रविवार, 24 जुलाई 2011

‎"दुनिया चाहे कुछ भी सोचे, मैं तो बस जानू इतना,
तुम मिल जाओ तो है जीवन, तुम बिन मैं हूँ तनहा !"
‎"खुशमिजाजी को देख मेरे, यारों न दो मशहूर होने की दुआ,
कि आज के दौर में मशहूर लोग, तन्हाईयों में मरते हैं..."

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मानसिक गुलामी और संकीर्णता के दायरे में सजी आजादी

आजादी, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने लम्बे समय तक राष्ट्रविरोधी शक्तियों से संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुति देकर कर हमें स्वतंत्र वातावरण में सांस लेने का हक दिलाया। आज इस आजादी को हमने अपने निजी स्वार्थ और एकमेव लाभ की मनोदशा के आधार पर फिर से गिरवी रख दिया है। कल तक जिस आजादी के सुनहरे स्वप्न को अपनी पलकों में सजोकर हमारे देश के स्वातंत्र वीरों ने अपनी भारत माता को विदेशी ताकतों से आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, आज उसी भारत में सियासत और तुष्टीकरण की ऐसी आंधी बह चली है की आजाद देश की गुलाम जनता सत्तासीन निरीह हुकूमत के खिलाफ जूझने पर मजबूर है।

लूट आज भी बदस्तूर जारी है, फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय गोरे अंग्रेजों ने देश को दीमक की तरह खोखला किया और आज काले अंग्रेज़ इस काम को कर रहे हैं। खेल वही है बदले हैं तो सिर्फ इसके किरदार। उस दौर में सत्ता और धन पर नियंत्रण अंगरेज़ हुक्मरान और देसी रजवाडों-नवाबों तक सीमित था, आज सफ़ेद पोश नेताओं, अफसरों और सत्ता के दलालों के हाथ में है। आजादी के बाद बने पहले प्रधान मंत्री द्वारा सन् १९४८ में पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया गया था, जिसके अंतर्गत देश का विकास किया जाना था लेकिन आज कितने लोग हैं जो जानना चाहते है कि पंचवर्षीय योजना के तहत क्या कार्य किये गये हैं? प्रत्येक वर्ष कितना पैसा पंचवर्षीय योजनाओं के नाम पर खर्चा जाता है यह जानने वाला कोई नहीं?

स्वतंत्रता पूर्व जिस अवस्था में भारत और भारतवासी थे, उसमें देशवासियों पर केवल सरकार के खिलाफ कार्य न करने देने की पाबंदी थी लेकिन आज स्थिति उससे भी अधिक भयावह हो गयी है। एक तरफ महात्मा गाँधी के रामराज्य की परिकल्पना को साकार करने का स्वप्न दिखाकर देश के हुक्मरान देशवासियों के खून-पसीने की कमाई को विदेशी बैंको में ज़मा कर रहें है तो दूसरी तरफ महगाई की चाबुक निरीह जनता की कमर तोड रही है। बाकि बची कसर सरकार का कर तमाचाङ्क आये दिन हमारे शक्ल की मालिश कर पूरा कर रहा है। क्या इसी आज़ादी की संकल्पना हमारे देश के अमर शहीदों और महापुरुषों ने की थी...? वास्तव में हमें आजादी नहीं मिली है, बल्कि देश की सत्ता को विदेशी गोरों से स्थानांतरित कर उन्हीं की नुमाइंदगी करने वाले देशी काले लोगों की हाथों में सौंप दी गयी है। वास्तविकता यह है कि आज भी हम मानसिक रूप से गुलाम हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक पुरातन देश है, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत का विकास होना चाहिए था जिसमे स्वतंत्रता-संग्राम के साहचर्य और राष्ट्रीय स्वाभिमान के नवोन्मेष के सोपान का दर्शन हो। लेकिन अब समय की आवश्यकता है कि सभी राजनीतिक पार्टियां और नीति निर्देशक तत्व देश की जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। स्पष्ट करें अपनी अपनी रणनीति कि देश से गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार को मिटाने, आतंकवाद को जड से उखाडने, नक्सलवाद के सफाए, समस्त भारतीयों को निर्भय एवं सुखी, संपन्न और विश्व में भारत को एक भरोसेलायक आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए क्या पुष्ट योजनाएं और किसके पास हैं। देश को विकास पथ पर ले जाने की बात करने वाले हमारे राजनेता धनलोलुप्सा को जागृत किये हुए हैं और जनता को विश्वास का घोल पिलाये जा रहे है कि सरकार उन्हीं के लिए तो प्रतिबद्ध है।

देश की जनता और आजादी के परवानों ने अनगिनत कुर्बानियां दे कर देश को अंग्रेजों से आज़ाद करवाया ताकि इस देश की धन संपदा इस देश की गरीब जनता को नसीब हो और वे अपना भविष्य संवार सकें। लेकिन आज देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं। नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि विदेशी गोरे लोगों के पिटठू, जो सरकार बन हमारे देश की दिशा और दशा तय कर रहे हैं, इन्हें देश और देश के विकास में कोई रूचि नहीं है। तो क्या यह सवाल नहीं उठता कि अगर गोरे लोगों की नीतियों को ही देशी लोग अनुपालन में लाया जा रहा है वो भी और घृणित रूप मे तो इससे बेहतर तो अंग्रेजों का ही शासन था, जहां कम से कम इतनी खामियां तो नहीं थी। आजाद भारत की व्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर कई सवाल खडे़ होते हैं जिनमें मुख्य यह है कि ऐसी आज़ादी किस काम की जो हमें मानसिक गुलामी और संकीर्णता के दायरे से मुक्त ना कर सके?ङ्क

आजादी शब्द जिसका मतलब ही है कि इंसान को अपने मन के मुताबिक कार्य करने की स्वतंत्रता हो। पर वास्तविकता यह है कि हमारी आजादी अन्य लोगों की सोच पर निर्भर करती है कि वह इसके बारे में क्या सोचते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि आज आजादी की आबो-हवा में सांस लेने वाले लोग अपनी मौलिक सोच को अब भी सामने वाले की बातों का गुलाम बना कर रखे हुए हैं। शाब्दिक अर्थो के तौर पर लोग आजादी को केवल अपने लाभ और स्वार्थसिद्धी का माध्यम मामने का चलन चल पडा है, किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि आजादी का मूलभाव क्या है और किस लिए लाखों देशवासियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। सरकारी अधिकारी अपने नौ से पांच के कार्य अवधि पर चाय और पान के साथ बातों के हवाई किले बनाते हुए समय को बिताते हैं और वेतन का भोग लगाते हैं। ऐसे में कैसे कहा जाये की इसी आजादी के लिए कभी देश में संग्राम हुआ था।

भारत ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है। परन्तु अब भारत, जिसने हर संकट की घडी में बिना धैर्य खोये हर मुसीबत का सामना किया, अनेकों बुराइयों से जकडा हुआ है। मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, जातिवाद, सत्ता लोलुपता के लिए सस्ती राजनीति करना जो कि कभी-कभी सामाजिक वैमनष्य के साथ-साथ देश की एकता को ही संकट में डाल देता है। इसके अलावा राजनीति में वंशवाद व भाई-भतीजावाद, न्यायिक प्रक्रिया में विलम्ब इन सारी नकारात्मक खूबियों से लबरेज कुशासन और कुव्यवस्था, जिसमें नौकरशाही के भ्रष्टाचार और चालबाजियों ने लोगों के दैनिक जीवन में निराशा घोल दी हो। जहाँ कुशासन ने न्याय-तंत्र की निष्पक्षता में लोगों की आस्था हिला दी हो, ऐसी आजादी किस काम की।

आज की इस आजाद भारत में रहने वालों की बात की जाये तो उनकी अपनी मानसिकता में आजादी का अलग ही मायने है। जेपी आंदोलन के प्रमुख नायकों में एक वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का कहना है कि हमारी वर्तमान व्यवस्था अर्थात संविधान के अनुसार अंतिम सत्ता साधारण नागरिक में है लेकिन उस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जो सत्ता पर आम आदमी का नियंत्रण स्थापित करे। आज जनता के हाथ में जो ताकत है, वह दिखावटी अधिक है। आजादी के बाद बना हमारा संविधान एक ऐसे उल्टे पिरामिड की रचना करता है जिसमें सत्ता नीचे से ऊपर नहीं बल्कि ऊपर से नीचे आती है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह संविधान स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के अनुरूप नहीं है। स्वाधीनता संग्राम का जो लक्ष्य था हम उस लक्ष्य तक नहीं पहुच सके हैं।

रामबहादुर राय के अनुसार वर्तमान में देश में अनुपालित संविधान सिद्धांततः तो लोकतंत्र कायम करता है लेकिन वास्तविक स्थिति में यहां लोकतंत्र नहीं है। यह अंग्रेजों की योजना में बना हुआ संविधान है। सत्ता के लिए अधीर हो चुके कांग्रेसी नेताओं ने अंग्रेजों से समझौता कर एक काम चलाऊ संविधान बना लिया। १९३५ का जो कानून अंग्रेजों ने बनाया था, उसी कानून के अस्सी फीसदी हिस्से को इस संविधान में जगह दे दी गयी है। १९३५ में बने गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट को नेहरू ने गुलामी का दस्तावेज कहा था। अब बताइए गुलामी के दस्तावेज पर बने इस संविधान को हम क्यों मानें। व्यवस्था परिवर्तन में जुडे लोगों को अब सबसे पहले इस संविधान को ही बदलने की कोशिश करनी होगी। आजादी के सही मायने तभी सामने आयेंगे जब इसके मुताबिक संविधान बनाया जायेगा

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्कूल कालेजों और अन्य सरकार विभागों पर तिरंगे झंडे को फहराने भर से आजादी का औचित्य नहीं सामने आ पाता। जिस उद्देश्य से भारत देश की आजादी के लिए लोगों ने प्रयास किये कि देश में समानता, सम्पन्नता और विकास की छंटा लहराया करेगी, सब ओर खुशहाली होगी और सब एकजुट होकर रहेंगे। यह सारी उद्देश्यपरक वैचारिकता आज के भोग-विसाली समाज में कहीं विलुप्त हो चुकी है। कष्टों से मिली आजादी पर हर भारतीय की अपनी-अपनी अलग राय है। कोई देश में कानून व्यवस्था, राजनीतिज्ञों एवं सरकारी अफसरों की बेईमानी का रोना रोते हैं। तो कुछ लोग अपनी स्वार्थता को ही आजादी का परिचायक बताते हैं। लेकिन इससे अलग एक और भारतीय वर्ग है जो सरकार और सरकारी कार्यगुजारियों की मार झेल रहा है। उनके लिए आजादी के मायने अलग हैं जब आपको इंसाफ़ के लिए लडाई लडनी पडे, मतलब आपको सही मायनों में आज़ादी नहीं मिली है। पैसे वाले आरोपी अपने रसूख़ के बल पर कानूनी प्रक्रिया को खींचते रहते हैं। जब तक देश में भय का माहौल रहेगा, हमारी आज़ादी औचित्यहीन हैं।

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

दिल-ए-हालत...

"ये कैसा महोब्बत का सफ़र देख रहा हूँ,
ना है मंजिल ना कोई राहे गुजर देख रहा हूँ !

टूटेगा दिल ये इश्क में हर बार की तरह,
में खुद को आजमा के मगर देख रहा हूँ !

यूँ मरने का मैं इतना शौकीन तो ना था,
मोहब्बत का मगर खुद पे असर देख रहा हूँ !

इस बार भी दुश्मन से खायी हैं गालियाँ,
कुछ ऐसा शराफत का असर देख रहा हूँ !

माना कि वो बेमरव्वत मुझे रखता हैं गैरों में,
मैं उसको अपना कह के मगर देख रहा हूँ !...."

कौन लेगा 'बिग थ्री' की जगह?

द्रविड़ और लक्ष्मण दोनों का ही ये आख़िरी इंग्लैंड दौरा हो सकता है. आज यदि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण अचानक से अवकाश ले लें तो ज़रा सोचिए भारतीय बल्लेबाज़ी क्रम कैसी नज़र आएगी. और ये बिल्कुल ही काल्पनिक स्थिति हो ऐसा भी नहीं है, ये शायद जल्द ही हक़ीकत बन जाए. कितनी तैयार है भारतीय टीम इन रिक्त स्थानों को भरने के लिए यह भी सामने आ जायेगा ?

इन तीनों बल्लेबाज़ों के क्रिकेट अनुभव को जोड़ें तो उन्होंने ४५३ टेस्ट खेले हैं, ३५,१५२ रन बनाए हैं और ९९ शतक लगाए हैं. ऐसे दिग्गजों की जगह कैसे भरी जा सकती है? लक्ष्मण इस नवंबर में ३७ साल के हो जाएंगे जबकि सचिन और द्रविड़ अपने अगले जन्मदिन पर ३९ मोमबत्तियां फूंकेगे. भारत की कोशिश यह सुनिश्चित करने की होगी कि तीनों एक साथ ही रिटायर न हो जाएं. ये देखना होगा कि ये बारी-बारी से रिटायर हों और नए खिलाडियों को दुनिया के आजतक के सबसे बेहतर मध्यक्रम बल्लेबाजों में गिने जानेवाले खिलाडियों से दिशानिर्देश मिल सके. इन बल्लेबाज़ों में से अब शायद ही कोई दोबारा इंग्लैंड के दौरे पर आए वैसे ये निश्चित तौर से कभी नहीं कहा जा सकता.

मिसाल के तौर पर पिछली बार जब भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई तो सचिन तेंदुलकर जहां भी गए उन्हें हर जगह प्यार भरी विदाई दी गई लेकिन अब ये लगभग तय है कि वो इस साल के अंत में होनेवाले ऑस्ट्रेलियाई दौरे में फिर शामिल होंगे. इन तीनों खिलाडियों की महानता इस बात में झलकती है कि क्रिकेट जगत से उनकी विदाई की इबारत कई बार लिखी जा चुकी है लेकिन वो हर बार गेंदबाज़ों के लिए एक बुरे सपने की तरह उभरकर आए हैं. तीनों ही बल्लेबाज़ों के पास इंग्लैंड में अपने रिकॉर्ड की कुछ कमियों को डूर करने का भी मौका हैं.

भारत में लोग यह मान चुके हैं सचिन जैसा दूसरा कोई पैदा नहीं होगा! जैसे सचिन और द्रविड़ दोनों ने मिलकर कुल ८३ टेस्ट शतक लगाए हैं लेकिन क्रिकेट का मक्का कहे जानेवाले लॉर्ड्स के मैदान पर एक भी शतक नहीं है. यदि इसमें सुनील गावस्कर के ३४ शतकों को भी जोड़ दिया जाए तो ये अपने आप में चौंकाने वाली बात है कि भारत के तीन सबसे ज्यादा शतक लगानेवालों में से किसी ने लॉर्ड्स पर शतक नहीं लगाया है. इंग्लैंड में लक्ष्मण का सर्वाधिक स्कोर ७४ रनों का है और शायद वो उसे सुधारने की कोशिश करें.

युवा खिलाडी

जिन युवा खिलाडियों ने पिछले दिनों में उम्मीद जगाई है उनमें से चेतेश्वर पुजारा चोटिल हैं, विराट कोहली का फ़ॉर्म ख़राब चल रहा है, मुरली विजय वेस्टइंडीज़ में संघर्ष करते नज़र आए और सिर्फ़ सुरेश रैना जिन्होंने श्रीलंका में अपने करियर के पहले टेस्ट में शतक जमाया वेस्ट इंडीज़ में सफल होते दिखे. इंग्लैंड में सोमरसेट के ख़िलाफ़ अभ्यास मैच में भी उन्होंने शतक जमाया.

मध्यक्रम में जिन बल्लेबाज़ों की गाडी छूट गई है, भले ही थोड़े समय के लिए, वो हैं तमिलनाडु के सुब्रमण्यम बद्रीनाथ और मुंबई के रोहित शर्मा. इस सूची में काफ़ी दम है और थोड़ी अनुभव भी. बल्कि कोहली तो शायद भविष्य में टीम इंडियन के कप्तान भी बन जाए.

टेस्ट जीवन

सचिन तेंदुलकर :- टेस्ट जीवन की शुरूआत १९८९ में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कराची में
राहुल द्रवि‹ड :- टेस्ट की शुरूआत जून १९९६, इंग्लैंड के ख़िलाफ़ लॉर्ड्स में
वीवीएस लक्ष्मण :- टेस्ट जीवन की शुरूआत नवंबर १९९६, दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में

भारतीय सेलेक्टरों ने शायद रक्षात्मक नीति अपनाई जब उन्होंने कोहली को इंग्लैंड के दौरे पर मौका नहीं दिया. लेकिन वो अभी २२ साल के ही हैं और बिग थ्री के रिक्त किए स्थान को भर सकते हैं. कोहली एक अंदर एक बुलडाग (गंभीर बल्लेबाजी के हुनरमंद) का चरित्र है. एक बार यदि उन्हें अपनी जगह मिल गई तो वो उसे छोड़ेंगे नहीं.

रैना से उम्मीद

तेज़ शॉर्ट पिच गेंदों के ख़िलाफ़ रैना की कमज़ोरी जगजाहिर है लेकिन उनके अंदर का जुझारूपन इस कमज़ोरी के बावजूद उन्हें जीत दिलाता रहता है. ठोस तकनीक सचिन और द्रविड़ जैसे खिलाडियों की पहचान है लेकिन लक्ष्मण ने दिखाया है कि कलेजा बड़ा हो तो ऑफ़ स्टंप के बाहर की कमज़ोरी से निबटा जा सकता है. रैना में भी भविष्य के कप्तान की संभावना है.. ज़िम्बाब्वे के दौरे पर वो भारतीय टीम का नेतृत्व भी कर चुके हैं!

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तेईस साल के पुजारा की ज्यादा परीक्षा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से उन्होंने बैंग्लोर टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पारी खेली वो सराहनीय थी. भारत वो टेस्ट मैच जीता था. तीसरे नंबर पर खेलते हुए उन्होंने शानदार ७२ रन बनाए और उनसे कई बड़ी पारियों की उम्मीद जगी लेकिन आईपीएल में लगी चोट ने उन्हें वेस्ट इंडीज़ और इंग्लैंड के दौरे से बाहर रखा है. जब उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की तो उन्हें अपनी ठोस तकनीक और लंबी पारी की भूख की वजह से द्रविड़ के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था. मुरली विजय को एक और उभरते द्रविड़ की तरह देखा जा रहा है. वैसे भी भारत में ये लगभग मान ही लिया गया है कि अब दूसरा तेंदुलकर नहीं पैदा हो सकता!

एक ओर जहाँ विराट कोहली के अंदर आसानी से अपनी जगह नहीं छोड़ने का जज्बा है, वहीँ मुरली विजय के तेवर भी बड़े मैचों वाले हैं और उनमें भी पिच पर चिपकने वाले वो गुण हैं जिनसे बड़े स्कोर बनते हैं. आईपीएल ने उनकी तकनीक को ज़रूर नुकसान पहुंचाया है क्योंकि उन्हें कई बार पहले से फ्रंट फुट पर खेलने का मन बनाते देखा गया है और टी-२० मैचों में फ्रंट फ़ुट को गेंद की लाईन से हटाते देखा गया है. सत्ताईस साल के विजय कोई नए नवेले नहीं हैं और इसलिए उन्हें वापस ड्रॉइंग बोर्ड पर जाने की ज़रूरत है.

युवराज का अनुभव

युवराज सिंह इतने समय से खेल रहे हैं कि कई बार आश्चर्य होता है जब पता चलता है कि उनकी उम्र ३० से नीचे है. एक दिवसीय मैचों में उनकी जगह को कोई चुनौती नहीं दे सकता, उन्होंने २७४ एक दिवसीय मैच खेले हैं. लेकिन सिर्फ़ ३४ टेस्ट मैच में उन्हें जगह मिली है और वहां वो अपने को स्थापित नहीं कर पाए हैं. उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि जब वो चल जाते हैं तो अद्भुत नज़र आते हैं लेकिन जब नहीं चल पाते तो स्विंग और स्पिन दोनों ही के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे होते हैं. बदलाव के दौर में शायद उनका अनुभव काम आए लेकिन उन्हें अब भी ये साबित करना है कि वो लंबी रेस के घोड़े हैं.

जब फ़ैबुलस फ़ोर के नाम से मशहूर बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर और वेंकटराघवन का स्पिन दौर खत्म हुआ तो कई लोगों को उम्मीद थी कि उनके उत्तराधिकारी भी बिल्कुल उन्हीं के जैसे होंगे. और इसलिए उनकी जगह आए गेंदबाज़ों की काफ़ी आलोचना हुई कि वो फ़ैब फ़ोर जैसे नहीं है. अब प्रशंसक वो ग़लती नहीं दोहराएं तो बेहतर है क्योंकि इससे उन नए खिलाडियों पर दबाव और ज्यादा बढेगा जो अपने समय के महानतम बल्लेबाज़ों के पदचिन्हों पर चलने की कोशिश कर रहे होंगे!.....

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

एक सच जीवन का ....

"कहीं सलाखें लोहे की, कहीं सलाखें तृष्णा की,
कहीं सांस का आना जाना तक पीड़ा का बंधन है/
हम सब सिलबट्टे पर रखकर खुद अपने को पीस रहे हैं,
और जमाने की नजर में- मिला मुफ्त का चन्दन है//

संबंधों के कोलाहल में सिर्फ स्वार्थ की अनुगूँज हैं,
...वरना मन की देहरी पर तो सन्नाटें ही बिखरे हैं/
रहा सवाल उड़ने का हवा में तो सुनो सलोने पंछी,
पंख तुम्हारे भी कतरे हैं, पंख हमारे भी कतरे हैं...//"

सोमवार, 27 जून 2011

अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा

अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा..
यूपी भी हो बम्बई भी हो ऐसा हिंदुस्तान हो मेरा..
मंदिर हो और मस्जिद भी हो, गिरजा और गुरुद्वारा भी हो..
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब में भाई चारा भी हो..!

सच के हो हर और उजाले, झूठों के मुह भी हो काले..
अपने चारों धाम हो जिसमे, मौला तेरा नाम हो जिसमे..
शबरी भी हो राम हो जिसमे, राधा के संग श्याम हो जिसमे..
गीता का भी ज्ञान हो जिसमे, साहिब ओ कुरान हो जिसमे..!

दिल मे खाकसारी भी हो, आँखों में चिंगारी भी हो..
प्यार की हो बातें लेकिन जंग की तैयारी भी हो..
सच्चाई की आंधी आये, फिर से कोई गाँधी आये..
झूठे जालिम संतरी ना हो, गुंडे तश्कर मंत्री ना हो..!

सच के ऊपर फायर ना हो, कोई जनरल डायर ना हो..
जयचंदो सा कायर ना हो, झूठा कोई शायर ना हो..
बिस्मिल से मतवाले भी हो, हम जैसे दिलवाले भी हो..
मीर का दीवान हो जिसमे, ग़ालिब की अजान हो जिसमे..!

सच्चाई का प्रकाश को जिसमे, सपनो का आकाश को जिसमे..
प्यार का पैगाम हो जिसमे, तेरा मेरा नाम हो जिसमे..
दुश्मन भी मेहमान हो जिसमे ऐसा हिंदुस्तान हो मेरा..
अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा...!!

मंगलवार, 21 जून 2011

द्रविड के टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे


'श्रीमान भरोसेमंद' और 'दी वाल' जैसे उप-नामो से विख्यात पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने वेस्टइंडीज के खिलाफ़ २० जून २०११ को शुरू हुए पहले क्रिकेट टेस्ट के साथ टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे किये! इस इस्टाईलिश बैट्समैन से आगे भी इसी तरह बेहतरीन खेल का मुजाहरा करते रहने की सभी क्रिकेट प्रशंशक की कामना है!

अपने क्रिकेटिंग कैरियर में द्रविड़ ने काफी उचाईयों और विरोधाभास को देखा है! इस बिच द्रविड़ धीमा खेलने के लिए टीम से निकाले भी गए और फिर वापसी करते हुए भारतीय बलेबाज़ी क्रम की रीढ़ की हड्डी भी बन गए, जिसने बिना टीम से निकले लगातार मैच खेलने का रिकॉर्ड भी बनाया!

इंग्लैंड के खिलाफ़ लार्डस में 20 जून 1996 को पदार्पण करने वाला यह कलात्मक बल्लेबाज टीम के लिए भरोसे की पहचान बन गया! आज भी जीवन के ३८ बसंत देख चुके राहुल द्रविड़ के रिप्लेसमेंट के टक्कर का कोई खिलाडी भारतीय टीम के पास नहीं है! भले ही युवाओ का खेल हो चुके एकदिनी और टी२० मैच में द्रविड़ न दिखे पर ये बात अब भी सही है की युवा खिलाडी तेज़ तो है पर उन के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है! जिसके बिना खेल के किसी भी फॉरमेट में अपना स्थान पक्का नहीं किया जा सकता ! जबकि द्रविड़ को जाना ही उनकी इसी खूबी के लिए जाता है की वो अच्छा न खलते हुए भी औसतन ३५-४० रन तो बनायेंगे ही! आज भी क्रिकेट के असली परिचायक फॉरमेट 'टेस्ट' में राहुल द्रविड़ के बिना खेलना टीम के लिए सपनो के जैसा है, जिसकी कल्पना भी वह नहिकारना चाहेगी कि जब द्रविड़, सचिन और लक्ष्मण सन्यास के बाद टीम का क्या होगा.......

रविवार, 19 जून 2011

सपना और हकीकत


खुशियों की किलकारियों में जन्म हमारा होता है,
बेफिक्र पालने में बच्चा सोता है !

पहला शब्द, पहला कदम, पहला अनुभव उसका होता है,
बांहों में नन्ही जान, आँखों में बड़े
सपने लिए बाप उसका सोता है!

एक आंसू अपने बच्चों की, पिता को दर्द देती है,
और खुद बड़ी होकर वही संतान, उसे छोड़ देती है!

क्या किया गलत पिता ने बच्चों को पाल के,
की छोड़ गए अपने उसे उम्र की शाम ढलते-ढलते!

खुद का सहारा मान, जिसे सहारा दिया उसने,
आज तन्हाईयों में सोच रहा, क्यों पूरे न हो सके सपने!

क्यों बीतते वक़्त में दुनियां बदल जाती है,
क्यों शाम आते अपनी परछाई साथ छोड़ जाती है!

समझेंगे वो कल जब खुद पर कहानी दोहराई जायेगी,
अपनों की बाते अपनों से बेरुखी निभाएगी!

तब उन्हें अपने बड़ों की याद आएगी,
तब शायद कहीं समाज में सम्मान की बयार छाएगी...!!


I Love You Papa... Happy Father's Day

शनिवार, 11 जून 2011

शत्रुता भुनाने के लिए क़ानून बनाना अनुचित

भारत में क़ानून बनाने वालों कि स्थिति दयनीय है. कानून सरकार बनाए या न्यायालयों के निर्णय हों, उनका उद्देश्य एक वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए दूसरे पक्ष को दण्डित करना होता है अभी एटा ,उ.प्र. की एक अदालत ने आनर किलिंग में तीन लोगों को मारने के लिए १० लोगों को फांसी कि सजा सुनाई गई है. बड़े- बड़े दंगों और आतंकी हत्याओं के प्रकरण में भी इतने लोगों को फांसी कि सजा नहीं हो पाती है. लड़की को किसी प्रकार पटा लो और शादी कर लो, अब उनके माँ-बाप, रिश्तेदार क्या कर लेंगे? यदि लड़की न माने तो उसको तेजाब से जलाने से लेकर हत्या के प्रयास करो या उनका एस एम् एस बनाकर प्रसारित कर दो. यदि युवकों को पता हो कि घरवालों कि सहमति के बिना विवाह नहीं होगा तो वे इतना आगे बढ़ेंगे ही नहीं . एक आशिक छात्र द्वारा भोपाल में लड़की से बदला लेने के लिए जिस प्रकार उसे और उसकी दो सहेलियों को सरे आम फ़िल्मी ढंग से कार से कुचला गया, न कुचला जाता. असामाजिक लोगों की मांग कि आनर किलिंग के लिए फांसी दो और अदालत का निर्णय, युवकों को लाभ पहुँचाने के लिए तथा उनके माता-पिता तथा रिश्तेदारों को दण्डित करने का एक उदाहरण मात्र है.


यह एक सामाजिक समस्या है. क़ानून के साथ ही ऐसी सामाजिक चेतना भी उत्पन्न की जानी चाहिए कि युवकों को ध्यान रहे कि उनके घरवालों कि सहमति के बिना विवाह मान्य नहीं होगा और अभिभावकों को समझ में आ जाए कि बच्चों की जायज मांग का आदर करना चाहिए तो समाज में वीभत्स घटनाएं रुक सकती हैं.


अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा के लिए क़ानून बनाया गया है. उसकी कंडिकाओं का मुख्य उद्देश्य बाल शिक्षा न होकर प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों की व्यवस्था को चौपट करना प्रतीत होता है. कुछ निजी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है, उनका नाम है, प्रतिष्ठा है. उन्हें दंड देना इसलिए जरूरी हो गया है उनके नाम के सामने सरकारी स्कूलों को कोई पूछ नहीं रहा है. नव वधूओं को दहेज़ के लोभी परेशान न करें, इसके लिए जो क़ानून बनाया गया है उसका दुरूपयोग आधुनिक लड़कियां पति, सास, ससुर, नन्द, जेठ, देवर जैसे सम्बंधियो को जेल भिजवाने या ब्लैकमेल करने में धड़ल्ले से कर रही हैं. कोर्ट समझ भी जाते हैं परन्तु क़ानून किसी को बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता है.


अनुसूचित जातियों को उच्च वर्ण की यातनाओं से बचाने के लिए जो क़ानून बना है उसका भी भरपूर दुरूपयोग किया जाता है. किसी सेवा में यदि उनका उच्चाधिकारी उनके विरुद्ध कोई अनुशासन हीनता के कारण कार्यवाही करना चाहता है तो वे इस नियम का आश्रय लेकर उस अधिकारी को धमकाने या फंसाने में भी नहीं चूकते हैं. इस क़ानून के विरुद्ध उस अधिकारी को कोई सहायता नहीं कर सकता है वह अधिकारी भले ही कितना अच्छा हो .महिलाओं के विरुद्ध पुरुष अधिकारिओं द्वारा कार्यवाही करने पर भी ऐसे हालात उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है. इससे शासकीय विभागों की हालत खस्ता होती जा रही है. अनुशासन के अभाव में कामचोरी और भ्रष्टाचार सर्वत्र फैलता जा रहा है. परिणाम स्वरूप सरकार अपने विभागों को सुधारने के कठिन कार्य के स्थान पर उनका निजीकरण करती जा रही है.


आने वाले समय में कलेक्टर, कमिश्नर, सचिव, मंत्री, मुख्यमंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और न्यायाधीश भी ठेके पर दिए जाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. हमें भूलना नहीं चाहिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी ऐसे ही ठेकों पर देशी रियासतों के राजा-नवाबों को नियुक्त करती थी और जब उनसे मन भर जाता था तो उसे बेदखल करके उनकी रियासत को कंपनी की संपत्ति बना लेते थे. १८५७ का संघर्ष उसी का परिणाम था. आज पुनः देश छोटा होता जा रहा है और लोग बड़े होते जा रहे हैं .इसलिए वे मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं, उसे कोई भ्रष्टाचार कहे, नाकारा कहे, भूख हड़ताल करे या अपना सिर धुने, बड़े आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है.


आज कुछ लोग कालाधन रखने वालों तथा भ्रष्टाचारिओं को फांसी देने या आजीवन कारावास देने एवं उनकी सारी संपत्ति जब्त करने की बात कर रहे हैं. आज जब यह सिद्ध हो रहा है कि जज भी भ्रष्ट हैं, पुलिस पर तो पहले से ही किसी को विश्वास नहीं है , तो पकड़े या पकडवाए गए लोगों को सजा कौन और कितने दिनों में दिलवा पायेगा जबकि आज देश कि अदालतों में ढाई करोड़ से अधिक प्रकरण लंबित हैं. इसलिए किसी भी क़ानून को बनवाने या बनाने में यह विचार सर्वोपरि रहनी चाहिए कि उससे न्याय एवं व्यवस्था स्थापित हो, उसका दुरूपयोग करने कि सम्भावना न हों तथा लोगों में परस्पर भ्रातृत्व भाव एवं एकता बनी रहे.


गुरुवार, 9 जून 2011

तलाश सूने मन की....

मैं उदास रास्ता हूँ शाम का,
मुझे आहटों की तलाश है!

ये सितारे सब हैं बुझे बुझे
मुझे जुगनुओं की तलाश है!

वो जो एक दरिया था आग का,
मेरे रास्तों से गुज़र गया!

मुझे कब से रेत के शहर में,
बारिशों की तलाश है!

मैं उदास रास्ता हूँ शाम का,
मुझे आहटों की तलाश है .....!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

चाह नहीं...

मोहब्बत में जो मिट जाता है,
वो कुछ कह नहीं सकता।
ये वो कूचा है जिसमे,
दिल सलामत रह नहीं सकता।
कि सारी दुनिया यहाँ तबाह नहीं,
कौन है जिसके लब पे आग नहीं।
उस पर दिल जरुर आएगा,
जिसके बचने कि कोई राह नहीं।
ज़िन्दगी आज नजर मिलते ही लुट जाएगी,
कि अब और जीने कि चाह नहीं।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

1901 में हुई ब्लड ग्रुप की खोज

कार्ल लैंड्सटईनेर ने 1901 में खून के ग्रुप ए, बी, बी, और की खोज की थी। इससे पहले खून के ग्रुप के बारे में जानकारी ना होने के कारण लोगो को काफी समस्याओ का सामना करना पड़ता था। 1628 में पहली बार एक कुत्ते से दुसरे कुत्ते को खूनका संचालन किया गया था। 1667 में एक व्यक्ति को किसी पशु का खून देते समय उसकी मौत हो गयी थी। 1678 में खून संचालन को गैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया था। 1818 में एक व्यक्ति की नाड़ीमें छेड़ करके नाली के माध्यम से उसमे खून डाला गया, लेकिन ग्रुप मैच ना होने के कारन खून वही जम गया। कार्ल लैंड्सटईनेर ने खून की ग्रुपों की खोज की तो बहुत से लोगों को जीवन दान मिला।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

तुम्हारी याद ....

है दिल में आह होंठो पे मेरी फ़रियाद का मौसम ,
अभी तक नम है अश्को से मेरी रूहाद का मौसम .

हजारो रंग बदले हैं ज़माने की फिजाओ ने ,
मगर दिल से नहीं जाता तुम्हारी याद का मौसम .

कभी ख्वाबो में रहता हूँ , कभी जागे ही सोता हूँ ,
तुम्हारी याद में जानम मै हर पल ही रोता हूँ .

कब पलके नहीं भींगी , गला कब तर्ख नहीं होता ,
बैठ महफ़िल में कैसे कहू की जुदाई का दर्द नहीं होता .

कभी सिसकियाँ नहीं बदली , ना ही आहों का रुख मोड़ा ,
बस दिल ही दिल में तडपा हूँ , चुपचाप ही मरता हूँ .

बुधवार, 16 जून 2010

पिता : एक व्याख्या

हर पिता अपने बेटे को जानना चाहता है, कुछ कहना चाहता है पर एक अनचाही, अनसमझी अदृश्य सोच, दोनों को थोडा दूर दूर रखे रहती हैचूँकि बेटे अपनी माँ और अपने बीच ऐसा कुछ महसूस नहीं करते हैं, इसलिए यह झिझक 'साइज़' में और भी बड़ी दिखती है, दूरी बनी रहती हैइस समस्या के विश्लेषण के लिए 'बेटा' और 'पापा' जैसे शब्दों के अन्दर उतर कर देखना समझना पड़ेगा

बेटा शब्द का अध्ययन गूढता से करना होगा। 'बे' से सबसे आसानी से बनाने वाला शब्द होगा बेफिक्रवहीँ 'टा' से 'टॉप ऑफ़ हाउस' का विचार मन में आता हैयानि घर में बाप से थोड़ी ऊँची पोजीसन पर एक बादशाहतो बेटा अर्थ निकला-"घर में बाप से बड़ा बेफिक्र बादशाह।"

अब पहले पुराने ज़माने के 'पिताजी' का अध्ययन करे तो, इसके तीन हिस्से होंगे
पि- 'पिछड़ा हुआ' सबसे उपयुक्त बैठता है
ता- तारीफ ना करने वाला
जी- जीवन भर की ज़िम्मेदारी
यानि पिताजी हुए - पिछड़ी सोच के, तारीफ ना करने वाले बेटे के सर पे पड़ी जीवन भर की ज़िम्मेदारी

अब पिताजी के आधुनिक स्वरुप पापा का अध्ययन...
पा- पारदर्शिता से दूर
पा- पुरानी सोच वाला
तो 'पापा' यानि बेटे की पारदर्शिता सोच के आगे शून्य, बस पुरानी सोच का जीव

"अब अगर ये कहे कि 'एक बेटा पिताजी के साथ रहता है।' तो कहना होगा बाप से बड़ा एक बेफिक्र बादशाह एक पिछड़ी सोच वाले, तारीफ़ ना करने वाले व् जीवन भर कि एक ज़िम्मेदारी बने, पारदर्शिता से दूर, पुरानी सोच वाले जीव के साथ रहता है। "

कड़वा लग रहा है ना! पर इस परिभाषा को १० बार लगातार पढ़िएसच्चाई, इसकी मिठास बनकर आपका गला तर कर देगीयह आज के ज़माने का सर्वत्र स्वीकार्य सत्य हैखैर, इन सब बातों से परे हट कर एक बाप को अपने बेटे कि हर बात मंजूर होती हैकहीं अगर वो टांग अडाता भी है तो बच्चे को गिरने से बचने के लिएइसे वो समझ ना सके तो ये दुर्भाग्य भी बाप के हिस्से में ही जाता है

अब रही बेटे कि भला सोचने कि बातकौन ऐसा पिता होगा जो अपने बेटे कि उन्नति ना चाहेअब तो दुआ है एक युग ऐसा आये, जहाँ एक बेटा अपने पिता से वो सब कहे, जो अपनी माँ से आसानी से कह लेता है

गुरुवार, 27 मई 2010

आज का नौजवान

समझता है वह खुद को फलसफी अपने ज़माने का,
यही मकसद है शायद आजकल दाढ़ी बढ़ाने का।

नक़ल फ़िल्मी अदाकारों की वो फैशन समझता है,
वह तहजीब की बातो को पिछड़ापन समझता है।

जिया करता है नशे में दिल को बहला कर,
गुजरती हैं दिन उसके लोगों को उल्लू बनाकर।

बोली-भाषा-हुनर और ज्ञान में जीरो ही जीरो है,
वह बरातों में पीकर नाच सकता है तो हीरो है।

कभी शिक्षक को मारा, कभी हड़ताल करवा दी,
उसे हर रोज़ मिलनी चाहिए पढने से आज़ादी।

हो जाये झगडा खलासी से तो बस जला डाली,
खता माली की थी बुनियाद गुलशन की मिटा डाली।

यह हसरत है की रोज किसी से जंग हो जाये,
हमे पढना नहीं, औरों को क्यों पढने दिया जाये।

लड़े हक के लिए इसके सिवा रास्ता क्या है,
हमारा फ़र्ज़ क्या है इससे हमको वास्ता क्या है।

हमारे साथ जो हड़ताल में शामिल नहीं होगा,
सलामत लौट पाए घर को इस काबिल नहीं होगा।

नक़ल को क्यों नहीं इम्तिहान में आबाद किया जाये,
किताबे पढ़ के किस लिए सेहत बर्बाद की जाये।

नक़ल करने से हमके क्या रोकेगा कोई साला,
खुला रखा है जब टेबल पे कट्टा व चाकू रामपुर वाला।

यही चाकू हमारे ज़िन्दगी का रहनुमा होगा,
इसी की नोक पर हर नौकरी का दर खुला होगा।

क्या बच गयी है और भी कुछ इस वक़्त की बाते,
तो फिर चाँद लाइने और लिख के कहेंगे,
आज के युवा की हैं ये सब करामातें.....

सिगरेट : तू ही सच्चा हमसफ़र

गमे दौराँ में जब हमदम ना कोई काम आया,
मेरे मायूस लब पर उस समय तेरा नाम आया,
मेरे हर हमसफ़र ने साथ जब मझधार में छोड़ा,
यही सिगरेट है जिसने नहीं मेरा दिल तोडा।।

अभी भी गम है हजारों मेरी राहो में,
चला आया हूँ पर भाग कर इसकी पनाहों में,
जहाँ तक साथ भी मेरे अपने दे नहीं पाए,
वहां तक पहुचे है इसके छल्लो के सुर्खरू साये।।

यह मेरे साथ है तो रंज मुझसे दूर रहता है,
मेरे तमाम रातो में इसी का नूर रहता है,
ये खुद जल के देती है चमक मेरे अरमानो को,
सुकून देती है जला के , गम के ठिकानो को।।

माना की ये मेरे जीवन को यकीनी से इत्तेफाक करती है,
क्या हुआ की ये दिल जिगर को जला के ख़ाक करती है,
हम तो वैसे भी यहाँ अकेलेपन में मरते हैं,
इसके आने से वो सूनापन तो मिटता है...
हम पल-पल सुलगते हैं, वो धीरे-धीरे से बुझता है।।।।

शनिवार, 22 मई 2010

कुछ अपने कर्त्तव्य

बचपन की रवानी के दिन और होते हैं ,
हमारी हर सिसक पे दौड़ते हज़ारो पैर होते हैं ,
न वो बचपन रहा , ना वो पाँव ही हैं दिखते ,
की हम अपने आसुओं के लिए भी बाज़ार से रुमाल खरीदते …

ऐसा नहीं है की अपनों ने भुला दिया है हमे ,
पर पेट की आग ने धुप में दौड़ा दिया है हमे ,
करना तो था ही हमे ये काम भी यारा ,
कल तलक जो खिलाते थे हमे , उनका आज बनाना है सहारा …

सोच अब भी यही की कैसे करे उनकी आसन ज़िन्दगी ,
पर दौड़ भाग के बीच कहीं छूट जाती उनकी बंदगी ,
माता-पिता से प्यार का सागर लिया है हमने ,
अब सन्मान का दरिया भी बहाना है हमने …

कोई कहता है हमसे की चल चले दूर देश में ,
पर माँ-बाप की वो डांट-दुलार याद आती हर भेष में ,
कैसे उन्हें हम छोड़ दे जिसकी दुनिया ही हममे सिमट चुकी ,
अब तो जीना भी यही है मरना भी यही ,
की अब उनकी मार-दुलार ही हमारी आदत है बन चुकी ॥

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

लब खोलोगे , तो दिल तोड़ोगे ….

हम अक्सर कुछ ऐसी बाते कहते और सुनते हैं जो हमे तो अच्छी लगती हैं पर सामने वाला इसे पसंद नहीं करता । ये तो पता था की किसी एक बात से सबको खुश नहीं रखा जा सकता , पर ये नहीं जानता था की आपकी कही एक बात किसी को दुःख भी पंहुचा सकती है । आज मैंने इस बात को भी समझ लिया की आप कुछ कहने से पहले सौ बार सोचिये की कहीं इससे कोई दुखी तो नहीं होगा । यहाँ बात कहने से तात्पर्य ये नहीं की आप किसी की बुराई या खामिया छाट रहे हैं बल्कि किससे ये बात करे इसका भी ध्यान देना जरुरी होता है ।

आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ , एक महोदय से अपने कॉमन फ्रेंड के बारे में बात की जो किसी प्रकार से उसे पता चली … खैर इसमें कोई गलत बात नहीं थी क्योंकि मै खुद उससे इस बारे में बात करने को था । मै उसे बताना चाहता था की अमुक व्यक्ति से मेरी बात हुई , पर अमुक व्यक्ति मुझसे तेज़ निकला और एक प्रकार से मेरी कही हर अच्छी-बुरी बात को उसके सामने ऐसे रखा की मै ही दोषी हो गया । अब उस मित्र को ऐसा लगता है की मैंने उसकी बुराई उसके पीठ पीछे किसी और से की है । पर ये तो मै ही जनता हूँ मैंने क्या और क्यों कहा । इन बातो के पीछे मेरी क्या मनसा थी । पर मै गलत साबित हुआ और अब मै खुद अपनी नजरो में दोषी लग रहा हूँ की चाहे जो हुआ पर मुझे किसी की बात उसकी अनुपस्थिति में किसी अन्य के सामने नहीं करनी चाहिए थी ।

अपनी गलती की माफ़ी तो मैंने आज उस दोस्त से मांग ली , साथ ही एक वायदा भी कर आया की अब उससे जुडी किसी बात को उसे छोड़ किसी से नहीं करूँगा । पर दिल को जाने क्यों ऐसा लग रहा है की अब किसी से बात नहीं करनी चाहिए, कम से कम अगले कुछ दिनों तक तो नहीं ही। शायद पहली बार इस तरह से अपना ही मजाक उड़ते मैंने पाया है कि अब हर किसी से रूठ जाने को दिल करता है । बस मै और मेरी तन्हाई ना कोई बात ना किसी की रुसवाई ….....॥

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

सवाल यही : कौन गलत, कौन सही

अपराध और राजनीती एक दुसरे के पर्याय बनते जा रहे हैंहर बार चुनाव से पहले एक सवाल उठता है की दागी छवि वाले नेताओ को टिकेट ना दिया जाये, लेकिन अगर बेदाग छवि वाले नेताओ को ढूँढना ही टेढ़ी खीर हो जाये तो? भारतीय राजनीती में हर स्तरपर ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके रसूख का जायजा उनके हथियारों के की तादाद से लिया जाता है। 'ओंकारा' तथा 'सत्या' जैसी फिल्मो के नायक ही बाहुबली थे और इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की नेताओ की बाहुबली वाली छवि को भारतीय जनमानस ने पुरो तरह अपना लिया है

कैसी विडम्बना है की गुंडों, लोफरो और बदमाशो को अब 'बाहुबली' जैसे सशक्त शब्द की पारी सीमा में गढ़ दिया गया हैजो लोगो को उनके प्रति घृणा की जगह सम्मान और उनके बढ़ते रसूख को बढ़ावा देता हैऐसे में एक सवाल उठता है की क्या वाकई भारतीय राजनीती में ये बाहुबली अपनी लिए खास मुकाम बना चुके हैं? क्या आज बाहुबली होना शर्म की नहीं गर्व की बात बन गयी है? क्या नैतिकता के लिए अब कोई जगह नहीं बची?

हमारे सामने सवाल मुश्किल हैअगर उद्योगपति अपनी अकूत दौलत की बदौलत, कोई अपराधी अपने बहुबल की तर्ज पर और कोई पत्रकार-लेखक अपनी कलम बेचकर संसद या विधानसभाओ में 'जनप्रतिनिधि' का दर्जा पाने की कोशिश करता है तो इनमे से किसे अलग और एक आदर्श के तौर पर देखा जाये???

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