गुरुवार, 27 मई 2010

सिगरेट : तू ही सच्चा हमसफ़र

गमे दौराँ में जब हमदम ना कोई काम आया,
मेरे मायूस लब पर उस समय तेरा नाम आया,
मेरे हर हमसफ़र ने साथ जब मझधार में छोड़ा,
यही सिगरेट है जिसने नहीं मेरा दिल तोडा।।

अभी भी गम है हजारों मेरी राहो में,
चला आया हूँ पर भाग कर इसकी पनाहों में,
जहाँ तक साथ भी मेरे अपने दे नहीं पाए,
वहां तक पहुचे है इसके छल्लो के सुर्खरू साये।।

यह मेरे साथ है तो रंज मुझसे दूर रहता है,
मेरे तमाम रातो में इसी का नूर रहता है,
ये खुद जल के देती है चमक मेरे अरमानो को,
सुकून देती है जला के , गम के ठिकानो को।।

माना की ये मेरे जीवन को यकीनी से इत्तेफाक करती है,
क्या हुआ की ये दिल जिगर को जला के ख़ाक करती है,
हम तो वैसे भी यहाँ अकेलेपन में मरते हैं,
इसके आने से वो सूनापन तो मिटता है...
हम पल-पल सुलगते हैं, वो धीरे-धीरे से बुझता है।।।।

1 टिप्पणी:

  1. दर्द से दामन खूब भरा है।
    जीने का भरपूर मज़ा है।।

    कुछ कर लो उतना ही मिलेगा
    जो उसने किस्मत में लिखा है।

    बेबस होकर जीने वाला
    सच पूछो तो रोज़ मरा है।

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