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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011
एक सच जीवन का ....
कहीं सांस का आना जाना तक पीड़ा का बंधन है/
हम सब सिलबट्टे पर रखकर खुद अपने को पीस रहे हैं,
और जमाने की नजर में- मिला मुफ्त का चन्दन है//
संबंधों के कोलाहल में सिर्फ स्वार्थ की अनुगूँज हैं,
...वरना मन की देहरी पर तो सन्नाटें ही बिखरे हैं/
रहा सवाल उड़ने का हवा में तो सुनो सलोने पंछी,
पंख तुम्हारे भी कतरे हैं, पंख हमारे भी कतरे हैं...//"
सोमवार, 27 जून 2011
अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा
मंदिर हो और मस्जिद भी हो, गिरजा और गुरुद्वारा भी हो..
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब में भाई चारा भी हो..!
गीता का भी ज्ञान हो जिसमे, साहिब ओ कुरान हो जिसमे..!
प्यार की हो बातें लेकिन जंग की तैयारी भी हो..
सच्चाई की आंधी आये, फिर से कोई गाँधी आये..
जयचंदो सा कायर ना हो, झूठा कोई शायर ना हो..
बिस्मिल से मतवाले भी हो, हम जैसे दिलवाले भी हो..
मीर का दीवान हो जिसमे, ग़ालिब की अजान हो जिसमे..!
अपनी अपनी बातें ना हो मुल्क ही इमान हो मेरा...!!
मंगलवार, 21 जून 2011
द्रविड के टेस्ट क्रिकेट में 15 बरस पूरे

रविवार, 19 जून 2011
सपना और हकीकत

खुशियों की किलकारियों में जन्म हमारा होता है,
बेफिक्र पालने में बच्चा सोता है !
पहला शब्द, पहला कदम, पहला अनुभव उसका होता है,
बांहों में नन्ही जान, आँखों में बड़े सपने लिए बाप उसका सोता है!
एक आंसू अपने बच्चों की, पिता को दर्द देती है,
और खुद बड़ी होकर वही संतान, उसे छोड़ देती है!
क्या किया गलत पिता ने बच्चों को पाल के,
की छोड़ गए अपने उसे उम्र की शाम ढलते-ढलते!
खुद का सहारा मान, जिसे सहारा दिया उसने,
आज तन्हाईयों में सोच रहा, क्यों पूरे न हो सके सपने!
क्यों बीतते वक़्त में दुनियां बदल जाती है,
क्यों शाम आते अपनी परछाई साथ छोड़ जाती है!
समझेंगे वो कल जब खुद पर कहानी दोहराई जायेगी,
अपनों की बाते अपनों से बेरुखी निभाएगी!
तब उन्हें अपने बड़ों की याद आएगी,
तब शायद कहीं समाज में सम्मान की बयार छाएगी...!!
शनिवार, 11 जून 2011
शत्रुता भुनाने के लिए क़ानून बनाना अनुचित
भारत में क़ानून बनाने वालों कि स्थिति दयनीय है. कानून सरकार बनाए या न्यायालयों के निर्णय हों, उनका उद्देश्य एक वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए दूसरे पक्ष को दण्डित करना होता है अभी एटा ,उ.प्र. की एक अदालत ने आनर किलिंग में तीन लोगों को मारने के लिए १० लोगों को फांसी कि सजा सुनाई गई है. बड़े- बड़े दंगों और आतंकी हत्याओं के प्रकरण में भी इतने लोगों को फांसी कि सजा नहीं हो पाती है. लड़की को किसी प्रकार पटा लो और शादी कर लो, अब उनके माँ-बाप, रिश्तेदार क्या कर लेंगे? यदि लड़की न माने तो उसको तेजाब से जलाने से लेकर हत्या के प्रयास करो या उनका एस एम् एस बनाकर प्रसारित कर दो. यदि युवकों को पता हो कि घरवालों कि सहमति के बिना विवाह नहीं होगा तो वे इतना आगे बढ़ेंगे ही नहीं . एक आशिक छात्र द्वारा भोपाल में लड़की से बदला लेने के लिए जिस प्रकार उसे और उसकी दो सहेलियों को सरे आम फ़िल्मी ढंग से कार से कुचला गया, न कुचला जाता. असामाजिक लोगों की मांग कि आनर किलिंग के लिए फांसी दो और अदालत का निर्णय, युवकों को लाभ पहुँचाने के लिए तथा उनके माता-पिता तथा रिश्तेदारों को दण्डित करने का एक उदाहरण मात्र है.
यह एक सामाजिक समस्या है. क़ानून के साथ ही ऐसी सामाजिक चेतना भी उत्पन्न की जानी चाहिए कि युवकों को ध्यान रहे कि उनके घरवालों कि सहमति के बिना विवाह मान्य नहीं होगा और अभिभावकों को समझ में आ जाए कि बच्चों की जायज मांग का आदर करना चाहिए तो समाज में वीभत्स घटनाएं रुक सकती हैं.
अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा के लिए क़ानून बनाया गया है. उसकी कंडिकाओं का मुख्य उद्देश्य बाल शिक्षा न होकर प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों की व्यवस्था को चौपट करना प्रतीत होता है. कुछ निजी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है, उनका नाम है, प्रतिष्ठा है. उन्हें दंड देना इसलिए जरूरी हो गया है उनके नाम के सामने सरकारी स्कूलों को कोई पूछ नहीं रहा है. नव वधूओं को दहेज़ के लोभी परेशान न करें, इसके लिए जो क़ानून बनाया गया है उसका दुरूपयोग आधुनिक लड़कियां पति, सास, ससुर, नन्द, जेठ, देवर जैसे सम्बंधियो को जेल भिजवाने या ब्लैकमेल करने में धड़ल्ले से कर रही हैं. कोर्ट समझ भी जाते हैं परन्तु क़ानून किसी को बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता है.
अनुसूचित जातियों को उच्च वर्ण की यातनाओं से बचाने के लिए जो क़ानून बना है उसका भी भरपूर दुरूपयोग किया जाता है. किसी सेवा में यदि उनका उच्चाधिकारी उनके विरुद्ध कोई अनुशासन हीनता के कारण कार्यवाही करना चाहता है तो वे इस नियम का आश्रय लेकर उस अधिकारी को धमकाने या फंसाने में भी नहीं चूकते हैं. इस क़ानून के विरुद्ध उस अधिकारी को कोई सहायता नहीं कर सकता है वह अधिकारी भले ही कितना अच्छा हो .महिलाओं के विरुद्ध पुरुष अधिकारिओं द्वारा कार्यवाही करने पर भी ऐसे हालात उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है. इससे शासकीय विभागों की हालत खस्ता होती जा रही है. अनुशासन के अभाव में कामचोरी और भ्रष्टाचार सर्वत्र फैलता जा रहा है. परिणाम स्वरूप सरकार अपने विभागों को सुधारने के कठिन कार्य के स्थान पर उनका निजीकरण करती जा रही है.
आने वाले समय में कलेक्टर, कमिश्नर, सचिव, मंत्री, मुख्यमंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और न्यायाधीश भी ठेके पर दिए जाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. हमें भूलना नहीं चाहिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी ऐसे ही ठेकों पर देशी रियासतों के राजा-नवाबों को नियुक्त करती थी और जब उनसे मन भर जाता था तो उसे बेदखल करके उनकी रियासत को कंपनी की संपत्ति बना लेते थे. १८५७ का संघर्ष उसी का परिणाम था. आज पुनः देश छोटा होता जा रहा है और लोग बड़े होते जा रहे हैं .इसलिए वे मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं, उसे कोई भ्रष्टाचार कहे, नाकारा कहे, भूख हड़ताल करे या अपना सिर धुने, बड़े आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है.
आज कुछ लोग कालाधन रखने वालों तथा भ्रष्टाचारिओं को फांसी देने या आजीवन कारावास देने एवं उनकी सारी संपत्ति जब्त करने की बात कर रहे हैं. आज जब यह सिद्ध हो रहा है कि जज भी भ्रष्ट हैं, पुलिस पर तो पहले से ही किसी को विश्वास नहीं है , तो पकड़े या पकडवाए गए लोगों को सजा कौन और कितने दिनों में दिलवा पायेगा जबकि आज देश कि अदालतों में ढाई करोड़ से अधिक प्रकरण लंबित हैं. इसलिए किसी भी क़ानून को बनवाने या बनाने में यह विचार सर्वोपरि रहनी चाहिए कि उससे न्याय एवं व्यवस्था स्थापित हो, उसका दुरूपयोग करने कि सम्भावना न हों तथा लोगों में परस्पर भ्रातृत्व भाव एवं एकता बनी रहे.
गुरुवार, 9 जून 2011
तलाश सूने मन की....
मुझे आहटों की तलाश है!
ये सितारे सब हैं बुझे बुझे
वो जो एक दरिया था आग का,
मेरे रास्तों से गुज़र गया!
मुझे कब से रेत के शहर में,
मुझे आहटों की तलाश है .....!
सोमवार, 27 सितंबर 2010
चाह नहीं...
वो कुछ कह नहीं सकता।
ये वो कूचा है जिसमे,
दिल सलामत रह नहीं सकता।
कि सारी दुनिया यहाँ तबाह नहीं,
कौन है जिसके लब पे आग नहीं।
उस पर दिल जरुर आएगा,
जिसके बचने कि कोई राह नहीं।
ज़िन्दगी आज नजर मिलते ही लुट जाएगी,
कि अब और जीने कि चाह नहीं।
शनिवार, 11 सितंबर 2010
1901 में हुई ब्लड ग्रुप की खोज
सोमवार, 6 सितंबर 2010
तुम्हारी याद ....
बुधवार, 16 जून 2010
पिता : एक व्याख्या
बेटा शब्द का अध्ययन गूढता से करना होगा। 'बे' से सबसे आसानी से बनाने वाला शब्द होगा बेफिक्र। वहीँ 'टा' से 'टॉप ऑफ़ द हाउस' का विचार मन में आता है। यानि घर में बाप से थोड़ी ऊँची पोजीसन पर एक बादशाह। तो बेटा अर्थ निकला-"घर में बाप से बड़ा बेफिक्र बादशाह।"
अब पहले पुराने ज़माने के 'पिताजी' का अध्ययन करे तो, इसके तीन हिस्से होंगे।
पि- 'पिछड़ा हुआ' सबसे उपयुक्त बैठता है।
ता- तारीफ ना करने वाला।
जी- जीवन भर की ज़िम्मेदारी।
यानि पिताजी हुए - पिछड़ी सोच के, तारीफ ना करने वाले बेटे के सर पे पड़ी जीवन भर की ज़िम्मेदारी।
अब पिताजी के आधुनिक स्वरुप पापा का अध्ययन...
पा- पारदर्शिता से दूर
पा- पुरानी सोच वाला
तो 'पापा' यानि बेटे की पारदर्शिता सोच के आगे शून्य, बस पुरानी सोच का जीव।
"अब अगर ये कहे कि 'एक बेटा पिताजी के साथ रहता है।' तो कहना होगा बाप से बड़ा एक बेफिक्र बादशाह एक पिछड़ी सोच वाले, तारीफ़ ना करने वाले व् जीवन भर कि एक ज़िम्मेदारी बने, पारदर्शिता से दूर, पुरानी सोच वाले जीव के साथ रहता है। "
कड़वा लग रहा है ना! पर इस परिभाषा को १० बार लगातार पढ़िए। सच्चाई, इसकी मिठास बनकर आपका गला तर कर देगी। यह आज के ज़माने का सर्वत्र स्वीकार्य सत्य है। खैर, इन सब बातों से परे हट कर एक बाप को अपने बेटे कि हर बात मंजूर होती है। कहीं अगर वो टांग अडाता भी है तो बच्चे को गिरने से बचने के लिए। इसे वो समझ ना सके तो ये दुर्भाग्य भी बाप के हिस्से में ही जाता है।
अब रही बेटे कि भला सोचने कि बात। कौन ऐसा पिता होगा जो अपने बेटे कि उन्नति ना चाहे। अब तो दुआ है एक युग ऐसा आये, जहाँ एक बेटा अपने पिता से वो सब कहे, जो अपनी माँ से आसानी से कह लेता है।
गुरुवार, 27 मई 2010
आज का नौजवान
यही मकसद है शायद आजकल दाढ़ी बढ़ाने का।
नक़ल फ़िल्मी अदाकारों की वो फैशन समझता है,
वह तहजीब की बातो को पिछड़ापन समझता है।
जिया करता है नशे में दिल को बहला कर,
गुजरती हैं दिन उसके लोगों को उल्लू बनाकर।
बोली-भाषा-हुनर और ज्ञान में जीरो ही जीरो है,
वह बरातों में पीकर नाच सकता है तो हीरो है।
कभी शिक्षक को मारा, कभी हड़ताल करवा दी,
उसे हर रोज़ मिलनी चाहिए पढने से आज़ादी।
हो जाये झगडा खलासी से तो बस जला डाली,
खता माली की थी बुनियाद गुलशन की मिटा डाली।
यह हसरत है की रोज किसी से जंग हो जाये,
हमे पढना नहीं, औरों को क्यों पढने दिया जाये।
लड़े हक के लिए इसके सिवा रास्ता क्या है,
हमारा फ़र्ज़ क्या है इससे हमको वास्ता क्या है।
हमारे साथ जो हड़ताल में शामिल नहीं होगा,
सलामत लौट पाए घर को इस काबिल नहीं होगा।
नक़ल को क्यों नहीं इम्तिहान में आबाद किया जाये,
किताबे पढ़ के किस लिए सेहत बर्बाद की जाये।
नक़ल करने से हमके क्या रोकेगा कोई साला,
खुला रखा है जब टेबल पे कट्टा व चाकू रामपुर वाला।
यही चाकू हमारे ज़िन्दगी का रहनुमा होगा,
इसी की नोक पर हर नौकरी का दर खुला होगा।
क्या बच गयी है और भी कुछ इस वक़्त की बाते,
तो फिर चाँद लाइने और लिख के कहेंगे,
आज के युवा की हैं ये सब करामातें.....
सिगरेट : तू ही सच्चा हमसफ़र
गमे दौराँ में जब हमदम ना कोई काम आया,मेरे मायूस लब पर उस समय तेरा नाम आया,
मेरे हर हमसफ़र ने साथ जब मझधार में छोड़ा,
यही सिगरेट है जिसने नहीं मेरा दिल तोडा।।
अभी भी गम है हजारों मेरी राहो में,
चला आया हूँ पर भाग कर इसकी पनाहों में,
जहाँ तक साथ भी मेरे अपने दे नहीं पाए,
वहां तक पहुचे है इसके छल्लो के सुर्खरू साये।।
यह मेरे साथ है तो रंज मुझसे दूर रहता है,
मेरे तमाम रातो में इसी का नूर रहता है,
ये खुद जल के देती है चमक मेरे अरमानो को,
सुकून देती है जला के , गम के ठिकानो को।।
माना की ये मेरे जीवन को यकीनी से इत्तेफाक करती है,
क्या हुआ की ये दिल जिगर को जला के ख़ाक करती है,
हम तो वैसे भी यहाँ अकेलेपन में मरते हैं,
इसके आने से वो सूनापन तो मिटता है...
हम पल-पल सुलगते हैं, वो धीरे-धीरे से बुझता है।।।।
शनिवार, 22 मई 2010
कुछ अपने कर्त्तव्य
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
लब खोलोगे , तो दिल तोड़ोगे ….
हम अक्सर कुछ ऐसी बाते कहते और सुनते हैं जो हमे तो अच्छी लगती हैं पर सामने वाला इसे पसंद नहीं करता । ये तो पता था की किसी एक बात से सबको खुश नहीं रखा जा सकता , पर ये नहीं जानता था की आपकी कही एक बात किसी को दुःख भी पंहुचा सकती है । आज
आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ , एक महोदय से अपने कॉमन फ्रेंड के बारे में बात की जो किसी प्रकार से उसे पता चली … खैर इसमें कोई गलत बात नहीं थी क्योंकि मै खुद उससे इस बारे में बात करने को था । मै उसे बताना चाहता था की अमुक व्यक्ति से मेरी बात हुई , पर अमुक व्यक्ति मुझसे तेज़ निकला और एक प्रकार से मेरी कही हर अच्छी-बुरी बात को उसके सामने ऐसे रखा की मै ही दोषी हो
अपनी गलती की माफ़ी तो
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
सवाल यही : कौन गलत, कौन सही
कैसी विडम्बना है की गुंडों, लोफरो और बदमाशो को अब 'बाहुबली' जैसे सशक्त शब्द की पारी सीमा में गढ़ दिया गया है। जो लोगो को उनके प्रति घृणा की जगह सम्मान और उनके बढ़ते रसूख को बढ़ावा देता है। ऐसे में एक सवाल उठता है की क्या वाकई भारतीय राजनीती में ये बाहुबली अपनी लिए खास मुकाम बना चुके हैं? क्या आज बाहुबली होना शर्म की नहीं गर्व की बात बन गयी है? क्या नैतिकता के लिए अब कोई जगह नहीं बची?
हमारे सामने सवाल मुश्किल है। अगर उद्योगपति अपनी अकूत दौलत की बदौलत, कोई अपराधी अपने बहुबल की तर्ज पर और कोई पत्रकार-लेखक अपनी कलम बेचकर संसद या विधानसभाओ में 'जनप्रतिनिधि' का दर्जा पाने की कोशिश करता है तो इनमे से किसे अलग और एक आदर्श के तौर पर देखा जाये???
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
वो कैसा शख्स है ...
वो कैसा शख्स है की हर रोज सजा देता है
फिर हंसाता है वो इतना की सब भुला देता है
कभी जो रो दे तो मुझ को भी भूल जाता है
और फिर भूल के मुझ को भी रुला देता है
हमारे पास न आने की क़सम खा कर वो
“आजा ” लिखता है वो कागज़ पे उड़ा देता है
उससे पूछो की बताये किससे मुहब्बत है तुम्हें
नाम सरगोशी में मेरा ही सुना देता है
कभी कहता है चलो साथ हमेशा मेरे
चल पड़े साथ तो रास्ता ही फिरा देता है
खुद ही कहता है न दोहराओ पुरानी यादें
मैं न दोहराऊँ तो फिर खुद ही सुना देता है
खुद ही लिखता है की जज़्बात में हलचल ना करो
और फिर खुद ही नयी आग लगा देता है …!!!
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
संवादों ने जीता दिल …. शायद आत्मा भी जगाई
यह फिल्म रण के एक गीत की वह पंक्ति है जो कहानी के अनुसार मीडिया की महत्ता को दर्शाती है की अगर मीडिया ने
1- कुछ चुनिन्दा अवसरवादी लोगो की कट्टरपंथी सोच का नाम ही कौमी नफरत है ।
इस संवाद ने शायद सभी को एक बार तो यह सोचने को मजबूर कर ही दिया होगा की ये वाकई सच है । और उस पल हमारे मन की साड़ी कद्वाहते ख़तम हो गयी होंगी ।
2- कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं होता बस लोग होते हैं । अपने-अपने तरीके से जीवन जीना ही धर्मं है ।
यह संवाद विचारों की मंथन चासनी में काफी पाक कर ही कागज़ पर आया है । लेखक भी अक्सर सोचता रहता होगा की आखिर ये धर्मं है क्या ? क्या दो लोगो के बीच विषमता की परिभाषा ही धर्मं है ?
अगर किसी भी धर्मं या जाती के दो लोगो को आपस में बदल कर एक-दुसरे के स्थान पर रखा जाएऔर सारे काम उन्हें दुसरो की तरह करने हो तो भला कौन कह पायेगा की अब वह हिन्दू-मुस्लिम याकिस अन्य जाती का है । बल्कि वह सिर्फ एक इंसान है, हाड-मांस का बना जो हमारी-आपकी तरहकेवल खुद का पेट पालने के लिए काम करता है । उसे ना तो दुनियादारी की चिंता है ना किसीधर्मं-जाती की , वह बस काम करता है और अपने मालिक से चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लमान अपनीमजदूरी ले घर को आता है ।
समाज का आईना अब सामाजिक बदलाव को जागरूक
कहने को तो फिल्मे समाज का आईना होती हैं . परदे पर वही कहानी दिखाई जाती है जो वास्तविकता में इंसानों के जीवन में घटित होती है कभी-कभी ऐसा लगता है की परदे पर प्रस्तुत हो रहा व्यक्तित्व किसी भी प्रकार से आम लोगों से मेल नहीं खता। क्या कभी ऐसा देखा
अक्सर ऐसा होता है की मसाला फिल्मो से अलग किसी सन्देश को लेकर प्रचारित होती फिल्मे फ्लॉप हो जाती हैं पर उसका सन्देश पूर्णतः बेकार जाए ऐसा कभी नहीं होता । तभी तो सभी प्रकार के ड्रामे के साथ हसी-मजाक में आमिर ने मन की सुनकर कैरीअर बनाने की बात कही और लोगो ने इसे सराहा । विजय हर्षवर्धन मालिक के किरदार ने भी सार्थक पत्रकारिता की लड़ाई लड़ी , जिसकी मशाल पूरब शास्त्री (रितेश देशमुख ) जैसे युवा के हाथो में थमा दी ताकि जर्नलिज्म को सही दिशा में ले जाने के लिए युवा उत्तरदाई बने ना की टीरपी को लक्ष्य बनाये ।
इस प्रकार ये साबित हो गया की अब हमारा सिल्वर स्क्रीन मसालों की तड़क भड़क के बीच समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता के साथ भी अपने कदम बाधा रहा है। जो शायद आने वाले भविष्य में हमारी नई पीढ़ी को नया तजुर्बा सिखाये।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
हम और आप सिर्फ कहते हैं...
हम और आप सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते ही है कि हमारी सरकार नाकाम है, निकम्मी है, कामचोर है, कुछ नहीं करती है, यहां कानून कोई मायने नहीं रखता है। कानून रसूखदारों और सत्तासीनों की रखैल से ज्यादा कुछ नहीं है। जल बोर्ड का पानी घर की बजाय नालियों में जाता है। नगर निगम सफाई नहीं करता है। फोन महिनों ठप्प पड़े रहते है। सड़के टूटी पड़ी रहती है लेकिन कागजों में सेंकड़ों बार बन जाती है। ट्रेनों के आने जाने का समय हमें सदी का सबसे बड़ा मजाक लगता है। हम सिर्फ कहते है और सिर्फ कहते है।
लेकिन जब हम और आप विदेश जाते है तो सिगरेट के ठूंठों को लंदन की सड़कों पर नहीं फेंकते है। न्यूयोर्क की सड़कों पर गलत साइड चलाने पर ट्रेफिक के हवलदार को ‘जानता नहीं मैं फलां का साला हू’ की धमकी नहीं देते। रोम की दीवारों पर भी खैनी खाकर नहीं थूकते। जबकि अपने देश में हम इंतजार कर रहे है किसी मिस्टर, मिस एंड मिसेज सुपर क्लीन का। क्या यह संभव नहीं है कि हम खुद ही कुछ छोटा-छोटा सा, थोड़ा- थोड़ा सा योगदान दे दें? यदि आपका जवाब हां है तो पहल कीजिए अपने आप से। ताकि बना सकें एसा समाज जैसा हम चाहते है। संस्कार अपने बच्चों को देना चाहते है, क्योंकि जैसा आज आप बोएगें, कल वैसा ही अपने बच्चे काटेगें।
चैनलों की भीड़ में भी अखबार का सर ऊँचा
29 जनवरी 1780 को पहली बार कलकत्ता से प्रकाशित भारत के प्रथम अखबार ’बंगाल गजट’ के जन्म दिवस के रूप में 29 जनवरी को ’न्यूजपेपर डे’ मनाया जाता है। ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि खबरिया टीवी चैनलों की 24*7 खबरों की आंधी में अखबार खत्म हो जाएगा ऐसे लगाये गये सभी कयासों को अखबारों ने झूठा और तर्कहीन साबित कर दिया है। खबरिया टीवी चैनलों पर खबरों के नाम पर ब्रेकिंग न्यूज, फिल्मी प्रोग्रामों के लटके झटके, विभिन्न तरीकों से भाग्य बांचते बाबा और सुंदरियां, खोजी पत्रकारिता के नाम पर नेताओं के बेडरूम में तांक झांक, के साथ सबसे तेज खबर परोसने के दावों के बीच अखबारों के पाठक संख्या में न सिर्फ दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है बल्कि इसकी साज सज्जा, ले आउट, प्रस्तुतिकरण और कंटेट में भी तेजी से निखार आता जा रहा है। इंटरनेट के इस युग में अखबार ने भी अपने आप को समय के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की ठान रखी है। बात चाहे अखबारों के ई- संस्करणों की हो या मार्केटिंग स्ट्रेटजी की, अखबार कहीं भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे है।
यह प्रेक्टिकल बात है इस पर गौर करने की भी जरूरत है कि मौजूदा समय में अखबार को जो सबसे ज्यादा चुनौती इंटरनेट से मिल रही है और उसी इंटरनेट को भी अखबार ने अपने प्रसार का माध्यम बना लिया है। अखबारों के ई- संस्करण निश्चित तौर पर पर्यावरण के अनुकूल है, वृक्षों की भी बचत हो रही है। बावजूद सभी चुनौतियों के अखबार का वजूद अब भी हमारे देश में बहुत मजबूत है और आने वाले समय में इजाफे की पूरी संभावनाएं दिख रही हैं। बाजारीकरण के इस दौर में अखबार के सामाजिक दायित्वों और सरोकारों पर मुनाफाखोरी, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, भौतिकवाद, नंबर वन की रेस हावी होती दिख रही है, साथ ही साथ संपादकों पर मार्केटिंग कर्मियों को तबज्जों अस्वस्थ परंपरा की नींव रख रहा है। आज वही छापा जा रहा है जो बिकाऊ है।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने अखबारों पर हावी होते बाजारवाद पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि समाचार वो है जो विज्ञापन की पीठ लिखा जाता है। कुछ को छोड़कर सभी अखबार बड़े बड़े कॉर्पोरेट घरानों के व्यवसायिक प्रतिष्ठान है जो उनके कई अन्य उद्देश्यों की पूर्ति के साधन मात्र भी है। कई अखबार सिर्फ स्कीमों के दम पर बिक रहे हैं। साल भर के लिए अखबार की बुकिंग दीजिए तो एक झोला गिफ्ट में साथ मिलेगा जिसकी कीमत साल भर के अखबार की कीमत से अधिक बताई जाती है। मार्केटिंग का गणित, मार्केटिंग वाले इस तरह पाठक (याने कि उपभोक्ता) को समझाते है कि कीमत के एवज में झोला पाआ॓, रद्दी बेच कर मुनाफा कमाआ॓, फ्री में अखबार पढ़ो। ये केवल इस लिए की अखबार आपको अपनी ओर आकर्षित कर सके और आप कहीं और ना भटके ....