रविवार, 1 जनवरी 2012

फिर याद आये तुम...

मैं लफ्जों में कुछ भी इजहार नहीं करता,
इसका मतलब ये नहीं कि मैं प्यार नहीं करता।

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
तेरी सोच में वक्त अपना बरबाद नहीं करता।

तमाशा ना बन जाये कहीं ये मेरी मोहब्बत,
इस लिए अपने दर्द को नामोदार नहीं करता।

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता।

पर कोई तो बात है तेरी फितरत में जालिम,
वरना मैं तुझे चाहने की गलती बार-बार नहीं करता।।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी पधारकर अपना स्नेहाशीष प्रदान करें, आभारी होऊंगा.

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