रविवार, 3 जून 2012

नया दिन नई सोच...


"अब सोचते हैं नये दिन से नया सा हाल हो,
अपनी हरकतें भी लोगों को लिए मिसाल हो।

अपने शहर में कोई न रहे दूर किसी से,
रहे हर ओर शांति अब न कोई बवाल हो।

ये तेरा है ये मेरा है, ये बातें भूल जाये सब,
कि हर लब पर बस हमारेलहजे का कमाल हो।

चले ऐसी आंधी की मिटे सारे रंजिश-ए-शिकवे,
दुश्मनों में भी हो मोहब्बत, उनमें बोलचाल हो।

न झगड़े कोई किसी से, ना अब फसाद हो कोई,
मुस्कुराहटों संग गुजरे जिंदगी ऐसा कोई साल हो।

सब कुछ हमारे पास फिर क्यों है गरीबी का बसर,
इस अमीरे-शहर में अब कुछ ऐसे भी सवाल हो।

कभी तो बदले महोब्बत का भी निजाम देश में,
उब चुके हुश्न-ओ-इश्क से, अब देशप्रेम मुहाल हो।"

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 29/5/12 को राजेश कुमारी द्वारा
    चर्चामंच मंच पर की जायेगी |

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    1. जी आपका आभार.. कि आपको रचना अच्छी लगी..

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  2. उत्तर
    1. हबीब साहब हौसला अफजाई का शुक्रिया..

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