सोमवार, 9 नवंबर 2009

प्यार को प्यार ही रहने दो...

हर अहद में हर चीज़ बदलती रही लेकिन

एक दर्द--मोहब्बत है जो पहले की तरह है।



प्यार का कोई इतिहास तो नहीं है, लेकिन इसका दर्द हमेशा एक जैसा ही है। अगर माना जाए, तो प्यार की शुरुआत दुनिया में आदम और हव्वा के ज़माने से हुई थी। लेकिन प्यार की मिसाल में किसी का नाम आता है, तो विदेश में रोमियो और जूलियट, तो हिंदुस्तान में लैला-मजनू और शीरी-फ़रहाद को प्यार की बेमिसाल मूरत माना जाता है। अपने प्यार के लिए इन्होंने दुनिया की तमाम बंदिशों को हंसते-हंसते पार कर लिया। अपने महबूब के लिए ज़माने के तानों से लेकर गोलियां तक खाईं, लेकिन प्यार का एहसास और दर्द कभी कम नहीं हुआ। तमाम मौसम बदले, रुत बदलीं, वक्त बदला, लोग बदले, लेकिन वो मीठा सा प्यार कभी नहीं बदला।

जब कोई आपसे प्यार का एहसास करता है, तो दिल में एक अजीब से हलचल होती है। कभी-कभी सपनों में किसी की छुअन महसूस सी होती है। कभी-कभी लगता है कि दुनिया में इसके सिवा कुछ भी नहीं है, दुनिया में सबसे हसीन अगर कुछ है, तो सिर्फ़ आपका महबूब और आपका प्यार है। फिर ज़माने की परवाह किसे होती है। आपका प्यार आपसे जितना दूर जाता है, उससे अपनेपन का एहसास और भी बढ़ जाता है। बदलते मौसम के साथ पल-पल प्यार के रंग भी बदलते हैं.. दुनिया और सपनीली हो जाती है... मन में कुछ-कुछ होता है, कई बार लगता है कि ये ज़मीन और आसमान एक क्यों नहीं हो जाते, कई बार दिल चाहता है कि सारा जहान झुककर आपके कदमों में गिरे।


बसंत के हसीन मौसम में प्यार को पंख लग जाते हैं। अपने महबूब के साथ सपनों की दुनिया बसाई जाती है... लेकिन वक्त बदला तो प्यार का अंदाज भी बदल गया। बाग-बगीचों और प्रेम पत्रों से निकलकर प्यार रेसत्रां और पार्क में पहुंच गया। लव-लेटर की जगह -मेल और एसएमएस ने ले ली... मोबाइल पर बतियाने का जो दौर शुरु होता है, वो घंटो तक चलता है....लंबी बातचीत के बाद भी लगता है, कि अभी तो बात ही क्या हुई है। ऐसे में मोबाइल कंपनियां भी धड़ल्ले से फायदा उठा रही हैं। प्यार के इस एहसास को हर कोई कैश कराने में लगा है। जेब हल्की हो रही है... गर्लफ्रेंड को रिझाने के लिए बाज़ार भी नये-नये नुस्खे ला रहा है।

प्यार का एहसास कराने के लिए वेलेंटाइन डे नाम का एक त्योहार ही चल निकला है। प्यार मॉर्डन हो गया है, लेकिन प्यार करने वाले अब भी ज़माने से नहीं डरते, प्यार पर पहरा लगाने वाले हर दौर में थे और आज भी हैं। आदिम युग में प्यार करने वालों को पत्थर मार-मार कर कुचल दिया जाता था, सलीम और अनारकली को भला कौन भूल सकता है। एक कनीज को अपना प्यार अमर करने के लिए दीवार में चुन जाना कबूल था।... वक्त बदला, सदियां बदली, लेकिन तो प्यार के दुश्मन बदले, प्यार का अंदाज़ बदला और ही प्यार के एहसास में कोई कमी आई। लेकिन अब प्यार पर पहरा लगाने वाले ज़ालिम ही नहीं जल्लाद भी हो गये।

चाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो, या हरियाणा, प्यार की ख़ता सिर्फ़ मौत होती है। वहशियाना मौत, ऐसी मौत जिसमें मां-बाप और भाई-बहन ही अपने जिगर के टुकड़ों का क़त्ले-आम कर देते हैं। बात-बात में पश्चिम की नकल कर मॉडर्न होने का दम भरने वाले हम लोग इस मामले में मॉर्डन बनने की कोशिश कतई नहीं करते। मां-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की छूट खुलेआम देते हैं, समाज के ठेकेदार फ्लेक्सीबिलिटी की बात करते हैं, लेकिन जब कोई ज़माने के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है, तो यही ज़माना दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।

फिर मज़हब और जात-बिरादरी का रोना रोया जाता है। हिंदू और मुसलमान पर बहस होती है, मांगलिक और गैर मांगलिक पर बहस होती है। हरियाणा की खाप पंचायत के फैसलों को कौन भूला होगा, प्यार कर अपनी नई दुनिया बसाने वाले एक युवक को सिर्फ़ इसलिये मार डाला गया, कि उसने एक ही गोत्र में शादी की थी, लेकिन हुआ क्या? खूब हो-हल्ला मचा, लेकिन वोट के ठेकेदारों के मुंह से उफ़्फ़ तक नहीं निकली... लेकिन सलाम है...प्यार के परिंदों को जिन्होंने हर अहद में अपने प्यार को अमर रखा, और ज़माने की हर दीवार को गिरा दिया।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

क्यों नहीं...


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ज़माने के अंदाज़ में ढ़लता क्यों नहीं,
मैं वक़्त के साथ बदलता क्यों नहीं।
 बच्चों सा मासूम क्यों घूमता हूँ आज भी,
तजुर्बे की आंच में जलता क्यों नहीं।
पीले ही नहीं पड़ते मेरे चाहतों के पन्ने,
मेरे दोस्तों का नाम बदलता क्यों नहीं।
राहों में मिलने वाले बन जाते हैं राहबर,
मैं अकेले कभी सफर पे निकलता क्यों नहीं।
हस भी नहीं पाते जिन चुटकुलों पे और सब,
हस-हस के उनपे मेरा दम निकलता क्यों नहीं।
निकल पड़ता हूँ करके इरादा पक्का,
नाकामियों पे भी हाथ मैं मलता क्यों नहीं।
ना जाने क्यों ऐसा बनाया है खुदा ने मुझे,
इस खुदगर्ज दुनिया में क्यों सजाया है मुझे।
 शायद उसे भी पुरानी चीजों से लगाव है,
शायद यही वजह की मेरा ऐसा स्वभाव है।
काले बादलों में सुनहरे उजाले नज़र आते हैं,
इस दौर में भी मुझे लोग प्यारे नज़र आते हैं।
ना जाने ज़माने से क्यो इतना जुदा हूँ मैं,
लगता है की नए शहर में गुमशुदा हूँ मैं।
मैं वो गीत हूँ जो अब कोई सुनता नहीं,
हकीक़त के हादसों में सपना कोई बुनता नहीं।
फिर मैं ही क्यों वक़्त के साथ बदलता नहीं।
क्यों मैं ज़माने के अंदाज में ढ़लता नहीं..।

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

sawaal-jawaab


Aaj Ka Topic……. Pyaar…


………….. MY FAVORITE…………


mat karo koi wada jise tum nibha na sako,

mat chaho use jise tum pa na sako,

pyar kahan kisi ka poora hota hai,

iska to pehla shabd hi adhoora hota hai





...............ISKA JAWAB...............


mana ki pyaar ka pehla akshar adhura hai,

lekin 'p' ko nikal do to yaar rah jata hai

aur aap jaisa yaar ho

to zindagi se bhi pyar ho jata hai





SO…. REMEMBER ALWAYS………..


Yun to pyar karne waale tumhein kam na milengey,

Mil jaengey hum jaise bohot ,,, per hum na milengey.




...............NOW ENJOY...............


unhe bhoolne ki koshish ki maine,

dil ne kaha yaad karte rehna...

wo hamare dard ki fariyad sune na sune,

apna to farz hai unhe pyar karte rehna.......!!!!!

MITRA KA PAIGAAM THA ACHCHHA LAGA MUJHE ISS LIYE YAHA PE CHASPA DIYA...
SOCHA AAPKO BHI ACHCHHA LAGEGA...

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

तुम समझो....

हमारी मुश्किलें जानों, हमारे गम तो तुम समझो।
कभी तो इस तरह भी हो, मुकम्मल हमको तुम समझो।
बहुत दिन बाद तुमने फिर पुराने पृष्ठ खोले हैं।
उन्हें पढ़कर जो आखें नम हुई, उस नमी को समझो।

नसीहत बाद में देना कि आसान हैं सब राहें।
चलो कुछ दूर पहले और पेचोंखम को तो समझो।
बचाकर हमने जो रखा है उस संयम को तुम समझो।
जिधर देखों उधर हालात बेहद जानलेवा है...
अगर हम फिर भी जिंदा हैं तो हमारे दम को तुम समझो।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

प्यार की शिद्दत...

शरम आई उन्हें इस शिद्दत से, कि वो नजरें झुका बैठे।
तब उन्हें देखने की खातिरहम उनका चिलमन उठा बैठे।
झुकी नजरें, लरजते लब.. धड़कता दिल और मोहब्बत।
हम यूं देखकर उनकोअपनी दिल गुमां बैठे।
हसीं थी सुहानी शामऔर दिलों में मोहब्बत।
हम एक-दूसरे सेकर वादा-ए-वफा बैठे।

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