गुरुवार, 11 अगस्त 2011

जोश और उम्मीद....

खिलखिला रही है नसों में, सौ दर्द की अठखेलियाँ,

आजादी के सावन में भी गुलाम मन की होलियाँ,

कैसे भला कह दे की हम, करते नहीं परवाह तनिक,

जब देश में बम फोड़ आतंकी मना रहे दिवालियाँ।


आज भी जब देखता हूँ खून को बिखरे हुए,

अपने ही भाई बंधुओं को कराह में सिमटे हुए,

दिलो-दिमाग में छाये कुंध से तड़प उठता हूँ,

कि या तो सब रहे खुश या दुनिया ही मिटा दूं।


फैंली हो शांति दूर तक, दिलों में अमन हों,

यह देश हमारा फिर से एकता का चमन हों,

रंजो-गम के मेले में खुशियों के ठेले हों,

ना बोझ हो किसी पर, न महफिल में अकेले हों।


दिन आयेगा ऐसा भी कि खुशियां ही खिलेंगी,

तकरार की आंच पर पककर मोहब्बत ही मिलेंगी,

तीखी जुबान, कढवे विचार से भी शहद फूटेगा,

जब आदमी का गुरूर आदमी के प्यार पर टूटेगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आकाश जी....गजब का लिखा है आपने । पढ़ कर दिल खुश हो गया । "आकाश "से गिरी "एक-एक बूंद" में "हकीकत की एसिड" कैद है । जिसका हल्का सा एहसास..."फड़फड़ाने" पर मजबूर कर देती है। वाकई तबियत से लिखा है आपने। मैंने सारी रचनाएं पढ़ी....लगा जैसे मैंने क्या खो दिया था। आजादी से लेकर लाचारी और लाचारी से लेकर जज्बात और जज्बात से लेकर हिम्मत को खंगालकर …..."आकाश" का "नायाब रंग" दिखाया है। ये शब्द "गुमनाम हौंसले का परिचय" अपने आप में पूरी व्याख्या है।

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  2. shukriya bhai ji... aapko kuchh achcha laga ye meri khushkismati hai... waise aapke shabd mere liye prerna banega ki mai behtar likhu, jo aap ko pasand aaye aur "गुमनाम हौंसले का परिचय" ke shabd ko sahi thehra saku....

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