मंगलवार, 19 मार्च 2013

मैं एक पंत चल जाता हूँ...


जीवन के भयकाल सफर पर,
मैं एक पंत चल जाता हूँ।
ना भाव-विचार ना दुविधा मन में,
रख लक्ष्य नज़र का दूर तलक,
प्राप्त मानवता को होता हूँ।

बस एक कलम साथी अपना,
हैं शब्द सारथी जीवन के।
रस वसुधा सारा ध्यान उढ़ेल,
बस एक छंद रच पाता हूँ।

सच दुनिया का है इतना जाना,
जितना सोचो सब खोना है।
अब हार मिले या जीत मिले,
सबके मद में रब होना है।।

मंगलवार, 5 मार्च 2013

सुलझा हुआ बजट है : नैना लाल किदवई, प्रेसिडेंट फिक्की


साक्षात्कारनई दिल्ली, 28 फरवरी (हि.स.)। बजट में उद्योग जगत को क्या मिला। क्या इस बजट से उद्योग जगत संतुष्ट है इन्हीं सब मुद्दों पर फिक्की प्रेसिडेंट नैना लाल किदवई से खास बातचीत की हिन्दुस्थान समाचार के संवाददाता आकाश राय ने....

- बजट पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है।

इस बजट से अर्थव्यवस्था विकास की ओर बढ़ेगी। इस बजट से ग्रोथ में तेजी आएगी ऐसा अनुमान है। कह सकते हैं यह सुलझा हुआ बजट है और इसमें जिम्मेदारी का पुट है। बजट में वित्तीय प्रबंधन, बुनियादी ढांचे का खास ख्याल रखा गया है। जैसा अनुमान था वैसा ही बजट है। इस बार के बजट में ऐसा कुछ नहीं है जिसे खास कहा जाए। राजकोषीय घाटे कम करने का प्रयास किया जाएगा।

-इस बजट में महिला उद्यमियों को कहां देख रहे हैं। महिलाओं के लिए विशेष घोषणा भी हुई है।

पिछली बार कहा गया था कि महिला मुद्दे ही गायब हैं। इस बार महिला द्वारा महिला के लिए फंड निर्भया फंड बनाने का ऐलान किया है। वह है एक हजार करोड़ रुपए का। और यह पूरी तरह महिलाओं द्वारा संचालित होगा। यह पहली बार किया जा रहा है जो काफी अच्छा कदम है। युवाओं के लिए एक हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था काफी अच्छा घोषणा की गई है। यह अच्छी योजना है।

-सरकार ने इनफ्रास्ट्रक्चर पर इस बजट में जोर दिया है क्या कहेंगे आप।

निश्चित तौर पर सरकार ने इनफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया है। वह काफी अच्छा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर बांड के जरिए 50 करोड़ रुपए जुटाने का प्रयास किए जाने की बात कही गई है वह अच्छा है। इससे रियल एस्टेट में तेजी आएगी ऐसी उम्मीद है। राजीव गांधी इक्विटी से भी छोटे निवेशकों को फायदा होगा।

-सरकार से उद्योग जगत को जीएसटी और डीटीसी पर उम्मीदें भी थी।

बिल्कुल, जीएसटी और डीटीसी को लेकर सरकार ने कहा है कि इस पर जल्द ही विधेयक संशोधन के बाद आएगा उसपर पारित किया जाएगा। यह अच्छा है। बजट गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स की ओर पहला कदम है। यह अच्छी बात है। मुआवजे के लिए नौ हजार करोड़ रखे गए हैं।

- बजट को देखने से ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य सेक्टर पर सरकार ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। आप क्या कहेंगे।

निश्चिततौर पर स्वास्थ्य सेक्टर ऐसा सेक्टर है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है। हालांकि बजट में सरकार ने कुछ सेक्टर जहां स्वास्थ्य से जुड़े हैं खासकर सामाजिक कल्याण के लिए किया गया काम इसी के अंतर्गत है। जिसपर जोर है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में रिक्शेवाले, ऑटोरिक्शा का प्रस्ताव अच्छा है। इसमें खासकर स्वयं सहायता ग्रुप बीमा का प्रस्ताव अच्छा है।

-कुछ ऐसे मुद्दे जिस पर उद्योग जगत की अपेक्षा रही हो और वित्त मंत्री उसपर कोई ध्यान नहीं दिए हों।

 उद्योग के कई सेक्टर पर काफी कुछ सरचार्ज लगे हुए हैं। जो मंदी के समय से ही हैं। उसे हटाने के बारे में सोचना चाहिए। सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया यह निराशाजनक है। सरचार्ज हटाना चाहिए था। जिससे उद्योग जगत को राहत मिले। जिससे बेहतर आउटपुट दिखाई पड़ता। सरकार ने एक करोड़ से अधिक आमदनी वाले पर दस फीसदी सरचार्ज लगाने की बात कहीं गई है। वित्त मंत्री ने कहा कि इसे एक साल के बाद हटा लिया जाएगा। लेकिन अब ऐसा लगता नहीं है।

-सरकार ने बजट में उद्योग से ज्यादा कृषि सेक्टर पर ध्यान दिया है।

नहीं, ऐसा नहीं लगता। नाबार्ड के तहत कुछ विशेष घोषणा है। लेकिन कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है। पोस्ट ऑफिस को कोर बैंकिंग बनाने की बात कही गई है। हैंडलूम और पर भी घोषणाए काफी अच्छी है। इस तरह की घोषणा से सभी तरह के विकास होगा।

 -सब्सिडी पर सरकार मौन हैं ऐसा लगता है आपको।

सब्सिडी जैसे तत्व पहले ही सरकार ने बजट से बाहर कर दिया है। सब्सिडी धीरे-धीरे कम करना चाहिए था। सब्सिडी कम नहीं किया है। सरकार की भी ऐसी रणनीति रही है कि धीरे-धीरे इसे कम करते हैं लेकिन सरकार ने इस पर अमल नहीं किया है।

-सरकार ने इस बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देने की बात नजर आ रही है।

सरकार की ओर से किया गया प्रयास अप्रर्याप्त है। पवार सेक्टर के लिए घोषणाएँ कुछ अच्छी रही हैं। अभी इंफ्रास्ट्रक्टर पर और काम करने की जरूरत है। सरकार को इससे उबारने का प्रयास करना चाहिए। इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा तभी उद्योग जगत भी आगे बढ़ेगा।

हिन्दुस्थान समाचार/28.02.2013/आकाश।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

माँ मेरी ...

माँ मेरी तू मुझपे बस इतनी मेहर कर दे,
दे दुआ मुझको सदा खुद में बसर कर दे।
रहूं जब भी तुझसे दूर मेरे दिन चैन से कटे,
रहे माथे पर हाथ तेरा, मन का साहस तू बने।
माँ मेरी मुझको तो बस तेरी दुआ चाहिए,
ताऊम्र तेरे आँचल की ठंडी हवा चाहिए।

खुशियाँ दुनिया भर की तेरे चरणों की धूल हैं,
माँ तेरे आगे अभी तो हम बच्चें सब फूल हैं।
जिन्दगी के हर कदम पर तेरा आसरा चाहिए,
माँ मेरी मुझको तो बस तेरी दुआ ही चाहिए,
ताऊम्र तेरे आँचल की ठंडी हवा ही चाहिए।

सुन कर बातों को मेरी, माँ कुछ सोचती हुई,
आँखों में आए अपने आँसुओं को रोकती हुई,
फिर, रो पड़ी माँ, माथे को मेरे चूमती हुई।
अब कितने दिन रहोगे, मेरे पास तुम यहाँ,
थकती नहीं है मुझ से वो ये पूछती हुई।

रहती है जागती वो मेरी नींद के लिये,
मैं ठीक तो हूँ, हर वक़्त यही सोचती हुई।
कहती है कैसे कटती है परदेश में तेरी,
आँखों से बहते अश्कों को पोछती हुई।
हो गई कमाई और कितना काम करेगा,
घर आ जा बेटा कहती है मुझे टोकती हुई।

उसके आंसुओं को जब भी पोछता हूँ मैं,
कितना दुख झेलती है मां ये सोचता हूँ मैं।
चाहता हूँ कह दूं कुछ दिन इंतजार कर ले,
फिर तेरे संग अपनी तो सुबहो-शाम कटेगी।
तेरी एक आवाज पर मैं तेरे पास रहूंगा,
तब तेरी हर जरुरतों के लिए तैयार रहूंगा।

सुन कर मेरी बातों को वो फिर से आंसु बहायेगी,
एक प्यार की पुच्ची से मेरे माथे को वो छू जायेगी।
मैं फिर से कह पड़ुंगा देख कर माँ के जज्बात को,
माँ मेरी मुझको तो बस तेरी दुआ ही चाहिए,
ताऊम्र तेरे आँचल की ठंडी हवा ही चाहिए।

...अब तो


बहुत मशहूर हुए हैं अपने फसाने अब तो,
कुछ और देर जी लेते हैं इसी बहाने अब तो।
मेरे ही गम़ सारे अब सताने से लगे हैं मुझको,
खुशियां भी लगी हैं मुझसे कतराने अब तो।
महफिलों में मेरे हंसने का आलम न पूछिये,
हर हंसी पे कई आंसू पड़ते हैं बहाने अब तो।
ये जो बढ़ रहा है दर्द मेरे सीने का इस कदर,
कि जो हम उन्हें भुलाने में लगे हैं अब तो।
तेरे अंदाज-ए-खयालात का असर बाकि है अभी, 
कि, तेरी बातों को ही मिसाल बना लेते हैं अब तो।

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

फिर खाली गयी उम्मीदें...


क्रिकेट के खेल को भारत में इबादत से कम का दर्जा हासिल नहीं है। हर भारतवासी क्रिकेट के लिए जीवन के सभी जरुरी कामों से तौबा करने को तैयार हो जाता है लेकिन मजाल हो कि खेल का एक लम्हा भी उससे छूट जाये। ऐसे में अगर खेल के प्रसंशक अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से सजी टीम से खिताब जीतने की उम्मीद करते हैं तो इसमें बुरा क्या है। पर खेल तो आखिर खेल है जो घरों व स्टेडियम में बैठे दर्शकों-प्रसंशकों की ख्वाहिशों से परे मैदान पर बेहतर प्रदर्शन को ही मानता है। इसी लिए शायद एक बार फिर भारतीय क्रिकेट टीम को खिताब से महरुम रहना पड़ा क्योंकि उसके खेल कौशल में कुछ कमियां रह गयी। यहां बात हो रही है महिला क्रिकेट विश्वकप की जिसकी मेजबानी करने के बाद भी भारतीय टीम अपने ही जमीन पर खिताब कब्जाने में नाकामयाब रही।

क्रिकेट, जिसे अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है जिसमें हर पल रोमांच का पुट होता है और खेल किसी भी क्षण अपने वर्तमान स्थिति से बदल सकता है। हर पल बदलने की फितरत वाले इस खेल का ही तो कमाल है कि जिस टूर्नामेंट का आगाज भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज को करारी शिकस्त देते हुए किया था, उसी से वह बाहर हो गयी है। हालांकि अपने गौरव को बचाने के क्रम में भारतीय टीम ने अपने आखिरी मुकाबले में चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को जरुर पटखनी दी। जिससे वह टूर्नामेंट में सांतवा स्थान हासिल करने में कामयाब रही लेकिन यह प्रदर्शन सवा अरब भारतीयों की उम्मीदों पर खरा उतरने का काबिल नहीं है। और हो भी कैसे जिस खिताब के लिए देशवासी इंतजार कर रहे है वह अपनी जमीं पर भी लूट गया।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम खिताब को जीतने से रह गयी हो। बल्कि पिछले 30 वर्षों और 10 विश्वकप प्रतियोगिताओं (वर्ष 2013 को लेकर) में एक बार भी विश्वविजेता नहीं बन सकी है। विश्वविजेता तो दूर भारतीय टीम सिर्फ एक बार विश्वकप के फाइनल (वर्ष 2005, आस्ट्रेलिया के खिलाफ) में खेल पायी है। इस बार तो टीम की हालत पूर्व की सालों से और भी बदतर थी। टीम के लिए इस विश्वकप में सबसे सुखद बात यह रही कि चार लीग मैचों में से तीन में उसके एक बल्लेबाज ने शतक जरुर लगाया। जहां पहले मुकाबले में वेस्टइंडीज के खिलाफ कामिनी ने 100 बनाये तो वहीं इंग्लैंड के खिलाफ हरमनप्रीत कौर ने भी शतक ठोका। जबकि आखिरी मुकाबले में पाकिस्तान के खिलाफ कप्तान मिताली राज ने भी नाबाद 134 रन की पारी खेली।

पूरे टूर्नामेंट में भारतीय टीम की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई उसकी गेंदबाजी। टीम के पास अनुभवी और दुनिया की सबसे तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी के अलावा अमिता शर्मा, निरंजना और एकता बिष्ट जैसे नाम थे। जिन पर टीम के गेंदबाजी का भार था लेकिन सभी गेंदबाज जरुरत के समय बेकार साबित हुए। उस पर रही सही कसर टीम की फिल्डिंग ने पूरी कर दी। इस प्रकार के ओवरआल औसत प्रदर्शन के बल पर ही भारतीय टीम टूर्नामेंट में सातवें स्थान पर काबिज रही। इन चार मैचों ने भारतीय टीम को केवल प्रतियोगिता से बाहर नहीं बल्कि करोड़ों क्रिकेट प्रसंशकों की उस उम्मीद पर भी पानी फेर दिया जिन्हें आस थी कि शायद इस बार भारतीय टीम विश्वकप जीत कर नयी कीर्तिमान रचेगी। आखिर लोगों को उम्मीद हो भी क्यों ना, पुरुष क्रिकेट टीम ने भी वर्ष 2011 का विश्वकप खिताब अपनी जमीन पर खेलते हुए ही जीता था। पर कहते हैं ना कि खेल को केवल भाग्य से नहीं बल्कि जज्बें के सहारे खेलना चाहिए। यह खेल जज्बे और भाग्य के संतुलित मेल के आधार पर बुलंदी पर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।  

खैर भारतीय टीम बाहर हो चुकी है और अब अटकलें इस बात पर लगायी जा रही हैं कि कौन सी टीम वर्ष 2013 का विश्वकप खिताब अपने नाम करने में कामयाब होगी। अब तक के बीते नौ विश्वकप प्रतियोगिता के आंकड़ों के मुताबिक आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच ही खिताबी मुकाबले के आसार हैं। पर क्रिकेट का खेल आंकड़ों की जादूगरी से ज्यादा उस दिन मैदान पर टीम के प्रदर्शन पर टिका होता है। ऐसे में किस टीम के सर जीत का ताज होगा यह कहना जल्दबाजी होगी। वैसे अब तक के प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलियाई टीम पांच बार इस ताज को पहन चुकी है, जबकि इंग्लैड ने तीन बार इसे अपने सिर पर सजाया है। वहीं न्यूजीलैंड को भी एक बार इस कप को अपने घर ले जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

तीनों एशियाई टीमों भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के टूर्नामेंट से बाहर होने के बाद यह तो यह हो गया है कि यह खिताब एशिया में नहीं आने वाला। ऐसे में लोगों की उम्मीदें थोड़ी मायूसी के साथ अगले महिला विश्वकप तक के लिए टल गयी हैं पर इत्तेफाक की बात ये ही कि यह उम्मीद मरी नहीं है। क्रिकेट का खेल ही ऐसा है कि हर रोज एक नहीं ताजगी और नये लक्ष्य के साथ इसे खेलने, देखने और आनन्द उठाने के लिए लोग मजबूर हो जाते हैं। इसीलिए भारतीय प्रसंशकों को नये आस और विश्वास के साथ कि भारतीय महिला टीम विश्व विजेता बनेगी के साथ अगली बार का इंतजार रहेगा।  

-- आकाश कुमार राय

बुधवार, 16 जनवरी 2013

क्या करना...


"जो दिल से अपना नाता है, तो गज़ल-शेर का क्या करना,
तुम धड़कन बन कर रहती हो, फिर बात बढ़ा कर क्या करना।

तुम मेरे थे  तुम मेरे हो, है हमको मालूम यहां,
फिर दुनिया को ये बात जता कर क्या करना।

जो चाहत से निभाये हम, रिश्ते सारे अपने दिल के,
फिर रशम-ए-दुनियादारी को. यूं निभा कर क्या करना।

तुम खफा भी अच्छे लगते हो, तुममें नूर और झलकता है,
तो काहें की कोटा-पूर्ति, फिर तुम्हें मनाकर क्या करना।

हो सुबहों-शाम तुम्हीं जहन में, दिन याद से अच्छा गुजरेगा,
फिर तुमसे कैसी परदेदारी, तब तुम्हें भूलाकर क्या करना।

मैं खुशबू तेरी चाहत का, बस तुझमें ही खो जाना है,
हो गयी पूरी मुराद जो अपनी, और चाह कर क्या करना।  

अपना तो बस यही सफर, जो मैं रुका तो चल पड़ी डगर,
जब मंजिल मेरी मुझमें ही है, तो और गुजर कर क्या करना।"

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

क्रिकेट मतलब, शौहरत-पैसा और हसीनाओं का ताना-बाना



जैन्टलमैंस गेम कहे जाने वाला क्रिकेट अब भद्रजनों का खेल नहीं रहा। इसमें सेक्स और सट्टा का तड़का लग गया है, जिससे खिलाड़ी तो खिलाड़ी अब अंपायर भी अछूते नहीं हैं। क्रिकेटरों की रंगीनमिजाजी तो सबके सामने है जिसका ताजा उदाहरण श्रीलंका में आयोजित टी20 विश्वकप में भी देखने को मिला। शोहरत और पैसों की चकाचौंध ने खिलाड़ियों को उनके मूल केंद्रीय भाव से भटका दिया है।

एक समय था जब खिलाड़ी अपने खेल को निखारने के लिए सतत प्रयास करते थे तथा बेहतर खेल प्रदर्शन के बाद भी अपनी कमियों और आउट होने के तरीकों बारे विचार करते थे। पर आज खेल मानसिक मजबूती और कलात्मकता से कहीं परे हो गया है। कल की कलात्मकता की जगह आज के तेज तर्रार शॉट और शारीरिक डीलडौल ने ले ली है। इसी का नतीजा है कि खेल में कलाईयों और टाईमिंग के बजाय लंबे और तगड़े शॉट देखने को मिलते हैं। खैर यह तो परिवर्तन का नियम शास्वत ही है। एक नयी पीढ़ी अपने साथ कुछ नया लेकर आती ही है और उसके ही हाल का कल्चर कहा जाता है। ऐसे में जो पैसा, पब्लिसीटी और हसिनाओं का जो तालमेल देखने को मिल रहा है वह क्रिकेट के इसी संक्रमण काल का द्योतक है। जो बतला रहा है कि क्रिकेट भी बदल रहा है और उसके खेलने वाले भी।

डॉन ब्रैडमैन, विवियर रिचर्ड, सुनील गावस्कर, कपिल देव, स्टीव वॉ से लेकर सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ तक सभी खिलाड़ियों ने खेल में अपने मुताबिक कुछ नया करने की कोशिश की। जिसमें वो काफी हद तक सफल भी रहे और अपने खेल कौशल के आधार पर भी दशकों तक क्रिकेट के एक स्तंभ बने रहे। इनमें सचिन तो आज भी अपने इस दृढ़ प्रतिज्ञ आस्था के साथ जुड़े हुए ही है औऱ शायद जब तक रहें खेल को एक नई विधा बताते भी रहें। ब्रैडमैन से लेकर द्रविड़ तक जितने भी खिलाड़ी आये सबने क्रिकेट को खेल से ज्यादा जीवन का अहम हिस्सा समझ जिया और उसकी गरीमा को बनाये रखने में ही अपनी जीत सुनिश्चित की। पर आज का युवा खिलाड़ी खेल को उनसे बेहतर तरीके से प्रयोग में लाने का हुनर जानते हैं तभी तो लक्ष्मण जैसे क्लास बल्लेबाज के लिए टेस्ट टीम में भी जगह नहीं मिली और दो-चार मैचों का इल्म रखने वाले रोहित, विराट और पुजारा को हाथों-हाथ लिया जा रहा है। यहीं बदलाव है जो वर्तमान क्रिकेट के दौर में देखने को मिल रहा है।

आज के खिलाड़ी खेल को मैदान पर खेलने के बाद भूलते नहीं बल्कि उस खेल के जरिए अपने बाकि समय में भी उसकी खूबियों के मार्फत लाभ उठाने में लगे हैं। कभी आर्थिक लाभ के लिए कभी अईयाशी के लिए अपने प्रसिद्धी को आजमाते रहते हैं। इंडियन प्रीमियर लीग में खिलाड़ियों का महिलाओं के प्रति सलूक और पैसों के लिए मैच फिक्सिंग की बात को कौन भूला सकता है। इसके अलावा अब अंपायरों को भी मैच फिक्स कराने का हुनर आ गया है और हाल के खुलासे ने आईसीसी के छह अंपायरों की पोल भी खोली है। इतना ही नहीं लड़कियों के प्रति लार टपकाने के मामले में भी अंपायर पीछे नहीं हैं आखिर वो भी कभी खिलाड़ी रहे होंगे इस बात को वो भूले नहीं हैं शायद। तभी तो पाकिस्तानी अंपायर अशद रऊफ ने एक पाकी मॉडल को अपनी भूख के बाबत पैसे देकर होटल के कमरे में बुलाने क्रम चलाया था। वो तो शुक्र हो कि उक्त मॉडल का ईमान अब भी कायम था और वो कई रातें रऊफ की रंगीन करने के बाद आखिरकार खुलासा करने पर उतर आयी।

इससे इतर जैंटलमैंस गेम के खिलाड़ियों के प्रति मुंबई टीम की चीयरलीडर रह चुकी दक्षिण अफ्रीकी मॉडल गैबरीला पास्कालोटो ने पिछले साल कुछ पोल भी खोले थे। जिसके कारण उनकी टीम से छुट्टी भी हो गयी थी। गैबरीला की मानें तो 'जेंटलमैन गेम्स' में शामिल कई सितारा क्रिकेटरों के रंग-ढंग मैच के बाद बदल जाते हैं। आईपीएल पार्टियों में लार टपकाते, लड़कियों के इर्दगिर्द मंडराते और सीरियल किसर के रूप में उन्हें देखा जा सकता है। गैबरीला ने तो ब्लॉग पर लिखा भी था कि असली मौजमस्ती तो वीआईपी कमरों में होती है, जहां खिलाड़ी और देर रात तक पार्टी करने वाले स्कैंडल कर सकते हैं। खिलाड़ियों की हरकतों को बारिकी से उघाड़ते हुए गैबरीला ने लिखा है, ‘वो (जैंटलमैन क्रिकेटर्स) पहले आपका चेहरा देखते हैं, फिर आपके पेट के ऊपर, फिर पीठ के नीचे देखते हैं, फिर दोबारा पेट के ऊपर देखते हैं। वो लोग हमें मांस के टुकड़ों की तरह समझते हैं। जो उनके खेल के बाद शायद उनका तोहफा हो जिसे वो अपने बिस्तर पर नोचने की तैयारी में लगे हो।’ गैबरीला ने कुल 8 खिलाड़ियों को इस बाबत जोड़ा था जिसमें चार ऑस्ट्रेलियाई, एक दक्षिण अफ्रीकी तथा तीन भारतीय खिलाड़ियों के नाम शामिल थे।

क्रिकेट के खेल में फिक्सिंग का तो पुराना नाता रहा है लेकिन उसमें भी अब काफी परिवर्तन आ गया है। वर्तमान समय में खिलाड़ियों को पटाने के लिए भी महिलाओं को चारे की तरह आजमाया जा रहा है। जो अपने हुश्न और मादक अदाओं के बल पर खिलाड़ियों को रिझाती हैं तथा बड़ी कीमत पर उन्हें पटा भी लेती हैं। बालिवुड अभिनेत्री नूपुर मेहता का नाम भी ऐसी ही सुंदरियों में शुमार है जो खिलाड़ियों की फिक्सिंग कराने का भी हुनर जानती हैं। एक समाचार पत्र ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया था कि नूपुर जैसी हॉट मॉडल क्रिकेटरों को फंसाने में सटोरियों की मदद करती हैं। उसने तो यहां तक कहा था कि नूपुर श्रीलंका क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान तिलकरत्ने दिलशान के साथ डेटिंग कर चुकी हैं। हालांकि आईसीस जांच में कुछ भी साबित नहीं हो पाया था लेकिन यह बात भी कैसे मानी जाये कि बिना आग के ही धुआं उठने लगा था। कुछ तो इस क्रिकेट में है तभी तो झारम-झार पैसों और शोहरत की बारिश के बाद अब महिलाओं का भी क्रम चल पड़ा है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कल के क्रिकेट से आज का क्रिकेट काफी भिन्न हो गया है, ऐसे में आज के इस खेल की परिभाषा पैसा-शोहरत और हसीनाओं के पुट के बिना अधूरी ही जान पड़ती है।

रविवार, 23 सितंबर 2012

एक खयाल...


"वो जरा-जरा सी बात पर नज़रे झुकाते थे,
हमें लगता था कि वो हमसे शर्माते थे,
हुआ शर्मिंदा बहुत अपनी इस बेजां खयाली पे,
जब ये जाना कि...
वो आदतन लोगों से बहुत कम नज़र मिलाते थे।

ख्वाब टूटे, अरमान भी सब चकनाचूर हो गये,
फिर हम अपनी सोच में भी...
मोहब्बत की कहानी से दूर हो गये।
बमुश्किल जान पाया मैं, एक हसीन अदा उनकी,
हमें आजमाने को ही...
वो नज़रें मिलकर पलके झुकाते थे।"

मंगलवार, 26 जून 2012

रंग-ए-जिंदगानी


"हर कदम एक जलजला आया, फिर भी मंजिल तक चला आया।
था अंधेरा घना जहां जमाने में, मैं वहां पर दिया जला आया।

उड़ गयी धज्जीयां भी चुप्पी की, मैं अगर फाड़कर गला आया।
ज्वार रोका है कैसे पूछो मत, चांद जब सीने में उतर आया।

लग रही है जमीन जन्नत सी, अर्श का कौन सा तल आया।
वैसे सुबह है कहां मुमकिन, ख्वाब जिस रुप में ढ़ल आया।

कोई उत्सुक नहीं मुझे लेकर, जाने मैं किस लिए उतावला आया।
पायी फूल की चोट कांटो से बढ़कर, आंख में खून छलछला आया।

जी रहा हूँ मौत के जिस वायदे पर, रोज के रोज जो टला आया।
जाने किस दिन हो मिलन उससे, जो ख्वाबों में अक्सर चला आया।"

शनिवार, 16 जून 2012

पिता...


"होती है मां घर की आत्मा जरुर,
पर ओढ़ दृढ़ता का आवरण रक्षक बनता है पिता।

अश्रुओं का सागर बच्चों के लिए रखती है मां,
तो संयम का नया पाठ पढ़ाता है पिता।

बच्चों की एक आह पर दौड़ती है जहां मां,
वहीं फर्स्ट-एड का डिब्बा पकड़ता है पिता।

माना बच्चों की भूख पर रोटी खिलाती मां,
उसे लाने की खातिर तो परिश्रम करता है पिता।

नहीं कहता मां से बेहतर पिता होता हैं,
कि दोनों की छांव में बच्चा पल-बढ़ कर है जीता।

मां सह देकर कहती ना करना गलती तू,
पर ठेठ अंदाज में बच्चों को सुधारता है पिता।

थोड़ा गुस्सा थोड़ा प्यार अंदाज यही पिता का,
पर जाने क्यों फिर मन ही मन रोता है पिता।


ना रोकता ना टोकता, बच्चों की ख्वाहिश पे जीता,
बच्चे ना पकड़े गलत रस्ता, ये ध्यान रखता है पिता।

कभी उभरते जज्बात कभी डांट का भरम बनाये रखते हैं,
अपने ही अलग-अनूठे अंदाज में अनबूझ पहेली हैं पिता।

चाहे जैसा भी कह लो उनको, गुस्सैल-नरम या जज्बाती,
पर बच्चों की खातिर नाजुक दिल संग सख्त धड़ हैं पिता।"

शुक्रवार, 8 जून 2012

आहटें दर्द की....


बोझ मेरे मन पर बढ़ा-बढ़ा सा लगता है,
सूनी आँखों में आया सैलाब सा लगता है।

कोई रुठ गया या दिल टूटा सा लगता है,
उससे फिर भी अहसास जुड़ा सा लगता है।

भोर से लेकर शाम तलक वो ही अपना लगता है,
जाने फिर क्यों उससे ही मन उखड़ा मेरा रहता है।

आज भी उससे रिश्ता अपना पहले जैसा लगता है,
जाने फिर क्यों हरकतें वो अहसानों वाला रखता है।

डरता हूँ खो ना जाऊ, दुनिया की इस उलझन में,
पर इससे ज्यादा डर उसको खोने का लगता है।

साथ ही था मेरे जो अब खोया-खोया सा रहता है,
कि खुद से अब हर रोज यही गिला सा रहता है।

मिलूंगा उससे भी एक दिन की वो कब तक रुठेगा,
उस एक दिन की ख्वाहिश में जीना बेजार सा लगता है।

रंग-ए-जिन्दगानी...


कल वो सारे ख्वाब नजर आये बहुत,
देख कर जिनको हम पछताये बहुत।

जुस्तजू क्या थी कि बढ़ती ही गयी,
वैसे हमनें अपने पांव फैलाये बहुत।

सामने कुछ भी नजर आता न था,
यूँ तो निगाहों में साये रहे बहुत। 

देखने की चाह जब जाती रही,
आंख को मंजर नजर आये बहुत।"

आज के नेता...


जनसेवा का व्रत लिया, रहते जन से दूर।
सत्ता सुख की कामना, आदत से मजबूर।

सीडी, सत्ता, सुन्दरी, इनमें क्या है मेल।
मतदाता हैरान हैं, आखिर क्या है खेल।

राजनीति के हाट में, सच ईमान बिकाय।
रावण जीता राम से, राम करे हैं हाय...।"

रविवार, 3 जून 2012

नया दिन नई सोच...


"अब सोचते हैं नये दिन से नया सा हाल हो,
अपनी हरकतें भी लोगों को लिए मिसाल हो।

अपने शहर में कोई न रहे दूर किसी से,
रहे हर ओर शांति अब न कोई बवाल हो।

ये तेरा है ये मेरा है, ये बातें भूल जाये सब,
कि हर लब पर बस हमारेलहजे का कमाल हो।

चले ऐसी आंधी की मिटे सारे रंजिश-ए-शिकवे,
दुश्मनों में भी हो मोहब्बत, उनमें बोलचाल हो।

न झगड़े कोई किसी से, ना अब फसाद हो कोई,
मुस्कुराहटों संग गुजरे जिंदगी ऐसा कोई साल हो।

सब कुछ हमारे पास फिर क्यों है गरीबी का बसर,
इस अमीरे-शहर में अब कुछ ऐसे भी सवाल हो।

कभी तो बदले महोब्बत का भी निजाम देश में,
उब चुके हुश्न-ओ-इश्क से, अब देशप्रेम मुहाल हो।"

शुक्रवार, 1 जून 2012

आगे ही बढ़ता रहा...


"ये जिन्दगी चलती रही, वक्त भी गुजरता रहा,
मैं अपनी धुन में गिरता और संभलता रहा।

जो जागने के दौर में, मैं था बस सोता रहा,
जब नींद आंखों से गयी तो हार पर रोता रहा।

फिर संभल कर राह पर मैं तो बस चलता रहा,
सुध नहीं रखी कोई, ठोकर लगी कि पांव जलता रहा।

हर अंधेरी राह पर भटकन का डर लगता रहा,
पर दिलेरी आस की और रास्ता कटता रहा।

सवालों के उलझनों में भी कई बार उलझता रहा,
फिर जवाबों की फिराक में रात-दिन मचलता रहा। 

अभी दूर है मंजिल मेरी हरपल इसका अंदेशा रहा,
पर उसे पाने की ख्वाहिश दिल में बस पलता रहा।

पा ही जाउंगा मैं मंजिल, कल कोई कहता रहा,
पर जुनून-ए-जीत में, आगे को बढ़ता रहा...आगे ही बढ़ता रहा।"

सोमवार, 28 मई 2012

मेरी जिन्दगी...


"मेरी जिन्दगी तो बस मेरी मां के ख्वाबों का रुप है,
कभी उसके प्यार की छांव, कभी गुस्से का धूप है,
रोऊं मैं तो आंखे उसकी हैं नम होती,
हंसी मेरी उसके चेहरे पे मुस्कान लाती है,
इतना जुड़ा हूँ उससे कि कोई बात नहीं भाती,
अब तो हर खुशी-गम में उसकी याद सताती।"

शनिवार, 26 मई 2012

ये उड़ान पंखों की नहीं हौसलों की है...

जज्बा और जुनून हो तो इंसान लाख कमियों के बावजूद अपनी मंजिल को पा ही लेता है फिर चाहे शरीर साथ दे या ना दे। ऐसे में व्यक्ति अपने हौसलों को ही अपने पंख के तौर पर इस्तेमाल कर अपनी उड़ान को पूरा करने की क्षमता रखता है। चाहे कला के क्षेत्र की बात हो या फिर जीवन यापन के लिए नौकरी करने की। हौंसला हर घड़ी इंसान को अपनी पहुँच से ऊपर तक मेहनत करने को प्रोत्साहित करता है, जो वास्तविकता में कार्य परिणीत भी होती है। ऐसे में जब खेल की बात आती है तो लोग अक्सर सोचने लगते हैं कि शारीरिक अक्षमता के लोग कैसे खुद को पहचान दिया पायेंगे, लेकिन आज खेलों में भी अपने दृढ़ निश्चय के बल पर शारीरिक अक्षमता को मात देते हुए कईयों ने अपनी अलग पहचान बना ली है।

खेल चाहे जो भी हो पर एक बात तो साफ है कि पैसे और शोहरत की कमी इसमें नहीं है। तभी तो बहुतेरे लोग इसे अपना प्रोफेशन बनाने में लगे हैं। इसमें शारीरिक सक्षम लोगों को तो लम्बी फौज है, पर एक वर्ग ऐसा भी है जो खेल को केवल जुनून और जीवन की कठिनाईयों से न हारने की जिद के आधार पर इसे अपना रहा है। इस वर्ग का विशेषण यह है कि शरीर के साथ नहीं देने के बावजूद उनका जज्बा ही उन्हें लगातार आगे बढ़ने का हौसला देते हैं। इन्हीं हौसलों के जरिए ही आज दुनिया भर में कई ऐसे खेल अस्तीत्व में आ गये हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मसलन जिसके पैर साथ ना देते हो वह व्यक्ति भला कभी बास्केट बाल खेल सकता है, या फिर जिसने दुनिया के विभिन्न रंगों को देखा न हो वह टेनिस के खेल में बेहतरीन शॉट या निशानेबाजी में लक्ष्य पर सटिक निशाना लगा सकता है। ऐसे और कई सवाल हैं जो दिमाग में उलझन पैदा करते हैं लेकिन अब यह सब सच हो गया है। तकनीक के कमाल और खिलाड़ियों के कभी हार न मानने के जज्बे ने सब कुछ कर दिखाया है।


खेल और उसके खिलाड़ी :-
पैरा बैडमिंटन- कहते हैं मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है..। ये पंक्तियां अबोहर के नजदीकी गांव खुइयां सरवर के बैंडमिंटन खिलाड़ी संजीव कुमार पर पूरी फिट बैठती हैं। संजीव ने विकलांगता को मात देते हुए अपनी काबिलियत से यह सिद्ध कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कुछ भी असंभव नहीं है।

संजीव कुमार ने दूसरी फ्रेंच ओपन इंटरनेशनल पैरा बैडमिंटन (विकलांग) 2012 मुकाबले में कांस्य पदक जीत कर विकलांगता को मात दी है। प्रतियोगिता फ्रांस के रोडीज में 6 से 9 अप्रैल को हुई थी, जिसमें 13 टीमों ने अपने जौहर दिखाए थे। गौरतलब हो कि इससे पहले भी संजीव बैडमिंटन में कई पुरस्कार जीत कर अपना नाम रोशन कर चुका है। प्रतियोगिता में यह खिलाड़ी ट्राईसाइकिल पर बैठकर ही खेलता है।

विकलांगों की कुश्ती डॉगलैग्स:- शरीरिक तौर पर विकलांग होना लोगों को खेलों से दूर नहीं कर सकता। फिर चाहे खेल कुश्ती ही क्यों न हो। जापान का डॉगलैग्स रेस्लिंगग्रुप ऐसी ही एक संस्था है जो अपाहिज लोगों को कुश्ती लड़ने का मौका देती है। फिर भी बहुत से लोग इस लड़ाई को नकली मानते हैं, जबकि अन्य खेलों की तुलना में डॉगलैग्स को ज्यादा मनोरंजक बनाया गया है।

डॉगलैग्स खेल के संस्थापकों में से एक यूकिनोरी किटाजिमा कहते हैं कि दर्शकों का मनोरंजन करने वाला कोई भी शख्स पहलवान बन सकता है। डॉगलैग्स के एक मशहूर पहलवान ईटीका वे उदाहरण देते हैं कि वे किस तरह चेहरे पर भाव भी प्रकट करते हैं। इन शारीरिक अक्षम खिलाड़ियों के नाम भी हार्ड रॉक, नो सिंपैथी और वेलफेयर पॉवर जैसे रोमांचक होते हैं, ताकि कहीं से भी उन्हें यह न लगे की उन्हें केवल सहानुभूति के तौर पर पसंद किया जाता है।

 व्हीलचेयर बास्केटबॉल- इस खेल की कल्पना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अस्तीत्व में आयी थी। जब युद्ध के विकलांग दिग्गजों द्वारा रचित व्हीलचेयर बास्केटबॉल का खेल शुरु हुआ। इसमें शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई व्हीलचेयर पर बास्केटबॉल खेला जाता है। दुनिया में व्हीलचेयर बास्केटबॉल का शासी निकाय अंतर्राष्ट्रीय व्हीलचेयर बास्केटबॉल फ़ेडरेशन (आईजब्ल्यूबीएफ) है। अभी तक दुनिया में कोई बड़ा नाम इस खेल के प्रति ज्यादा आकर्षित नहीं हुआ और ना ही इस खेल को कोई पब्लिसिटी मिली है। लेकिन इतना जरुर हुआ है कि इस खेल को पसंद करने वाले खिलाड़ी व्हीलचेयर पर बैठकर ही सही खेल का लुफ्त केवल देखकर नहीं खेल कर भी लेने में सक्षम हो गये हैं।

ब्लाइंड टेनिस- इंसान की कल्पनायें दुनिया की मौजूद वस्तुओं-सुविधाओं से परे चीजे करने को उत्साहित करती है। इसी का नतीजा है कि नेत्रहीन लोगों के लिए ब्लाइंड टेनिस जैसे खेल का आविष्कार हो सका। इस खेल की खोज का श्रेय जापान के मियोशी टाकी को जाता है, जो खुद नेत्रहीन हैं और बचपन से ही टेनिस के प्रति लगाव ने उन्हें आविष्कारक बना दिया।

शुरुआत में उनका एक ही मकसद था, हवा में तैरती बॉल को ज्यादा से ज्यादा ताकत से मारना। काफी प्रैक्टिस के बाद वे इसमें माहिर हो गए। फिर उन्होंने एक अलग तरह की नरम बॉल खोजी। इस बॉल में आवाज भी होती है, जिसकी स्थिति का अंदाज लगाकर नेत्रहीन व्यक्ति उसे शॉट मार सकता है।

मियोशी की मेहनत रंग लाई और 1990 में जापान में पहली नेशनल ब्लाइंड टेनिस चैंपियनशिप आयोजित की गई। आज देश के हर हिस्से में सैकड़ों नेत्रहीन लोग ब्लाइंड टेनिस खेलते हैं। जापान के अलावा ये खेल चीन, कोरिया, ताईवान, ब्रिटेन और अमेरिका में भी पहुंच गया है। भारत मे यह खेल अभी शैशव अवस्था में है और केवल हैदराबाद में एक संस्थान में इसका प्रशिक्षण कार्य होता है।

विकलांग क्रिकेट - देश में क्रिकेट की लोकप्रियता इतनी है कि बच्चों-बूढ़ों से लेकर शारीरिक अक्षम लोग भी इसके रंग में रंग जाने को तैयार रहते हैं। लोगों का इसके प्रति लगाव ही एकमात्र कारण है कि आज इस खेल का एक अन्य रुप विकलांग क्रिकेट भी सामने आ गया है। ऐसे में पैरालंपिक कमेटी आफ इंडिया कई टूर्नामेंट का आयोजन कर विकलांग खिलाड़ियों को नया मंच देता है।

हाल ही में कर्नाटक में आयोजित गंधर्व ट्राफी 2012 में कई राज्यों के खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई। उन्हीं प्रतिभावान खिलाड़ियों में एक मोहन ठाकुर भी है, जो स्नातक तृतीय वर्ष का विद्यार्थी है। पटना के विकलांग खेल अकादमी का यह हुनरमंद खिलाड़ी शारीरिक अक्षमता के साथ आर्थिक तंगी का भी शिकार है। पर इसने अपने जज्बे और जुनून से साबित कर दिया कि अगर कुछ करने की ठानी जाये तो मंजिल मिल ही जाती है। इस खिलाड़ी ने कर्नाटक के हुबली शहर में राष्ट्रीय स्तर के पैरालंपिक प्रतियोगिता में बिहार टीम की ओर से भाग लिया और आठ राज्यों की टीमों के बीच तीसरा स्थान हासिल किया।

इसके अलावा, पटना में आयोजित बारहवीं बिहार राज्य पारालंपिक एथेलेटिक्स चैंपियनशिप के डिस्कस थ्रो में द्वितीय स्थान भी ग्रहण किया तथा पन्द्रह सौ मीटर दौड़ में तृतीय स्थान भी प्राप्त किया है। अपनी प्रतिभा के बल पर ही मोहन ने राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। अब बस उसे सरकार से आर्थिक मदद की दरकार है जो उसकी मेहनत को और आगे ले जाने में मददगार हो सके।

विकलांग ओलम्पिक खेल- शारीरिक अक्षम लोगों के लिए खेल का परिक्षेत्र यहीं नहीं रुकता बल्कि दिन-प्रतिदिन नयी-नयी कड़ियां जुड़ती जा रही हैं। अब तो ओलम्पिक खेलों में भी विकलांग खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलने लगा है। इस साल लंदन में होने जा रहे विकलांग ओलम्पिक खेलों में उत्तरी कोरिया का खेलदल भी हिस्सेदारी करेगा। इससे पहले उत्तरी कोरिया ने विकलांग ओलम्पिक खेलों में कभी भाग नहीं लिया था।

लंदन ओलम्पिक कमेटी ने इस बाबत साफ कर दिया है कि उत्तरी कोरिया के विकलांग एथलीटों का एक दल पेइचिंग पहुँच गया है। उत्तरी कोरिया के खिलाड़ियों को यहाँ बने एक शिविर में चीन के विकलांग खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग दी जाएगी। वे तैराकी, टेबल-टेनिस और एथलेटिक्स खेलों में हिस्सा लेगें। लंदन में 29 अगस्त से 9 सितम्बर तक चलने वाले विकलांग ओलम्पिक खेलों के लिए सात भारतीय खिलाड़ियों ने भी अपनी सीट बुक करा ली है।

लंदन ओलम्पिक की पैरा-ओलम्पिक स्पर्धाओं के लिये क्वालिफाई करने वाले हरियाणा के सात विकलांग खिलाड़ियों ने हर प्रतियोगिता के लिए खुद को तैयार बताया है। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास है कि जब वो लंदन तक पहुँचे हैं तो आगे भी जायेंगे। इन सात खिलाड़ियों में अमित सरोहा-डिस्कस थ्रो, ज्ञानेन्द्र सिंह घनघस-लाँग जम्प, जयदीप सिंह-डिस्कस थ्रो, अमित कुमार-लांग जम्प, जगमेन्द्र-डिस्कस थ्रो, नरेन्द्र-जैवलिन थ्रो और विजय कुमार-जैवलिन थ्रो शामिल हैं।

छोटे कस्बों की अन्तरराष्ट्रीय प्रतिभाएं- वर्तमान विकलांग प्रतिभाओं से परे कुछ होनहार ऐसे भी हैं जो भविष्य में देश के मान को बढ़ाने की तैयारियों में जुटे पड़े हैं। इनमें एक हैं खेकड़ा कस्बे के अंकुर, जो नेत्रहीन है पर गजब का एथलीट भी है। अपने देश की प्रतियोगिताओं को छोड़िए उसने अमेरिका में हुई नेत्रहीनों की विश्व युवा खेलकूद प्रतियोगिता में विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए दो सोने के पदक जीते हैं। उसका कहना है कि वह नेत्रहीन हुआ तो क्या वह देश का नाम रोशन करना चाहता है और इसके लिए वह मेहनत कर रहा है। बकौल अंकुर, अभी तो मैं सीखने के क्रम में हूँ, पर मेरा ख्वाहिश अपनी सच्ची लगन से देश का गौरव बढ़ाना है। 

इसी तरह, बड़ौत नगर की सोनिया पैरों से विकलांग है, लेकिन वह अच्छी निशानेबाज है और आजकल जौहड़ी गांव में भारतीय खेल प्राधिकरण के केंद्र पर प्रशिक्षण ले रही है। उसके पास एयर पिस्टल भी नहीं है लेकिन उधार की पिस्टल से प्रशिक्षण लेकर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंच गई है। उसका कहना है कि वह विकलांग है और हथियार भी उसके पास नहीं है लेकिन अपनी मेहनत के बल पर वह विदेशों तक में नाम रोशन करेगी। ऐसे ही खेड़की गांव का रहने वाला आकाश भी विकलांग है। वह शाहमल रायफल क्लब बड़ौत पर निशानेबाजी का अभ्यास करता है। उसने स्टेट व नेशनल स्तर पर आठ पदक जीते हैं। पिछले साल उसका चयन जर्मनी में होने वाले व‌र्ल्ड कप के लिए हो गया था, लेकिन पासपोर्ट न बन पाने के कारण वह वह नहीं जा सका था। अब वह पूना में होने वाली मास्टर मीट शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लेने की तैयारी कर रहा है।

                 कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिलें झुककर सलाम करती है। देश और दुनिया के इन शारीरिक अक्षम इंसानों ने भी अपने जज्बे से अपनी मंजिल को अपने सामने झुका दिया है। बहरहाल, जिस तरह मुफलिसी और मायूसी के अंधेरों से निकलकर इस विकलांग खिलाड़ियों ने अपने हौसलों से खुद का आसमान तैयार किया है। जिस तरह इन खिलाड़ियों ने अपनी गरीबी और अक्षमताओं को पीछे ढ़केल दिया है, वह आने वाली पीढ़ी को अपने जज्बों और हौसलों पर भरोसा करने का पाठ साबित होगा। अब वह दिन दूर नहीं जब आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चे समझदार होते ही स्टेडियमों का रुख खुद कर लिया करेंगे। उनके लिए बस एक ही बात मायने रखेगी कि हौसला और हिम्मत हो तो विकलांगता तरक्की में आड़े नहीं आती। शारीरिक अक्षम पर हुनरमंद खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि आगे बढ़ने का जोश और जुनून अगर दिल में जगह बना ले तो इंसानी जज्बा हर कामयाबी को अपनी झोली में डाल लेता है।

--आकाश कुमार राय

Pages