सच्चे दिल के थे। बारह वर्ष की आयु में ही उनका विवाह सुलक्षिणी देवी से करा दिया गया जिनसे श्रीचन्द और लक्खी दास नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए किन्तु सांसारिक बंधन उन्हें बाध न सके। उन्होंने गुरू की गद्दी पर अपने किसी परिजन को न बिठा कर उसके योग्य अपने एक साथी लहणा को बिठाया था जिसके संस्कार बड़े ऊंचे थे। ये लहणा भाई जी ही आगे चलकर गुरू अंगद देव जी के नाम से सिखों के दूसरे गुरू कहलाए। सिख सम्प्रदाय के प्रवर्तक गुरु नानक जी की सम्पर्ण काव्यमय वाणी गुरु ग्रन्थ साहिब के जपुजी साहिब खण्ड एक के मुताबिककार्तिक पूर्णिमा के दिन ही सिखों के आदि गुरु सन्त श्री नानक देव जी की जयन्ती और प्रकाश पर्व मनाया जाता है। इन्होंने लगभग 974 शब्द और 19 राग लिखे हैं। उनके सभी शब्द और राग अनन्त भक्तिमय हैं और निराकार परमेश्वर की तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं। गुरुवाणी के शुरू में उन्होंने सबसे पहले जो दोहा लिखा है वह इस प्रकार है-

ओम् सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरू।
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।
अर्थात ओमकार रूपी परमेश्वर का एक ही नाम है और यही सत्य है। वह सम्पूर्ण सृष्टि का करता पुरुष है। यह ब्रह्माण्ड उसी परमेश्वर के इशारे पर चल रहा है। वह निर्भय हैउसका किसी से वैर नहीं है। उसकी कोई मूर्ति नहीं हैउसका कोई रूप या आकार नहीं है। वह अजन्मा हैअर्थात परमात्मा योनि और जन्म-मरण से रहित है। और उस परमात्मा को पाना गुरु की कृपा पर ही निर्भर करता है।

एक ओंकार सतनाम
नानक बचपन से ही प्रतिदिन संध्या के समय अपने मित्रों के साथ बैठकर सत्संग किया करते थे। उनके प्रिय मित्र भाई मनसुख ने सबसे पहले नानक की वाणियों का संकलन किया था। कहा जाता है कि नानक जब वेईनदी में उतरेतो तीन दिन बाद प्रभु से साक्षात्कार करने पर ही बाहर निकले। ज्ञान प्राप्ति के बाद उनके पहले शब्द थे- एक ओंकार सतनाम। नानक देव जी अपनी गुरुवाणी जपुजी साहिब में कहते हैं कि नानक उत्तम-नीच न कोई! अर्थात ईश्वर की निगाह में सब समान हैं। यह तभी हो सकता हैजब व्यक्ति ईश्वर नाम द्वारा अपना अहंकार दूर कर लेता है। गुरु नानक साहब हिंदू और मुसलमानों के बीच एक सेतु थे। हिंदू उन्हें गुरु और मुसलमान पीर पैगम्बर के रूप में मानते हैं। भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य के अनुसार गुरु नानक देव जी एक रहस्यवादी संत और समाज सुधारक थे। जीवन भर देश विदेश की यात्रा करने के बाद गुरु नानक अपने जीवन के अंतिम चरण में अपने परिवार के साथ करतापुर बस गए थे। गुरु नानक ने 25 सितंबर, 1539 को अपना शरीर त्यागा। जनश्रुति है कि नानक के निधन के बाद उनकी अस्थियों की जगह मात्र फूल मिले थे. इन फूलों का हिन्दू और मुसलमान अनुयायियों ने अपनी अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

गुरु नानक देव जी की शिक्षाएं
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में मुख्यत: तीन बातें हैं। पहला जप यानी प्रभु स्मरणदूसरा कीरत यानी अपना काम करना और तीसरा जरूरतमंदों की मदद। गुरु नानक की शिक्षा में सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने हमेशा लोगों को प्रेरित किया कि वह अपना काम करते रहे। उनके अनूसार, आध्यात्मिक व्यक्ति होने का यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति को अपना काम-धंधा छोड़ देना चाहिए।

लंगर
गुरु जी ने अपने उपदेशों को अपने जीवन में अमल में लाकर स्वयं एक आदर्श बन सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। इसी कारण जात-पात को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने के भाव से ही अपने अनुयायियों के बीच लंगर की प्रथा शुरू की थी। जहां सब छोटे-बड़ेअमीर-गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी दुनिया भर के तमाम गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही हैजहां हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। इसमें सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है।

संगत
जातिगत वैमनस्य को खत्म करने के लिए गुरू जी ने संगत परंपरा शुरू की। जहां हर जाति के लोग साथ-साथ जुटते थेप्रभु आराधना किया करते थे। कथित निम्न जाति के समझे जाने वाले मरदाना को उन्होंने एक अभिन्न अंश की तरह हमेशा अपने साथ रखा और उसे भाई कहकर संबोधित किया। इस प्रकार तत्कालीन सामाजिक परिवेश में गुरु जी ने इस क्रांतिकारी कदमों से एक ऐसे भाईचारे को नींव रखी जिसके लिए धर्म-जाति का भेदभाव बेमानी था।

गुरुनानक देव जी के दस उपदेश :-
1- ईश्वर एक है।
2- सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।
3- ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है।
4- ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।
5- ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।
6- बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं।
7- सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए।
8- मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।
9- सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।
10- भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।

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