गुरुवार, 11 अगस्त 2011

जोश और उम्मीद....

खिलखिला रही है नसों में, सौ दर्द की अठखेलियाँ,

आजादी के सावन में भी गुलाम मन की होलियाँ,

कैसे भला कह दे की हम, करते नहीं परवाह तनिक,

जब देश में बम फोड़ आतंकी मना रहे दिवालियाँ।


आज भी जब देखता हूँ खून को बिखरे हुए,

अपने ही भाई बंधुओं को कराह में सिमटे हुए,

दिलो-दिमाग में छाये कुंध से तड़प उठता हूँ,

कि या तो सब रहे खुश या दुनिया ही मिटा दूं।


फैंली हो शांति दूर तक, दिलों में अमन हों,

यह देश हमारा फिर से एकता का चमन हों,

रंजो-गम के मेले में खुशियों के ठेले हों,

ना बोझ हो किसी पर, न महफिल में अकेले हों।


दिन आयेगा ऐसा भी कि खुशियां ही खिलेंगी,

तकरार की आंच पर पककर मोहब्बत ही मिलेंगी,

तीखी जुबान, कढवे विचार से भी शहद फूटेगा,

जब आदमी का गुरूर आदमी के प्यार पर टूटेगा।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

कुछ जज्बात...


"दिल-ओ-नज़र से कुछ देर भी जुदा रखूं,

ये मेरे बस मैं नहीं की तुझे खफा रखूं !

नहीं है कुछ भी मेरे ज़ेहन में सिवा इसके,

मैं तेरी याद भुला दूँ तो याद क्या रखूं !!"


"टुकड़ों में जी रहे हैं, जीने की चाह में हम,

महंगा पड़ा है शायद ये ज़िन्दगी का शौक..

सादगी है ये की दिल कहता है सबको अपना,

मुझको मिटा न डाले कहीं ये दोस्ती का शौक..."


"जो आजमाते हैं उन्हें भी ये पता चले,

हम साथ में लिये हुए किस की दुआ चले।

ख्वाहिश है या खलिश है या कोई खुमार है,

तू न दिखा तो हम जुस्तजू-ए-तन्हाई चले..।।"


"सब बलाएँ रोज मेरी अपने सर लेती रही

माँ ही थी जो सह के सब कुछ भी दुआ देती रही

उसके दम पर आ अंधेरों आज भी रोशन हूँ मैं

मेरी बुझती लौ को माँ हर दिन हवा देती रही........"


"आवारा मिजाजी से निकलने नहीं देता ,

मैं चाहूँ बदलना वो बदलने नहीं देता ,

ना जाने कैसा उसकी दोस्ती में है नशा ,

एक उम्र हुई मुझको संभलने नहीं देता...."


"खताए उसकी आज उसको बता आये हम,

आँखों के मोती को आँखों से गिरा आये हम,

कहते ही क्या उस इश्क के व्यापारी को भला,

दिखा के आईना नजरो से गिरा आये हम...."


"हम से बिछड़ कर बेनाम हो जाओगे,

सौदागरों के हाथो नीलाम हो जाओगे,

हमें अच्छा नहीं लगता तेरा हर एक से मिलना,

हर किसी से मिलोगे तो आम हो जाओगे..! "


"कुछ फासले सिर्फ आँखों से होते हैं,

दिल के फासले तो बातों से होते हैं,

कोई लाख भुलाने कि कोशिश करे पर,

कुछ रिश्ते ख़त्म सिर्फ साँसों से होते हैं..!"


"क़सम उन मस्त आँखों कि,

मै वो लबरेज सागर हूँ,

जो मस्ती में चल निकलूँ,

तो सारी दुनियां को ले डूबूं.."

पूंजी प्रवाह के आगे नतमस्तक 'पत्रकारिता'

लोकतंत्र में पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसे सामाजिक सरोकारों का सच्चा पहरूआ कह सकते हैं क्योंकि पत्रकारिता का लक्ष्य सच का अन्वेषण है। सामाजिक शुचिता के लिए सच का अन्वेषण जरूरी है। सच भी ऐसा कि जो समाज में बेहतरी की बयार को निर्विरोध बहाये, जिसके तले हर मनुष्य खुद को संतुष्ट समझे। पत्रकारिता का उद्भव ही मदांध व्यवस्था पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से हुआ था लेकिन आज की वर्तमान स्थिति में यह बातें बेमानी ही नजर आ रही है। आज केवल खुद को आगे पहॅुचाने और लोगों की भीड से अलग दिखाने की चाह में जो भी अनर्गल चीज छापी या परोसी जा सकती हैं सभी को किया जा रहा है। अगर आज की पत्रकारिता को मिशन का चश्मा उतार कर देखा जाये तो स्पष्ट होता है कि मीडिया समाचारों के स्थान पर सस्ती लोकप्रियता के लिए चटपटी खबरों को रखने के लिए तत्पर है।


एक दौर हुआ करता था जब पत्रकार निष्पक्ष सेवक और पत्रकारिता श्रद्धा के तौर पर देखी जाती थी। जो समाज के बेसहाराओं का सहारा बन उनकी आवाज को कुम्भकर्णी नींद में सोए हुक्मरानों तक पहुॅचाने का माद्दा रखती थी। उस दौर के पत्रकार की कल्पना दीन-ईमान के ताकत पर सत्तामद में चूर प्रतिष्ठानों के चूल्हें हिलाने वाले क्रांतिकारी फकीर के रूप में होती थी। यह बातें अब बीते दौर की कहानी बन कर रह गयी हैं। आज की पत्रकारिता के सरोकार बदल गये है और वह भौतिकवादी समाज में चेरी की भूमिका में तब्दील हो गयी है। जिसका काम लोगों के स्वाद को और मजेदार बनाते हुए उनके मन को तरावट पहुॅचाना है। देश के सामाजिक चरित्र के अर्थ प्रधान होने का प्रभाव मीडिया पर भी पडा है और आज मीडिया उसी अर्थ लोलुप्सा की ओर अग्रसर है, या यू कहिए की द्रूत गति से भाग रही है। इस दौड में पत्रकारिता ने अपने आयामों को इस कदर बदला है कि अब समझ ही नहीं आता की मीडिया सच की खबरें बनाती है या फिर खबरों में सच का छलावा भरती है, लेकिन जो भी हो यह किसी भी दशा में निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है।


पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सूचना, ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करना। किसी समाचार पत्र को जीवित रखने के लिए उसमें प्राण होना आवश्यक है। पत्र का प्राण होता है समाचार, लेकिन बढते बाजारवाद और आपसी प्रतिस्पद्र्धा के कारण विज्ञापन इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता का वास्तविक स्वरूप ही बदल गया हैŸ। राष्ट्रीय स्तर के समाचारों के लिए सुरक्षित पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर भी अद्र्धनग्न चित्र विज्ञापनों के साथ आ गये हैं। समाचार पत्रों का सम्पादकीय जो समाज के बौद्धिक वर्ग को उद्वेलित करता था जिनसे जनमानस भी प्रभावित होता था। उसका प्रयोग आज अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखाने में उपयोग किया जा रहा है, जिसने पत्रकारिता के गिरते स्तर और उसकी दिशा को लेकर अनेक सवाल खडे कर दिये हैं। वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव ने समाचार पत्रों को भी सत्य के नाम पर इतनी तेजी से दौडा दिया है कि समाचार संवाहक को स्वयं ही समाचार सर्जक बना दिया है। फिल्म अभिनेत्रियों की शादी और रोमांस के सम्मुख आम महिलाओं की मौलिक समस्याएँ, उनके रोजगार, स्वास्थ्य उनके ऊपर होने वाले अत्याचार का समाचार स्थान नहीं पा पाता। यदि होता भी है तो बेमन, केवल दिखाने के लिए।


पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो समझ आता है कि भारत में पत्रकारिता अमीरों के मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित होने की बजाय स्वतंत्रता संग्राम के एक साधन के रूप में विकसित हुई थी। इसलिए जब १९२० के दशक में यूरोप में पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर बहस शुरू हो रही थी, भारत में पत्रकारिता ने इसमें प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। १८२७ में राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘मेरा सिर्फ यही उद्देश्य है कि मैं जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं, जो उनके अनुभवों को बढ़ाए और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं ताकि शासक जनता को अधिक से अधिक सुविधा देने का अवसर पा सकें और जनता उन उपायों से परिचित हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।ङ्क वर्तमान में राजा राममोहन राय जी की यह बातें केवल शब्द मात्र हैं जिनपर चलने का किसी भी पत्रकार का कोई मन नहीं है आखिर उसे भी समाज में अपनी ऊचाईयों को छूना है। आज के समय मीडिया अर्थात् पत्रकारिता से जुडे लोगों का लक्ष्य सामाजिक सरोकार न होकर आर्थिक सरोकार हो गया है। वैसे भी व्यवसायिक दौर में सामाजिक सरोकार की बातें अपने आप ही बेमानी हो जाती हैं। सरोकार के नाम पर अगर कहीं किसी कोने में पत्रकारिता के अंतर्गत कुछ हो भी रहा है तो वो भी केवल पत्रकारिता के पेशे की रश्म अदायगी भर है।


पत्रकारिता के पतित पावनी कार्यनिष्ठा से सत्य, सरोकार और निष्पक्षता के विलुप्त होने के पीछे वैश्वीकरण की भूमिका भी कम नहीं है। सभी समाचार पत्र अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय समाचारों के बीच झूलने लगे हैं। एक ओर विदेशी पत्रकारिता की नकल पर आज अधिकांश पत्र सनसनी तथा उत्तेजना पैदा करने वाले समाचारों को सचित्र छापने की दौड में जुटे हैं। इन्टरनेट से संकलित समाचार कच्चे माल के रूप में जहाँ इन्हें सहजता से मिल जा रहा है,वहीं प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अनेक संस्करण निकालकर अपने पत्रों को क्षेत्रीय रूप दे रहे हैं, जिसके कारण पत्रकारिता का सार्वभौमिक स्वर ही विलीन होने लगा है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएं व टेलीविजन चैनल जो गे डेङ्क यानी कि समलैंगिकता दिवस मनाते हैं, संस्कृति की रक्षा की बातों को मोरल पोलिसिंग कहकर बदनाम करने की कोशिशें करते हैं, भारतीय परंपराओं और जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाते हैं, खुलकर अश्लीलता, वासनायुक्त जीवन और अमर्यादित आचरणों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि यह सब वे पब्लिक डिमांडङ्क यानी कि जनता की मांग पर कर रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यही है कि बाजारवाद के लाभ से लाभान्वित होने के प्रयास में अन्य पर दोषारोपण करके स्वयं को मुक्त नहीं किया जा सकता।


आज यदि महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, विष्णु हरि पराङकर या माखनलाल चतुर्वेदी जीवित होते तो क्या वे स्वयं को पत्रकार कहलाने की हिम्मत करते? क्या उन जैसे पत्रकारों की विरासत को आज के पत्रकार ठीक से स्मरण भी कर पा रहे हैं? क्या आज के पत्रकारों में उनकी उस समृद्ध विरासत को संभालने की क्षमता है? ये प्रश्न ऐसे हैं, जिनके उत्तर आज की भारतीय पत्रकारिता को तलाशने की जरूरत है, अन्यथा न तो वह पत्रकारिता ही रह जाएगी और न ही उसमें भारतीय कहलाने लायक कुछ होगा। इसके अलावा पत्रकारिता को सबसे बडा खतरा गलत दिशा में बढा कदम है। जिसके लिए बाजारवादी आकर्षण से मुक्त होकर पुनः पुरानी परम्परा का अनुसरण करना ही होगा, तभी पत्रकारिता की विश्वसनीयता ब‹‹ढेगी। मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को पीत पत्रकारिता एवं सत्ताभोगी नेताओं के प्रशस्ति गान के बजाय जनमानस के दुःख दर्दो का निवारण, समाज एवं राष्ट्र के उन्नयन के लिए निःस्वार्थ भाव से कत्र्तवय का पालन करना होगा, तभी वह लोकतंत्री मे चौथे स्तंभ का अस्तित्व बनाये रखने में सफह हो सकेंगे।


-आकाश कुमार राय

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कुछ पंक्तियाँ... जो दिल को छू गयी ....

"बस एक ही तमन्ना रखता हूँ मैं अपने दिल में...
मुहब्बत से मिलो चाहे मुझे बर्बाद ही कर दो ..."


"दांत भी टूटी , खाट भी टूटा , उनसे प्यार निभायी में ..

उनके शर्म ने ली जान हमारी , भर गर्मी ओढ़ रजाई में ..."



"जब करो इज़हार इश्क का, जेब-ओ-दिल पर हाथ रख लेना,

मान गयी तो खर्च बढेगा, ना मानी तो कुछ टूटेगा ..."


"मौला यूँ ही रखना मेरे सर पे अपना हाथ
माँ भी मेरे साथ हो मेरे बाबु जी भी साथ....."


"ना करना हौसले की बात तू मुझसे महोब्बत में
अक्ल की हम नहीं सुनते जुनूँ से काम करते हैं... "


"सोचता हूँ बिना शर्त के आये मौत तो हाथ मिला लूं ,
कि उब्ब गया हूँ ज़िन्दगी से समझौता करते-करते...."


"मेरी आवारगी में कुछ दखल तुम्हारा भी है,
तुम्हारी याद आती है तो हमे घर अच्छा नहीं लगता.."


"कहता हैं दर्दे जिगर को लफ्जों से मत तोलना
आँख से गिरने की ख्वाइश कुछ तो तेरे खूं में हो......."


"आँखों के आईने में किस किस को छुपाता वो
हज़ार थे हम जैसे ख्वाबों में आने वाले......"


"ये सोच के सूरज को मुटठी में भर लिया
बादल के साये देर तक मेरे साथ रहेंगे .."


"देख ले आ मौत आकर आज फिर हारेगी तू
माँ मिलेगी साथ मेरे, छोड़ कर भागेगी तू...."

रविवार, 31 जुलाई 2011

मोहम्मद रफ़ी : वो जब याद आये, बहुत याद आये......

सुरों के सरताज मोहम्मद रफ़ी की रविवार ३१ जुलाई को पुण्यतिथि है। हर रोज गूंजती है टीवी या रेडियो पर उनकी आवाज और विश्वास नहीं होता कि उनको हमसे बिछड़े हुए इतने साल बीत गए। आज सशरीर वे भले हमारे बीच न हों लेकिन मोहब्बत हो या जुदाई, भजन हो या कव्वाली, शादी हो या विदाई, जीवन का कोई ऐसा मौका नहीं जो मोहम्मद रफी की आवाज में घुलकर ये गाने हमारे कानों तक न पहुंचते हों। रफी के गीतों में कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियो' में देशभक्ति का जोश है तो 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' में भक्ति भाव का समर्पण। फिल्म 'कश्मीर की कली' के मशहूर गीत 'तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुझे बनाया' में 'तारीफ' शब्द का इस्तेमाल दर्जनों बार किया गया है लेकिन इसे गाते समय मोहम्मद रफी ने हर बार 'तारीफ' शब्द को एकदम अलग-अलग अंदाज में इस तरह गाया है कि मुंह से 'वाह' निकल पड़ता है।

शहंशाह-ए-तरन्नुम कहलाने वाले रफी साहब आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। हिंदी सिनेमा में अपनी आवाज और शोखी के आधार पर अलग पहचान बनाने वाले गायक रफी की कमी आज भी लोगों को खलती है। नये गायकों के लिए रफी साहब के गाने जैसे संजीवनी हो कि जिसे गुनाकर वह संगीत का ककहरा सीख लेंगे। संगीत के पुरोधा कहते हैं.. बॉलवुड में कभी के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे समेत जैसे गायकों के पास शास्त्रीय गायन की विरासत थी, संगीत की समझ थी लेकिन नहीं थी तो वो थी आवाज। जिसे रफी ने पूरा किया। सन १९५२ में आई फिल्म 'बैजू बावरा' से उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनायी।

१९६५ में पद्मश्री से नावाजे जा चुके रफी साहब को ६ बार फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुका है। उनके गाये गीत.. चौदहवीं का चांद हो, हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को (ससुराल), ऐ गुलबदन (प्रोफ़ेसर), मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की क़सम (मेरे महबूब), चाहूंगा में तुझे (दोस्ती), छू लेने दो नाजुक होठों को (काजल), बहारों फूल बरसाओ (सूरज), बाबुल की दुआएं लेती जा (नीलकमल), दिल के झरोखे में (ब्रह्मचारी), खिलौना जानकर तुम तो, मेरा दिल तोड़ जाते हो (खिलौना), हमको तो जान से प्यारी है (नैना), परदा है परदा (अमर अकबर एंथनी), क्या हुआ तेरा वादा (हम किसी से कम नहीं ), आदमी मुसाफ़िर है (अपनापन), चलो रे डोली उठाओ कहार (जानी दुश्मन), मेरे दोस्त किस्सा ये हो गया (दोस्ताना), दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-ज़िगर (कर्ज), मैने पूछा चांद से (अब्दुल्ला).. आज भी बजते हैं तो लोग उनकी आवाज में खो जाते हैं।

गौरतलब है कि पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित रफी का जन्म २४ दिसंबर १९२४ को हुआ था और ३१ जुलाई १९८० के दिन मुंबई में दिल का दौरा पढने से उनका निधन हो गया। आज भले ही रफी जी दुनिया में ना हो पर उनके गानों और आवाज के बलबूते वो हर पल लोगों की दिलों में संगीत लहरी के तौर पर जिंदा रहेंगे। बरसों पहले जब उन्होंने गीत ‘तुम मुझे यूँ भूला ना पाओंगे...' गाया होगा तो नहीं सोचा होगा ये गीत केवल शब्द नहीं बल्कि भविष्य की सच्चाई को बयां कर रही है। वाकई संगीत के प्रशंसक आज भी मोहम्मद रफी को उनके गाये गानों में तलाशते हैं।

(पुण्यतिथि पर विशेष...)

रविवार, 24 जुलाई 2011

...और क्या देते

"तुम्हे बख्शी है दिल पे हुक्मरानी और क्या देते ,
यही थी सिर्फ अपनी राजधानी और क्या देते ,
सितारों से किसी की मांग भरना इक फ़साना है ,
तुम्हारे नाम लिख दी जिंदगानी और क्या देते ,
बिछरते वक़्त तुम्हे इक न इक तोहफा तो देना था ,
हमारे पास था आँखों में पानी और क्या देते ...!"
‎"मै ये नहीं कहता कोई उनके लिए दुआ न मांगे ,
बस चाहता हूँ कोई दुआ में उनको न मांगे ...."

"माना की बहुत खास हूँ में अपने चाहने वालो के लिए लेकिन ...
चंद लम्हों से ज्यादा कोई न रोयेगा मेरे चले जाने के बाद ..."
"सुकून दिन को , रात को राहत नहीं है ,
मुझे फिर भी उनसे शिकायत नहीं है ,
मै हक उसपे अपना जताऊ भी तो कैसे,
वो चाहत है मेरी अमानत नहीं है..."

‎"जिस मासूमियत से मैंने अपने ज़ख्म दिखाए थे ,
उतनी ही मेहरबानी की उसने उन्हें नासूर बनाने में ..."
"तुमसे न कट सकेगा अंधेरों का ये सफ़र ,
अब रात हो रही है मेरा हाथ थाम लो ..."
"मैं बिखरा नही हूँ, बस थोडा टूट गया हूँ !
मैं खफा भी नही, बस थोडा रूठ गया हूँ !
मत सोच के मैंने चाहा है तेरा साथ छोड़ना !
तू आगे निकल गया और मैं पीछे छुट गया हूँ !!"

"मेरे न रहने से किसी को कोई खास फरक नहीं पड़ेगा,
बस एक तन्हाई रोएगी की मेरा हमसफ़र चला गया..."

"फ़रिश्ते से बेहतर है इंसान बनना..
मगर उसमे लगती है मेहनत ज्यादा...."
"आरम्भ के स्तर से
विकास के शिखर तक,
यह क्रम सब जीवन में फिरते हैं....

पर मौत उस सच्चाई
को नहीं नापती,
जहाँ से हम गिरते हैं....."
"एक ठंडी हवा, एक बादल, एक खूबसूरत आसमान...
मैं जहाँ कहीं भी जाता हूं , अपने घर की धुल साथ ले जाता हूँ..."

"फुर्सत ही नहीं मिली कभी मुझको दिल लगाने की ...
इसलिए ये मोहब्बतों के मुद्दे मेरी समझ में नहीं आते ..."

खलीश मन की...

"बेनाम सा ये दर्द, ठहर क्यों नहीं जाता,
जो बीत गया है, वो गुज़र क्यों नहीं जता,

वो एक ही चेहरा तो नहीं, सारे जहां में,
जो दूर है, वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई, राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मै उधर क्यों नहीं जाता,

वो नाम जो बरसो से, ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है, तो बिखर क्यों नहीं जाता...."
"खो गया यादों के हुजूम में अपना ही वजूद ,
कि अब याद नहीं किस याद ने महफूज रखा था..."
"तुझे अकेले पढूँ कोई हम-सबक न रहे ,
मैं चाहता हूँ की तुझ पर किसी का हक न रहे .."

इक बात कहूं गर सुनते हो ..

इक बात कहूं गर सुनते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
कुछ चुप - चुप से , कुछ चंचल से ,
कुछ पागल - पागल लगते हो .

हैं चाहने वाले और बहुत ,
...पर तुम में है इक बात अजब ,
तुम मेरे सपने से लगते हो.
इन ख्वाबों से आगे बढ़कर .
तुम अपने अपने से लगते हो .

इक बात कहूं गर सुनते हो .
तुम मुझको अच्छे लगते हो .
"उसे मालूम है शायद मेरा दिल है निशाने पर ,
लबों से कुछ नहीं कहती नज़र से वार करती है,
मैं उससे पूछता हूँ ख्वाब में , 'मुझ से मोहब्बत है ?
फिर आँखें खोल देता हूँ वो जब इज़हार करती है ''
‎"Lamhon mein qaid kar de jo sadiyon ki chahate
Hasrat rahi ki aisa koi apna bhi talabgaar ho..!!"
वक्त और लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं। एक न एक दिन हम सबको आखिरी नतीजों का सामना करना ही पड़ता है। मुस्कुराते हुए इसका सामना करने की तैयारी करना बेहतरी है।
‎"हमारा दिमाग, इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखेबाज़ है! यह अपने रास्ते चलने के लिए अलग-अलग तरह के हज़ारों बहाने करता है!"
‎"गली गली मैं हुआ मेरी हार का ऐलान ,
ये कौन जाने की मैं तो बिसात पर ही न था "
"वो जो औरों को बताता है जीने के तरीके ...
खुद अपनी मुट्ठी में मेरी जान लिए फिरता है ......"
"मैं रोजमर्रा के अनुभवों में, होशमंद हालत में, यूं ही भटकता हूं ... महसूस करता हूं कि जैसे कोई जहाज हूं जो परिस्थितियों के समंदर में है ..."
"हमे भी पता है साहिल का सुकून, लेकिन
लुफ्त हमे सागर से टकराने में आता है.."
"मुखालफत से मेरी शख्सियत निखरती है ,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ ! "
‎"शिद्दत-ए-दर्द से शर्मिंदा नहीं है मेरी वफ़ा ... !
दोस्त गहरे हैं तो फिर जख्म भी गहरे होंगे !!"
“Wo Chup Rehta Tha Magar, Uski Nighahen Bolti Thi...
kuch Log khamosh Reh Kar Bhi “DIL” Jeet Jaatey Hain...!”
‎"शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है,
मेरे अंदर बारिश होती रहती है।
रोज सजाता हूँ ख्वाबों का कारवां,
हकीकत मेरी आंखों को धोती रहती है।"
"जो छू नहीं सकते, जमीं की सहजता,
उन्हें अधिकार नहीं है, आकाश छूने का ...."
राहें सदा असंतोष से निकलती हैं, संतोष के गढ़ से कोई भी राह बाहर की ओर नहीं जाती। मैं भी असंतोष के दौर में हूँ और अपने मंजिल को उन्मुख मेरा सफ़र लगातार जारी है।
‎"नहीं काबिल तेरे लेकिन, मुनासिब हो अगर समझो,
याद रखना दुआओं में, यही बस इल्तजा अपनी ....!"
‎"हवाओं ने है रुख बदला, तूफां की गुंजाइश है ...
जिद अपनी भी न रुकने की, आज हौसलों की आजमाईश है !"
‎"पलकों की हद को तोड़ कर बाहर वो आ गया,
एक आंसू मेरे सब्र की तौहीन कर गया....!"
‎"ज़िन्दगी के मेले में, मैंने बस यही देखा ,
इक दुकान सपनों की, इक हुजूम दुनिया का..."

मैं..

‘‘तुम जैसा समझते रहे वैसा तो नहीं मैं,
कांटा हूँ मगर फूल पे चुभता तो नहीं मैं!

अपनों से तो रूठा हूँ मैं सौ बार बहरहाल,
पर गैरों में जाकर कभी बैठा तो नहीं मैं!

रोता है अब भी दिल मेरा अक्सर ये सोचकर,
भूला हैं मुझे वो, उसे भूला तो नहीं मैं!

खुद्दारी की कुछ दाद तो तुम्ही दो मेरी आँखों,
हालात तो रोने के थे रोया तो नहीं मैं! "
किसी की तकलीफों का जिम्मेदार नहीं है "आकाश ".. ,
फिर भी लोग मुसीबतों में मेरी तरफ क्यों देखेते हैं ...!'
‎"Mera kissa...Meri Zindagi...Meri Hasraton Ke Siwa Kuch Nahi,
Ye Kiya Nahi, Wo Hua Nahi, 'Ye' Mila Nahi, 'Wo' Raha Nahi !!!"
‎" एहसास तो कर इन जज्बों का, नजरों से गिरा बेशक लेकिन!
जीना भी मुझे दुश्वार लगे, इतना तो नजर अंदाज़ ना कर....!! "
‎"कभी सुना था की ज़िन्दगी हौसलों से कटती है, आज पता चला 'मरने की आरज़ू' और 'सिसकती साँसों' को भी लोग जीना कहते हैं...!"
‎"लगातार प्रयास और अपनी गलतियों से सीख कर हर किसी को सही कदम उठाना ही पड़ेगा क्योंकि किसी की भी जिंदगी इतनी लंबी नहीं होती वह 'चाणक्य' बनने तक की अवधि का इंतज़ार कर सके!"
"सोचता हूँ बिना शर्त के आये मौत तो हाथ मिला लूं ,
कि उब्ब गया हूँ ज़िन्दगी से समझौता करते-करते...."
‎"टुकड़ों में जी रहे हैं, जीने की चाह में हम,
महंगा पड़ा है शायद ये ज़िन्दगी का शौक..
सादगी है ये की दिल कहता है सबको अपना,
मुझको मिटा न डाले कहीं ये दोस्ती का शौक..."
‎"दुनिया चाहे कुछ भी सोचे, मैं तो बस जानू इतना,
तुम मिल जाओ तो है जीवन, तुम बिन मैं हूँ तनहा !"
‎"खुशमिजाजी को देख मेरे, यारों न दो मशहूर होने की दुआ,
कि आज के दौर में मशहूर लोग, तन्हाईयों में मरते हैं..."

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मानसिक गुलामी और संकीर्णता के दायरे में सजी आजादी

आजादी, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने लम्बे समय तक राष्ट्रविरोधी शक्तियों से संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुति देकर कर हमें स्वतंत्र वातावरण में सांस लेने का हक दिलाया। आज इस आजादी को हमने अपने निजी स्वार्थ और एकमेव लाभ की मनोदशा के आधार पर फिर से गिरवी रख दिया है। कल तक जिस आजादी के सुनहरे स्वप्न को अपनी पलकों में सजोकर हमारे देश के स्वातंत्र वीरों ने अपनी भारत माता को विदेशी ताकतों से आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, आज उसी भारत में सियासत और तुष्टीकरण की ऐसी आंधी बह चली है की आजाद देश की गुलाम जनता सत्तासीन निरीह हुकूमत के खिलाफ जूझने पर मजबूर है।

लूट आज भी बदस्तूर जारी है, फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय गोरे अंग्रेजों ने देश को दीमक की तरह खोखला किया और आज काले अंग्रेज़ इस काम को कर रहे हैं। खेल वही है बदले हैं तो सिर्फ इसके किरदार। उस दौर में सत्ता और धन पर नियंत्रण अंगरेज़ हुक्मरान और देसी रजवाडों-नवाबों तक सीमित था, आज सफ़ेद पोश नेताओं, अफसरों और सत्ता के दलालों के हाथ में है। आजादी के बाद बने पहले प्रधान मंत्री द्वारा सन् १९४८ में पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया गया था, जिसके अंतर्गत देश का विकास किया जाना था लेकिन आज कितने लोग हैं जो जानना चाहते है कि पंचवर्षीय योजना के तहत क्या कार्य किये गये हैं? प्रत्येक वर्ष कितना पैसा पंचवर्षीय योजनाओं के नाम पर खर्चा जाता है यह जानने वाला कोई नहीं?

स्वतंत्रता पूर्व जिस अवस्था में भारत और भारतवासी थे, उसमें देशवासियों पर केवल सरकार के खिलाफ कार्य न करने देने की पाबंदी थी लेकिन आज स्थिति उससे भी अधिक भयावह हो गयी है। एक तरफ महात्मा गाँधी के रामराज्य की परिकल्पना को साकार करने का स्वप्न दिखाकर देश के हुक्मरान देशवासियों के खून-पसीने की कमाई को विदेशी बैंको में ज़मा कर रहें है तो दूसरी तरफ महगाई की चाबुक निरीह जनता की कमर तोड रही है। बाकि बची कसर सरकार का कर तमाचाङ्क आये दिन हमारे शक्ल की मालिश कर पूरा कर रहा है। क्या इसी आज़ादी की संकल्पना हमारे देश के अमर शहीदों और महापुरुषों ने की थी...? वास्तव में हमें आजादी नहीं मिली है, बल्कि देश की सत्ता को विदेशी गोरों से स्थानांतरित कर उन्हीं की नुमाइंदगी करने वाले देशी काले लोगों की हाथों में सौंप दी गयी है। वास्तविकता यह है कि आज भी हम मानसिक रूप से गुलाम हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक पुरातन देश है, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत का विकास होना चाहिए था जिसमे स्वतंत्रता-संग्राम के साहचर्य और राष्ट्रीय स्वाभिमान के नवोन्मेष के सोपान का दर्शन हो। लेकिन अब समय की आवश्यकता है कि सभी राजनीतिक पार्टियां और नीति निर्देशक तत्व देश की जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। स्पष्ट करें अपनी अपनी रणनीति कि देश से गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार को मिटाने, आतंकवाद को जड से उखाडने, नक्सलवाद के सफाए, समस्त भारतीयों को निर्भय एवं सुखी, संपन्न और विश्व में भारत को एक भरोसेलायक आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए क्या पुष्ट योजनाएं और किसके पास हैं। देश को विकास पथ पर ले जाने की बात करने वाले हमारे राजनेता धनलोलुप्सा को जागृत किये हुए हैं और जनता को विश्वास का घोल पिलाये जा रहे है कि सरकार उन्हीं के लिए तो प्रतिबद्ध है।

देश की जनता और आजादी के परवानों ने अनगिनत कुर्बानियां दे कर देश को अंग्रेजों से आज़ाद करवाया ताकि इस देश की धन संपदा इस देश की गरीब जनता को नसीब हो और वे अपना भविष्य संवार सकें। लेकिन आज देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं। नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि विदेशी गोरे लोगों के पिटठू, जो सरकार बन हमारे देश की दिशा और दशा तय कर रहे हैं, इन्हें देश और देश के विकास में कोई रूचि नहीं है। तो क्या यह सवाल नहीं उठता कि अगर गोरे लोगों की नीतियों को ही देशी लोग अनुपालन में लाया जा रहा है वो भी और घृणित रूप मे तो इससे बेहतर तो अंग्रेजों का ही शासन था, जहां कम से कम इतनी खामियां तो नहीं थी। आजाद भारत की व्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर कई सवाल खडे़ होते हैं जिनमें मुख्य यह है कि ऐसी आज़ादी किस काम की जो हमें मानसिक गुलामी और संकीर्णता के दायरे से मुक्त ना कर सके?ङ्क

आजादी शब्द जिसका मतलब ही है कि इंसान को अपने मन के मुताबिक कार्य करने की स्वतंत्रता हो। पर वास्तविकता यह है कि हमारी आजादी अन्य लोगों की सोच पर निर्भर करती है कि वह इसके बारे में क्या सोचते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि आज आजादी की आबो-हवा में सांस लेने वाले लोग अपनी मौलिक सोच को अब भी सामने वाले की बातों का गुलाम बना कर रखे हुए हैं। शाब्दिक अर्थो के तौर पर लोग आजादी को केवल अपने लाभ और स्वार्थसिद्धी का माध्यम मामने का चलन चल पडा है, किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि आजादी का मूलभाव क्या है और किस लिए लाखों देशवासियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। सरकारी अधिकारी अपने नौ से पांच के कार्य अवधि पर चाय और पान के साथ बातों के हवाई किले बनाते हुए समय को बिताते हैं और वेतन का भोग लगाते हैं। ऐसे में कैसे कहा जाये की इसी आजादी के लिए कभी देश में संग्राम हुआ था।

भारत ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है। परन्तु अब भारत, जिसने हर संकट की घडी में बिना धैर्य खोये हर मुसीबत का सामना किया, अनेकों बुराइयों से जकडा हुआ है। मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, जातिवाद, सत्ता लोलुपता के लिए सस्ती राजनीति करना जो कि कभी-कभी सामाजिक वैमनष्य के साथ-साथ देश की एकता को ही संकट में डाल देता है। इसके अलावा राजनीति में वंशवाद व भाई-भतीजावाद, न्यायिक प्रक्रिया में विलम्ब इन सारी नकारात्मक खूबियों से लबरेज कुशासन और कुव्यवस्था, जिसमें नौकरशाही के भ्रष्टाचार और चालबाजियों ने लोगों के दैनिक जीवन में निराशा घोल दी हो। जहाँ कुशासन ने न्याय-तंत्र की निष्पक्षता में लोगों की आस्था हिला दी हो, ऐसी आजादी किस काम की।

आज की इस आजाद भारत में रहने वालों की बात की जाये तो उनकी अपनी मानसिकता में आजादी का अलग ही मायने है। जेपी आंदोलन के प्रमुख नायकों में एक वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का कहना है कि हमारी वर्तमान व्यवस्था अर्थात संविधान के अनुसार अंतिम सत्ता साधारण नागरिक में है लेकिन उस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जो सत्ता पर आम आदमी का नियंत्रण स्थापित करे। आज जनता के हाथ में जो ताकत है, वह दिखावटी अधिक है। आजादी के बाद बना हमारा संविधान एक ऐसे उल्टे पिरामिड की रचना करता है जिसमें सत्ता नीचे से ऊपर नहीं बल्कि ऊपर से नीचे आती है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह संविधान स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के अनुरूप नहीं है। स्वाधीनता संग्राम का जो लक्ष्य था हम उस लक्ष्य तक नहीं पहुच सके हैं।

रामबहादुर राय के अनुसार वर्तमान में देश में अनुपालित संविधान सिद्धांततः तो लोकतंत्र कायम करता है लेकिन वास्तविक स्थिति में यहां लोकतंत्र नहीं है। यह अंग्रेजों की योजना में बना हुआ संविधान है। सत्ता के लिए अधीर हो चुके कांग्रेसी नेताओं ने अंग्रेजों से समझौता कर एक काम चलाऊ संविधान बना लिया। १९३५ का जो कानून अंग्रेजों ने बनाया था, उसी कानून के अस्सी फीसदी हिस्से को इस संविधान में जगह दे दी गयी है। १९३५ में बने गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट को नेहरू ने गुलामी का दस्तावेज कहा था। अब बताइए गुलामी के दस्तावेज पर बने इस संविधान को हम क्यों मानें। व्यवस्था परिवर्तन में जुडे लोगों को अब सबसे पहले इस संविधान को ही बदलने की कोशिश करनी होगी। आजादी के सही मायने तभी सामने आयेंगे जब इसके मुताबिक संविधान बनाया जायेगा

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्कूल कालेजों और अन्य सरकार विभागों पर तिरंगे झंडे को फहराने भर से आजादी का औचित्य नहीं सामने आ पाता। जिस उद्देश्य से भारत देश की आजादी के लिए लोगों ने प्रयास किये कि देश में समानता, सम्पन्नता और विकास की छंटा लहराया करेगी, सब ओर खुशहाली होगी और सब एकजुट होकर रहेंगे। यह सारी उद्देश्यपरक वैचारिकता आज के भोग-विसाली समाज में कहीं विलुप्त हो चुकी है। कष्टों से मिली आजादी पर हर भारतीय की अपनी-अपनी अलग राय है। कोई देश में कानून व्यवस्था, राजनीतिज्ञों एवं सरकारी अफसरों की बेईमानी का रोना रोते हैं। तो कुछ लोग अपनी स्वार्थता को ही आजादी का परिचायक बताते हैं। लेकिन इससे अलग एक और भारतीय वर्ग है जो सरकार और सरकारी कार्यगुजारियों की मार झेल रहा है। उनके लिए आजादी के मायने अलग हैं जब आपको इंसाफ़ के लिए लडाई लडनी पडे, मतलब आपको सही मायनों में आज़ादी नहीं मिली है। पैसे वाले आरोपी अपने रसूख़ के बल पर कानूनी प्रक्रिया को खींचते रहते हैं। जब तक देश में भय का माहौल रहेगा, हमारी आज़ादी औचित्यहीन हैं।

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

दिल-ए-हालत...

"ये कैसा महोब्बत का सफ़र देख रहा हूँ,
ना है मंजिल ना कोई राहे गुजर देख रहा हूँ !

टूटेगा दिल ये इश्क में हर बार की तरह,
में खुद को आजमा के मगर देख रहा हूँ !

यूँ मरने का मैं इतना शौकीन तो ना था,
मोहब्बत का मगर खुद पे असर देख रहा हूँ !

इस बार भी दुश्मन से खायी हैं गालियाँ,
कुछ ऐसा शराफत का असर देख रहा हूँ !

माना कि वो बेमरव्वत मुझे रखता हैं गैरों में,
मैं उसको अपना कह के मगर देख रहा हूँ !...."

कौन लेगा 'बिग थ्री' की जगह?

द्रविड़ और लक्ष्मण दोनों का ही ये आख़िरी इंग्लैंड दौरा हो सकता है. आज यदि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण अचानक से अवकाश ले लें तो ज़रा सोचिए भारतीय बल्लेबाज़ी क्रम कैसी नज़र आएगी. और ये बिल्कुल ही काल्पनिक स्थिति हो ऐसा भी नहीं है, ये शायद जल्द ही हक़ीकत बन जाए. कितनी तैयार है भारतीय टीम इन रिक्त स्थानों को भरने के लिए यह भी सामने आ जायेगा ?

इन तीनों बल्लेबाज़ों के क्रिकेट अनुभव को जोड़ें तो उन्होंने ४५३ टेस्ट खेले हैं, ३५,१५२ रन बनाए हैं और ९९ शतक लगाए हैं. ऐसे दिग्गजों की जगह कैसे भरी जा सकती है? लक्ष्मण इस नवंबर में ३७ साल के हो जाएंगे जबकि सचिन और द्रविड़ अपने अगले जन्मदिन पर ३९ मोमबत्तियां फूंकेगे. भारत की कोशिश यह सुनिश्चित करने की होगी कि तीनों एक साथ ही रिटायर न हो जाएं. ये देखना होगा कि ये बारी-बारी से रिटायर हों और नए खिलाडियों को दुनिया के आजतक के सबसे बेहतर मध्यक्रम बल्लेबाजों में गिने जानेवाले खिलाडियों से दिशानिर्देश मिल सके. इन बल्लेबाज़ों में से अब शायद ही कोई दोबारा इंग्लैंड के दौरे पर आए वैसे ये निश्चित तौर से कभी नहीं कहा जा सकता.

मिसाल के तौर पर पिछली बार जब भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई तो सचिन तेंदुलकर जहां भी गए उन्हें हर जगह प्यार भरी विदाई दी गई लेकिन अब ये लगभग तय है कि वो इस साल के अंत में होनेवाले ऑस्ट्रेलियाई दौरे में फिर शामिल होंगे. इन तीनों खिलाडियों की महानता इस बात में झलकती है कि क्रिकेट जगत से उनकी विदाई की इबारत कई बार लिखी जा चुकी है लेकिन वो हर बार गेंदबाज़ों के लिए एक बुरे सपने की तरह उभरकर आए हैं. तीनों ही बल्लेबाज़ों के पास इंग्लैंड में अपने रिकॉर्ड की कुछ कमियों को डूर करने का भी मौका हैं.

भारत में लोग यह मान चुके हैं सचिन जैसा दूसरा कोई पैदा नहीं होगा! जैसे सचिन और द्रविड़ दोनों ने मिलकर कुल ८३ टेस्ट शतक लगाए हैं लेकिन क्रिकेट का मक्का कहे जानेवाले लॉर्ड्स के मैदान पर एक भी शतक नहीं है. यदि इसमें सुनील गावस्कर के ३४ शतकों को भी जोड़ दिया जाए तो ये अपने आप में चौंकाने वाली बात है कि भारत के तीन सबसे ज्यादा शतक लगानेवालों में से किसी ने लॉर्ड्स पर शतक नहीं लगाया है. इंग्लैंड में लक्ष्मण का सर्वाधिक स्कोर ७४ रनों का है और शायद वो उसे सुधारने की कोशिश करें.

युवा खिलाडी

जिन युवा खिलाडियों ने पिछले दिनों में उम्मीद जगाई है उनमें से चेतेश्वर पुजारा चोटिल हैं, विराट कोहली का फ़ॉर्म ख़राब चल रहा है, मुरली विजय वेस्टइंडीज़ में संघर्ष करते नज़र आए और सिर्फ़ सुरेश रैना जिन्होंने श्रीलंका में अपने करियर के पहले टेस्ट में शतक जमाया वेस्ट इंडीज़ में सफल होते दिखे. इंग्लैंड में सोमरसेट के ख़िलाफ़ अभ्यास मैच में भी उन्होंने शतक जमाया.

मध्यक्रम में जिन बल्लेबाज़ों की गाडी छूट गई है, भले ही थोड़े समय के लिए, वो हैं तमिलनाडु के सुब्रमण्यम बद्रीनाथ और मुंबई के रोहित शर्मा. इस सूची में काफ़ी दम है और थोड़ी अनुभव भी. बल्कि कोहली तो शायद भविष्य में टीम इंडियन के कप्तान भी बन जाए.

टेस्ट जीवन

सचिन तेंदुलकर :- टेस्ट जीवन की शुरूआत १९८९ में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कराची में
राहुल द्रवि‹ड :- टेस्ट की शुरूआत जून १९९६, इंग्लैंड के ख़िलाफ़ लॉर्ड्स में
वीवीएस लक्ष्मण :- टेस्ट जीवन की शुरूआत नवंबर १९९६, दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में

भारतीय सेलेक्टरों ने शायद रक्षात्मक नीति अपनाई जब उन्होंने कोहली को इंग्लैंड के दौरे पर मौका नहीं दिया. लेकिन वो अभी २२ साल के ही हैं और बिग थ्री के रिक्त किए स्थान को भर सकते हैं. कोहली एक अंदर एक बुलडाग (गंभीर बल्लेबाजी के हुनरमंद) का चरित्र है. एक बार यदि उन्हें अपनी जगह मिल गई तो वो उसे छोड़ेंगे नहीं.

रैना से उम्मीद

तेज़ शॉर्ट पिच गेंदों के ख़िलाफ़ रैना की कमज़ोरी जगजाहिर है लेकिन उनके अंदर का जुझारूपन इस कमज़ोरी के बावजूद उन्हें जीत दिलाता रहता है. ठोस तकनीक सचिन और द्रविड़ जैसे खिलाडियों की पहचान है लेकिन लक्ष्मण ने दिखाया है कि कलेजा बड़ा हो तो ऑफ़ स्टंप के बाहर की कमज़ोरी से निबटा जा सकता है. रैना में भी भविष्य के कप्तान की संभावना है.. ज़िम्बाब्वे के दौरे पर वो भारतीय टीम का नेतृत्व भी कर चुके हैं!

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तेईस साल के पुजारा की ज्यादा परीक्षा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से उन्होंने बैंग्लोर टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पारी खेली वो सराहनीय थी. भारत वो टेस्ट मैच जीता था. तीसरे नंबर पर खेलते हुए उन्होंने शानदार ७२ रन बनाए और उनसे कई बड़ी पारियों की उम्मीद जगी लेकिन आईपीएल में लगी चोट ने उन्हें वेस्ट इंडीज़ और इंग्लैंड के दौरे से बाहर रखा है. जब उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की तो उन्हें अपनी ठोस तकनीक और लंबी पारी की भूख की वजह से द्रविड़ के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था. मुरली विजय को एक और उभरते द्रविड़ की तरह देखा जा रहा है. वैसे भी भारत में ये लगभग मान ही लिया गया है कि अब दूसरा तेंदुलकर नहीं पैदा हो सकता!

एक ओर जहाँ विराट कोहली के अंदर आसानी से अपनी जगह नहीं छोड़ने का जज्बा है, वहीँ मुरली विजय के तेवर भी बड़े मैचों वाले हैं और उनमें भी पिच पर चिपकने वाले वो गुण हैं जिनसे बड़े स्कोर बनते हैं. आईपीएल ने उनकी तकनीक को ज़रूर नुकसान पहुंचाया है क्योंकि उन्हें कई बार पहले से फ्रंट फुट पर खेलने का मन बनाते देखा गया है और टी-२० मैचों में फ्रंट फ़ुट को गेंद की लाईन से हटाते देखा गया है. सत्ताईस साल के विजय कोई नए नवेले नहीं हैं और इसलिए उन्हें वापस ड्रॉइंग बोर्ड पर जाने की ज़रूरत है.

युवराज का अनुभव

युवराज सिंह इतने समय से खेल रहे हैं कि कई बार आश्चर्य होता है जब पता चलता है कि उनकी उम्र ३० से नीचे है. एक दिवसीय मैचों में उनकी जगह को कोई चुनौती नहीं दे सकता, उन्होंने २७४ एक दिवसीय मैच खेले हैं. लेकिन सिर्फ़ ३४ टेस्ट मैच में उन्हें जगह मिली है और वहां वो अपने को स्थापित नहीं कर पाए हैं. उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि जब वो चल जाते हैं तो अद्भुत नज़र आते हैं लेकिन जब नहीं चल पाते तो स्विंग और स्पिन दोनों ही के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे होते हैं. बदलाव के दौर में शायद उनका अनुभव काम आए लेकिन उन्हें अब भी ये साबित करना है कि वो लंबी रेस के घोड़े हैं.

जब फ़ैबुलस फ़ोर के नाम से मशहूर बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर और वेंकटराघवन का स्पिन दौर खत्म हुआ तो कई लोगों को उम्मीद थी कि उनके उत्तराधिकारी भी बिल्कुल उन्हीं के जैसे होंगे. और इसलिए उनकी जगह आए गेंदबाज़ों की काफ़ी आलोचना हुई कि वो फ़ैब फ़ोर जैसे नहीं है. अब प्रशंसक वो ग़लती नहीं दोहराएं तो बेहतर है क्योंकि इससे उन नए खिलाडियों पर दबाव और ज्यादा बढेगा जो अपने समय के महानतम बल्लेबाज़ों के पदचिन्हों पर चलने की कोशिश कर रहे होंगे!.....

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

एक सच जीवन का ....

"कहीं सलाखें लोहे की, कहीं सलाखें तृष्णा की,
कहीं सांस का आना जाना तक पीड़ा का बंधन है/
हम सब सिलबट्टे पर रखकर खुद अपने को पीस रहे हैं,
और जमाने की नजर में- मिला मुफ्त का चन्दन है//

संबंधों के कोलाहल में सिर्फ स्वार्थ की अनुगूँज हैं,
...वरना मन की देहरी पर तो सन्नाटें ही बिखरे हैं/
रहा सवाल उड़ने का हवा में तो सुनो सलोने पंछी,
पंख तुम्हारे भी कतरे हैं, पंख हमारे भी कतरे हैं...//"

सोमवार, 27 जून 2011

अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा

अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा..
यूपी भी हो बम्बई भी हो ऐसा हिंदुस्तान हो मेरा..
मंदिर हो और मस्जिद भी हो, गिरजा और गुरुद्वारा भी हो..
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब में भाई चारा भी हो..!

सच के हो हर और उजाले, झूठों के मुह भी हो काले..
अपने चारों धाम हो जिसमे, मौला तेरा नाम हो जिसमे..
शबरी भी हो राम हो जिसमे, राधा के संग श्याम हो जिसमे..
गीता का भी ज्ञान हो जिसमे, साहिब ओ कुरान हो जिसमे..!

दिल मे खाकसारी भी हो, आँखों में चिंगारी भी हो..
प्यार की हो बातें लेकिन जंग की तैयारी भी हो..
सच्चाई की आंधी आये, फिर से कोई गाँधी आये..
झूठे जालिम संतरी ना हो, गुंडे तश्कर मंत्री ना हो..!

सच के ऊपर फायर ना हो, कोई जनरल डायर ना हो..
जयचंदो सा कायर ना हो, झूठा कोई शायर ना हो..
बिस्मिल से मतवाले भी हो, हम जैसे दिलवाले भी हो..
मीर का दीवान हो जिसमे, ग़ालिब की अजान हो जिसमे..!

सच्चाई का प्रकाश को जिसमे, सपनो का आकाश को जिसमे..
प्यार का पैगाम हो जिसमे, तेरा मेरा नाम हो जिसमे..
दुश्मन भी मेहमान हो जिसमे ऐसा हिंदुस्तान हो मेरा..
अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा...!!

मंगलवार, 21 जून 2011

द्रविड के टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे


'श्रीमान भरोसेमंद' और 'दी वाल' जैसे उप-नामो से विख्यात पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने वेस्टइंडीज के खिलाफ़ २० जून २०११ को शुरू हुए पहले क्रिकेट टेस्ट के साथ टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे किये! इस इस्टाईलिश बैट्समैन से आगे भी इसी तरह बेहतरीन खेल का मुजाहरा करते रहने की सभी क्रिकेट प्रशंशक की कामना है!

अपने क्रिकेटिंग कैरियर में द्रविड़ ने काफी उचाईयों और विरोधाभास को देखा है! इस बिच द्रविड़ धीमा खेलने के लिए टीम से निकाले भी गए और फिर वापसी करते हुए भारतीय बलेबाज़ी क्रम की रीढ़ की हड्डी भी बन गए, जिसने बिना टीम से निकले लगातार मैच खेलने का रिकॉर्ड भी बनाया!

इंग्लैंड के खिलाफ़ लार्डस में 20 जून 1996 को पदार्पण करने वाला यह कलात्मक बल्लेबाज टीम के लिए भरोसे की पहचान बन गया! आज भी जीवन के ३८ बसंत देख चुके राहुल द्रविड़ के रिप्लेसमेंट के टक्कर का कोई खिलाडी भारतीय टीम के पास नहीं है! भले ही युवाओ का खेल हो चुके एकदिनी और टी२० मैच में द्रविड़ न दिखे पर ये बात अब भी सही है की युवा खिलाडी तेज़ तो है पर उन के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है! जिसके बिना खेल के किसी भी फॉरमेट में अपना स्थान पक्का नहीं किया जा सकता ! जबकि द्रविड़ को जाना ही उनकी इसी खूबी के लिए जाता है की वो अच्छा न खलते हुए भी औसतन ३५-४० रन तो बनायेंगे ही! आज भी क्रिकेट के असली परिचायक फॉरमेट 'टेस्ट' में राहुल द्रविड़ के बिना खेलना टीम के लिए सपनो के जैसा है, जिसकी कल्पना भी वह नहिकारना चाहेगी कि जब द्रविड़, सचिन और लक्ष्मण सन्यास के बाद टीम का क्या होगा.......

रविवार, 19 जून 2011

सपना और हकीकत


खुशियों की किलकारियों में जन्म हमारा होता है,
बेफिक्र पालने में बच्चा सोता है !

पहला शब्द, पहला कदम, पहला अनुभव उसका होता है,
बांहों में नन्ही जान, आँखों में बड़े
सपने लिए बाप उसका सोता है!

एक आंसू अपने बच्चों की, पिता को दर्द देती है,
और खुद बड़ी होकर वही संतान, उसे छोड़ देती है!

क्या किया गलत पिता ने बच्चों को पाल के,
की छोड़ गए अपने उसे उम्र की शाम ढलते-ढलते!

खुद का सहारा मान, जिसे सहारा दिया उसने,
आज तन्हाईयों में सोच रहा, क्यों पूरे न हो सके सपने!

क्यों बीतते वक़्त में दुनियां बदल जाती है,
क्यों शाम आते अपनी परछाई साथ छोड़ जाती है!

समझेंगे वो कल जब खुद पर कहानी दोहराई जायेगी,
अपनों की बाते अपनों से बेरुखी निभाएगी!

तब उन्हें अपने बड़ों की याद आएगी,
तब शायद कहीं समाज में सम्मान की बयार छाएगी...!!


I Love You Papa... Happy Father's Day

शनिवार, 11 जून 2011

शत्रुता भुनाने के लिए क़ानून बनाना अनुचित

भारत में क़ानून बनाने वालों कि स्थिति दयनीय है. कानून सरकार बनाए या न्यायालयों के निर्णय हों, उनका उद्देश्य एक वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए दूसरे पक्ष को दण्डित करना होता है अभी एटा ,उ.प्र. की एक अदालत ने आनर किलिंग में तीन लोगों को मारने के लिए १० लोगों को फांसी कि सजा सुनाई गई है. बड़े- बड़े दंगों और आतंकी हत्याओं के प्रकरण में भी इतने लोगों को फांसी कि सजा नहीं हो पाती है. लड़की को किसी प्रकार पटा लो और शादी कर लो, अब उनके माँ-बाप, रिश्तेदार क्या कर लेंगे? यदि लड़की न माने तो उसको तेजाब से जलाने से लेकर हत्या के प्रयास करो या उनका एस एम् एस बनाकर प्रसारित कर दो. यदि युवकों को पता हो कि घरवालों कि सहमति के बिना विवाह नहीं होगा तो वे इतना आगे बढ़ेंगे ही नहीं . एक आशिक छात्र द्वारा भोपाल में लड़की से बदला लेने के लिए जिस प्रकार उसे और उसकी दो सहेलियों को सरे आम फ़िल्मी ढंग से कार से कुचला गया, न कुचला जाता. असामाजिक लोगों की मांग कि आनर किलिंग के लिए फांसी दो और अदालत का निर्णय, युवकों को लाभ पहुँचाने के लिए तथा उनके माता-पिता तथा रिश्तेदारों को दण्डित करने का एक उदाहरण मात्र है.


यह एक सामाजिक समस्या है. क़ानून के साथ ही ऐसी सामाजिक चेतना भी उत्पन्न की जानी चाहिए कि युवकों को ध्यान रहे कि उनके घरवालों कि सहमति के बिना विवाह मान्य नहीं होगा और अभिभावकों को समझ में आ जाए कि बच्चों की जायज मांग का आदर करना चाहिए तो समाज में वीभत्स घटनाएं रुक सकती हैं.


अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा के लिए क़ानून बनाया गया है. उसकी कंडिकाओं का मुख्य उद्देश्य बाल शिक्षा न होकर प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों की व्यवस्था को चौपट करना प्रतीत होता है. कुछ निजी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है, उनका नाम है, प्रतिष्ठा है. उन्हें दंड देना इसलिए जरूरी हो गया है उनके नाम के सामने सरकारी स्कूलों को कोई पूछ नहीं रहा है. नव वधूओं को दहेज़ के लोभी परेशान न करें, इसके लिए जो क़ानून बनाया गया है उसका दुरूपयोग आधुनिक लड़कियां पति, सास, ससुर, नन्द, जेठ, देवर जैसे सम्बंधियो को जेल भिजवाने या ब्लैकमेल करने में धड़ल्ले से कर रही हैं. कोर्ट समझ भी जाते हैं परन्तु क़ानून किसी को बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता है.


अनुसूचित जातियों को उच्च वर्ण की यातनाओं से बचाने के लिए जो क़ानून बना है उसका भी भरपूर दुरूपयोग किया जाता है. किसी सेवा में यदि उनका उच्चाधिकारी उनके विरुद्ध कोई अनुशासन हीनता के कारण कार्यवाही करना चाहता है तो वे इस नियम का आश्रय लेकर उस अधिकारी को धमकाने या फंसाने में भी नहीं चूकते हैं. इस क़ानून के विरुद्ध उस अधिकारी को कोई सहायता नहीं कर सकता है वह अधिकारी भले ही कितना अच्छा हो .महिलाओं के विरुद्ध पुरुष अधिकारिओं द्वारा कार्यवाही करने पर भी ऐसे हालात उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है. इससे शासकीय विभागों की हालत खस्ता होती जा रही है. अनुशासन के अभाव में कामचोरी और भ्रष्टाचार सर्वत्र फैलता जा रहा है. परिणाम स्वरूप सरकार अपने विभागों को सुधारने के कठिन कार्य के स्थान पर उनका निजीकरण करती जा रही है.


आने वाले समय में कलेक्टर, कमिश्नर, सचिव, मंत्री, मुख्यमंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और न्यायाधीश भी ठेके पर दिए जाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. हमें भूलना नहीं चाहिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी ऐसे ही ठेकों पर देशी रियासतों के राजा-नवाबों को नियुक्त करती थी और जब उनसे मन भर जाता था तो उसे बेदखल करके उनकी रियासत को कंपनी की संपत्ति बना लेते थे. १८५७ का संघर्ष उसी का परिणाम था. आज पुनः देश छोटा होता जा रहा है और लोग बड़े होते जा रहे हैं .इसलिए वे मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं, उसे कोई भ्रष्टाचार कहे, नाकारा कहे, भूख हड़ताल करे या अपना सिर धुने, बड़े आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है.


आज कुछ लोग कालाधन रखने वालों तथा भ्रष्टाचारिओं को फांसी देने या आजीवन कारावास देने एवं उनकी सारी संपत्ति जब्त करने की बात कर रहे हैं. आज जब यह सिद्ध हो रहा है कि जज भी भ्रष्ट हैं, पुलिस पर तो पहले से ही किसी को विश्वास नहीं है , तो पकड़े या पकडवाए गए लोगों को सजा कौन और कितने दिनों में दिलवा पायेगा जबकि आज देश कि अदालतों में ढाई करोड़ से अधिक प्रकरण लंबित हैं. इसलिए किसी भी क़ानून को बनवाने या बनाने में यह विचार सर्वोपरि रहनी चाहिए कि उससे न्याय एवं व्यवस्था स्थापित हो, उसका दुरूपयोग करने कि सम्भावना न हों तथा लोगों में परस्पर भ्रातृत्व भाव एवं एकता बनी रहे.


गुरुवार, 9 जून 2011

तलाश सूने मन की....

मैं उदास रास्ता हूँ शाम का,
मुझे आहटों की तलाश है!

ये सितारे सब हैं बुझे बुझे
मुझे जुगनुओं की तलाश है!

वो जो एक दरिया था आग का,
मेरे रास्तों से गुज़र गया!

मुझे कब से रेत के शहर में,
बारिशों की तलाश है!

मैं उदास रास्ता हूँ शाम का,
मुझे आहटों की तलाश है .....!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

चाह नहीं...

मोहब्बत में जो मिट जाता है,
वो कुछ कह नहीं सकता।
ये वो कूचा है जिसमे,
दिल सलामत रह नहीं सकता।
कि सारी दुनिया यहाँ तबाह नहीं,
कौन है जिसके लब पे आग नहीं।
उस पर दिल जरुर आएगा,
जिसके बचने कि कोई राह नहीं।
ज़िन्दगी आज नजर मिलते ही लुट जाएगी,
कि अब और जीने कि चाह नहीं।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

1901 में हुई ब्लड ग्रुप की खोज

कार्ल लैंड्सटईनेर ने 1901 में खून के ग्रुप ए, बी, बी, और की खोज की थी। इससे पहले खून के ग्रुप के बारे में जानकारी ना होने के कारण लोगो को काफी समस्याओ का सामना करना पड़ता था। 1628 में पहली बार एक कुत्ते से दुसरे कुत्ते को खूनका संचालन किया गया था। 1667 में एक व्यक्ति को किसी पशु का खून देते समय उसकी मौत हो गयी थी। 1678 में खून संचालन को गैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया था। 1818 में एक व्यक्ति की नाड़ीमें छेड़ करके नाली के माध्यम से उसमे खून डाला गया, लेकिन ग्रुप मैच ना होने के कारन खून वही जम गया। कार्ल लैंड्सटईनेर ने खून की ग्रुपों की खोज की तो बहुत से लोगों को जीवन दान मिला।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

तुम्हारी याद ....

है दिल में आह होंठो पे मेरी फ़रियाद का मौसम ,
अभी तक नम है अश्को से मेरी रूहाद का मौसम .

हजारो रंग बदले हैं ज़माने की फिजाओ ने ,
मगर दिल से नहीं जाता तुम्हारी याद का मौसम .

कभी ख्वाबो में रहता हूँ , कभी जागे ही सोता हूँ ,
तुम्हारी याद में जानम मै हर पल ही रोता हूँ .

कब पलके नहीं भींगी , गला कब तर्ख नहीं होता ,
बैठ महफ़िल में कैसे कहू की जुदाई का दर्द नहीं होता .

कभी सिसकियाँ नहीं बदली , ना ही आहों का रुख मोड़ा ,
बस दिल ही दिल में तडपा हूँ , चुपचाप ही मरता हूँ .

बुधवार, 16 जून 2010

पिता : एक व्याख्या

हर पिता अपने बेटे को जानना चाहता है, कुछ कहना चाहता है पर एक अनचाही, अनसमझी अदृश्य सोच, दोनों को थोडा दूर दूर रखे रहती हैचूँकि बेटे अपनी माँ और अपने बीच ऐसा कुछ महसूस नहीं करते हैं, इसलिए यह झिझक 'साइज़' में और भी बड़ी दिखती है, दूरी बनी रहती हैइस समस्या के विश्लेषण के लिए 'बेटा' और 'पापा' जैसे शब्दों के अन्दर उतर कर देखना समझना पड़ेगा

बेटा शब्द का अध्ययन गूढता से करना होगा। 'बे' से सबसे आसानी से बनाने वाला शब्द होगा बेफिक्रवहीँ 'टा' से 'टॉप ऑफ़ हाउस' का विचार मन में आता हैयानि घर में बाप से थोड़ी ऊँची पोजीसन पर एक बादशाहतो बेटा अर्थ निकला-"घर में बाप से बड़ा बेफिक्र बादशाह।"

अब पहले पुराने ज़माने के 'पिताजी' का अध्ययन करे तो, इसके तीन हिस्से होंगे
पि- 'पिछड़ा हुआ' सबसे उपयुक्त बैठता है
ता- तारीफ ना करने वाला
जी- जीवन भर की ज़िम्मेदारी
यानि पिताजी हुए - पिछड़ी सोच के, तारीफ ना करने वाले बेटे के सर पे पड़ी जीवन भर की ज़िम्मेदारी

अब पिताजी के आधुनिक स्वरुप पापा का अध्ययन...
पा- पारदर्शिता से दूर
पा- पुरानी सोच वाला
तो 'पापा' यानि बेटे की पारदर्शिता सोच के आगे शून्य, बस पुरानी सोच का जीव

"अब अगर ये कहे कि 'एक बेटा पिताजी के साथ रहता है।' तो कहना होगा बाप से बड़ा एक बेफिक्र बादशाह एक पिछड़ी सोच वाले, तारीफ़ ना करने वाले व् जीवन भर कि एक ज़िम्मेदारी बने, पारदर्शिता से दूर, पुरानी सोच वाले जीव के साथ रहता है। "

कड़वा लग रहा है ना! पर इस परिभाषा को १० बार लगातार पढ़िएसच्चाई, इसकी मिठास बनकर आपका गला तर कर देगीयह आज के ज़माने का सर्वत्र स्वीकार्य सत्य हैखैर, इन सब बातों से परे हट कर एक बाप को अपने बेटे कि हर बात मंजूर होती हैकहीं अगर वो टांग अडाता भी है तो बच्चे को गिरने से बचने के लिएइसे वो समझ ना सके तो ये दुर्भाग्य भी बाप के हिस्से में ही जाता है

अब रही बेटे कि भला सोचने कि बातकौन ऐसा पिता होगा जो अपने बेटे कि उन्नति ना चाहेअब तो दुआ है एक युग ऐसा आये, जहाँ एक बेटा अपने पिता से वो सब कहे, जो अपनी माँ से आसानी से कह लेता है

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