शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

लब खोलोगे , तो दिल तोड़ोगे ….

हम अक्सर कुछ ऐसी बाते कहते और सुनते हैं जो हमे तो अच्छी लगती हैं पर सामने वाला इसे पसंद नहीं करता । ये तो पता था की किसी एक बात से सबको खुश नहीं रखा जा सकता , पर ये नहीं जानता था की आपकी कही एक बात किसी को दुःख भी पंहुचा सकती है । आज मैंने इस बात को भी समझ लिया की आप कुछ कहने से पहले सौ बार सोचिये की कहीं इससे कोई दुखी तो नहीं होगा । यहाँ बात कहने से तात्पर्य ये नहीं की आप किसी की बुराई या खामिया छाट रहे हैं बल्कि किससे ये बात करे इसका भी ध्यान देना जरुरी होता है ।

आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ , एक महोदय से अपने कॉमन फ्रेंड के बारे में बात की जो किसी प्रकार से उसे पता चली … खैर इसमें कोई गलत बात नहीं थी क्योंकि मै खुद उससे इस बारे में बात करने को था । मै उसे बताना चाहता था की अमुक व्यक्ति से मेरी बात हुई , पर अमुक व्यक्ति मुझसे तेज़ निकला और एक प्रकार से मेरी कही हर अच्छी-बुरी बात को उसके सामने ऐसे रखा की मै ही दोषी हो गया । अब उस मित्र को ऐसा लगता है की मैंने उसकी बुराई उसके पीठ पीछे किसी और से की है । पर ये तो मै ही जनता हूँ मैंने क्या और क्यों कहा । इन बातो के पीछे मेरी क्या मनसा थी । पर मै गलत साबित हुआ और अब मै खुद अपनी नजरो में दोषी लग रहा हूँ की चाहे जो हुआ पर मुझे किसी की बात उसकी अनुपस्थिति में किसी अन्य के सामने नहीं करनी चाहिए थी ।

अपनी गलती की माफ़ी तो मैंने आज उस दोस्त से मांग ली , साथ ही एक वायदा भी कर आया की अब उससे जुडी किसी बात को उसे छोड़ किसी से नहीं करूँगा । पर दिल को जाने क्यों ऐसा लग रहा है की अब किसी से बात नहीं करनी चाहिए, कम से कम अगले कुछ दिनों तक तो नहीं ही। शायद पहली बार इस तरह से अपना ही मजाक उड़ते मैंने पाया है कि अब हर किसी से रूठ जाने को दिल करता है । बस मै और मेरी तन्हाई ना कोई बात ना किसी की रुसवाई ….....॥

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

सवाल यही : कौन गलत, कौन सही

अपराध और राजनीती एक दुसरे के पर्याय बनते जा रहे हैंहर बार चुनाव से पहले एक सवाल उठता है की दागी छवि वाले नेताओ को टिकेट ना दिया जाये, लेकिन अगर बेदाग छवि वाले नेताओ को ढूँढना ही टेढ़ी खीर हो जाये तो? भारतीय राजनीती में हर स्तरपर ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके रसूख का जायजा उनके हथियारों के की तादाद से लिया जाता है। 'ओंकारा' तथा 'सत्या' जैसी फिल्मो के नायक ही बाहुबली थे और इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की नेताओ की बाहुबली वाली छवि को भारतीय जनमानस ने पुरो तरह अपना लिया है

कैसी विडम्बना है की गुंडों, लोफरो और बदमाशो को अब 'बाहुबली' जैसे सशक्त शब्द की पारी सीमा में गढ़ दिया गया हैजो लोगो को उनके प्रति घृणा की जगह सम्मान और उनके बढ़ते रसूख को बढ़ावा देता हैऐसे में एक सवाल उठता है की क्या वाकई भारतीय राजनीती में ये बाहुबली अपनी लिए खास मुकाम बना चुके हैं? क्या आज बाहुबली होना शर्म की नहीं गर्व की बात बन गयी है? क्या नैतिकता के लिए अब कोई जगह नहीं बची?

हमारे सामने सवाल मुश्किल हैअगर उद्योगपति अपनी अकूत दौलत की बदौलत, कोई अपराधी अपने बहुबल की तर्ज पर और कोई पत्रकार-लेखक अपनी कलम बेचकर संसद या विधानसभाओ में 'जनप्रतिनिधि' का दर्जा पाने की कोशिश करता है तो इनमे से किसे अलग और एक आदर्श के तौर पर देखा जाये???

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वो कैसा शख्स है ...



वो कैसा शख्स है की हर रोज सजा देता है
फिर हंसाता है वो इतना की सब भुला देता है

कभी जो रो दे तो मुझ को भी भूल जाता है
और फिर भूल के मुझ को भी रुला देता है

हमारे पास न आने की क़सम खा कर वो
“आजा ” लिखता है वो कागज़ पे उड़ा देता है

उससे पूछो की बताये किससे मुहब्बत है तुम्हें
नाम सरगोशी में मेरा ही सुना देता है

कभी कहता है चलो साथ हमेशा मेरे
चल पड़े साथ तो रास्ता ही फिरा देता है

खुद ही कहता है न दोहराओ पुरानी यादें
मैं न दोहराऊँ तो फिर खुद ही सुना देता है

खुद ही लिखता है की जज़्बात में हलचल ना करो
और फिर खुद ही नयी आग लगा देता है …!!!

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

संवादों ने जीता दिल …. शायद आत्मा भी जगाई


गलती का मौत दंड है , रण है …..

यह फिल्म रण के एक गीत की वह पंक्ति है जो कहानी के अनुसार मीडिया की महत्ता को दर्शाती है की अगर मीडिया ने गलती की तो मतलब सब ख़तम। वैसे तो फिल्म में कई ऐसी खासियते हैं जिन्हें अगर हम आत्मसात करे तो हमारा नैतिक विकास ही होगा । उनमे से कुछ खास संवाद निम्न हैं -


1- कुछ चुनिन्दा अवसरवादी लोगो की कट्टरपंथी सोच का नाम ही कौमी नफरत है

इस संवाद ने शायद सभी को एक बार तो यह सोचने को मजबूर कर ही दिया होगा की ये वाकई सच है । और उस पल हमारे मन की साड़ी कद्वाहते ख़तम हो गयी होंगी ।


2- कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं होता बस लोग होते हैं अपने-अपने तरीके से जीवन जीना ही धर्मं है

यह संवाद विचारों की मंथन चासनी में काफी पाक कर ही कागज़ पर आया है । लेखक भी अक्सर सोचता रहता होगा की आखिर ये धर्मं है क्या ? क्या दो लोगो के बीच विषमता की परिभाषा ही धर्मं है ?


अगर किसी भी धर्मं या जाती के दो लोगो को आपस में बदल कर एक-दुसरे के स्थान पर रखा जाएऔर सारे काम उन्हें दुसरो की तरह करने हो तो भला कौन कह पायेगा की अब वह हिन्दू-मुस्लिम याकिस अन्य जाती का है बल्कि वह सिर्फ एक इंसान है, हाड-मांस का बना जो हमारी-आपकी तरहकेवल खुद का पेट पालने के लिए काम करता है उसे ना तो दुनियादारी की चिंता है ना किसीधर्मं-जाती की , वह बस काम करता है और अपने मालिक से चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लमान अपनीमजदूरी ले घर को आता है

समाज का आईना अब सामाजिक बदलाव को जागरूक

कहने को तो फिल्मे समाज का आईना होती हैं . परदे पर वही कहानी दिखाई जाती है जो वास्तविकता में इंसानों के जीवन में घटित होती है कभी-कभी ऐसा लगता है की परदे पर प्रस्तुत हो रहा व्यक्तित्व किसी भी प्रकार से आम लोगों से मेल नहीं खता। क्या कभी ऐसा देखा गया है की हालिया हित फिल्म ‘3 idiot’ के किरदार रेंचो की तरह किसी ने इंजीनियरिंग कॉलेज में अपने तेअचेर की नाक में दम किया हो और उसे कॉलेज से निकला ना गया हो , क्योंकि वो किसी रसूखदार घर से ताल्लुक रखता है । जबकि वास्तविक जीवन में ऐसा होने की स्तिथि में तुरंत कॉलेज से फरमान जारी होता है और छात्र का पुलिंदा बांध जाता है।


ठीक इसी प्रकार रण फिल्म में भी एक ससेने दिखाया जाता है की एक मीडिया परसों जो की एक राजनीतिक हस्ती से भी ज्यादा प्रमुख है । जिसकी एक रिपोर्ट ने सर्कार बना दी और फिर गिरा दी । मन मीडिया में करिश्माई ताकतें हैं पर क्या इतना खरा स्वरुप किसी सामजिक इंसान का है … तो इसका एक ही जवाब मिलेगा की नहीं । लेकिन यह एक प्रयास है की किसी भी तरह से सामाजिक तंत्रों में सकारात्मक परिवर्तन की बयार लायी जाए । तभी तो विधु विनोद चोप्रा और हिरानी जी ने पढाई के सही तरीके को जहाँ आगे बढ़ाते हुए कामयाबी से ज्यादा काबिलियत को तवज्जो दी , वहीँ राम गोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन जैसे शशक्त कलाकार को परदे पे उतार कर मीडिया के लिए सही दिशा में आगे आने का मार्ग दिखाया ।


अक्सर ऐसा होता है की मसाला फिल्मो से अलग किसी सन्देश को लेकर प्रचारित होती फिल्मे फ्लॉप हो जाती हैं पर उसका सन्देश पूर्णतः बेकार जाए ऐसा कभी नहीं होता । तभी तो सभी प्रकार के ड्रामे के साथ हसी-मजाक में आमिर ने मन की सुनकर कैरीअर बनाने की बात कही और लोगो ने इसे सराहा । विजय हर्षवर्धन मालिक के किरदार ने भी सार्थक पत्रकारिता की लड़ाई लड़ी , जिसकी मशाल पूरब शास्त्री (रितेश देशमुख ) जैसे युवा के हाथो में थमा दी ताकि जर्नलिज्म को सही दिशा में ले जाने के लिए युवा उत्तरदाई बने ना की टीरपी को लक्ष्य बनाये ।


इस प्रकार ये साबित हो गया की अब हमारा सिल्वर स्क्रीन मसालों की तड़क भड़क के बीच समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता के साथ भी अपने कदम बाधा रहा है। जो शायद आने वाले भविष्य में हमारी नई पीढ़ी को नया तजुर्बा सिखाये।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

हम और आप सिर्फ कहते हैं...

हम और आप सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते ही है कि हमारी सरकार नाकाम है, निकम्मी है, कामचोर है, कुछ नहीं करती है, यहां कानून कोई मायने नहीं रखता है। कानून रसूखदारों और सत्तासीनों की रखैल से ज्यादा कुछ नहीं है। जल बोर्ड का पानी घर की बजाय नालियों में जाता है। नगर निगम सफाई नहीं करता है। फोन महिनों ठप्प पड़े रहते है। सड़के टूटी पड़ी रहती है लेकिन कागजों में सेंकड़ों बार बन जाती है। ट्रेनों के आने जाने का समय हमें सदी का सबसे बड़ा मजाक लगता है। हम सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते है।


लेकिन जब हम और आप विदेश जाते है तो सिगरेट के ठूंठों को लंदन की सड़कों पर नहीं फेंकते है। न्यूयोर्क की सड़कों पर गलत साइड चलाने पर ट्रेफिक के हवलदार को जानता नहीं मैं फलां का साला हू की धमकी नहीं देते। रोम की दीवारों पर भी खैनी खाकर नहीं थूकते। जबकि अपने देश में हम इंतजार कर रहे है किसी मिस्टर, मिस एंड मिसेज सुपर क्लीन का। क्या यह संभव नहीं है कि हम खुद ही कुछ छोटा-छोटा सा, थोड़ा- थोड़ा सा योगदान दे दें? यदि आपका जवाब हां है तो पहल कीजिए अपने आप से। ताकि बना सकें एसा समाज जैसा हम चाहते है। संस्कार अपने बच्चों को देना चाहते है, क्योंकि जैसा आज आप बोएगें, कल वैसा ही अपने बच्चे काटेगें।

चैनलों की भीड़ में भी अखबार का सर ऊँचा

'खींचो ना कमानों को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ अकबर इलाहाबादी की यह लाइनें आज भी उतनी ही अर्थपूर्ण है जितनी कि उस जमाने में, जब ये लिखी गई होंगी। इसे कोई नकार नहीं सकता इसका प्रमाण है कि संसद में आज भी आए दिन विभिन्न विषयों पर अखबारों की रिर्पोटों को बतौर उदाहरण रखा जाता है।

29 जनवरी 1780 को पहली बार कलकत्ता से प्रकाशित भारत के प्रथम अखबार ’बंगाल गजट’ के जन्म दिवस के रूप में 29 जनवरी को ’न्यूजपेपर डे’ मनाया जाता है। ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि खबरिया टीवी चैनलों की 24*7 खबरों की आंधी में अखबार खत्म हो जाएगा ऐसे लगाये गये सभी कयासों को अखबारों ने झूठा और तर्कहीन साबित कर दिया है। खबरिया टीवी चैनलों पर खबरों के नाम पर ब्रेकिंग न्यूज, फिल्मी प्रोग्रामों के लटके झटके, विभिन्न तरीकों से भाग्य बांचते बाबा और सुंदरियां, खोजी पत्रकारिता के नाम पर नेताओं के बेडरूम में तांक झांक, के साथ सबसे तेज खबर परोसने के दावों के बीच अखबारों के पाठक संख्या में न सिर्फ दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है बल्कि इसकी साज सज्जा, ले आउट, प्रस्तुतिकरण और कंटेट में भी तेजी से निखार आता जा रहा है। इंटरनेट के इस युग में अखबार ने भी अपने आप को समय के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की ठान रखी है। बात चाहे अखबारों के ई- संस्करणों की हो या मार्केटिंग स्ट्रेटजी की, अखबार कहीं भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे है।

यह प्रेक्टिकल बात है इस पर गौर करने की भी जरूरत है कि मौजूदा समय में अखबार को जो सबसे ज्यादा चुनौती इंटरनेट से मिल रही है और उसी इंटरनेट को भी अखबार ने अपने प्रसार का माध्यम बना लिया है। अखबारों के ई- संस्करण निश्चित तौर पर पर्यावरण के अनुकूल है, वृक्षों की भी बचत हो रही है। बावजूद सभी चुनौतियों के अखबार का वजूद अब भी हमारे देश में बहुत मजबूत है और आने वाले समय में इजाफे की पूरी संभावनाएं दिख रही हैं। बाजारीकरण के इस दौर में अखबार के सामाजिक दायित्वों और सरोकारों पर मुनाफाखोरी, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, भौतिकवाद, नंबर वन की रेस हावी होती दिख रही है, साथ ही साथ संपादकों पर मार्केटिंग कर्मियों को तबज्जों अस्वस्थ परंपरा की नींव रख रहा है। आज वही छापा जा रहा है जो बिकाऊ है।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने अखबारों पर हावी होते बाजारवाद पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि समाचार वो है जो विज्ञापन की पीठ लिखा जाता है। कुछ को छोड़कर सभी अखबार बड़े बड़े कॉर्पोरेट घरानों के व्यवसायिक प्रतिष्ठान है जो उनके कई अन्य उद्देश्यों की पूर्ति के साधन मात्र भी है। कई अखबार सिर्फ स्कीमों के दम पर बिक रहे हैं। साल भर के लिए अखबार की बुकिंग दीजिए तो एक झोला गिफ्ट में साथ मिलेगा जिसकी कीमत साल भर के अखबार की कीमत से अधिक बताई जाती है। मार्केटिंग का गणित, मार्केटिंग वाले इस तरह पाठक (याने कि उपभोक्ता) को समझाते है कि कीमत के एवज में झोला पाआ॓, रद्दी बेच कर मुनाफा कमाआ॓, फ्री में अखबार पढ़ो। ये केवल इस लिए की अखबार आपको अपनी ओर आकर्षित कर सके और आप कहीं और ना भटके ....

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

गलत दौर में पाई ज़िन्दगी



बहुत चोट खाई पर आई न चतुराई

जीवन भर बस पाता रहा मेहनत की कमाई

समझाते रहे साथी की खुद को कुछ बदलो

पर कहाँ ठेठ मानस को बात समझ में आई


अब भी लगा पड़ा हूँ अपनी ही धुन में

की न मिला चाहे कुछ पर शीश ना झुकाई

आज शायद ना झुकी नज़रों का हश्र मै जनता हूँ

हेय हुआ सबकी नज़रों में पर खुद में शाख बचाई


शायद मै आज के दौर का अवतार नहीं हूँ

फिर भी हर जंग पे है अपनी जान लड़ाई

न जीत सका इस दुनिया को अपने हिसाब से

पर जी रहा हूँ क्या ये कम है लड़ाई


हर पल बढ़ते लोगो में विश्वास को मरते देखा है

मै बढ़ा दो कदम ही पर चढ़ा विश्वास से

ना जानता हूँ ना जानने की कसक है दिल में आई

कि लोग मानते मुझे बुजदिल या मेरे हिम्मत ने दाद पाई


मै यूँ ही चल पड़ा था अपने ही जूनून में

न सोचा कोई साथी करेगा हौसला अफजाई

पर जहाँ भर की खुदगर्जी में कुछ दोस्त ऐसे मिले

जो दौड़ती दुनिया में मुझ पैदल की कर रहे बड़ाई


मै कोसू भी तो कैसे अपने ही जनम को

पर सच है मैंने गलत दौर में है ज़िन्दगी पाई

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

बंधन में उन्मुक्त सोच




पिंजरे में कैद पंछी ये सोचता रहा

छूना था आसमान पर क्या से क्या हुआ


वीरान जजीरे पे खड़ा देख रहा हूँ

हर ओर अंतहीन समंदर का सिलसिला


हम अपनी सफाई में कभी कुछ कहेंगे

एक रोज़ वक़्त खुद ही सुना देगा फैसला


लोगो की शक्ल में महज जिस्म बचे हैं

रूहें तो जाने कब की हो चुकी हैं गुमशुदा


जो ज़िन्दगी को जीते रहे अपनी तरह से

ये सिर्फ वही जानते हैं उनको क्या मिला


अच्छा कहा किसी से किसी से बुरा कहा

मै तो बस आईने की तरह पड़ा रहा


जिसने जैसा चाहा वैसा ही अक्स पाया

किसी को वाह वाही तो किसी को खरा लगा


रिश्तों को मत बना या मिटा खेल समझ कर

रिश्ते बना तो आखिरी दम तक उसे निभा ....

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

आज क़ी सरस्वती वंदना



आज माँ सरस्वती की आराधना और धरती माँ की गोद में उभरी फसलों के श्रृंगार का दिन है आज बसंत पंचमी का पावन दिवस है जिस दिन सभी लोग विद्या की देवी से अपने सुनहरे भविष्य की कामना करते हैं आज चाहे वो बुद्धिमान हो या फिर मेरे जैसा मुर्ख हर कोई माँ वीणा वादिनी से प्रार्थना करने में लगा रहेगा, की वह उसे वो सब कुछ दे जो उसे समाज के अन्य लोगो से ऊपर कर सके इस बीच हमारी मांगे भी अपनी हदों को पार कर जाती हैं विद्या की देवी से बुद्धि और ज्ञान के भंडार का वरदान मांगने के साथ-साथ हम उनसे भौतिक सुख सम्पदा और धन की भी चाह करने लगते हैं

यह कोई दोष नहीं है बल्कि हमारा भावावेश है कि हम चाहे जिस वास्तु कि खोज कर रहे हो पर जब हम भावनात्मक रूप से लबरेज होते हैं तो हमारी मुख्य मांग अपने आप हमारी जुबान पे जाती है या यूँ कहिये कि हमारी जरुरत या वो कमी जिसकी हमे ज्यादा आवश्यकता है स्वतः ही लबों पे स्फुतिक हो जाती है अगर आज के समय में लोगो कि धारणा के हिसाब से माँ सरस्वती कि आराधना मंत्र का उच्चारण होगा तो वह शायद ऐसा ही होगा....
''वीणा वादिनी वर दे , बुद्धि का भंडार दे
घर में मिले ऐश हमको, ऐसा कोई उपहार दे
करे कोई उपेक्षा , हर लब हमको जय दे
धन-धान्य कभी हमसे रूठे ,
लक्ष्मी से मेरे घर को भर दे,
माँ वीणा वादिनी वर दे......''

क्या ये दर्द भी दिखावटी है?



क्यों आत्मा जब शरीर को छोड़ कर चली जाती है तब ही सबको ज्ञात होता है की वह भला मानस था । उसके द्वारा किये गए काम सराहनीय हैं । ये सब बांटे तो उसके जीवित रहते भी तो की सकती थी । आखिर ये कैसी राजनीति हमारे समाज में फैली है की इंसान के मरणोपरांत ही उसके अनूठे कार्य की प्रशंशा होती है । क्या केवल यादों में ही किसी को अच्छा या बुरा कह देने से काम ख़त्म हो गया । यदि किसी की वास्तविक प्रशंशा करनी हो तो उसके रहते, उसके समक्ष करनी चाहिए ताकि एक स्पष्टवादिता के भाव से समाज को ओत प्रोत किया जा सके ।

आज भले ही सभी अखबारों में लेखों , सम्पादकीय और स्तंभों में ज्योति बासु जी को राजनीति का आदम पुरुष की संज्ञा दी जा रही है पर इन्ही बासु जी को कांग्रेस ने हाल ही में बने सरकार से ये कह कर किनारा कर लिया था की वाम दल की कोई निश्चित सोच नहीं की कैसे देश को विकास के पथ पर ले जाया जाए । जब कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता पायी तो पत्रकारों के पूछे सवाल पे स्पष्ट उत्तर मिला था की लेफ्ट द्वारा बार बार सर्कार को भ्रमित करने का काम किया जाता रहा है । इसलिए इस बार कांग्रेस ने अकेले , बिना लेफ्ट की मदद के सरकार बनाने तथा चलाने का काम करेगी । वहीँ विपक्षी पार्टियाँ भारतीय जनता पार्टी , समाजवादी पार्टी तो पहले से ही लेफ्ट की नीतियों पर प्रश्न उत्थाये हुए हैं । यहाँ तक की बंगाल में वामदल की चीर प्रत्ज्द्वंदी ममता बेनर्जी ने भी बासु और उनकी पार्टी को गलत नीतियों का पोषक बता कर सत्ता पर काबिज हुई । और आज ये ही सारे दुनिया से रूठे हुए महान जीवन को याद की लोरी में गुनगुना रहे हैं ।।।

रविवार, 17 जनवरी 2010

हमारी सांस्कृतिक जननी है गाय

भारतमाता को ग्रामवासिनी कहा जाता है। अर्थात भारत को पहचान देने वाली विशेषताओं एवं जीवनशक्ति प्रदान करने वाले कारकों का उद्भव गांव आधारित व्यवस्था से होता है। भारतीयता प्रदान करने वाली इस ग्रामीण संरचना का आधार गाय है। गाय ही वह केन्द्र बिन्दु है जिसके चारों तरफ भारतीयता का ताना -बाना बुना गया है। गाय का गोमय एवं गोमूत्र भूमि का पोषण करते हैं पंचगव्य मनुष्यों का पोषण करता है। रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों और जैविक खेती की बढती मांग ने गायों की महत्ता को एक बार फिर से रेखांकित किया है। भारतीय नस्ल की गायों में अल्प मात्रा में स्वर्णमाक्षिक भस्म पाए जाने और अन्य जानवरों से अधिक सुपाच्य होने की बात पुष्ट हो चुकी है। गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य औषधीय गुणों से भरपूर है। पंचगव्यों के औषधीय गुणों के कारण ही गो-चिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था के रुप में उभर रही है। गोमुत्र में कैंसररोधी तत्वों के पाए जाने की पुष्टि हो चुकी है। आयुर्वेद के अनुसार पंचगव्य का सेवन शरीर में वात, कफ और पित्त को साम्यावस्था में लाकर सभी रोगों का शमन करता है।

पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में भी गाय की महत्वपूर्ण भूमिका है। गोबर गैस प्लांटों का उपयोग खाना बनाने के लिए ईंधन के रुप में किया जा सकता है। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी के साथ रासायनिक खादों के विकल्प के रुप में हमे जैविक खाद भी मिलेगी। गोबर से बिजली प्राप्त करके हम स्वावलम्बी उर्जा गृह का निर्माण कर सकते हैं। इससे भारत को अपनी उर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए किसी के सामने रिरियाना नहीं पडेगा। ही अपनी सम्प्रभुता को गिरवी रखकर अमेरिका के साथ नाभिकीय समझौता करने की नौबत आएगी। साथ ही भारत की अकूत सम्पदा बाहर जाने से बच जाएगी।

भारत और गाय का सम्बंध आर्थिक, चिकित्सकीय एवं पर्यावरणीय से अधिक सांस्कृतिक है। पक्ष से अधिक भारत जिन मूल्यों, आस्थाओं, दर्शनों का उपासक है गाय का उनसे सम्बंध है। गाय की सांस्कृतिक महत्ता को स्वीकार करते हुए ही इसमें सभी तैंतीस करोड देवताओं का वास बताया गया है। एक भारतीय जीवन से लेकर मरण तक गोमाता से जुडा होता है। पैदा होने पर गाय के गोबर सेलीपकरघर में स्वागत किया जाता है और अंत समय उसका परिवार गोदान कर उसेवैतरणीपार कराता है। किसान नयी फसल से प्राप्त अनाज को गाय के गोबर सेगोंठकरही तौलना प्रारम्भ करता है। घर में सभी धार्मिक कर्मकाण्डों से पहले भूमि का गोमय से शुध्दीकरण आवश्यक है। और घर में बनने वाला भोजन का पहला हिस्सा गोग्रास के रुप में गोमाता को ही समर्पित किया जाता है। हम कह सकते है कि गाय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रुप से भारतीय जनजीवन में रची-बसी है। गोसंवर्ध्दन और गोसंरक्षण करके हम भारत और भारतीयता को नई शक्ति प्रदान कर सकते हैं।

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