मंगलवार, 16 अगस्त 2011

एक शहर की हकीक़त...

"सुना था दिल पे राज करते हैं, दिल्ली के बाशिंदे...
मगर सच्चाईयों में उम्मीदों का अक्स टूट चूका है !

फरेबी हैं यहाँ सभी , कोई सच्चा नहीं है,
जबाँ मीठी मगर दिल से कोई अच्छा नहीं है !

किताबें और तेजी खा गई बचपन शहर के ,
उम्रे बचपन में भी कोई बच्चा यहाँ, बच्चा नहीं है !

मिर्जा के शहर में कभी, शब्दों पर भी दिल धड़कता था,
वहां अब शब्द केवल जग-हसाई के काम आता है!

महक भी खो रही है अपने जमीं की, यहाँ की पुरवाई में,
हैं शीशे के सभी लोग, कोई मकाँ भी कच्चा नहीं है!

कंक्रीट का है जंगल, संगमरमर की बूते हैं,
इन पत्थरों की भीड़ में इंसान भी घुटे हैं...!"

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई...हम तो "आकाश" के परिन्दे हो गए हैं।...लाजवाब लिखा है.....खूब लिखा है..खुलकर लिखा है आपने। दिल को छू गयी कविता।शहर तो वही रहता है रहने वाले बदल जाते है।बाकी, नजरिया तो आंख के आंसू है ...जो "माहौल देखकर टपक" पड़ते हैं । दिल्ली की आबोहवा में घुली "इस सच्चाई" को पहचानने से बेहतर है इस सच्चाई को "आदमखोर"होने से रोका जाए। वैसे आपने जो बातें लिखी है..उसे मैंने भी अपने शहर में महसूस किया। मैंने भी हैदराबाद में "कुछ समझझौते" का एहसास किया है। उसी एहसास का एक टुकड़ा आज अस कविता में पिघल रही है। दिल्ली मैं भी आया था लेकिन एक आंगन देखने को तरस गया। मैं भी पैसे कमाता हूं लेकिन शीशे से दुनिया देखता हूं।शहरों के लोग झूठे रूतबे के ताजमहल को बनाने में खुद की नींव को कमजोर कर रहे हैं। आकाश जी....अतीत के कैदखाने से बेहतर है भविष्य का शिल्पकार बना जाए।"आज नहीं तो कल होगी...मुश्किल है तो हल होगी।फिक्र ना कर प्यासे पंछी.....बर्फ भी तरल होगी"। और आखिरी में आप से एक सवाल.....शहरों की दो आंखे होती है..एक "फिक्र" का ...एक "जिक्र" का।आप किस आंखे से देखते हैं...

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  2. कविता को पसंद करने का शुक्रिया। वैसे जहां तक मेरी बात है़, मैं "जिक्र" की आंखों से "फिक्र" को आंकता हूं। दोनों नजरिया रखना जरूरी है।

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  3. बहुत खूब आकाश भाई हकीकत बयां कर दी आपने बहुत शुक्रिया....

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