गुरुवार, 29 सितंबर 2011

अब कहां दोस्त मिले साथ निभाने वाले

अब कहां दोस्त मिले साथ निभाने वाले,

सबने सीखे हैं नये अंदाज जमाने वाले।


दिल जलाओं या दिये आखों के दरवाजों पर,

वक्त से पहले तो आते नहीं आने वाले।


अश्क बन कर मैं तेरी निगाहों में आऊंगा,

ऐ मुझे अपनी निगाहों से गिराने वाले।


वक्त बदला तो उठाते हैं उंगली मुझ पर,

कल तलक हक में मेरे हाथ उठाने वाले।


वक्त हर जख्म का मरहम नहीं हो सकता,

कुछ दर्द होते हैं ता-उम्र रूलाने वाले।


मैं तेरी सोहबत पर रंज भी करूं तो कैसे,

ये रूशवाई भी डालेंगी मेरी दोस्ती में दरारें।


कभी खुद को मानु भी दोषी तो भला क्या हो,

हमने जुर्म ही किये हैं बस तेरे तरक्की वाले।


सोमवार, 26 सितंबर 2011

तीसरे मोर्चे के लिए दिल्ली अभी दूर!

राजनीति में मतदाताओं को लुभाना तथा विकास व सुविधाओं के आश्वासन पर लोगों को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया में अब तीसरा मोर्चा भी अपना स्थान तलाशने में जुट गया है । इस बाबत कुछ पार्टियां फिर से एक साथ आने को तैयार दिख रही है। वैसे तो इससे पहले भी वह एक बार हाथ मिला चुकी हैं लेकिन कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी।

वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर तीसरा मोर्चा गठजोड़ बनाने में जुटता नजर आ रहा है। इस बाबत समाजवादी पार्टी और वामपंथी आपस में हाथ मिलाकर सत्तारूढ़ सरकार और प्रमुख विपक्षी पार्टी को पछाड़ने तथा सत्ता में आने की जुगत भिड़ाने में लग गये हैं। हलांकि इस तीसरे मोर्चे की सोच काफी हल्की लगती है क्योंकि न तो इनके पास कोई ठोस मुद्दा है और न ही सरकार को घेरकर सत्ता हथियाने वाला कोई चेहरा। यहां यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर बिना चेहरे और मुद्दे के कोई भी गठबंधन सत्ताशीन कैसे हो सकता है?

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो अन्य मोर्चा के लिए अभी भी परिस्थितियां प्रतिकूल नहीं है कि वह लोकसभा स्तर पर कांग्रेस या भाजपा के हाथों से सत्ता का मांझा खींच सके। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा ही सत्ता के लिए प्रमुख उम्मीदवार हैं, जिनके मांझे पर जनता के विश्वास का शीशा पूरी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसे में वह किसी भी तीसरे मोर्चे के सूती धागे को आसानी से कांट देंगे। जबकि तीसरे मोर्चे को मजबूती से सामने लाने की कवायद के बीच भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा का कहना है कि दोनों प्रमुख पार्टियां (कांग्रेस व भाजपा) जब जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व को ठीक से नहीं निभा रही हैं तो एक विकल्प के तौर पर तीसरे मोर्चे को लाना आवश्यक हो जाता है। इस लिए भाकपा अपने विचारों और देश के प्रति समर्पित विचारों वाली पार्टियों को एकत्रित करने में जुट गयी है।

तीसरे मोर्चे के लिए लामबंद हो रहे लोगों के बारे समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिवेश में तीसरा मोर्चा ही समस्याओं से हलकान जनता के लिए राहत लायेगी। वहीं तेलगुदेशम पार्टी के नेता नामा नागेश्वर राव ने कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी पार्टी भी अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों की भांति ही सोचती है। इसके लिए भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की वकालत भी करती हैं। ओ़डिशा में शासन कर रही बिजद वैसे तो वैचारिक तौर पर भाजपा और कांग्रेस से काफी अलग है पर तीसरे मोर्चे के लिए उसने अभी कोई मन नहीं बनाया है। वहीं तमिलनाडु में पूर्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) का कांग्रेस के साथ गठबंधन रहा है, अब सत्ता में आई अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम(एआईआईडीएमके) राज्य में लेफ्ट के साथ जुड़ी हुई है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर एआईआईडीएमके का भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना ज्यादा हैं।

भाजपा और कांग्रेस से इतर बाकी सारी छो़टी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के विचारों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को देखते हुए राजनीतिक विशेषज्ञों का यही कहना है कि अभी तीसरा मोर्चा किसी प्रकार की शक्ति प्रदर्शन के लायक नहीं है। जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त के प्रोफेसर निसार उल हक का कहना है कि तीसरे मोर्चे का प्रदर्शन इस लिए दमदार नहीं होगा क्योंकि वर्तमान में वामपंथी खुद चोटिल हैं तो वह औरों को कैसे मजबूत करेंगे। इसी प्रकार, राजनीतिक विश्लेषक जी.वी.एल. नरसिम्हा राव का कहना है कि बीते हालातों को देखते हुए अब जनता भी सावधान हो गयी है। इस लिए वह भी तीसरे मोर्चे पर दाव लगाने की नहीं सोच रहें कि कुछ दिनों बाद ही यह मोर्चा फिर अस्थायी स्थिति बना देगा। विदित हो कि 1996 में देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी तीसरे मोर्चे की सरकार अपना कार्यकाल दो साल भी पूरा कर सकी।

तीसरे मोर्चे की प्रमुख पार्टियों की स्थितियां भी पहले से तो बेहतर है पर ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। समाजवादी पार्टी जहां केवल उत्तर प्रदेश में मजबूत हैं,जहां कुछ 545 लोकसभा सीट में 80 सीटे हैं। इसी प्रकार वामपंथ का केरल (20) और पश्चिम बंगाल (42) को छोड़कर कहीं भी आधार नहीं है। ऐसे में बिहार में अस्तित्व तलाश रही राष्ट्रीय जनता दल व लोकजनशक्ति पार्टी से तीसरे मोर्चे को बहुत अधिक उम्मीद नहीं है। सत्ता में बने रहने की लालसा लिये इन क्षेत्रीय पार्टियों का तीसरे मोर्चे से जुड़ने की संभावना कम ही है। ऐसा ही कुछ हाल जनता दल-सेकुलर और जनता दल यूनाइटेड का भी है। ऐसे में आपसी खींचतान के बीच कुछ एक पार्टियां मिलकर तीसरे मोर्चे को मजबूती नहीं दे पायेगी।

एक अन्य राजनीतिक जानकार भास्कर राव का कहना है कि दिल्ली की सत्ता से विरोध के भाव क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ तो ला सकते हैं लेकिन यह पार्टियां विकल्प के तौर पर नहीं उभर सकती। मुद्दों और साफ छवि के कद्दावर चेहरे की कमी के कारण ही तीसरे मोर्चे की भारतीय जनमानस के बीच अपनी पैठ बनाने की संभावना न के बराबर है।


शनिवार, 24 सितंबर 2011

"चिंगारी कहीं आग में ढलती ना चली जाये"

चिंगारी कहीं आग में ढलती ना चली जाये,

गर्मी-ए-सियासत कहीं बढ़ती ना चली जाये।


खा तो रहा हैं मुल्क रोज जख्मे-सियासत,

ये चोट हैं, नासूर में ढ़लती ना चली जाये।


सर कटाया था जिसको बचाने के वास्ते,

डर हैं कहीं आज वो पगड़ी ना चली जाये।


बढ़ तो रहें हैं तेरे सितम पर ये सोच ले,

मेरी भी हिम्मत कहीं बढ़ती ना चली जाये।


सोये हैं इस कदर तेरे ख्वाबों की चाह में,

कहीं नींद ये आँखों में चुभती ना चली जाये..।"


ख्वाहिश हम भी सजा बैठे...

"ख्वाहिशों की महफील थी यारों,

एक ख्वाहिश हम भी सजा बैठे,

उसे पाने की ख्वाहिश को,

दिल की ख्वाहिश बना बैठे।


उसके चेहरे पे एक नूर था,

जिसने नूर ही नूर में, हमें बेनूर कर दिया...


दिल भागा सीने से निकल कर, ऐसा की यारों,

कम्बख्त ने हमें, टकटकी लगाने का मजबूर कर दिया।


हर एक लम्हें में, सीने से निकली थी दुआयें...

दुआओं ही दुआओं का, काफिला चल पड़ा...


हर एक दुआ में, खुदा से मांगा उसे... और फिर...

रो-रो कर उसे मांगने का, सिलसिला चल पड़ा...।"


छायी फिर से बहार हो जैसे...

"छायी फिर से बहार हो जैसे
हल्का हल्का खुमार हो जैसे

रात भर थे तुम ही ख्यालों मे
दिल को तुमसे ही प्यार हो जैसे

बात ऐसी वो कह गया सब से
बस मेरा ऐतबार हो जैसे

हर घडी देखता हैं वो मुझको
रखता मेरा ख्याल हो जैसे

कितने खामोश है लब उसके
दिल मे कोई गुबार हो जैसे

जुस्तजू में तेरी रहा हर दिन
वो कोई ख़ाक सार हो जैसे

रहती है बस नमी सी आँखों मे
अब भी कोई इन्तजार हो जैसे

मर के भी नाम था तेरा लब पे
जाँ ये तुझ पे निसार हो जैसे....!"

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

खुदाई का आलम...

"हो जाये असर कोई शायद दुआओं से

ये दर्दे-जिगर बढ़ने लगा हैं दवाओं से


हैं इश्क गर तो बाजियाँ दिल की ही लगेंगी

डरते हो मियाँ इतने भला क्यूँ खताओं से


नजरे बचा के देखता हूँ सबसे उसे रोज

मुझे देखता हैं वो भी तिरछी निगाहों से


रातों में जागते हो मेरी नींदों में आकर

दिन में भी निकलते नहीं हो तुम निगाहों से


आकर के मेरे दर से वापस ना चले जाना

तुम को ही हर रोज माँगा हैं खुदाओं से......"


बुधवार, 21 सितंबर 2011

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है...

"हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनीसी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है।"

कुछ यादों के मंजर...

"आज फिर कुछ पुराना मंजर याद आने लगा है,
उन हसीन लम्हों को सोच मन हर्षाने लगा है,
कभी हर पल की जिद्द पर कोई ख्वाहिश पूरी होती,
आज ख्वाहिशे हैं हल पल बस जिद्द अधूरी सोती!

हमारी शरारतों पर उन दिनों मिलती हमें लोरियों की थाप थी,
आज दिल खोजता उस डांट को, जिसमे कभी दुलार की छाप थी!

जाने क्यों वक़्त दूरियों की इतनी पाबन्द होती है,
कि समय के साथ बदलाव की बाते बुलंद होती हैं,
क्यों नहीं सब रिश्तें हर समय एक समान होते हैं,
क्यो बचपन बीतने पर हम नींद-ओ-चैन खो देते हैं।

जब कभी इन बातो पर आता विचार, होते हम शर्मिंदगी से चूर,
आखिर क्यों अपनों से हैं हम दूर, कि क्यों हम हैं इतने मजबूर...!"

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

श्रीमान भरोसेमंद राहुल 'द वाँल' द्रविड...


हाल ही में टीम इंडिया ने इंग्लैण्ड दौरा पूरा किया। इस सीरीज ने वनडे और टेस्ट स्तर पर विश्व चैम्पियन टीम इंडिया को अर्श से फर्श पर धकेल दिया। भारत इंग्लैण्ड से चार टेस्ट और पांच वनडे और एकमात्र टी-20 में परास्त हुआ। इंग्लैण्ड हर स्तर पर भारत पर हावी रहा। खेल के हर मैदान में उसके खिलाडी हमारे खिलाडियों पर हावी रहे। इस सीरीज की समाप्ति से पहले ही भारत के एक से क्रिकेटर ने सन्यास लेने की घोषणा कर दी थी, जिसे दुनिया द वाल, मिस्टर रिलाइबल, भरोसेमन्द के नाम से पुकारते हैं। यह खिलाडी रहा राहुल शरद द्रविड जिसे टीम इंडिया और मीडिया में राहुल द्रविड के नाम से पुकारा जाता है। अपने 16 साल के करियर में करीब-करीब बेदाग रहने वाले द्रविड पर भारतीय टीम की कप्तानी करते हुए 2004 में गेंद से छेडछाड के आरोप के अतिरिक्त अन्य कोई आरोप नहीं लगा। शांत स्वभाव के राहुल बेहद सादगी और शांति से अपने करियर को अलविदा कह गए। पेश है राहुल के करियर से सम्बन्धित कुछ रोचक जानकारियां-

भारतीय क्रिकेट टीम की द वॉल (दीवार) के नाम से प्रसिद्ध राहुल द्रविड का जन्म इंदौर (मध्य प्रदेश) के कर्नाटक में रहने वाले एक मराठा परिवार में हुआ। मध्यक्रम के भरोसेमंद बल्लेबाज का पूरा नाम राहुल शरद द्रविड है। उनके पूर्वज थंजावुर तमिलनाडु के अय्यर थे। द्रविड बैंगलूर में बडे हुए। हिन्दी अंग्रेजी के साथ-साथ मराठी और कन्नड बोलने वाले राहुल के परिवार में माता-पिता के अलावा एक भाई है। उनके पिता प्राइवेट फर्म में काम करते हैं और माता वास्तुकला की प्रोफसर हैं। उनकी पत्नी नागपुर में सर्जन हैं। द्रविड ने क्रिकेट की दुनिया में अपना एक अहम् स्थान बनाया है। स्वभाव से शान्त रहने वाले द्रविड ने विश्व क्रिकेट में अपने नाम कई रिकॉर्ड्‌स बनाए हैं, जिनकी वजह से उन्हें लम्बे समय तक याद किया जाएगा।

पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर और मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बाद वे तीसरे से बल्लेबाज है, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 10 हजार से अधिन रन बनाए हैं। 14 फरवरी 2007 को राहुल द्रविड विश्व क्रिकेट के छठे और टीम इंडिया के तीसरे से खिलाडी बने जिन्होंने एक दिवसीय क्रिकेट में दस हजार रन के आंकडे को छुआ। इसके अतिरिक्त द्रविड के नाम 182 कैच और अन्य बल्लेबाजों के साथ भागीदारी करते हुए 75 मर्तबा शतकीय साझेदारी को पूरा करने का विश्व रिकॉर्ड है। इस विश्व रिकॉर्ड में उनके साथ 18 बल्लेबाजों के नाम जुडे हैं।

राष्ट्रीय टीम में स्थान बनाने से पहले राहुल द्रविड ने अंडर-15, अंडर-17 और अंडर-19 के स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व किया। फरवरी 1991 में उन्हें पुणे में महाराष्ट्र के खिलाफ रणजी ट्राफी की शुरूआत करने के लिए चुना गया। उस वक्त वे द्वितीय वर्ष की पढाई कर रहे थे। इस मैच में राहुल द्रविड ने 82 रन का योगदान अपनी टीम को दिया था। यह स्थिति तब थी जब वे 7वें स्थान पर बल्लेबाजी करने उतरे थे। द्रविड ने अपने वनडे करियर का पहला मैच अप्रैल 1996 में श्रीलंका के खिलाफ सिंगापुर में खेला था। द्रविड ने वनडे में 343 मैचों की 317 पारी खेली है और 39.06 की औसत से 10820 रन बनाए है। जिसमें 83 अर्द्धशतक और 12 शतक शामिल है।

द्रविड ने अपने टेस्ट करियर का आगाज जून 1996 में इंग्लैड के खिलाफ लाड्‌स में किया था। द्रविड की टेस्ट मैचों की बात करें तो 157 मैचों में 273 पारी खेली है और 53 की औसत से 12,775 रन अपने किए है। जिसमें 60 अर्द्धशतक और 35 शतक शामिल है। करियर की शुरूआत मार्च 1996 में श्रीलंका के खिलाफ अपना करियर शुरू करने वाले द्रविड को इस सीरीज के बाद टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद उन्हें इंग्लैण्ड दौरे के लिए चुना गया। करियर के आठवें साल में उन्हें टीम इंडिया का कप्तान नियुक्त किया गया था। लगभग चार वर्ष तक उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाई, लेकिन इस दौरान टीम इंडिया के लिए राहुल सा कोई चमत्कार नहीं कर पाए जिससे टीम इंडिया का मनोबल ऊंचा उठता या फिर विश्व क्रिकेट में वह अपने नाम को सार्थक सिद्ध कर पाती। सितम्बर 2007 में उन्होंने अपने इस पद से इस्तीफा दे दिया।


वर्ष 2000 में द्रविड को पांच सर्वश्रेष्ठ विजडन क्रिकेटरों में शामिल होने पर सम्मानित किया गया था। शतक लगाने का रिकार्ड हाल ही खत्म हुए इंग्लैण्ड दौरे के दौरान द्रविड ने चार टेस्ट मैचों में तीन शतक की बदौलत भारत की तरफ से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाडी का खिताब पाया। जिसके लिए उन्हें "मैन आफ द सीरीज" अवार्ड से नवाजा गया। इस सीरीज में राहुल ने करियर का 35वां शतक लगाकर ब्रायन लारा और सुनील गावस्कर की बराबरी करने के साथ विश्व क्रिकेट में सबसे ज्यादा टेस्ट शतक बनाने वालों की सूची में चौथा स्थान पाया।

टेस्ट के साथ-साथ एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक शतक बनाने का गौरव भारत के मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के नाम है। सचिन ने 51 टेस्ट शतक के साथ 49 एक दिवसीय शतक बनाए हैं। अभी सम्पन्न हुई इंग्लैण्ड सीरीज में राहुल ने पारी की शुरूआत करने वाले खिलाडी के रूप में एक नया रिकॉर्ड बनाया जो अन्त तक नाबाद रहा। यह उपलब्धि उन्होंने चौथे टेस्ट मैच में अर्जित की। इस टेस्ट मैच में उन्होंने सुनील गावस्कर और वीरेन्द्र सहवाग की बराबरी की।

रन आउट होने का रिकार्ड
10 सितम्बर 2011 में इंग्लैण्ड के खिलाफ ओवल वनडे में राहुल द्रविड 2 रन बनाकर रन आउट होकर भी क्रिकेट में एक अनोखा रिकार्ड बनाए। वनडे करियर में ये 40वां मौका है जब राहुल रन आउट हुए। इस तरीके से आउट होकर द्रविड ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इजमाम उल हक की बराबरी कर ली है। इंजी भी वनडे करियर में कुल 40 बार से आउट हुए। वनडे में सर्वाधिक बार रन आउट होने का रिकार्ड श्रीलंका के पूर्व कप्तान मरवन अट्टापट्टू के नाम है। मरवन कुल 41 बार रन आउट हुए। टेस्ट में ये कारनाम सर्वाधिक बार आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग ने किया पोटिंग सर्वाधिक 14 बार रन आउट हुए है।

सबसे अधिक उम्र के खिलाडी का रिकार्ड
31 अगस्त 2011 इंग्लैण्ड के खिलाफ टी-20 मैच खेलते हुए राहुल द्रविड ने एक और उपलब्धि अपने नाम की। वे टीम इंडिया के से पहले खिलाडी बने, जिन्होंने 38 वर्ष 232 दिन की उम्र में अपना पहला और आखिरी टी-20 मैच खेला। विश्व क्रिकेट में वे से तीसरे खिलाडी हैं जिन्होंने इतनी बडी उम्र में टी-20 मैच खेला है। राहुल से पहले दो कनाडाई बल्लेबाजों एस धनीराम और एस थुरइसिंघम है। धनीराम ने 39 साल और 290 दिन की उम्र में अपना पहला टी-20 खेला था। इसके बाद थुरइसिंघम ने जब अपना पहला टी-20 मैच खेला था। उस समय उनकी उम्र 38 साल और 326 दिन थी।

सर्वाधिक गेंदें खेलने का रिकार्ड
22 जुलाई 2010 में गाले में चोटी के बल्लेबाज राहुल द्रविड ने श्रीलंका के खिलाफ पहले टेस्ट मैच के दौरान एक अनोखा रिकार्ड बनाया। वे टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक गेंद खेलने वाले बल्लेबाज बने। द्रविड टेस्ट मैचों में 27 हजार अधिक गेंद खेलने वाले बल्लेबाज बने। इस मामले में उन्होंने आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान एलन बोर्डर के 27,002 गेंद खेलने के रिकार्ड को पीछे छोडा। इन दोनों के बाद सचिन तेंदुलकर और दक्षिण अफ्रीका के जैक कॉलिस का नंबर आता है, जिन्होंने करीब 25 हजार गेंद खेली हैं।

सर्वाधिक कैच लेने का रिकार्ड
27 दिसंबर 2010 को डरबन में अपना 149वां टेस्ट खेलते हुए राहुल द्रविड ने दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज डेल स्टेन का कैच लेने के साथ ही एक रिकार्ड बनाया। इस कैच के साथ ही उन्होंने 200 कैच लेने का जादुई आंकडा छुआ। विश्व क्रिकेट में वे इस उपलब्धि को हासिल करने वाले इकलौते भारतीय खिलाडी हैं। फिलहाल अन्य किसी देश का कोई खिलाडी इस मामले में उनके मुकाबले में नहीं है। टेस्ट मैचों में सर्वाधिक कैच लपकने की सूची में आस्ट्रेलिया के मार्क वॉ दूसरे स्थान पर हैं। मार्क के नाम 181 कैच दर्ज हैं। द्रविड ने 2004-05 में खेली गई गावस्कर-बार्डर श्रृंखला के दौरान चार टेस्ट मैचों में 13 कैच लपके थे। किसी एक श्रृंखला में सर्वाधिक कैच लपकने के मामले में द्रविड तीसरे स्थान पर हैं। द्रव़िड ने 339 वनडे मैचों में भी 196 कैच लपके हैं। इसके साथ ही द्रविड ने विकेटकीपिंग करते हुए 14 खिलाडियों को स्टम्पिग के जरिए आउट किया है।

गेंद छेडछाड हादसा
अपने पूरे करियर में बेदाग रहने वाले राहुल के खिलाफ टीम इंडिया की कप्तानी करते हुए जनवरी 2004 में गेंद से छेडछाड का आरोप लगा। जिम्बाब्वे के खिलाफ खेलते हुए द्रविड गेंद के साथ छेडछाड करने के दोषी पाए। मैच रैफरी क्लाइव लॉयड ने कहा कि राहुल ने गेंद में किसी ऊर्जाकारी चीज का प्रयोग किया, जो एक अपराध है। हालांकि द्रविड इस बात से इनकार करते रहे। मैच रैफरी लॉयड के कहने पर इसे टीवी फुटेज में बार-बार दिखाया गया। भारतीय टीम के कोच जॉन राइट ने द्रविड के बचाव में आते हुए कहा कि यह गलती जानबूझ कर नहीं की गई। द्रविड ने आईसीसी के नियमों के कारण घटना पर किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं की, लेकिन पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने जरूर कहा कि द्रविड का कार्य एक दुर्घटना है। राहुल द्रविड की उपलब्धियां एक नजर में 1999 विश्वकप के सीएट क्रिकेटर 2000 में विसडेन क्रिकेटर 2004 सर गारफील्ड सोबर्स ट्राफी विजेता (वर्ष के आईसीसी प्लेयर के लिए सम्मानित किए गए) पुरस्कृत 2004 में पश्री पुरस्कार 2006 में आईसीसी की टीम की

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राहुल की उपलब्धि टेस्ट क्रिकेट में "मैन आफ द सीरीज" पुरस्कार
2002 में इंग्लैड के खिलाफ 602 रन 10 कैच
2003-04 आस्ट्रेलिया के खिलाफ 619 रन 4 कैच
2006 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 496 रन 8 कैच "मैन आफ द मैच" पुरस्कार
1996-97 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 229 रन और 2 कैच
1996-97 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 92 रन
2002-03 में इंग्लैण्ड के खिलाफ 148 रन और 3 कैच
2002-03 में इंग्लैण्ड के खिलाफ 217 रन और 3 कैच
2003-04 में न्यूजीलैण्ड के खिलाफ 295 रन और 3 कैच
2003-04 आस्ट्रेलिया के खिलाफ 305 रन और 3 कैच
2003-04 में पाकिस्तान के खिलाफ 271 रन और एक कैच
2004-05 में पाकिस्तान के खिलाफ 245 रन और एक कैच
2006 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 149 रन और एक कैच
एकदिवसीय क्रिकेट में मैन ऑफ द पुरस्कार
1996 में पाकिस्तान के खिलाफ 46 रन
1996-97 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 84 रन
1998-99 में न्यूजीलैण्ड के खिलाफ 123 नाबाद
1998-99 में न्यूजीलैण्ड के खिलाफ 51 रन
1999 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 77 रन
2001 में जिम्बाब्वें के खिलाफ 72 रन नाबाद
2002 में श्रीलंका के खिलाफ 64 रन
2004 में संयुक्त अरब अमीरात के खिलाफ 104 रन
2005 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 52 रन नाबाद
2005-06 में श्रीलंका के खिलाफ 85 रन
2005-06 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 78 रन नाबाद
2005-06 मे पाकिस्तान के खिलाफ 92 रन
2006 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 105 रन
2007 में इंग्लैण्ड के खिलाफ 92 रन नाबाद।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

श्रीमान भरोसेमंद का रंगीन लबादे को अलविदा


भारतीय विकेटों के पतझड़ की घड़ी में आएगी ‘द वॉल' की याद
नई दिल्ली, 17 सितंबर। भारतीय बल्लेबाजी के मध्यक्रम की रीढ़ कहे जाने वाले राहुल द्रविड़ ने रंगीन लबादे के क्रिकेट प्रारूप को अलविदा कह दिया है। अपने 15 साल के एकदिवसीय करियर से विदाई लेते हुए द्रविड़ को भी तकलीफ हुई होगी लेकिन एक संतोष रहा होगा कि उन्होंने टीम को अपना भरपूर साथ दिया। पर इससे उलट उनके प्रशंसकों को जब भी एकदिनी मैच में विकेटों का पतझड़ देखने को मिलेगा, इस जीवट बल्लेबाज की कमी खलेगी।

आज से 15 वर्ष पूर्व यानि 1996 में क्रिकेट में पदार्पण करने वाले इस खिलाड़ी के बारे एक ही मिथ प्रचलित था कि यह धीमी गति का सुस्त बल्लेबाज है, जो एकदिवसीय फार्मेट में फिट नहीं आयेगा। 03 अप्रैल 1996 को श्रीलंका के खिलाफ खेले अपने पहले वनडे मैच में कुछ खास कमाल नही कर पाये थे, साथ ही काफी गेंदों का सामना भी किया। उनकी इसी प्रदर्शन को देखते हुए विशेषज्ञों ने कहा था कि द्रविड़ को काफी गेंदे चाहिए होती है जमने के लिए फिर उसके बाद वह रन बनाते है, तब तक मैच अंतिम मोड़ पर होता है। इस बैटिंग स्टाईल के कारण द्रविड़ शुरूआती करियर में एकदिनी मेचों को हिस्सा नहीं हो सके थे।

अपनी आलोचनाओं पर द्रविड़ ने एक बार कहा भी था, ‘शायद मैं एकदिनी फार्मेट को नहीं समझ पाया। मूझे पता है कि मैं क्रिकेट के इस प्रारूप में फिट नहीं हूं और न ही मैं गॉड गिफ्टेड हूँ पर मेरे पास हार न मानने और लगातार प्रयास करने की क्षमता है, जिससे मैं इस प्रारूप को भी समझ जाउंगा।' अपनी बातों को सही करते हुए द्रविड़ ने दिखा दिया कि कोशिश में अगर सच्चाई हो तो वह मंजिल का पा ही लेती है। द्रविड़ के वनडे क्रिकेट की उपलब्धियों पर नजर दौड़ाई जाये तो उनके खाते में पहला शतक (107 रन) 21 मई 1997 को चैन्नई में पाकिस्तान के विरूद्ध आया था। इसके साथ ही 300 से अधिक रनों की साझेदारी दो बार करने वाले एकमात्र बल्लेबाज हैं। द्रविड़ के नाम सचिन के साथ मिलकर 331 रन की विश्व रिकार्ड साझेदारी का कीर्तिमान भी है, जो उन्होंने न्यूजीलैंड के विरूद्ध बनाया है।


स्लो बैटिंग के लिए बार-बार आलोचनाएं झेलने वाले राहुल "द वॉल' द्रविड़ के नाम भारत के लिए दूसरा सबसे तेज अर्धशतक बनाने का रिकार्ड है। उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 22 गेंदों में नाबाद 50 रन बनाए थे। एकदिवसीय करियर में 12 शतकों के साथ 83 अर्धशतक का कारनामा भी द्रविड़ के नाम है, अर्धशतकों की संख्या के मामले में उनसे आगे केवल सचिन तेंदुलकर (95) ही हैं। इससे अतिरिक्त 79 मैचों में कप्तानी और 73 मैचों में विकेटकीपिंग भी की है। द्रविड़ ने अपने करियर में अपने विरोधियों और आलोचकों सभी को बल्लेबाजी से जवाब दिया है, और इनकी जवाबदेही की विपक्षी टीम भी कायल रही है। द्रविड़ का यही हुनर कि चाहे गेंदबाज कितने ही जतन करे द्रविड़ रन बनाने की जुगत खोज ही लेते हैं। राहुल के बारे एक कमेंटेटर ने कहा भी था, ‘है जुबां खामोश, बल्ला गवाही देगा... कोई कितना गढ़े किला, राहुल रन बना ही देगा।'

राहुल द्रविड़ को एकदिनी क्रिकेट से संयास लेने की बात कहने वाले आलोचक भी द्रविड़ की लगातार प्रदर्शन और सतत मेहतन की निष्ठा के कायल रहे हैं। अपने आखिरी एकदिवसीय मैच में शानदार पचासा लगाकर राहुल ने दिखा दिया है कि वह केवल इस लिमिटेड ओवर प्रारूप को अलविदा कह रहे हैं, क्रिकेट उनकी रगों में सदा समाहित रहेगा। गौरतलब हो कि 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वालों में द्रविड़ ही एकमात्र बल्लेबाज हैं, जिन्होंने अपने अंतिम मैच में अर्धशतक (69 रन, 79 गेंद) भी लगाया। गांगुली (11363), जयसूर्या (13430) और इंजमाम (11739) अपने अंतिम मैच में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके थे। विदाई मैच में जयसूर्या ने दो रन, गांगुली ने पंाच रन और इंजमाम ने 37 रन बनाये थे।


बुधवार, 14 सितंबर 2011

आखिरी मैच खेलने की हैट्रीक लगायेंगे द्रविड़

नई दिल्ली, 14 सितंबर (हि..)। भारतीय क्रिकेट टीम के बल्लेबाजी की रीढ़ रहे राहुल द्रविड़ के नाम तो वैसे कई विश्व रिकार्ड हैं लेकिन आगामी शुक्रवार 16 सितंबर 2011 एक और रिकार्ड बनाने जा रहे हैं। द्रविड़ इस दिन अपने करियर का आखिरी मैच खेलने की हैट्रीक लगायेंगे, क्योंकि इससे पहले वह दो बार और वनडे से बाहर होने के बाद उनके करियर खत्म होने की आशंका उठ चुकी है। इस बार यह आशंका नहीं बल्कि हकीकत है कि वह इंग्लैंड सीरीज के बाद वनडे से संयास ले लेंगे।

करीब चार साल पहले अक्तूबर 2007 में नौ मैच में 8.88 की औसत से 80 रन बनाने के कारण राहुल द्रविड़ को भारतीय एकदिवसीय टीम से बाहर कर दिया गया था। तब माना गया कि द्रविड़ का वनडे कैरियर समाप्त हो गया लेकिन दो साल बाद पुनः वापसी हुई और फिर टीम ने उन्हें बिसार दिया। अब इंग्लैंड में फिर से जरूरत के आधार पर चयनीत द्रविड़ ने संयास की घोषणा कर दी। बार-बार दो-दो साल के अंतराल पर टीम में जगह पाने वाले श्रीमान भरोसेमंद अब अंततः शुक्रवार को कार्डिफ में इंग्लैंड के खिलाफ वास्तव में अपना आखिरी वनडे मैच खेलेंगे।

राहुल द्रविड़ को इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट श्रंखला में शानदार प्रदर्शन के कारण वनडे टीम में चुना गया। उन्होंने तभी घोषणा कर दी थी कि वह इस सीरीज के बाद क्रिकेट के इस प्रारूप को अलविदा कह देंगे। इससे पहले भी दो अवसरों पर यह मान लिया गया था कि द्रविड़ अपना आखिरी वनडे खेल चुके हैं लेकिन वह टीम में वापसी करने में सफल रहे थे लेकिन अब फैसला स्वयं द्रविड़ ने किया है। अक्तूबर 2007 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ द्रविड़ का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था और इसके बाद जब पाकिस्तान की टीम भारत आई थी तो उन्हें टीम में नहीं चुना गया था। तब भी यह माना गया कि द्रविड़ ने 14अक्तूबर 2007 को अपना आखिरी वनडे खेल लिया है, लेकिन इसके लगभग दो साल बाद उन्हें शार्ट पिच गेंद खेलने और विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में खेले गए आईपीएल में अच्छे प्रदर्शन के दम पर श्रीलंका में त्रिकोणीय सीरीज और चैंपियन्स ट्राफी के लिए टीम में लिया गया।

द्रविड़ के वापसी पर तब चयनकर्ताओं के फैसले की कड़ी आलोचना हुई थी। जिसमें दिलीप वेंगसरकर भी शामिल थे जिनके चयनसमिति का अध्यक्ष रहते हुए द्रविड़ बाहर किए गए थे। वेंगसरकर ने कृष्णामाचारी श्रीकांत की अगुवाई वाली चयनसमिति के इस फैसले पर कहा था कि राहुल की इसलिए वापसी हुई है कि वह शार्ट गेंद को अच्छी तरह से खेलते हैं तो फिर यह भारतीय क्रिकेट के लिए चिंता का विषय है टीम फिर से पीछे देखने में लगी है। द्रविड़ को हालांकि दक्षिण अफ्रीका में खेली गयी चैंपियन्स ट्राफी के बाद फिर से बाहर कर दिया गया। उन्होंने इस बीच छह मैच में 180 रन बनाए जिनमें पाकिस्तान के खिलाफ सेंचुरियन में खेली गई 76 रन की पारी भी शामिल है। जब यह लगने लगा था कि द्रविड़ 30 सितंबर, 2009 को जोहानिसबर्ग में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना अंतिम वनडे खेल चुके हैं तब इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज में तीन शतक जड़ने के कारण द्रविड़ की वनडे सीरीज में फिर से वापसी हो गयी।

इंग्लैंड के खिलाफ वनडे श्रृंखला में द्रविड़ के चुने जाने पर चयनसमिति के पूर्व अध्यक्ष किरण मोरे और वेंगसरकर ने इस बार भी चयनकर्ताओं के फैसले पर नाखुशी जाहिर की थी। उन्होंने कहा कि था कि भले ही राहुल टेस्ट में अच्छा खेले हो पर वनडे में किसी युवा को ही तरजीह दी जानी चाहिए थी। हालांकि द्रविड़ ने अब तक खेले गए चार मैचों में टेस्ट सीरीज जैसी फार्म नहीं दिखाया है। उनसे उम्मीद की जा रही थी वह अच्छा प्रदर्शन करके अपना औसत 40 के ऊपर ले जाएंगे लेकिन चार मैच में 2, 32, 2, और 19 रन बनाने से अब उनका औसत 39 से भी नीचे गिरने का खतरा मंडराने लगा है। अब तक 39.06 की औसत से रन बनाने वाले द्रविड़ को 39 का औसत बनाए रखने के लिए कार्डिफ में अपने अंतिम वनडे में कम से कम 22 रन जरूर बनाने होंगे।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

मेरी पागल सी मोहब्बत तुम्हे याद आएगी


"जब चाँद सितारे चमक रहे हों,
जब यादों के फूल महक रहे हों,
जब दीद को नैन तरस रहे हों,
जब आँखों से आंसू बरस रहे हों!

मेरी पागल सी मोहब्बत तुम्हे याद आएगी!

जब तन्हाई से दिल घबराएगा,
जब तुम्हे अकेलापन सताएगा,
जब कोई ख्वाब भी नहीं आएगा,
जब फूल किताब में ही रह जाएगा,

मेरी पागल सी मोहब्बत तुम्हे याद आएगी!!"

आँखों की नमी...

" हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है

हँसती आँखों में भी नमी-सी है


दिन भी चुप चाप सर झुकाये था

रात की नब्ज़ भी थमी-सी है


किसको समझायें किसकी बात नहीं

ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई

गर्द इन पलकों पे जमी-सी है


कह गए हम ये किससे दिल की बात

शहर में एक सनसनी-सी है


हसरतें राख हो गईं लेकिन

आग अब भी कहीं दबी-सी है।"


रविवार, 4 सितंबर 2011

मुश्किल हूँ बहुत थोडा़ सा आसान कर मुझे

"मुश्किल हूँ बहुत थोडा़ सा आसान कर मुझे

मिल जाये जमीं से जो, आसमान कर मुझे


हो फूल सा दिल जिसमे ना हो कोई फरेबी,

बच्चों की तरह ऐ खुदा नादान कर मुझे,


बढती हैं कैसे रौशनी आँखों की देखना,

दो चार दिन ख्वाबों में मेहमान कर मुझे,


रिश्तों की फेर-बदल की रफ़्तार कर धीमी,

कर इतना करम मौला फिर इंसान कर मुझे,


पहचान मेरी सिर्फ हिंदुस्तान हो रब्बा,

न कोई जात न धर्म-ओ-खानदान कर मुझे..."


... और किसी का

महफ़िल में हैं जलवा--नज़र और किसी का,

करता हूँ मैं सजदे, है असर और किसी का>


ये आज के लोगों की महोब्बत भी अजब है,

रहता है कोई दिल में, घर है और किसी।


आँखों की चमक उसकी बता देती हैं सब कुछ,

ख्वाब तो रखता हैं वो, पर और किसी का।


हम तो किया करते हैं हर बात उसी की,

और उसकी बातों में है, जिकर और किसी का।


तेरे गाँव के नहीं ये शहरों के मकाँ है,

यहाँ दीवार किसी की हैं दर और किसी का।


रखा था हमने जिसको इस दिल में सजाकर,

सुनते हैं उसके दिल में हैं घर और किसी का।


बरबादियों की दास्ताँ सुन कर के मेरी आज,

दामन भी हुआ तर, मगर और किसी का...।


शिक्षक दिवस : शिक्षक देश का सबसे फर्टाइल ब्रेन....

ज्ञान की गंगा बहाने वाले गुरू को शास्त्रों में परमब्रह्म कहा गया है। संत कबीर ने गुरू की महिमा का बखान करते हुए कहा है, "गुरू गोविंद दोऊ ख़डे काके लागू पाय, बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।" गुरू हमेशा से सम्मान के पात्र रहे हैं। आधुनिक भारत में गुरूओं को सम्मान देने के लिए विशेष दिवस चुना गया है- शिक्षक दिवस। डाँ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि शिक्षक देश का सबसे (फर्टाइल ब्रेन) बुद्धिजीवी वर्ग होता है, जो देश के सुंदर भविष्य की कल्पना को साकार रुप देने हेतु ज्ञान की मजबूत नींव रखता है।

छात्रों के लिए शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने का यह सुनहरा मौका होता है। छात्र शिक्षकों को उपहार भेंट करते हैं, ग्रीटिंग कार्ड के जरिए बधाई संदेश देते हैं और उनके सम्मान में कविताएं और गीत सुनाते हैं। यह दिवस हर साल आता है और छात्रों के लिए भी विशेष बन जाता है। इस दिन छात्र शिक्षक बन जाते हैं और शिक्षक छात्र बनकर शिष्यों की बातों को गौर से सुनते हैं। इस तरह वे अपने उन दिनों की स्मृतियों को ताजा करते हैं जब वे स्वयं छात्र हुआ करते थे। शिक्षक दिवस यानी पांच सितम्बर को शिक्षकों को छात्रों के जरिए रोचक अनुभवों से गुजरने का अवसर मिलता है। शिक्षक दिवस वैसे तो पूरे विश्व में मनाया जाता है लेकिन अलग-अलग तिथियों को। भारत में यह दिवस पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पांच सितम्बर को मनाया जाता है।

देश में शिक्षक दिवस मनाने की परम्परा तब शुरू हुई जब डॉ. राधाकृष्णन 1962 में राष्ट्रपति बने और उनके छात्रों एवं मित्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की उनसे अनुमति मांगी। स्वयं 40 वर्षो तक शिक्षण कार्य कर चुके श्री राधाकृष्णन ने कहा कि "अनुमति तभी मिलेगी जब केवल मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय देशभर के शिक्षकों का दिवस आयोजित करें।" इसके बाद से प्रत्येक वर्ष शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। डॉ. राधाकृष्णन का जन्म पांच सितम्बर 1888 को मद्रास (चेन्नई) के तिरूत्तानी कस्बे में हुआ था। उनके पिता वीरा समय्या एक जमींदारी में तहसीलदार थे। उनका बचपन एवं किशोरावस्था तिरूत्तानी और तिरूपति (आंध्र प्रदेश) में बीता। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से एम.. की पढ़ाई पूरी की तथा "वेदांत के नीतिशास्त्र" पर शोधपत्र प्रस्तुत कर पी.एचडी. की उपाधि हासिल की।

शिक्षण कार्यो में बेहतर भविष्य के साथ डाक्टर साहब मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग में 1909 में व्याख्याता नियुक्त किए गए। जिसके पश्चात् 1918 में मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने। लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में वह 1936 से 39 तक पूर्व देशीय धर्म एवं नीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहे। राधाकृष्णन 1939 से 48 तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। वर्ष 1946 से 52 तक राधाकृष्णन को यूनेस्को के प्रतिनिधिमंडल के नेतृत्व का अवसर मिला। वह रूस में 1949 से 52 तक भारत के राजदूत रहे। 1952 में ही उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। मई 1962 से मई 1967 तक उन्होंने राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। राधाकृष्णन ने कहा था, "शिक्षकों को देश का मार्गदर्शक होना चाहिए।" शिक्षक दिवस शिक्षकों के लिए गर्व का दिन होता है। इस दिन छात्र अपने गुरूओं के मनोरंजन के लिए नृत्य एवं नाटक प्रस्तुत करते हैं। कहीं-कहीं छात्र शिक्षकों की वेशभूषा में अपने स्कूल या कॉलेज जाते हैं और अध्यापक की भूमिका अदा करते हैं।

शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजनों से शिक्षकों का मनोरंजन तो होता ही है, वे अतीत के सुनहरे पलों को फिर से जी पाते हैं। डाँ. राधाकृष्णन का मानना था, "शिक्षक देश का सबसे (फर्टाइल ब्रेन) बुद्धिजीवी वर्ग होता है।' उनका कहना था कि शिक्षक का मतलब केवल छात्रों से सम्मान अर्जित करना नहीं है बल्कि छात्र को इस लायक बनाना है कि वह जीवन के हर क्षेत्र में लक्ष्य हासिल करने के बाद हमें याद करें।

शिक्षक दिवस विभिन्न देशों में अलग-अलग तिथि को मनाया जाता है। प़डो़सी देश पाकिस्तान और रूस में 05 अक्टूबर, चीन में 10 सितम्बर, अमेरिका में 06 मई, ईरान में 02 मई, सीरिया, मिस्त्र, लीबिया और मोरक्कों में 28 फरवरी, थाईलैंड में 16 जनवरी, इंडोनेशिया में 25 नवम्बर तथा दुनिया के अधिकांश देशों में पांच अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाने की परम्परा है।

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