रविवार, 1 नवंबर 2015

मातहतों पर मेरहबानी

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप का मुद्दा उठाकर अप्रत्क्ष रूप से कम योग्य व्यक्तियों को व्यवस्था में स्थापित करने के अभियान पर तंज कसा है। वैसे भी श्रेष्ठता का अपना मानक होता है जो किसी भी सांचे में फिट बैठ जाता है और अपनेहुनररुपी पंख से लम्बी उड़ान के लिए तैयार रहता है। लेकिन जब सत्ता का विकेन्द्रीकरण होता है तो ये सभी मानक धरे के धरे रह जाते हैं और संस्थानों पर अपने लोगों के बैठाने की कवायद जोर पकड़ लेती है। ऐसे में ना तो योग्य व्यक्तियों का चयन हो पाता है ना ही तजुर्बे को तरज़ीह मिल पाती है।

मातहतों को लाभ पहुँचाने के क्रम में सरकार द्वारा योग्यता और अनुभव को दरकिनार किया जा रहा है। इस तरह की अगर एकाध घटना होती तो शायद इसे संयोग माना जा सकता था। मगर पिछले कुछ महीनोंकी गतिविधियों पर नजर डालें तो साफ तौर पर प्रतीत होता है कि विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिकसस्थानों पर सत्ता समर्पित लोगों की नियुक्तियों का दौर चल रहा है। एफटीआईआई (फिल्म एण्ड टेलीविजन इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डिया) के अध्यक्ष पद पर गजेन्द्र चौहान जैसे शख्स को बिठाकर सरकार ने इसका प्रमाण भी दिया है। जबकि वर्ष 2014 में अनुमानित नामों की सूची में अमिताभ बच्चन और अनुपम खेर जैसे ज्यादा ख्यातिप्राप्त और अनुभवी लोग शामिल थे। सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों ने निशाना भी साधा था। फिल्म जगत की नामचीन हस्तियों के अलावा कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। हालांकि सरकार की तरफ से मोर्चा सम्भालते हुए केन्द्र सरकार के एक मन्त्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने सधा सा जवाब दिया था।स्थिति को स्पष्ट करते हुए राठौर ने कहा कि एफटीआईआई के अध्यक्ष पद पर सिर्फ अनुभव और शख्सीयत के आधार पर ही नहीं बल्कि पर्याप्त समय देने की उपलब्धता के तौर पर नियुक्ति की गयी है। उनकी माने तो इस पद पर जिन लोगों के नाम प्रस्तावित थे उनमें गजेन्द्र चौहान ही ऐसे शख्स थे जो एफटीआईआई को पर्याप्त समय देने में सक्षम थे।

देखा जाये तो कमोबेस यही हाल अन्य सस्थाओं का भी रहा। सेंसर बोर्ड भी राजनीतिक हस्तक्षेप से अछूता नहीं रहा है। पूर्व में सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रहीं लीला सैमसन को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। लीला सैमसन को पहला झटका फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉडको सेंसर बोर्ड के ट्रीब्यूनल द्वारा मंजूरी देने से लगा, जबकि लीला ने फिल्म के कुछ भाग पर आपत्ति जतायी थी। उसके बाद बोर्ड के कुछ सदस्यों पर घूस लेने का भी आरोप लगा लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने की खीझ में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लीला सैमसन के इस्तीफे के बाद फिल्म निर्माता पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया।

ऐसा ही एक मामला आईआईटी मुम्बईमें भी देखने को मिला। प्रमुख वैज्ञानिक अनिल काकोदर ने मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के साथ मतभेदों के बाद आईआईटी मुम्बई के संचालक मण्डल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।काकोधर ने आईआईटी संस्थानों में निदेशकों की चयन प्रक्रिया पर सवाल भी खड़े किये थे। जिसके जवाब में मानव संसाधन विकास मन्त्री स्मृति ईरानी ने चयन प्रकिया को कानूनी तौर पर सही ठहराते हुए काकोधर के आरोपों को निराधार बताया था। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष दिसम्बर माह में आईआईटी दिल्ली के निदेशक आर. शेवगांवकर को भी मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा था। आज इन जगहों पर सरकार द्वारा कम अनुभवी लोगों को पदस्तकिया जा रहा है, इनके पास ना तो  संस्थानों को संचालित करने की पर्याप्त योग्यता है और ना ही काबिलियत।

औसत योग्यता को तरजीह देने का मामला यहीं समाप्त नहीं होताहै बल्कि आईएचआरसी सहित कई अन्य शैक्षणिक व सांस्कृतिक संस्थानों में भी सत्ता के संरक्षण में अपने मातहतों को आगे बढ़ाये जाने को लेकर सवाल उठे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह मामला तकनीकी खामियों का नहीं बल्कि सस्थाओं पर सत्ता से संचालित होने वाले व्यक्तियों के थोपने का है। सरकार चाहे तो बेहतर बौद्धिक ऊर्जा और योग्य व्यक्तियों के इस्तेमाल से इन संस्थाओं का कायाकल्प कर सकती है लेकिन इसके लिए बेहतर सोच और मजबूत इच्छा शक्ति का अभाव सा दिख रहा है।   

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 12 दिसंबर 2015 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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